नीचे CBSE कक्षा 12 राजनीति विज्ञान (Political Science)
पुस्तक: Politics in India Since Independence
अध्याय 6 – क्षेत्रीय आकांक्षाएँ (Regional Aspirations)
के आधार पर 20 महत्वपूर्ण प्रश्न और उत्तर दिए गए हैं।
1. क्षेत्रीय आकांक्षाएँ क्या हैं?
उत्तर:
क्षेत्रीय आकांक्षाएँ वे राजनीतिक, सामाजिक और सांस्कृतिक मांगें हैं जो किसी विशेष क्षेत्र या समुदाय द्वारा अपनी पहचान, विकास या स्वायत्तता के लिए की जाती हैं। भारत जैसे विविध देश में अलग-अलग भाषाई, धार्मिक और सांस्कृतिक समूह रहते हैं, इसलिए उनकी अलग-अलग अपेक्षाएँ भी होती हैं। ये मांगें राज्य निर्माण, अधिक स्वायत्तता या संसाधनों के न्यायपूर्ण वितरण से जुड़ी हो सकती हैं। भारत का लोकतंत्र इन आकांक्षाओं को वैध मानता है और उन्हें राष्ट्रीय एकता के खिलाफ नहीं समझता। बल्कि संवाद और समझौते के माध्यम से इनका समाधान किया जाता है।
2. भारत ने क्षेत्रीय विविधता को कैसे संभाला?
उत्तर:
भारत ने क्षेत्रीय विविधता को लोकतांत्रिक और संघीय ढांचे के माध्यम से संभाला है। स्वतंत्रता के बाद सरकार ने विभिन्न भाषाई और सांस्कृतिक समूहों को मान्यता दी। भाषाई आधार पर राज्यों का पुनर्गठन किया गया, जिससे लोगों की पहचान को सम्मान मिला। इसके साथ ही केंद्र और राज्यों के बीच शक्तियों का विभाजन किया गया। लोकतंत्र ने लोगों को अपनी मांगें शांतिपूर्ण तरीके से रखने का अवसर दिया। इस प्रकार भारत ने “एकता में विविधता” की नीति अपनाई, जिससे राष्ट्रीय एकता भी बनी रही और क्षेत्रीय आकांक्षाओं का समाधान भी संभव हुआ।
3. जम्मू-कश्मीर की क्षेत्रीय समस्या क्या है?
उत्तर:
जम्मू-कश्मीर की समस्या ऐतिहासिक, राजनीतिक और भौगोलिक कारणों से जुड़ी है। 1947 में इसके भारत में विलय के बाद पाकिस्तान के साथ विवाद शुरू हुआ। राज्य में अनुच्छेद 370 के तहत विशेष दर्जा दिया गया, जिससे इसे कुछ स्वायत्तता प्राप्त थी। यहां अलगाववाद, आतंकवाद और बाहरी हस्तक्षेप जैसी समस्याएँ भी उभरीं। इसके अलावा क्षेत्र के विभिन्न हिस्सों—जम्मू, कश्मीर घाटी और लद्दाख—की अलग-अलग पहचान भी तनाव का कारण बनी। समय-समय पर केंद्र सरकार ने बातचीत और विकास के माध्यम से स्थिति सुधारने का प्रयास किया है।
4. अनुच्छेद 370 का महत्व बताइए।
उत्तर:
अनुच्छेद 370 भारतीय संविधान का वह प्रावधान था जो जम्मू-कश्मीर को विशेष दर्जा देता था। इसके तहत राज्य को अपना संविधान बनाने और कई मामलों में स्वायत्तता प्राप्त थी। रक्षा, विदेश नीति और संचार को छोड़कर अन्य विषयों पर राज्य सरकार का अधिकार था। इसका उद्देश्य राज्य की विशेष परिस्थितियों को ध्यान में रखना था। हालांकि, इसके कारण राष्ट्रीय एकीकरण पर बहस भी हुई। 2019 में इसे समाप्त कर दिया गया और राज्य का पुनर्गठन किया गया। यह भारत के संघीय ढांचे में एक महत्वपूर्ण संवैधानिक परिवर्तन था।
5. पंजाब संकट के प्रमुख कारण क्या थे?
उत्तर:
पंजाब संकट के कई राजनीतिक और सामाजिक कारण थे। अकाली दल द्वारा अलग पंजाबी सूबा की मांग भाषा और संस्कृति के आधार पर उठाई गई थी। 1980 के दशक में आनंदपुर साहिब प्रस्ताव के माध्यम से अधिक स्वायत्तता की मांग की गई। इसके साथ ही आर्थिक असंतोष, बेरोजगारी और केंद्र-राज्य संबंधों में तनाव भी था। चरमपंथी गतिविधियों और आतंकवाद ने स्थिति को और बिगाड़ दिया। ऑपरेशन ब्लू स्टार और उसके बाद हुई हिंसा ने संकट को और गंभीर बना दिया। अंततः 1985 के राजीव-लोंगोवाल समझौते से शांति स्थापित करने का प्रयास किया गया।
6. ऑपरेशन ब्लू स्टार क्या था?
उत्तर:
ऑपरेशन ब्लू स्टार 1984 में भारतीय सेना द्वारा चलाया गया एक सैन्य अभियान था। इसका उद्देश्य अमृतसर के स्वर्ण मंदिर में छिपे उग्रवादियों को बाहर निकालना था। इस कार्रवाई में मंदिर परिसर को भारी नुकसान पहुँचा और कई लोगों की मृत्यु हुई। इससे सिख समुदाय की भावनाएँ आहत हुईं और देशभर में तनाव फैल गया। इस घटना का राजनीतिक प्रभाव बहुत बड़ा पड़ा और इसके बाद प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की हत्या भी हुई। यह घटना पंजाब संकट का एक महत्वपूर्ण मोड़ मानी जाती है।
7. असम आंदोलन क्यों हुआ?
उत्तर:
असम आंदोलन 1979–1985 के बीच चला एक बड़ा जन आंदोलन था। इसका मुख्य कारण अवैध प्रवासियों की बढ़ती संख्या और स्थानीय संसाधनों पर दबाव था। असम के लोगों को अपनी सांस्कृतिक पहचान और रोजगार के अवसरों के खोने का डर था। ऑल असम स्टूडेंट्स यूनियन (AASU) ने इस आंदोलन का नेतृत्व किया। आंदोलन का उद्देश्य “विदेशियों” की पहचान कर उन्हें हटाना था। लंबे संघर्ष के बाद 1985 में असम समझौता हुआ, जिसमें कई समस्याओं के समाधान का प्रयास किया गया।
8. असम समझौता (1985) क्या है?
उत्तर:
असम समझौता 1985 में केंद्र सरकार और असम आंदोलन के नेताओं के बीच हुआ एक समझौता था। इसका उद्देश्य अवैध प्रवासियों की समस्या का समाधान करना था। इसमें 1971 के बाद आए लोगों की पहचान कर उन्हें हटाने का प्रावधान था। साथ ही असम के लोगों की सांस्कृतिक पहचान की रक्षा का आश्वासन दिया गया। इस समझौते के बाद राज्य में शांति स्थापित करने का प्रयास किया गया। यह समझौता क्षेत्रीय समस्याओं के समाधान का एक महत्वपूर्ण उदाहरण माना जाता है।
9. उत्तर-पूर्व भारत की समस्याएँ क्या थीं?
उत्तर:
उत्तर-पूर्व भारत की समस्याएँ मुख्यतः अलगाववाद, विकास की कमी और सांस्कृतिक पहचान से जुड़ी थीं। इस क्षेत्र में कई जनजातीय समूह रहते हैं जिनकी अलग पहचान है। भौगोलिक अलगाव के कारण विकास धीमा रहा। कुछ समूहों ने स्वतंत्रता या अधिक स्वायत्तता की मांग की। मिजो नेशनल फ्रंट जैसे संगठनों ने सशस्त्र आंदोलन भी किया। सरकार ने बाद में बातचीत और समझौते के माध्यम से समाधान किया। मिजोरम जैसे राज्यों को पूर्ण राज्य का दर्जा देकर शांति स्थापित की गई।
10. मिजो नेशनल फ्रंट (MNF) का क्या महत्व है?
उत्तर:
मिजो नेशनल फ्रंट (MNF) मिजोरम का एक प्रमुख संगठन था जिसने अलगाववादी आंदोलन चलाया। इसका नेतृत्व लालडेंगा ने किया। 1966 में इसने सशस्त्र विद्रोह शुरू किया। आंदोलन का उद्देश्य स्वतंत्र मिजोरम की स्थापना था। बाद में सरकार और MNF के बीच बातचीत हुई। 1986 में मिजो समझौता हुआ, जिसके बाद मिजोरम को पूर्ण राज्य का दर्जा मिला। यह भारत में शांतिपूर्ण समाधान का एक सफल उदाहरण है।
11. सिक्किम का भारत में विलय कैसे हुआ?
उत्तर:
सिक्किम पहले एक संरक्षित राज्य था जो भारत के संरक्षण में कार्य करता था। यहां चोग्याल शासन था। धीरे-धीरे लोकतांत्रिक आंदोलन बढ़ा और जनता ने भारत में विलय की मांग की। 1975 में जनमत संग्रह कराया गया, जिसमें भारत में शामिल होने का निर्णय लिया गया। इसके बाद सिक्किम भारत का 22वां राज्य बन गया। यह प्रक्रिया शांतिपूर्ण और लोकतांत्रिक तरीके से पूरी हुई।
12. गोवा का भारत में विलय कब हुआ?
उत्तर:
गोवा 1961 तक पुर्तगाली उपनिवेश था। भारत सरकार ने “ऑपरेशन विजय” के तहत इसे मुक्त कराया। इसके बाद गोवा भारत का केंद्र शासित प्रदेश बना। 1987 में इसे पूर्ण राज्य का दर्जा दिया गया। गोवा का विलय भारत की एकता और उपनिवेशवाद विरोधी नीति का हिस्सा था।
13. क्षेत्रीय पार्टियों की भूमिका क्या है?
उत्तर:
क्षेत्रीय पार्टियाँ भारत के लोकतंत्र में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं। ये पार्टियाँ स्थानीय मुद्दों और क्षेत्रीय पहचान को राजनीतिक मंच पर लाती हैं। ये केंद्र और राज्यों के बीच संतुलन बनाने में मदद करती हैं। उदाहरण के लिए अकाली दल, DMK, नेशनल कॉन्फ्रेंस आदि। ये पार्टियाँ गठबंधन राजनीति में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं। इससे लोकतंत्र अधिक समावेशी बनता है।
14. भारत में गठबंधन राजनीति क्यों बढ़ी?
उत्तर:
गठबंधन राजनीति 1989 के बाद तेजी से बढ़ी। इसका मुख्य कारण एक दल के वर्चस्व का कमजोर होना था। क्षेत्रीय पार्टियों का उदय हुआ। मतदाताओं की विविधता और क्षेत्रीय मुद्दों का महत्व बढ़ा। किसी भी पार्टी को स्पष्ट बहुमत नहीं मिलने लगा। इसलिए कई पार्टियों ने मिलकर सरकार बनानी शुरू की। इससे राजनीति अधिक सहमति आधारित हो गई।
15. क्षेत्रीय आकांक्षाएँ लोकतंत्र का हिस्सा क्यों हैं?
उत्तर:
लोकतंत्र में लोगों को अपनी बात रखने की स्वतंत्रता होती है। इसलिए क्षेत्रीय आकांक्षाएँ लोकतंत्र का महत्वपूर्ण हिस्सा हैं। ये मांगें विकास, पहचान और स्वायत्तता से जुड़ी होती हैं। भारत का संविधान इन्हें स्वीकार करता है। शांतिपूर्ण आंदोलन और बातचीत के माध्यम से इनका समाधान किया जाता है। इसलिए इन्हें देश-विरोधी नहीं माना जाता।
16. भारत का संघीय ढांचा क्या है?
उत्तर:
भारत का संघीय ढांचा केंद्र और राज्यों के बीच शक्तियों के विभाजन पर आधारित है। संविधान ने विषयों को केंद्र सूची, राज्य सूची और समवर्ती सूची में विभाजित किया है। इससे राज्यों को अपने मामलों में स्वतंत्रता मिलती है। यह व्यवस्था विविधता वाले देश के लिए उपयुक्त है। इससे क्षेत्रीय समस्याओं का समाधान आसान होता है।
17. क्षेत्रीय असंतोष के कारण क्या हैं?
उत्तर:
क्षेत्रीय असंतोष के कई कारण होते हैं जैसे आर्थिक पिछड़ापन, सांस्कृतिक उपेक्षा, बेरोजगारी और राजनीतिक असमानता। जब किसी क्षेत्र को विकास में पीछे छोड़ा जाता है तो लोग असंतुष्ट हो जाते हैं। पहचान और संसाधनों को लेकर भी तनाव उत्पन्न होता है। यह असंतोष कभी-कभी आंदोलन का रूप ले लेता है।
18. राष्ट्रीय एकता और क्षेत्रीयता में संबंध क्या है?
उत्तर:
राष्ट्रीय एकता और क्षेत्रीयता एक-दूसरे के विरोधी नहीं हैं। क्षेत्रीयता लोगों की पहचान और संस्कृति को दर्शाती है। राष्ट्रीय एकता विभिन्न क्षेत्रों को जोड़ती है। भारत में दोनों के बीच संतुलन बनाए रखा गया है। लोकतंत्र इस संतुलन को मजबूत करता है।
19. भारत में भाषा आधारित राज्य क्यों बनाए गए?
उत्तर:
भाषा आधारित राज्यों का निर्माण लोगों की सांस्कृतिक पहचान को सम्मान देने के लिए किया गया। 1956 के राज्य पुनर्गठन आयोग ने यह सुझाव दिया। इससे प्रशासन आसान हुआ और क्षेत्रीय मांगें भी कम हुईं। इससे लोकतंत्र मजबूत हुआ।
20. क्षेत्रीय समस्याओं के समाधान के तरीके क्या हैं?
उत्तर:
क्षेत्रीय समस्याओं के समाधान के लिए बातचीत, समझौता और लोकतांत्रिक प्रक्रिया सबसे अच्छे तरीके हैं। सरकार विकास योजनाओं के माध्यम से असंतोष कम करती है। संघीय ढांचा और राज्य पुनर्गठन भी सहायक होते हैं। हिंसा की बजाय शांतिपूर्ण समाधान को प्राथमिकता दी जाती है।
