Ch 3 . आय एवं रोजगार का निर्धारण

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आय एवं रोजगार निर्धारण अध्याय मुख्यतः संबंधित है—

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यदि MPC = 0.75 हो तो गुणक होगा—

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अपस्फीतिक अंतर का संबंध है—

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मुद्रास्फीतिक अंतर का संबंध है—

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अल्प मांग की स्थिति में सरकार को करना चाहिए—

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Keynes के अनुसार रोजगार स्तर निर्भर करता है—

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संतुलन आय का दूसरा नाम है—

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जब उपभोग आय से अधिक हो, तब बचत—

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बचत वक्र X-अक्ष को जहाँ काटता है, वहाँ—

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गुणक प्रभाव सबसे अधिक होगा जब—

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निवेश बढ़ने पर राष्ट्रीय आय—

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समष्टि मांग में शामिल नहीं है—

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APC + APS बराबर होता है—

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APS का सूत्र है—

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यदि आय ₹500 और उपभोग ₹400 है, तो बचत होगी—

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अल्पकालीन संतुलन में उत्पादन स्तर निर्धारित होता है—

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समष्टि मांग वक्र सामान्यतः होता है—

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गुणक प्रक्रिया का संबंध है—

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यदि MPC = 0.6 हो, तो MPS होगा—

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आय का वह भाग जो उपभोग पर खर्च नहीं होता कहलाता है—

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Keynesian सिद्धांत संबंधित है—

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जब AD, AS से अधिक हो तो—

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प्रेरित निवेश निर्भर करता है—

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स्वायत्त निवेश प्रभावित नहीं होता—

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संतुलन स्तर पर—

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यदि MPC अधिक हो तो गुणक—

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निवेश गुणक का प्रभाव निर्भर करता है—

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समष्टि पूर्ति (AS) बराबर होती है—

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अल्प मांग दूर करने हेतु केंद्रीय बैंक—

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अत्यधिक मांग को नियंत्रित करने के लिए सरकार—

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अल्प मांग (Deficient Demand) से उत्पन्न होती है—

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अत्यधिक मांग (Excess Demand) की स्थिति में—

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पूर्ण रोजगार की स्थिति में—

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अनैच्छिक बेरोजगारी का अर्थ है—

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अर्थव्यवस्था में संतुलन का अर्थ है—

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संतुलन आय का निर्धारण होता है जब—

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यदि MPS = 0.25 हो, तो गुणक होगा—

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निवेश गुणक (Multiplier) का सूत्र है—

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जब आय शून्य होती है तब उपभोग कहलाता है—

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बचत फलन दर्शाता है—

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औसत उपभोग प्रवृत्ति (APC) का सूत्र है—

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MPC + MPS बराबर होता है—

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MPS का सूत्र है—

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यदि आय में ₹100 की वृद्धि पर उपभोग ₹80 बढ़ता है, तो MPC होगा—

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MPC का मान सदैव होता है—

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MPC का पूरा नाम है—

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यदि आय बढ़ती है तो सामान्यतः उपभोग—

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उपभोग फलन दर्शाता है—

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समष्टि मांग के घटक हैं—

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समष्टि मांग (Aggregate Demand) का अर्थ है—

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