CBSE कक्षा 12 अर्थशास्त्र (Indian Economic Development)
अध्याय 8: वर्तमान भारतीय अर्थव्यवस्था की चुनौतियाँ (Current Challenges Facing Indian Economy)
इस अध्याय में मुख्यतः मानव पूंजी निर्माण, ग्रामीण विकास, रोजगार तथा सतत आर्थिक विकास जैसे विषय शामिल हैं।


1. मानव पूंजी निर्माण क्या है? इसका आर्थिक विकास में क्या महत्व है?

उत्तर:
मानव पूंजी निर्माण वह प्रक्रिया है जिसके द्वारा शिक्षा, स्वास्थ्य, प्रशिक्षण तथा कौशल विकास के माध्यम से लोगों की उत्पादक क्षमता में वृद्धि की जाती है। किसी देश के विकास में मानव पूंजी की महत्वपूर्ण भूमिका होती है क्योंकि शिक्षित एवं स्वस्थ जनसंख्या अधिक कुशलता से कार्य करती है। इससे उत्पादन, आय और रोजगार के अवसर बढ़ते हैं। भारत में शिक्षा और स्वास्थ्य पर किए गए निवेश को मानव पूंजी निर्माण का प्रमुख साधन माना जाता है। यह न केवल आर्थिक विकास को गति देता है बल्कि जीवन स्तर में सुधार और सामाजिक प्रगति को भी बढ़ावा देता है।


2. मानव पूंजी और मानव विकास में अंतर स्पष्ट कीजिए।

उत्तर:
मानव पूंजी का संबंध व्यक्ति की उत्पादक क्षमता से होता है, जिसे शिक्षा, प्रशिक्षण और स्वास्थ्य के माध्यम से विकसित किया जाता है। इसका उद्देश्य आर्थिक उत्पादन बढ़ाना है। दूसरी ओर, मानव विकास एक व्यापक अवधारणा है जिसमें लोगों के जीवन स्तर, शिक्षा, स्वास्थ्य, स्वतंत्रता और अवसरों का विस्तार शामिल होता है। मानव पूंजी आर्थिक लाभ पर केंद्रित होती है जबकि मानव विकास व्यक्ति के समग्र कल्याण पर बल देता है। दोनों अवधारणाएँ परस्पर जुड़ी हुई हैं क्योंकि मानव पूंजी में वृद्धि से मानव विकास को बढ़ावा मिलता है।


3. भारत में शिक्षा क्षेत्र के विकास का महत्व बताइए।

उत्तर:
शिक्षा किसी भी राष्ट्र के विकास की आधारशिला होती है। भारत में शिक्षा के विस्तार से साक्षरता दर बढ़ी है तथा लोगों में जागरूकता आई है। शिक्षा व्यक्तियों को बेहतर रोजगार प्राप्त करने और तकनीकी ज्ञान हासिल करने में सहायता करती है। इससे उत्पादकता और आय में वृद्धि होती है। शिक्षा सामाजिक असमानताओं को कम करने तथा महिलाओं के सशक्तिकरण में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। आर्थिक विकास के लिए कुशल मानव संसाधन आवश्यक होते हैं, जिन्हें शिक्षा के माध्यम से तैयार किया जाता है। इसलिए शिक्षा क्षेत्र का विकास राष्ट्रीय विकास का प्रमुख साधन माना जाता है।


4. ग्रामीण विकास का अर्थ और महत्व बताइए।

उत्तर:
ग्रामीण विकास का अर्थ ग्रामीण क्षेत्रों में आर्थिक एवं सामाजिक प्रगति लाना है। इसका उद्देश्य ग्रामीण जनता के जीवन स्तर में सुधार करना तथा रोजगार और आय के अवसर बढ़ाना है। भारत की बड़ी आबादी गाँवों में रहती है, इसलिए ग्रामीण विकास देश के समग्र विकास के लिए आवश्यक है। इसमें कृषि विकास, ग्रामीण आधारभूत संरचना, शिक्षा, स्वास्थ्य तथा वित्तीय सुविधाओं का विस्तार शामिल है। ग्रामीण विकास से गरीबी और बेरोजगारी कम होती है तथा ग्रामीण-शहरी असमानता घटती है। यह संतुलित आर्थिक विकास को बढ़ावा देता है।


5. ग्रामीण ऋण की समस्या क्या है?

उत्तर:
ग्रामीण क्षेत्रों में किसानों और छोटे उत्पादकों को अक्सर पर्याप्त एवं सस्ता ऋण उपलब्ध नहीं हो पाता। परिणामस्वरूप वे साहूकारों और निजी ऋणदाताओं पर निर्भर हो जाते हैं, जो ऊँची ब्याज दर वसूलते हैं। इससे किसान ऋणग्रस्तता के चक्र में फँस जाते हैं। कृषि उत्पादन बढ़ाने के लिए समय पर ऋण आवश्यक होता है, परंतु संस्थागत ऋण की कमी ग्रामीण विकास में बाधा बनती है। इस समस्या के समाधान हेतु सहकारी समितियाँ, क्षेत्रीय ग्रामीण बैंक तथा वाणिज्यिक बैंक महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।


6. सहकारी समितियों की भूमिका स्पष्ट कीजिए।

उत्तर:
सहकारी समितियाँ ग्रामीण विकास में महत्वपूर्ण योगदान देती हैं। ये किसानों को कम ब्याज दर पर ऋण उपलब्ध कराती हैं तथा कृषि आदानों की आपूर्ति में सहायता करती हैं। सहकारी समितियाँ विपणन, भंडारण और कृषि उत्पादों के उचित मूल्य सुनिश्चित करने में भी मदद करती हैं। इनके माध्यम से छोटे और सीमांत किसान आर्थिक रूप से सशक्त बनते हैं। सहकारिता का सिद्धांत पारस्परिक सहयोग पर आधारित है, जिससे ग्रामीण समुदाय का सामूहिक विकास संभव होता है। इसलिए ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूत बनाने में सहकारी संस्थाओं का विशेष महत्व है।


7. कृषि विविधीकरण क्या है?

उत्तर:
कृषि विविधीकरण का अर्थ केवल पारंपरिक फसलों पर निर्भर रहने के बजाय कृषि से संबंधित अन्य गतिविधियों को अपनाना है। इसमें बागवानी, डेयरी, मत्स्य पालन, पोल्ट्री तथा पशुपालन जैसी गतिविधियाँ शामिल हैं। कृषि विविधीकरण किसानों की आय बढ़ाने तथा जोखिम कम करने में सहायक होता है। यदि किसी एक फसल की पैदावार कम हो जाए, तो अन्य गतिविधियों से आय प्राप्त की जा सकती है। यह ग्रामीण रोजगार के अवसर भी बढ़ाता है और कृषि क्षेत्र को अधिक स्थिर एवं लाभदायक बनाता है।


8. जैविक खेती (Organic Farming) क्या है?

उत्तर:
जैविक खेती ऐसी कृषि पद्धति है जिसमें रासायनिक उर्वरकों, कीटनाशकों और खरपतवार नाशकों का प्रयोग नहीं किया जाता। इसके स्थान पर प्राकृतिक खाद, जैव उर्वरक और जैविक तकनीकों का उपयोग किया जाता है। जैविक खेती से मिट्टी की उर्वरता बनी रहती है तथा पर्यावरण प्रदूषण कम होता है। इससे उत्पादित खाद्य पदार्थ अधिक सुरक्षित और स्वास्थ्यवर्धक होते हैं। यद्यपि प्रारंभिक अवस्था में उत्पादन अपेक्षाकृत कम हो सकता है, फिर भी दीर्घकाल में यह टिकाऊ कृषि विकास का महत्वपूर्ण माध्यम है।


9. रोजगार का अर्थ क्या है?

उत्तर:
रोजगार से तात्पर्य ऐसी आर्थिक गतिविधि से है जिसके बदले व्यक्ति को आय प्राप्त होती है। रोजगार व्यक्ति की आजीविका का मुख्य स्रोत होता है। किसी देश में रोजगार के अवसरों की उपलब्धता आर्थिक विकास का महत्वपूर्ण संकेतक है। रोजगार से न केवल आय प्राप्त होती है बल्कि व्यक्ति का सामाजिक सम्मान और जीवन स्तर भी बेहतर होता है। भारत जैसे विकासशील देश में रोजगार सृजन एक प्रमुख चुनौती है क्योंकि बड़ी जनसंख्या के लिए पर्याप्त रोजगार उपलब्ध कराना आवश्यक है।


10. औपचारिक और अनौपचारिक क्षेत्र में अंतर बताइए।

उत्तर:
औपचारिक क्षेत्र वह क्षेत्र है जहाँ श्रमिकों को नियमित वेतन, नौकरी की सुरक्षा, पेंशन, भविष्य निधि तथा अन्य सामाजिक सुरक्षा सुविधाएँ प्राप्त होती हैं। इसके विपरीत अनौपचारिक क्षेत्र में कार्यरत श्रमिकों को ऐसी सुविधाएँ नहीं मिलतीं। भारत में अधिकांश श्रमिक अनौपचारिक क्षेत्र में कार्य करते हैं। औपचारिक क्षेत्र में कार्य की शर्तें बेहतर होती हैं जबकि अनौपचारिक क्षेत्र में आय और रोजगार की स्थिरता कम होती है। दोनों क्षेत्रों का अर्थव्यवस्था में महत्वपूर्ण योगदान है, परंतु श्रमिक कल्याण की दृष्टि से औपचारिक क्षेत्र अधिक लाभदायक माना जाता है।


11. बेरोजगारी की समस्या पर संक्षिप्त टिप्पणी लिखिए।

उत्तर:
बेरोजगारी वह स्थिति है जिसमें कार्य करने की इच्छा और क्षमता रखने वाला व्यक्ति रोजगार प्राप्त नहीं कर पाता। भारत में जनसंख्या वृद्धि, कौशल की कमी तथा रोजगार के सीमित अवसर बेरोजगारी के प्रमुख कारण हैं। बेरोजगारी से आय में कमी, गरीबी तथा सामाजिक समस्याएँ बढ़ती हैं। यह मानव संसाधनों के अपूर्ण उपयोग को दर्शाती है। सरकार कौशल विकास कार्यक्रमों, स्वरोजगार योजनाओं तथा रोजगार सृजन नीतियों के माध्यम से इस समस्या को कम करने का प्रयास कर रही है।


12. ‘जॉबलेस ग्रोथ’ से क्या आशय है?

उत्तर:
जॉबलेस ग्रोथ ऐसी स्थिति है जिसमें अर्थव्यवस्था की उत्पादन दर और राष्ट्रीय आय तो बढ़ती है, लेकिन रोजगार के अवसर उसी अनुपात में नहीं बढ़ते। आधुनिक तकनीक और मशीनों के बढ़ते उपयोग के कारण कई बार उत्पादन में वृद्धि होती है, परंतु श्रम की आवश्यकता कम हो जाती है। भारत में आर्थिक सुधारों के बाद कुछ क्षेत्रों में ऐसी स्थिति देखने को मिली है। जॉबलेस ग्रोथ से बेरोजगारी और आय असमानता की समस्या बढ़ सकती है। इसलिए विकास के साथ रोजगार सृजन भी आवश्यक है।


13. सतत आर्थिक विकास क्या है?

उत्तर:
सतत आर्थिक विकास वह विकास है जो वर्तमान पीढ़ी की आवश्यकताओं को पूरा करते हुए भविष्य की पीढ़ियों की आवश्यकताओं को प्रभावित न करे। इसका उद्देश्य आर्थिक प्रगति और पर्यावरण संरक्षण के बीच संतुलन स्थापित करना है। सतत विकास प्राकृतिक संसाधनों के विवेकपूर्ण उपयोग पर बल देता है। यह पर्यावरणीय क्षति को कम करने तथा दीर्घकालीन विकास सुनिश्चित करने का प्रयास करता है। वर्तमान समय में बढ़ते प्रदूषण और संसाधनों के दोहन को देखते हुए सतत विकास अत्यंत आवश्यक हो गया है।


14. पर्यावरणीय संकट के प्रमुख कारण बताइए।

उत्तर:
पर्यावरणीय संकट के प्रमुख कारणों में जनसंख्या वृद्धि, औद्योगीकरण, वनों की कटाई, प्राकृतिक संसाधनों का अत्यधिक दोहन तथा प्रदूषण शामिल हैं। आर्थिक विकास की प्रक्रिया में संसाधनों का अनियंत्रित उपयोग पर्यावरणीय संतुलन को प्रभावित करता है। वायु, जल और भूमि प्रदूषण मानव स्वास्थ्य और जैव विविधता के लिए खतरा बन रहे हैं। यदि समय रहते प्रभावी कदम नहीं उठाए गए, तो भविष्य में संसाधनों की उपलब्धता और जीवन की गुणवत्ता पर गंभीर प्रभाव पड़ सकता है। इसलिए पर्यावरण संरक्षण को विकास नीतियों का अभिन्न हिस्सा बनाना आवश्यक है।


15. वैश्विक तापन (Global Warming) क्या है?

उत्तर:
वैश्विक तापन पृथ्वी के औसत तापमान में निरंतर वृद्धि की प्रक्रिया है। इसका मुख्य कारण ग्रीनहाउस गैसों जैसे कार्बन डाइऑक्साइड और मीथेन का अत्यधिक उत्सर्जन है। औद्योगिक गतिविधियाँ, जीवाश्म ईंधनों का उपयोग और वनों की कटाई इस समस्या को बढ़ाते हैं। वैश्विक तापन के कारण जलवायु परिवर्तन, समुद्र स्तर में वृद्धि तथा प्राकृतिक आपदाओं की आवृत्ति बढ़ रही है। यह मानव जीवन और पर्यावरण दोनों के लिए गंभीर चुनौती है। इसके समाधान के लिए स्वच्छ ऊर्जा और पर्यावरण-अनुकूल तकनीकों को बढ़ावा देना आवश्यक है।


16. मानव पूंजी निर्माण के प्रमुख स्रोत कौन-कौन से हैं?

उत्तर:
मानव पूंजी निर्माण के प्रमुख स्रोत शिक्षा, स्वास्थ्य, प्रशिक्षण, कौशल विकास और प्रवास हैं। शिक्षा ज्ञान और दक्षता प्रदान करती है, जबकि स्वास्थ्य सेवाएँ कार्य क्षमता को बढ़ाती हैं। प्रशिक्षण कार्यक्रम व्यक्तियों को विशेष कौशल प्रदान करते हैं जिससे उनकी उत्पादकता बढ़ती है। अनुसंधान एवं विकास गतिविधियाँ भी मानव पूंजी को मजबूत बनाती हैं। इन सभी साधनों में निवेश करके किसी देश की कार्यशील जनसंख्या को अधिक कुशल और सक्षम बनाया जा सकता है, जिससे आर्थिक विकास को गति मिलती है।


17. ग्रामीण विपणन की समस्या क्या है?

उत्तर:
ग्रामीण विपणन की समस्या का संबंध किसानों को उनकी उपज का उचित मूल्य न मिल पाने से है। कई ग्रामीण क्षेत्रों में भंडारण, परिवहन और बाजार सुविधाओं का अभाव होता है। किसान अक्सर बिचौलियों पर निर्भर रहते हैं, जिससे उन्हें कम कीमत प्राप्त होती है। उचित विपणन व्यवस्था के अभाव में कृषि आय प्रभावित होती है। सहकारी विपणन समितियाँ, मंडियाँ और आधुनिक आपूर्ति श्रृंखला व्यवस्थाएँ इस समस्या को कम करने में सहायता करती हैं। प्रभावी विपणन व्यवस्था ग्रामीण विकास के लिए अत्यंत आवश्यक है।


18. कृषि क्षेत्र में गैर-कृषि रोजगार का महत्व बताइए।

उत्तर:
ग्रामीण क्षेत्रों में केवल कृषि पर निर्भरता कई समस्याएँ उत्पन्न करती है, इसलिए गैर-कृषि रोजगार का विकास आवश्यक है। डेयरी, मत्स्य पालन, हस्तशिल्प, ग्रामीण उद्योग और पर्यटन जैसे कार्य अतिरिक्त आय प्रदान करते हैं। इससे कृषि पर दबाव कम होता है और ग्रामीण बेरोजगारी घटती है। गैर-कृषि गतिविधियाँ ग्रामीण अर्थव्यवस्था को विविध और स्थिर बनाती हैं। ये रोजगार के नए अवसर उत्पन्न करती हैं तथा ग्रामीण लोगों के जीवन स्तर में सुधार लाती हैं। इसलिए ग्रामीण विकास की रणनीति में गैर-कृषि रोजगार को महत्वपूर्ण स्थान दिया गया है।


19. रोजगार सृजन हेतु सरकार द्वारा अपनाए गए उपाय बताइए।

उत्तर:
सरकार रोजगार बढ़ाने के लिए विभिन्न योजनाएँ और कार्यक्रम लागू करती है। कौशल विकास कार्यक्रम, स्वरोजगार योजनाएँ, ग्रामीण रोजगार कार्यक्रम तथा लघु एवं कुटीर उद्योगों को प्रोत्साहन रोजगार सृजन के प्रमुख उपाय हैं। सरकार आधारभूत संरचना विकास में निवेश करके भी रोजगार के अवसर बढ़ाती है। उद्यमिता को बढ़ावा देने और वित्तीय सहायता उपलब्ध कराने से नए व्यवसाय स्थापित होते हैं। इन प्रयासों का उद्देश्य बेरोजगारी कम करना तथा युवाओं को उत्पादक रोजगार प्रदान करना है।


20. सतत विकास के लिए आवश्यक उपायों का वर्णन कीजिए।

उत्तर:
सतत विकास सुनिश्चित करने के लिए प्राकृतिक संसाधनों का विवेकपूर्ण उपयोग आवश्यक है। नवीकरणीय ऊर्जा स्रोतों जैसे सौर और पवन ऊर्जा को बढ़ावा दिया जाना चाहिए। वनों का संरक्षण, जल संसाधनों का उचित प्रबंधन तथा प्रदूषण नियंत्रण के उपाय अपनाने चाहिए। पर्यावरण-अनुकूल तकनीकों और जैविक खेती को प्रोत्साहित करना भी महत्वपूर्ण है। जनसंख्या को पर्यावरण संरक्षण के प्रति जागरूक बनाना आवश्यक है। इन उपायों से आर्थिक विकास और पर्यावरण संरक्षण के बीच संतुलन स्थापित किया जा सकता है तथा भविष्य की पीढ़ियों के लिए संसाधनों को सुरक्षित रखा जा सकता है।