CBSE कक्षा 12 अर्थशास्त्र (Indian Economic Development)

अध्याय 7 – आर्थिक सुधार (Economic Reforms Since 1991)

20 महत्वपूर्ण प्रश्न एवं उत्तर

1. भारत में 1991 के आर्थिक सुधारों की आवश्यकता क्यों पड़ी?

उत्तर:
1991 में भारत गंभीर आर्थिक संकट का सामना कर रहा था। विदेशी मुद्रा भंडार इतना कम हो गया था कि देश केवल कुछ सप्ताह के आयात का भुगतान कर सकता था। राजकोषीय घाटा और भुगतान संतुलन घाटा लगातार बढ़ रहे थे। सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों की कार्यक्षमता कम थी तथा औद्योगिक विकास की गति धीमी हो गई थी। अंतरराष्ट्रीय वित्तीय संस्थानों से सहायता प्राप्त करने के लिए भारत को अपनी आर्थिक नीतियों में परिवर्तन करना पड़ा। इसी कारण सरकार ने उदारीकरण, निजीकरण और वैश्वीकरण (LPG) की नीतियाँ अपनाईं, जिन्हें 1991 के आर्थिक सुधार कहा जाता है।


2. उदारीकरण (Liberalisation) से क्या अभिप्राय है?

उत्तर:
उदारीकरण का अर्थ अर्थव्यवस्था पर सरकारी नियंत्रणों और प्रतिबंधों को कम करना है। 1991 के बाद भारत सरकार ने उद्योगों के लिए लाइसेंस प्रणाली में ढील दी, आयात-निर्यात नियमों को सरल बनाया तथा निजी निवेश को प्रोत्साहन दिया। इसका उद्देश्य उद्योगों को स्वतंत्र वातावरण प्रदान करना था ताकि वे प्रतिस्पर्धा कर सकें और उत्पादन बढ़ा सकें। उदारीकरण से निवेश के अवसर बढ़े, तकनीकी विकास हुआ तथा उपभोक्ताओं को अधिक विकल्प उपलब्ध हुए। हालांकि, इससे कुछ उद्योगों को विदेशी प्रतिस्पर्धा का सामना भी करना पड़ा।


3. निजीकरण (Privatisation) क्या है?

उत्तर:
निजीकरण वह प्रक्रिया है जिसमें सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों में सरकार की भूमिका कम की जाती है और निजी क्षेत्र की भागीदारी बढ़ाई जाती है। 1991 के आर्थिक सुधारों के बाद सरकार ने कई सार्वजनिक उपक्रमों के शेयर निजी निवेशकों को बेचे तथा कुछ क्षेत्रों को निजी कंपनियों के लिए खोल दिया। निजीकरण का मुख्य उद्देश्य दक्षता, उत्पादकता और लाभप्रदता बढ़ाना था। इससे प्रतिस्पर्धा बढ़ी और सेवाओं की गुणवत्ता में सुधार हुआ। हालांकि, आलोचकों का मानना है कि इससे रोजगार सुरक्षा और सामाजिक कल्याण पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ सकता है।


4. वैश्वीकरण (Globalisation) का अर्थ स्पष्ट कीजिए।

उत्तर:
वैश्वीकरण वह प्रक्रिया है जिसके माध्यम से किसी देश की अर्थव्यवस्था विश्व की अन्य अर्थव्यवस्थाओं से जुड़ती है। इसमें वस्तुओं, सेवाओं, पूंजी, तकनीक और सूचनाओं का अंतरराष्ट्रीय स्तर पर आदान-प्रदान बढ़ता है। 1991 के बाद भारत ने व्यापार और निवेश संबंधी प्रतिबंधों में कमी की, जिससे विदेशी कंपनियों को भारत में निवेश का अवसर मिला। वैश्वीकरण से भारतीय उद्योगों को अंतरराष्ट्रीय बाजार मिला और आधुनिक तकनीक का उपयोग बढ़ा। इसके परिणामस्वरूप आर्थिक विकास को गति मिली, लेकिन घरेलू उद्योगों पर विदेशी प्रतिस्पर्धा का दबाव भी बढ़ा।


5. औद्योगिक क्षेत्र में किए गए प्रमुख सुधारों का वर्णन कीजिए।

उत्तर:
1991 के आर्थिक सुधारों के अंतर्गत औद्योगिक क्षेत्र में कई महत्वपूर्ण परिवर्तन किए गए। औद्योगिक लाइसेंस प्रणाली को अधिकांश उद्योगों के लिए समाप्त कर दिया गया। सार्वजनिक क्षेत्र के लिए आरक्षित उद्योगों की संख्या कम की गई। निजी और विदेशी निवेश को प्रोत्साहन दिया गया तथा एमआरटीपी अधिनियम के अंतर्गत बड़े उद्योगों पर लगे प्रतिबंध हटाए गए। इन सुधारों का उद्देश्य उद्योगों को अधिक स्वतंत्रता देना और प्रतिस्पर्धा बढ़ाना था। परिणामस्वरूप उत्पादन क्षमता में वृद्धि हुई, तकनीकी उन्नति हुई और औद्योगिक विकास को नई दिशा मिली।


6. विनिवेश (Disinvestment) क्या है?

उत्तर:
विनिवेश का अर्थ सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों में सरकार द्वारा अपनी हिस्सेदारी का कुछ भाग बेच देना है। यह निजीकरण की दिशा में उठाया गया एक महत्वपूर्ण कदम माना जाता है। सरकार विनिवेश के माध्यम से संसाधन जुटाती है तथा सार्वजनिक उपक्रमों की कार्यकुशलता बढ़ाने का प्रयास करती है। 1991 के बाद भारत में कई सार्वजनिक कंपनियों के शेयर निजी निवेशकों को बेचे गए। इससे सरकार को राजस्व प्राप्त हुआ और कुछ उपक्रमों की कार्यक्षमता में सुधार आया। हालांकि, आलोचक इसे सार्वजनिक संपत्ति के हस्तांतरण के रूप में भी देखते हैं।


7. व्यापार नीति सुधारों का क्या उद्देश्य था?

उत्तर:
व्यापार नीति सुधारों का मुख्य उद्देश्य भारतीय अर्थव्यवस्था को अंतरराष्ट्रीय व्यापार के लिए अधिक खुला बनाना था। 1991 के बाद आयात शुल्कों में कमी की गई, मात्रात्मक प्रतिबंध हटाए गए और निर्यात को प्रोत्साहित किया गया। इन उपायों से भारतीय उद्योगों को वैश्विक प्रतिस्पर्धा का सामना करने का अवसर मिला। व्यापार सुधारों के कारण विदेशी वस्तुएँ भारतीय बाजार में आने लगीं और उपभोक्ताओं को अधिक विकल्प प्राप्त हुए। साथ ही, भारतीय उत्पादों को भी विश्व बाजार में प्रवेश करने के बेहतर अवसर मिले।


8. विदेशी प्रत्यक्ष निवेश (FDI) क्या है?

उत्तर:
विदेशी प्रत्यक्ष निवेश (FDI) वह निवेश है जिसमें कोई विदेशी कंपनी किसी अन्य देश में व्यवसाय स्थापित करती है या किसी कंपनी में पर्याप्त हिस्सेदारी प्राप्त करती है। 1991 के बाद भारत ने विभिन्न क्षेत्रों में FDI को अनुमति दी। इससे विदेशी पूंजी, आधुनिक तकनीक और प्रबंधन कौशल भारत में आए। FDI ने रोजगार सृजन, उत्पादन वृद्धि और निर्यात को बढ़ावा दिया। इसके साथ ही भारतीय उद्योगों को अंतरराष्ट्रीय स्तर की प्रतिस्पर्धा और तकनीकी उन्नति का लाभ मिला।


9. वित्तीय क्षेत्र सुधारों का महत्व बताइए।

उत्तर:
वित्तीय क्षेत्र सुधारों का उद्देश्य बैंकिंग और वित्तीय संस्थाओं की कार्यक्षमता बढ़ाना था। 1991 के बाद ब्याज दरों को अधिक बाजार-आधारित बनाया गया, निजी बैंकों को अनुमति दी गई तथा पूंजी बाजार में सुधार किए गए। भारतीय रिजर्व बैंक की भूमिका को अधिक प्रभावी बनाया गया। इन सुधारों से बैंकिंग प्रणाली मजबूत हुई, निवेशकों का विश्वास बढ़ा और वित्तीय सेवाओं की गुणवत्ता में सुधार हुआ। इससे आर्थिक विकास के लिए आवश्यक पूंजी उपलब्ध कराने में सहायता मिली।


10. उदारीकरण के दो प्रमुख लाभ बताइए।

उत्तर:
उदारीकरण के प्रमुख लाभों में पहला है प्रतिस्पर्धा में वृद्धि। जब सरकारी नियंत्रण कम हुए, तब उद्योगों के बीच प्रतिस्पर्धा बढ़ी, जिससे उत्पादों की गुणवत्ता में सुधार हुआ। दूसरा लाभ है निवेश में वृद्धि। घरेलू और विदेशी निवेशकों को बेहतर अवसर मिलने से उद्योगों का विस्तार हुआ। इसके अतिरिक्त तकनीकी विकास, रोजगार के नए अवसर और उपभोक्ताओं के लिए अधिक विकल्प भी उपलब्ध हुए। इन लाभों ने भारतीय अर्थव्यवस्था को अधिक गतिशील और प्रतिस्पर्धी बनाया।


11. उदारीकरण की दो प्रमुख हानियाँ बताइए।

उत्तर:
उदारीकरण के कारण विदेशी कंपनियों की प्रतिस्पर्धा बढ़ी, जिससे कई छोटे और कुटीर उद्योग प्रभावित हुए। वे बड़े उद्योगों और बहुराष्ट्रीय कंपनियों के साथ प्रतिस्पर्धा नहीं कर सके। दूसरी ओर, आर्थिक असमानता में भी वृद्धि देखी गई क्योंकि सुधारों का लाभ मुख्य रूप से शहरी और विकसित क्षेत्रों को मिला। कुछ क्षेत्रों में रोजगार की अनिश्चितता भी बढ़ी। इसलिए उदारीकरण के लाभों के साथ-साथ कुछ सामाजिक और आर्थिक चुनौतियाँ भी सामने आईं।


12. बहुराष्ट्रीय कंपनियाँ (MNCs) क्या हैं?

उत्तर:
बहुराष्ट्रीय कंपनियाँ वे कंपनियाँ होती हैं जो एक से अधिक देशों में उत्पादन, व्यापार या सेवाएँ प्रदान करती हैं। इनके मुख्यालय किसी एक देश में होते हैं लेकिन इनकी गतिविधियाँ विश्व के कई देशों में फैली होती हैं। आर्थिक सुधारों के बाद भारत में अनेक बहुराष्ट्रीय कंपनियों ने निवेश किया। इन कंपनियों ने आधुनिक तकनीक, पूंजी और प्रबंधन कौशल प्रदान किया। इससे उत्पादन और रोजगार में वृद्धि हुई। हालांकि, इनके कारण घरेलू उद्योगों पर प्रतिस्पर्धात्मक दबाव भी बढ़ा।


13. भुगतान संतुलन (Balance of Payments) संकट क्या था?

उत्तर:
1991 में भारत को भुगतान संतुलन संकट का सामना करना पड़ा। इसका अर्थ था कि देश की विदेशी मुद्रा आय उसकी विदेशी मुद्रा व्यय से कम हो गई थी। विदेशी मुद्रा भंडार अत्यंत निम्न स्तर पर पहुँच गया था और आयात का भुगतान करना कठिन हो गया था। इस संकट के कारण भारत को अंतरराष्ट्रीय वित्तीय संस्थानों से सहायता लेनी पड़ी। आर्थिक सुधारों के माध्यम से व्यापार और निवेश को बढ़ावा देकर इस समस्या को दूर करने का प्रयास किया गया।


14. एमआरटीपी अधिनियम में सुधार क्यों किए गए?

उत्तर:
एमआरटीपी (Monopolies and Restrictive Trade Practices) अधिनियम का उद्देश्य एकाधिकार को रोकना था। लेकिन समय के साथ यह अधिनियम बड़े उद्योगों के विस्तार में बाधा बनने लगा। 1991 के आर्थिक सुधारों के तहत इसके कई प्रतिबंध हटाए गए ताकि उद्योग अपनी क्षमता के अनुसार विस्तार कर सकें। इससे निवेश और उत्पादन में वृद्धि हुई तथा प्रतिस्पर्धा को प्रोत्साहन मिला। परिणामस्वरूप औद्योगिक विकास को गति मिली और भारतीय कंपनियाँ वैश्विक स्तर पर प्रतिस्पर्धा करने में सक्षम हुईं।


15. आर्थिक सुधारों का कृषि क्षेत्र पर क्या प्रभाव पड़ा?

उत्तर:
आर्थिक सुधारों का कृषि क्षेत्र पर मिश्रित प्रभाव पड़ा। एक ओर किसानों को उन्नत तकनीक, बेहतर बीज और कृषि उपकरण उपलब्ध हुए। दूसरी ओर कृषि क्षेत्र में निवेश की गति अपेक्षाकृत धीमी रही। वैश्विक प्रतिस्पर्धा के कारण किसानों को अंतरराष्ट्रीय बाजार की कीमतों का भी सामना करना पड़ा। कुछ नकदी फसलों के उत्पादन में वृद्धि हुई, लेकिन छोटे किसानों को कई चुनौतियों का सामना करना पड़ा। इसलिए कृषि क्षेत्र में सुधारों के परिणाम समान रूप से लाभकारी नहीं रहे।


16. आर्थिक सुधारों का उपभोक्ताओं पर क्या प्रभाव पड़ा?

उत्तर:
आर्थिक सुधारों के बाद उपभोक्ताओं को वस्तुओं और सेवाओं की अधिक विविधता प्राप्त हुई। विदेशी और घरेलू कंपनियों के बीच प्रतिस्पर्धा बढ़ने से उत्पादों की गुणवत्ता में सुधार हुआ। नई तकनीकों के कारण बेहतर सुविधाएँ उपलब्ध हुईं। उपभोक्ताओं को अधिक विकल्प और बेहतर सेवाएँ मिलने लगीं। हालांकि, कुछ उत्पादों की कीमतें बढ़ीं और ग्रामीण क्षेत्रों तक सभी लाभ समान रूप से नहीं पहुँच सके। कुल मिलाकर उपभोक्ताओं के लिए बाजार अधिक प्रतिस्पर्धी और विकल्पों से भरपूर बन गया।


17. आर्थिक सुधारों के बाद सेवा क्षेत्र का विकास कैसे हुआ?

उत्तर:
आर्थिक सुधारों के बाद सेवा क्षेत्र भारत की अर्थव्यवस्था का प्रमुख क्षेत्र बन गया। सूचना प्रौद्योगिकी, दूरसंचार, बैंकिंग, बीमा और पर्यटन जैसे क्षेत्रों में तीव्र विकास हुआ। विदेशी निवेश और तकनीकी उन्नति ने सेवा क्षेत्र को नई दिशा दी। इस क्षेत्र ने रोजगार के अवसर बढ़ाए और राष्ट्रीय आय में महत्वपूर्ण योगदान दिया। विशेष रूप से आईटी उद्योग ने भारत को वैश्विक स्तर पर पहचान दिलाई। परिणामस्वरूप सेवा क्षेत्र आर्थिक विकास का प्रमुख चालक बन गया।


18. विश्व व्यापार संगठन (WTO) का भारत पर क्या प्रभाव पड़ा?

उत्तर:
विश्व व्यापार संगठन (WTO) की सदस्यता के बाद भारत को वैश्विक बाजारों तक बेहतर पहुँच प्राप्त हुई। भारतीय निर्यातकों को नए अवसर मिले तथा अंतरराष्ट्रीय व्यापार के नियम अधिक पारदर्शी बने। WTO ने प्रतिस्पर्धा बढ़ाई और व्यापार बाधाओं को कम करने में सहायता की। हालांकि, कृषि और छोटे उद्योगों को विदेशी प्रतिस्पर्धा से चुनौतियों का सामना करना पड़ा। इसलिए WTO की सदस्यता से भारत को लाभ और चुनौतियाँ दोनों प्राप्त हुईं।


19. आर्थिक सुधारों के दो सकारात्मक परिणाम बताइए।

उत्तर:
आर्थिक सुधारों का पहला सकारात्मक परिणाम उच्च आर्थिक विकास दर के रूप में सामने आया। उद्योग, सेवा और व्यापार क्षेत्रों में विकास की गति बढ़ी। दूसरा प्रमुख परिणाम विदेशी निवेश और तकनीकी उन्नति में वृद्धि था। इससे उत्पादन क्षमता बढ़ी और वैश्विक बाजारों से जुड़ाव मजबूत हुआ। उपभोक्ताओं को बेहतर गुणवत्ता की वस्तुएँ और सेवाएँ उपलब्ध हुईं। इन सुधारों ने भारतीय अर्थव्यवस्था को अधिक प्रतिस्पर्धी और आधुनिक बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।


20. क्या आर्थिक सुधार पूरी तरह सफल रहे? स्पष्ट कीजिए।

उत्तर:
आर्थिक सुधारों ने भारतीय अर्थव्यवस्था को नई दिशा दी और विकास दर, विदेशी निवेश तथा तकनीकी प्रगति में उल्लेखनीय वृद्धि की। सेवा क्षेत्र का विस्तार हुआ और भारत वैश्विक अर्थव्यवस्था से अधिक जुड़ गया। हालांकि, सभी वर्गों को समान लाभ नहीं मिला। आय असमानता, क्षेत्रीय विषमता और कृषि क्षेत्र की चुनौतियाँ बनी रहीं। कुछ छोटे उद्योग विदेशी प्रतिस्पर्धा के कारण प्रभावित हुए। इसलिए कहा जा सकता है कि आर्थिक सुधार काफी हद तक सफल रहे, लेकिन समावेशी विकास सुनिश्चित करने के लिए अभी भी निरंतर प्रयास आवश्यक हैं।