CBSE कक्षा 12 मनोविज्ञान (2026-27)
अध्याय 5 : चिकित्सीय उपागम (Therapeutic Approaches)
20 महत्वपूर्ण प्रश्न एवं उत्तर
नोट: ये प्रश्न-उत्तर नवीनतम CBSE 2026-27 पाठ्यक्रम के अनुसार तैयार किए गए हैं, जिसमें मनोचिकित्सा की प्रकृति, विभिन्न उपचार पद्धतियाँ, वैकल्पिक उपचार तथा पुनर्वास शामिल हैं।
1. मनोचिकित्सा (Psychotherapy) से क्या अभिप्राय है?
उत्तर:
मनोचिकित्सा एक ऐसी वैज्ञानिक एवं योजनाबद्ध प्रक्रिया है जिसमें प्रशिक्षित चिकित्सक (Therapist) और क्लाइंट के बीच सहयोगात्मक संबंध स्थापित किया जाता है। इसका उद्देश्य व्यक्ति के मानसिक तनाव, भावनात्मक समस्याओं तथा असामंजस्यपूर्ण व्यवहार को कम करना होता है। इसमें विभिन्न मनोवैज्ञानिक सिद्धांतों और तकनीकों का प्रयोग करके व्यक्ति के विचारों, भावनाओं और व्यवहार में सकारात्मक परिवर्तन लाया जाता है। मनोचिकित्सा व्यक्ति को आत्म-समझ विकसित करने, समस्याओं का समाधान खोजने तथा बेहतर समायोजन करने में सहायता देती है। यह मानसिक स्वास्थ्य सुधारने का एक प्रभावी माध्यम है।
2. चिकित्सीय संबंध (Therapeutic Relationship) क्या है?
उत्तर:
चिकित्सीय संबंध वह विशेष और व्यावसायिक संबंध है जो चिकित्सक और क्लाइंट के बीच स्थापित होता है। यह संबंध विश्वास, सहानुभूति, गोपनीयता और सम्मान पर आधारित होता है। चिकित्सक क्लाइंट की समस्याओं को बिना आलोचना किए सुनता है तथा उसे अपनी भावनाएँ व्यक्त करने के लिए सुरक्षित वातावरण प्रदान करता है। इस संबंध के कारण क्लाइंट खुलकर अपने अनुभव साझा कर पाता है और उपचार प्रक्रिया अधिक प्रभावी बनती है। सफल मनोचिकित्सा के लिए चिकित्सीय संबंध का मजबूत होना अत्यंत आवश्यक माना जाता है क्योंकि यही उपचार की नींव है।
3. मनोगतिक चिकित्सा (Psychodynamic Therapy) की प्रमुख विशेषताएँ बताइए।
उत्तर:
मनोगतिक चिकित्सा का विकास सिग्मंड फ्रायड ने किया था। यह चिकित्सा इस धारणा पर आधारित है कि व्यक्ति के वर्तमान व्यवहार और मानसिक समस्याओं का संबंध उसके अचेतन मन तथा बचपन के अनुभवों से होता है। इस चिकित्सा में मुक्त साहचर्य (Free Association), स्वप्न विश्लेषण (Dream Analysis) तथा स्थानांतरण (Transference) जैसी तकनीकों का उपयोग किया जाता है। चिकित्सक क्लाइंट को अपने विचार और भावनाएँ स्वतंत्र रूप से व्यक्त करने के लिए प्रोत्साहित करता है। इसका उद्देश्य अचेतन संघर्षों को चेतन स्तर पर लाकर उनका समाधान करना है ताकि व्यक्ति के व्यवहार में सुधार हो सके।
4. मुक्त साहचर्य (Free Association) तकनीक क्या है?
उत्तर:
मुक्त साहचर्य मनोगतिक चिकित्सा की एक महत्वपूर्ण तकनीक है। इसमें क्लाइंट को आरामदायक स्थिति में बैठाकर या लेटाकर कहा जाता है कि वह अपने मन में आने वाले सभी विचारों, भावनाओं और स्मृतियों को बिना किसी रोक-टोक के व्यक्त करे। चिकित्सक इन विचारों को ध्यानपूर्वक सुनता है और उनमें छिपे अचेतन संघर्षों को समझने का प्रयास करता है। इस प्रक्रिया से दबी हुई इच्छाएँ, भावनाएँ और अनुभव सामने आते हैं। मुक्त साहचर्य क्लाइंट को आत्म-समझ विकसित करने तथा मानसिक संघर्षों के मूल कारणों को पहचानने में सहायता करता है।
5. व्यवहार चिकित्सा (Behaviour Therapy) क्या है?
उत्तर:
व्यवहार चिकित्सा सीखने के सिद्धांतों पर आधारित एक उपचार पद्धति है। इसका मुख्य उद्देश्य व्यक्ति के अनुचित या अवांछित व्यवहारों को बदलकर उपयुक्त व्यवहार विकसित करना होता है। यह चिकित्सा वर्तमान व्यवहार पर ध्यान देती है और मानती है कि अधिकांश समस्यात्मक व्यवहार सीखे गए होते हैं, इसलिए उन्हें पुनः सीखा या बदला जा सकता है। इसमें पुनर्बलन (Reinforcement), मॉडलिंग, प्रणालीबद्ध असंवेदीकरण तथा टोकन इकोनॉमी जैसी तकनीकों का उपयोग किया जाता है। व्यवहार चिकित्सा विशेष रूप से फोबिया, चिंता तथा व्यवहार संबंधी समस्याओं के उपचार में प्रभावी मानी जाती है।
6. प्रणालीबद्ध असंवेदीकरण (Systematic Desensitisation) क्या है?
उत्तर:
प्रणालीबद्ध असंवेदीकरण व्यवहार चिकित्सा की एक तकनीक है जिसका उपयोग मुख्यतः फोबिया और भय के उपचार में किया जाता है। इस तकनीक में सबसे पहले क्लाइंट को विश्राम (Relaxation) करना सिखाया जाता है। इसके बाद भय उत्पन्न करने वाली परिस्थितियों की एक सूची तैयार की जाती है, जिसे भय श्रेणी (Hierarchy) कहा जाता है। क्लाइंट को धीरे-धीरे कम भय वाली स्थिति से अधिक भय वाली स्थिति तक कल्पना करने के लिए कहा जाता है। विश्राम और भय एक साथ नहीं रह सकते, इसलिए धीरे-धीरे भय की तीव्रता कम हो जाती है। इससे व्यक्ति अपने भय पर नियंत्रण प्राप्त कर लेता है।
7. मॉडलिंग (Modelling) तकनीक क्या है?
उत्तर:
मॉडलिंग व्यवहार चिकित्सा की एक तकनीक है जिसमें व्यक्ति दूसरों के व्यवहार को देखकर सीखता है। इसमें चिकित्सक या कोई अन्य व्यक्ति आदर्श व्यवहार का प्रदर्शन करता है और क्लाइंट उसका अवलोकन करके उसे अपनाने का प्रयास करता है। उदाहरण के लिए, यदि कोई बच्चा सामाजिक परिस्थितियों में डरता है, तो उसे आत्मविश्वास से व्यवहार करने वाले व्यक्ति का उदाहरण दिखाया जा सकता है। बार-बार अभ्यास और प्रोत्साहन के माध्यम से क्लाइंट नया व्यवहार सीख लेता है। यह तकनीक सामाजिक कौशल विकसित करने तथा भय और चिंता को कम करने में उपयोगी होती है।
8. संज्ञानात्मक चिकित्सा (Cognitive Therapy) क्या है?
उत्तर:
संज्ञानात्मक चिकित्सा का उद्देश्य व्यक्ति के त्रुटिपूर्ण विचारों और मान्यताओं को पहचानकर उन्हें बदलना होता है। इस चिकित्सा के अनुसार मानसिक समस्याएँ अक्सर नकारात्मक और अवास्तविक सोच के कारण उत्पन्न होती हैं। चिकित्सक क्लाइंट को अपने विचारों का विश्लेषण करने तथा उनके स्थान पर अधिक यथार्थवादी और सकारात्मक विचार विकसित करने में सहायता करता है। यह चिकित्सा अवसाद, चिंता और तनाव जैसी समस्याओं में विशेष रूप से प्रभावी मानी जाती है। संज्ञानात्मक चिकित्सा व्यक्ति को समस्या समाधान कौशल विकसित करने और आत्मविश्वास बढ़ाने में भी मदद करती है।
9. REBT (Rational Emotive Behaviour Therapy) क्या है?
उत्तर:
REBT का विकास अल्बर्ट एलिस ने किया था। यह संज्ञानात्मक चिकित्सा की एक महत्वपूर्ण विधि है। इसके अनुसार व्यक्ति की समस्याओं का मुख्य कारण घटनाएँ नहीं बल्कि उनके बारे में उसकी अविवेकपूर्ण धारणाएँ होती हैं। चिकित्सक क्लाइंट की नकारात्मक और अवास्तविक मान्यताओं की पहचान करता है तथा उन्हें तर्कसंगत विचारों से बदलने में सहायता करता है। उदाहरण के लिए, “मुझे हर कार्य में सफल होना ही चाहिए” जैसी धारणा को अधिक यथार्थवादी सोच से बदला जाता है। इससे व्यक्ति की भावनात्मक परेशानियाँ कम होती हैं और उसका व्यवहार अधिक अनुकूल बनता है।
10. संज्ञानात्मक व्यवहार चिकित्सा (CBT) क्या है?
उत्तर:
संज्ञानात्मक व्यवहार चिकित्सा (CBT) संज्ञानात्मक और व्यवहार चिकित्सा का संयोजन है। यह मानती है कि व्यक्ति के विचार, भावनाएँ और व्यवहार एक-दूसरे से जुड़े होते हैं। यदि नकारात्मक विचारों को बदला जाए तो भावनाओं और व्यवहार में भी सुधार आ सकता है। CBT में क्लाइंट को अपने नकारात्मक विचारों की पहचान करने और उन्हें सकारात्मक तथा यथार्थवादी विचारों से बदलने का प्रशिक्षण दिया जाता है। साथ ही व्यवहार परिवर्तन की तकनीकों का भी उपयोग किया जाता है। यह अवसाद, चिंता, तनाव और फोबिया जैसी समस्याओं के उपचार में अत्यंत प्रभावी मानी जाती है।
11. मानवतावादी चिकित्सा (Humanistic Therapy) क्या है?
उत्तर:
मानवतावादी चिकित्सा इस विश्वास पर आधारित है कि प्रत्येक व्यक्ति में विकास और आत्म-साक्षात्कार की क्षमता होती है। यह चिकित्सा व्यक्ति की वर्तमान भावनाओं, अनुभवों और संभावनाओं पर बल देती है। चिकित्सक क्लाइंट को बिना शर्त स्वीकृति (Unconditional Positive Regard), सहानुभूति और सम्मान प्रदान करता है। इससे क्लाइंट स्वयं को बेहतर ढंग से समझ पाता है और अपनी क्षमताओं का विकास कर सकता है। इस चिकित्सा का उद्देश्य केवल समस्या का समाधान करना नहीं बल्कि व्यक्ति के समग्र व्यक्तित्व विकास और आत्म-विकास को प्रोत्साहित करना भी है।
12. बिना शर्त सकारात्मक सम्मान (Unconditional Positive Regard) क्या है?
उत्तर:
बिना शर्त सकारात्मक सम्मान कार्ल रोजर्स की क्लाइंट-केंद्रित चिकित्सा का एक महत्वपूर्ण सिद्धांत है। इसका अर्थ है कि चिकित्सक क्लाइंट को उसकी कमियों, गलतियों या समस्याओं के बावजूद पूर्ण सम्मान और स्वीकृति प्रदान करता है। चिकित्सक क्लाइंट का मूल्यांकन या आलोचना नहीं करता, बल्कि उसकी भावनाओं को समझने का प्रयास करता है। इससे क्लाइंट स्वयं को सुरक्षित महसूस करता है और खुलकर अपनी समस्याएँ व्यक्त कर पाता है। यह वातावरण आत्म-स्वीकृति और आत्म-विकास को बढ़ावा देता है तथा उपचार प्रक्रिया को अधिक प्रभावी बनाता है।
13. अस्तित्ववादी चिकित्सा (Existential Therapy) का उद्देश्य क्या है?
उत्तर:
अस्तित्ववादी चिकित्सा व्यक्ति को जीवन के अर्थ, स्वतंत्रता, जिम्मेदारी और व्यक्तिगत चुनावों को समझने में सहायता करती है। यह मानती है कि प्रत्येक व्यक्ति अपने जीवन का निर्माता है और उसे अपने निर्णयों की जिम्मेदारी स्वयं लेनी चाहिए। इस चिकित्सा में व्यक्ति को अपनी समस्याओं, चिंताओं और जीवन के उद्देश्य पर विचार करने के लिए प्रेरित किया जाता है। चिकित्सक क्लाइंट को आत्म-जागरूकता विकसित करने और जीवन के प्रति सकारात्मक दृष्टिकोण अपनाने में सहायता करता है। इसका लक्ष्य व्यक्ति को अधिक सार्थक और संतुलित जीवन जीने में सक्षम बनाना है।
14. जैव-चिकित्सा (Biomedical Therapy) क्या है?
उत्तर:
जैव-चिकित्सा मानसिक विकारों के उपचार की वह पद्धति है जिसमें औषधियों तथा अन्य जैविक उपायों का उपयोग किया जाता है। यह इस धारणा पर आधारित है कि कई मानसिक विकार मस्तिष्क और तंत्रिका तंत्र की जैविक प्रक्रियाओं से संबंधित होते हैं। अवसाद, सिज़ोफ्रेनिया और गंभीर चिंता विकारों में दवाओं का प्रयोग किया जाता है। कुछ मामलों में विद्युत आक्षेपी चिकित्सा (ECT) भी उपयोगी हो सकती है। जैव-चिकित्सा अक्सर मनोचिकित्सा के साथ मिलकर दी जाती है ताकि उपचार अधिक प्रभावी हो सके और रोगी की कार्यक्षमता में सुधार आए।
15. वैकल्पिक उपचार (Alternative Therapies) क्या हैं?
उत्तर:
वैकल्पिक उपचार वे विधियाँ हैं जो मानसिक एवं शारीरिक स्वास्थ्य सुधारने के लिए पारंपरिक मनोचिकित्सा के साथ या उसके पूरक रूप में उपयोग की जाती हैं। इनमें योग, ध्यान (Meditation), प्राणायाम और आयुर्वेद जैसी पद्धतियाँ शामिल हैं। ये तकनीकें तनाव कम करने, भावनात्मक संतुलन बनाए रखने तथा आत्म-जागरूकता बढ़ाने में सहायक होती हैं। नियमित अभ्यास से व्यक्ति की मानसिक शांति, एकाग्रता और समग्र स्वास्थ्य में सुधार होता है। भारत में योग और ध्यान को मानसिक स्वास्थ्य संवर्धन के प्रभावी साधनों के रूप में व्यापक मान्यता प्राप्त है।
16. पुनर्वास (Rehabilitation) क्या है?
उत्तर:
पुनर्वास वह प्रक्रिया है जिसके माध्यम से मानसिक रोग से पीड़ित व्यक्ति को पुनः सामान्य और स्वतंत्र जीवन जीने योग्य बनाया जाता है। इसका उद्देश्य रोगी की सामाजिक, व्यावसायिक और व्यक्तिगत कार्यक्षमता को पुनर्स्थापित करना है। पुनर्वास में व्यावसायिक प्रशिक्षण, सामाजिक कौशल प्रशिक्षण, परिवार का सहयोग और सामुदायिक सहायता शामिल हो सकते हैं। यह विशेष रूप से गंभीर मानसिक विकारों से ग्रस्त व्यक्तियों के लिए महत्वपूर्ण है। पुनर्वास व्यक्ति के आत्मविश्वास को बढ़ाता है तथा उसे समाज में सम्मानपूर्वक जीवन जीने में सहायता प्रदान करता है।
17. मनोचिकित्सा के प्रमुख उद्देश्य लिखिए।
उत्तर:
मनोचिकित्सा का मुख्य उद्देश्य व्यक्ति के मानसिक स्वास्थ्य में सुधार लाना है। इसके अंतर्गत असामंजस्यपूर्ण व्यवहार को बदलना, भावनात्मक तनाव को कम करना तथा व्यक्ति को अपनी समस्याओं से प्रभावी ढंग से निपटने योग्य बनाना शामिल है। यह आत्म-जागरूकता बढ़ाने, आत्मविश्वास विकसित करने तथा बेहतर सामाजिक समायोजन स्थापित करने में सहायता करती है। मनोचिकित्सा व्यक्ति को सकारात्मक सोच विकसित करने और जीवन की चुनौतियों का सामना करने के लिए आवश्यक कौशल प्रदान करती है। इसके परिणामस्वरूप व्यक्ति अधिक संतुलित, स्वस्थ और संतोषजनक जीवन जी सकता है।
18. व्यवहार चिकित्सा और संज्ञानात्मक चिकित्सा में अंतर बताइए।
उत्तर:
व्यवहार चिकित्सा मुख्यतः व्यक्ति के प्रत्यक्ष व्यवहार पर ध्यान देती है और यह मानती है कि समस्यात्मक व्यवहार सीखे गए होते हैं, जिन्हें पुनः सीखा जा सकता है। इसके विपरीत, संज्ञानात्मक चिकित्सा व्यक्ति के विचारों और मान्यताओं पर केंद्रित होती है। व्यवहार चिकित्सा में पुनर्बलन, मॉडलिंग और असंवेदीकरण जैसी तकनीकों का उपयोग किया जाता है, जबकि संज्ञानात्मक चिकित्सा में नकारात्मक विचारों की पहचान और संशोधन पर बल दिया जाता है। दोनों का उद्देश्य मानसिक समस्याओं को कम करना है, परंतु उनका कार्यक्षेत्र और तकनीकें भिन्न होती हैं।
19. सहानुभूति (Empathy) का चिकित्सीय प्रक्रिया में क्या महत्व है?
उत्तर:
सहानुभूति का अर्थ है दूसरे व्यक्ति की भावनाओं और अनुभवों को उसके दृष्टिकोण से समझना। चिकित्सीय प्रक्रिया में सहानुभूति अत्यंत महत्वपूर्ण होती है क्योंकि इससे क्लाइंट को यह अनुभव होता है कि उसकी समस्याओं को समझा जा रहा है। सहानुभूतिपूर्ण व्यवहार क्लाइंट और चिकित्सक के बीच विश्वास को मजबूत बनाता है। इससे क्लाइंट खुलकर अपनी भावनाएँ व्यक्त कर पाता है और उपचार प्रक्रिया अधिक प्रभावी बनती है। सहानुभूति व्यक्ति के आत्मविश्वास और आत्म-स्वीकृति को भी बढ़ाती है, जिससे मानसिक स्वास्थ्य में सुधार होता है।
20. विभिन्न चिकित्सीय उपागमों की आवश्यकता क्यों होती है?
उत्तर:
प्रत्येक व्यक्ति की मानसिक समस्याएँ, व्यक्तित्व और परिस्थितियाँ अलग-अलग होती हैं। इसलिए सभी व्यक्तियों के लिए एक ही प्रकार की चिकित्सा उपयुक्त नहीं हो सकती। कुछ समस्याओं में व्यवहार चिकित्सा अधिक प्रभावी होती है, जबकि अन्य में संज्ञानात्मक, मानवतावादी या मनोगतिक चिकित्सा लाभदायक हो सकती है। विभिन्न चिकित्सीय उपागम चिकित्सकों को व्यक्ति की आवश्यकता के अनुसार उपचार चुनने की सुविधा प्रदान करते हैं। इससे उपचार अधिक व्यक्तिगत, प्रभावी और सफल बनता है। यही कारण है कि मनोविज्ञान में अनेक प्रकार की चिकित्सीय पद्धतियों का विकास हुआ है।
