CBSE कक्षा 12 अर्थशास्त्र (Macroeconomics)

अध्याय 5 – भुगतान संतुलन (Balance of Payments)

20 महत्वपूर्ण प्रश्न एवं उत्तर

भुगतान संतुलन (Balance of Payments) अध्याय में भुगतान संतुलन का अर्थ, चालू खाता, पूंजी खाता, विदेशी विनिमय दर, स्थिर एवं लचीली विनिमय दर तथा प्रबंधित फ्लोटिंग विनिमय प्रणाली जैसे विषय शामिल हैं।


1. भुगतान संतुलन (Balance of Payments) क्या है?

उत्तर:
भुगतान संतुलन (BoP) किसी देश के निवासियों और विदेशों के निवासियों के बीच एक निश्चित अवधि में हुए सभी आर्थिक लेन-देन का व्यवस्थित लेखा-जोखा है। इसमें वस्तुओं एवं सेवाओं के आयात-निर्यात, विदेशी निवेश, ऋण, उपहार तथा अन्य वित्तीय लेन-देन शामिल होते हैं। भुगतान संतुलन किसी देश की विदेशी आर्थिक स्थिति को दर्शाता है। इसके दो प्रमुख भाग होते हैं—चालू खाता और पूंजी खाता। यदि किसी देश के विदेशी लेन-देन संतुलित हैं तो उसकी अर्थव्यवस्था स्थिर मानी जाती है। इसलिए भुगतान संतुलन अंतरराष्ट्रीय आर्थिक संबंधों का एक महत्वपूर्ण संकेतक है।


2. भुगतान संतुलन के प्रमुख घटक कौन-कौन से हैं?

उत्तर:
भुगतान संतुलन के मुख्यतः दो घटक होते हैं—चालू खाता (Current Account) और पूंजी खाता (Capital Account)। चालू खाते में वस्तुओं एवं सेवाओं का आयात-निर्यात, आय प्राप्तियाँ तथा एकतरफा हस्तांतरण शामिल होते हैं। पूंजी खाते में विदेशी निवेश, विदेशी ऋण, बैंक जमा और अन्य पूंजीगत लेन-देन दर्ज किए जाते हैं। इन दोनों खातों की सहायता से किसी देश की विदेशी आर्थिक स्थिति का मूल्यांकन किया जाता है। भुगतान संतुलन का अध्ययन यह समझने में मदद करता है कि देश में विदेशी मुद्रा का प्रवाह किस प्रकार हो रहा है।


3. चालू खाता (Current Account) क्या है?

उत्तर:
चालू खाता भुगतान संतुलन का वह भाग है जिसमें वस्तुओं और सेवाओं के आयात-निर्यात, निवेश आय तथा एकतरफा हस्तांतरणों का लेखा रखा जाता है। इसमें पर्यटन, परिवहन, बैंकिंग सेवाएँ, बीमा सेवाएँ तथा विदेशों से प्राप्त धनराशि भी शामिल होती है। यदि निर्यात आयात से अधिक हो तो चालू खाते में अधिशेष होता है और यदि आयात अधिक हो तो घाटा उत्पन्न होता है। किसी देश की व्यापारिक एवं सेवा गतिविधियों का आकलन करने के लिए चालू खाते का विशेष महत्व है।


4. पूंजी खाता (Capital Account) का अर्थ बताइए।

उत्तर:
पूंजी खाता भुगतान संतुलन का वह भाग है जिसमें ऐसे लेन-देन दर्ज किए जाते हैं जो किसी देश की परिसंपत्तियों और देनदारियों में परिवर्तन लाते हैं। इसमें प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (FDI), पोर्टफोलियो निवेश, विदेशी ऋण तथा बैंकिंग पूंजी प्रवाह शामिल होते हैं। पूंजी खाते के माध्यम से यह ज्ञात किया जाता है कि देश में विदेशी पूंजी का कितना प्रवाह हो रहा है। पूंजी खाते का अधिशेष विदेशी निवेश में वृद्धि को दर्शाता है जबकि घाटा पूंजी के बहिर्गमन का संकेत देता है।


5. व्यापार संतुलन (Balance of Trade) क्या है?

उत्तर:
व्यापार संतुलन से आशय किसी देश के वस्तुओं के निर्यात और आयात के अंतर से है। इसे केवल दृश्य वस्तुओं (Visible Items) तक सीमित माना जाता है। यदि वस्तुओं का निर्यात आयात से अधिक हो तो व्यापार अधिशेष कहलाता है और यदि आयात अधिक हो तो व्यापार घाटा कहलाता है। व्यापार संतुलन भुगतान संतुलन का एक महत्वपूर्ण भाग है, लेकिन यह संपूर्ण भुगतान संतुलन नहीं होता। इसके माध्यम से किसी देश की विदेशी व्यापारिक स्थिति का आकलन किया जाता है।


6. व्यापार संतुलन और भुगतान संतुलन में अंतर बताइए।

उत्तर:
व्यापार संतुलन केवल वस्तुओं के आयात और निर्यात का अंतर दर्शाता है, जबकि भुगतान संतुलन सभी अंतरराष्ट्रीय आर्थिक लेन-देन का व्यापक लेखा-जोखा प्रस्तुत करता है। व्यापार संतुलन में सेवाएँ, निवेश और हस्तांतरण शामिल नहीं होते, जबकि भुगतान संतुलन में ये सभी सम्मिलित होते हैं। व्यापार संतुलन भुगतान संतुलन का एक भाग है। इसलिए भुगतान संतुलन किसी देश की विदेशी आर्थिक स्थिति का अधिक व्यापक और सटीक चित्र प्रस्तुत करता है।


7. भुगतान संतुलन में अधिशेष (Surplus) क्या होता है?

उत्तर:
जब किसी देश को विदेशों से प्राप्त कुल भुगतान उसकी विदेशों को की गई कुल देनदारियों से अधिक होते हैं, तब भुगतान संतुलन में अधिशेष कहा जाता है। यह स्थिति विदेशी मुद्रा भंडार में वृद्धि का संकेत देती है। अधिशेष यह दर्शाता है कि देश की निर्यात आय, सेवाओं की प्राप्तियाँ या पूंजी प्रवाह अधिक है। ऐसी स्थिति देश की आर्थिक मजबूती और विदेशी विनिमय भंडार को सुदृढ़ बनाती है।


8. भुगतान संतुलन में घाटा (Deficit) क्या होता है?

उत्तर:
जब किसी देश के विदेशों को किए गए भुगतान विदेशों से प्राप्त भुगतानों से अधिक हो जाते हैं, तब भुगतान संतुलन में घाटा उत्पन्न होता है। इसका अर्थ है कि देश अधिक आयात कर रहा है या विदेशी मुद्रा का बहिर्गमन अधिक हो रहा है। ऐसी स्थिति में विदेशी मुद्रा भंडार घट सकता है और सरकार को विदेशी ऋण लेने की आवश्यकता पड़ सकती है। लगातार घाटा अर्थव्यवस्था के लिए चिंता का विषय बन सकता है।


9. विदेशी विनिमय दर (Foreign Exchange Rate) क्या है?

उत्तर:
विदेशी विनिमय दर वह दर है जिस पर एक देश की मुद्रा को दूसरे देश की मुद्रा में बदला जाता है। उदाहरण के लिए, 1 अमेरिकी डॉलर के बदले कितने भारतीय रुपये मिलेंगे, यह विनिमय दर कहलाती है। विदेशी व्यापार, निवेश तथा अंतरराष्ट्रीय भुगतानों के लिए विनिमय दर अत्यंत महत्वपूर्ण होती है। यह विदेशी मुद्रा की मांग और पूर्ति से प्रभावित होती है तथा देश की आर्थिक स्थिति को भी दर्शाती है।


10. स्थिर विनिमय दर (Fixed Exchange Rate) क्या है?

उत्तर:
स्थिर विनिमय दर वह प्रणाली है जिसमें सरकार या केंद्रीय बैंक विदेशी मुद्रा की विनिमय दर को एक निश्चित स्तर पर बनाए रखता है। इस प्रणाली में बाजार की शक्तियों का प्रभाव सीमित होता है। स्थिर विनिमय दर अंतरराष्ट्रीय व्यापार में स्थिरता प्रदान करती है तथा विनिमय दर में अत्यधिक उतार-चढ़ाव को रोकती है। हालांकि इसे बनाए रखने के लिए केंद्रीय बैंक को विदेशी मुद्रा भंडार का उपयोग करना पड़ता है।


11. लचीली विनिमय दर (Flexible Exchange Rate) क्या है?

उत्तर:
लचीली विनिमय दर वह प्रणाली है जिसमें विदेशी मुद्रा की मांग और पूर्ति के आधार पर विनिमय दर निर्धारित होती है। सरकार इसमें प्रत्यक्ष हस्तक्षेप नहीं करती। यदि विदेशी मुद्रा की मांग बढ़ती है तो उसकी कीमत बढ़ जाती है और यदि पूर्ति बढ़ती है तो कीमत घट जाती है। यह प्रणाली बाजार शक्तियों को स्वतंत्र रूप से कार्य करने का अवसर देती है तथा विदेशी मुद्रा बाजार को अधिक गतिशील बनाती है।


12. प्रबंधित फ्लोटिंग विनिमय दर क्या है?

उत्तर:
प्रबंधित फ्लोटिंग विनिमय दर ऐसी प्रणाली है जिसमें विनिमय दर मुख्य रूप से बाजार की मांग और पूर्ति से निर्धारित होती है, लेकिन आवश्यकता पड़ने पर केंद्रीय बैंक हस्तक्षेप करता है। इसका उद्देश्य विनिमय दर में अत्यधिक उतार-चढ़ाव को रोकना होता है। भारत में इसी प्रकार की विनिमय दर प्रणाली अपनाई गई है। इससे बाजार की स्वतंत्रता और सरकारी नियंत्रण दोनों का संतुलन बना रहता है।


13. विदेशी मुद्रा की मांग क्यों उत्पन्न होती है?

उत्तर:
विदेशी मुद्रा की मांग मुख्यतः आयात, विदेशी यात्रा, विदेशों में शिक्षा, विदेशी निवेश तथा विदेशी ऋण भुगतान के लिए उत्पन्न होती है। जब देश के निवासी विदेशी वस्तुएँ या सेवाएँ खरीदते हैं, तब उन्हें विदेशी मुद्रा की आवश्यकता होती है। विदेशी मुद्रा की मांग बढ़ने पर उसकी कीमत बढ़ सकती है। इसलिए मांग का स्तर विनिमय दर निर्धारण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।


14. विदेशी मुद्रा की पूर्ति के स्रोत क्या हैं?

उत्तर:
विदेशी मुद्रा की पूर्ति वस्तुओं और सेवाओं के निर्यात, विदेशी निवेश, विदेशी ऋण तथा विदेशों से प्राप्त प्रेषण (Remittances) से होती है। जब विदेशी नागरिक किसी देश की वस्तुएँ खरीदते हैं या निवेश करते हैं, तब विदेशी मुद्रा देश में आती है। विदेशी मुद्रा की पूर्ति बढ़ने से उसकी उपलब्धता बढ़ती है और विनिमय दर पर प्रभाव पड़ता है। यह किसी देश के विदेशी मुद्रा भंडार को मजबूत बनाने में सहायता करती है।


15. विनिमय दर का निर्धारण कैसे होता है?

उत्तर:
मुक्त बाजार में विनिमय दर विदेशी मुद्रा की मांग और पूर्ति के परस्पर प्रभाव से निर्धारित होती है। यदि विदेशी मुद्रा की मांग उसकी पूर्ति से अधिक हो जाए तो उसकी कीमत बढ़ जाती है। इसके विपरीत, यदि पूर्ति अधिक हो तो कीमत घट जाती है। जिस बिंदु पर मांग और पूर्ति बराबर होती हैं, वहीं संतुलन विनिमय दर निर्धारित होती है। यह प्रक्रिया विदेशी मुद्रा बाजार का आधार है।


16. चालू खाते के प्रमुख मद कौन-कौन से हैं?

उत्तर:
चालू खाते में वस्तुओं का आयात-निर्यात, सेवाओं का आयात-निर्यात, निवेश आय तथा एकतरफा हस्तांतरण शामिल होते हैं। सेवाओं में पर्यटन, बीमा, परिवहन तथा बैंकिंग सेवाएँ आती हैं। एकतरफा हस्तांतरणों में विदेशों से प्राप्त उपहार और प्रेषण शामिल होते हैं। ये सभी मद किसी देश की नियमित अंतरराष्ट्रीय आर्थिक गतिविधियों को दर्शाते हैं और चालू खाते की स्थिति निर्धारित करते हैं।


17. प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (FDI) क्या है?

उत्तर:
प्रत्यक्ष विदेशी निवेश वह निवेश है जिसमें कोई विदेशी व्यक्ति या संस्था किसी अन्य देश में व्यवसाय या संपत्ति में नियंत्रण प्राप्त करने के उद्देश्य से निवेश करती है। यह निवेश उद्योगों, कारखानों या व्यावसायिक संस्थानों में किया जाता है। FDI से पूंजी, तकनीक और रोजगार के अवसर बढ़ते हैं। विकासशील देशों के आर्थिक विकास में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश महत्वपूर्ण योगदान देता है।


18. पोर्टफोलियो निवेश क्या है?

उत्तर:
पोर्टफोलियो निवेश वह निवेश है जिसमें विदेशी निवेशक किसी देश के शेयर, बॉन्ड या अन्य वित्तीय प्रतिभूतियाँ खरीदते हैं, लेकिन व्यवसाय पर नियंत्रण प्राप्त नहीं करते। इसका मुख्य उद्देश्य लाभ अर्जित करना होता है। यह निवेश पूंजी बाजार के विकास में सहायता करता है और विदेशी पूंजी के प्रवाह को बढ़ाता है। हालांकि यह अपेक्षाकृत अस्थिर होता है क्योंकि निवेशक कभी भी निवेश वापस ले सकते हैं।


19. भुगतान संतुलन का अध्ययन क्यों महत्वपूर्ण है?

उत्तर:
भुगतान संतुलन का अध्ययन किसी देश की विदेशी आर्थिक स्थिति को समझने के लिए आवश्यक है। इससे विदेशी व्यापार, विदेशी निवेश, विदेशी मुद्रा भंडार तथा अंतरराष्ट्रीय वित्तीय संबंधों की जानकारी प्राप्त होती है। सरकार भुगतान संतुलन के आधार पर व्यापार नीति, विनिमय दर नीति तथा विदेशी निवेश संबंधी निर्णय लेती है। यह आर्थिक योजना निर्माण और आर्थिक स्थिरता बनाए रखने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।


20. भुगतान संतुलन और विदेशी मुद्रा भंडार का क्या संबंध है?

उत्तर:
भुगतान संतुलन की स्थिति का सीधा प्रभाव विदेशी मुद्रा भंडार पर पड़ता है। यदि भुगतान संतुलन में अधिशेष होता है तो विदेशी मुद्रा भंडार बढ़ता है, जबकि घाटे की स्थिति में भंडार घट सकता है। विदेशी मुद्रा भंडार देश को आयात भुगतान, विदेशी ऋण भुगतान तथा विनिमय दर स्थिर रखने में सहायता करता है। इसलिए भुगतान संतुलन और विदेशी मुद्रा भंडार एक-दूसरे से घनिष्ठ रूप से जुड़े हुए हैं और आर्थिक स्थिरता के महत्वपूर्ण संकेतक माने जाते हैं।