CBSE कक्षा 12 रसायन विज्ञान (2026-27)

अध्याय 5: d- एवं f-ब्लॉक तत्व

20 महत्वपूर्ण प्रश्न एवं उत्तर

d- एवं f-ब्लॉक तत्व अध्याय में संक्रमण तत्वों के गुण, ऑक्सीकरण अवस्थाएँ, रंग, चुंबकीय गुण, उत्प्रेरक व्यवहार, लैन्थेनाइड संकुचन तथा ऐक्टिनाइडों के गुण अत्यंत महत्वपूर्ण हैं। CBSE बोर्ड परीक्षाओं में इन विषयों से नियमित रूप से प्रश्न पूछे जाते हैं।


1. संक्रमण तत्व (Transition Elements) किसे कहते हैं?

उत्तर:
वे तत्व जिनके परमाणु या उनकी किसी सामान्य ऑक्सीकरण अवस्था में d-कक्षक आंशिक रूप से भरे रहते हैं, संक्रमण तत्व कहलाते हैं। ये आवर्त सारणी के समूह 3 से 12 तक स्थित होते हैं। इनका सामान्य इलेक्ट्रॉनिक विन्यास (n−1)d¹⁻¹⁰ns¹⁻² होता है। संक्रमण तत्व परिवर्ती ऑक्सीकरण अवस्था, रंगीन आयन, संकुल यौगिक बनाने की क्षमता तथा उत्प्रेरक गुण प्रदर्शित करते हैं। Zn, Cd और Hg को सामान्यतः संक्रमण तत्व नहीं माना जाता क्योंकि उनकी सामान्य अवस्था में d-कक्षक पूर्णतः भरे रहते हैं। ये तत्व धात्विक प्रकृति, उच्च गलनांक तथा अच्छे चालकत्व के लिए प्रसिद्ध हैं।


2. Cr तथा Cu के इलेक्ट्रॉनिक विन्यास में अपवाद क्यों पाया जाता है?

उत्तर:
क्रोमियम (Cr) और ताँबा (Cu) का वास्तविक इलेक्ट्रॉनिक विन्यास अपेक्षित विन्यास से भिन्न होता है। Cr का विन्यास [Ar]3d⁵4s¹ तथा Cu का [Ar]3d¹⁰4s¹ होता है। इसका कारण अर्धपूर्ण (d⁵) तथा पूर्णपूर्ण (d¹⁰) d-कक्षकों की अतिरिक्त स्थिरता है। इन अवस्थाओं में विनिमय ऊर्जा अधिक तथा इलेक्ट्रॉन-विकर्षण कम होता है, जिससे परमाणु अधिक स्थिर बनता है। इसलिए 4s कक्षक का एक इलेक्ट्रॉन d-कक्षक में स्थानांतरित हो जाता है। यह संक्रमण तत्वों के इलेक्ट्रॉनिक विन्यास की महत्वपूर्ण विशेषता है और बोर्ड परीक्षाओं में अक्सर पूछा जाता है।


3. संक्रमण तत्व परिवर्ती ऑक्सीकरण अवस्थाएँ क्यों प्रदर्शित करते हैं?

उत्तर:
संक्रमण तत्वों में (n−1)d तथा ns कक्षकों की ऊर्जा लगभग समान होती है। इसलिए बंध निर्माण के समय दोनों कक्षकों के इलेक्ट्रॉन भाग ले सकते हैं। परिणामस्वरूप ये तत्व विभिन्न संख्या में इलेक्ट्रॉन खोकर अनेक ऑक्सीकरण अवस्थाएँ प्रदर्शित करते हैं। उदाहरण के लिए मैंगनीज +2 से +7 तक तथा लौह +2 और +3 अवस्थाएँ दर्शाता है। d-कक्षक में उपस्थित इलेक्ट्रॉनों की संख्या बदलने से विभिन्न ऑक्सीकरण अवस्थाएँ प्राप्त होती हैं। यही कारण है कि संक्रमण तत्वों का रसायन अत्यंत विविधतापूर्ण होता है तथा वे अनेक यौगिक बनाते हैं।


4. संक्रमण तत्वों के यौगिक रंगीन क्यों होते हैं?

उत्तर:
संक्रमण तत्वों के आयनों में d-कक्षक प्रायः आंशिक रूप से भरे रहते हैं। जब इन पर प्रकाश पड़ता है तो d-कक्षक के इलेक्ट्रॉन निम्न ऊर्जा स्तर से उच्च ऊर्जा स्तर में उत्तेजित हो जाते हैं। इस प्रक्रिया में दृश्य प्रकाश की कुछ तरंगदैर्ध्य अवशोषित हो जाती हैं और शेष परावर्तित प्रकाश रंग के रूप में दिखाई देता है। उदाहरणतः Cu²⁺ आयन नीला तथा Cr³⁺ आयन हरा रंग प्रदर्शित करता है। जिन आयनों में d-कक्षक पूर्णतः भरे या रिक्त होते हैं, वे सामान्यतः रंगहीन होते हैं। यह गुण संक्रमण तत्वों की विशिष्ट पहचान है।


5. संक्रमण तत्व प्रबल उत्प्रेरक क्यों होते हैं?

उत्तर:
संक्रमण तत्व तथा उनके यौगिक उत्कृष्ट उत्प्रेरक होते हैं क्योंकि वे परिवर्ती ऑक्सीकरण अवस्थाएँ प्रदर्शित करते हैं और अभिकारकों के साथ मध्यवर्ती यौगिक बना सकते हैं। उनकी सतह पर अभिकारकों का अधिशोषण भी सरलता से होता है, जिससे सक्रियण ऊर्जा कम हो जाती है। उदाहरण के लिए Fe का उपयोग हैबर प्रक्रिया में तथा V₂O₅ का उपयोग संपर्क प्रक्रिया में उत्प्रेरक के रूप में किया जाता है। निकेल वनस्पति तेलों के हाइड्रोजनीकरण में प्रयुक्त होता है। उत्प्रेरक क्रिया संक्रमण तत्वों के औद्योगिक महत्व को बढ़ाती है।


6. संक्रमण तत्व मिश्रधातु (Alloy) क्यों बनाते हैं?

उत्तर:
संक्रमण तत्वों के परमाणुओं के आकार लगभग समान होते हैं तथा उनकी क्रिस्टलीय संरचना भी मिलती-जुलती होती है। इसलिए एक धातु के परमाणु दूसरी धातु के जालक में आसानी से स्थान ग्रहण कर लेते हैं। परिणामस्वरूप मिश्रधातुओं का निर्माण होता है। उदाहरण के लिए स्टेनलेस स्टील, फेरोक्रोम और ब्रास प्रमुख मिश्रधातुएँ हैं। मिश्रधातुएँ सामान्य धातुओं की तुलना में अधिक कठोर, संक्षारणरोधी तथा टिकाऊ होती हैं। यही कारण है कि संक्रमण तत्व औद्योगिक और इंजीनियरिंग कार्यों में अत्यधिक उपयोगी हैं।


7. अनुचुंबकत्व (Paramagnetism) क्या है?

उत्तर:
जब किसी पदार्थ में अयुग्मित इलेक्ट्रॉन उपस्थित होते हैं तो वह बाहरी चुंबकीय क्षेत्र की ओर आकर्षित होता है। इस गुण को अनुचुंबकत्व कहते हैं। संक्रमण तत्वों के अनेक आयनों में अयुग्मित d-इलेक्ट्रॉन पाए जाते हैं, इसलिए वे अनुचुंबकीय होते हैं। अनुचुंबकत्व की तीव्रता अयुग्मित इलेक्ट्रॉनों की संख्या पर निर्भर करती है। अधिक अयुग्मित इलेक्ट्रॉन होने पर चुंबकीय आघूर्ण अधिक होता है। चुंबकीय गुणों के अध्ययन से संक्रमण तत्वों की इलेक्ट्रॉनिक संरचना को समझने में सहायता मिलती है।


8. अंतरास्थिक यौगिक (Interstitial Compounds) क्या हैं?

उत्तर:
संक्रमण धातुओं के क्रिस्टल जालक में छोटे आकार के परमाणु जैसे H, B, C या N प्रवेश कर जाते हैं। इनसे बनने वाले यौगिक अंतरास्थिक यौगिक कहलाते हैं। उदाहरण के लिए TiC, Fe₃C आदि। ये यौगिक अत्यधिक कठोर, उच्च गलनांक वाले तथा विद्युत चालक होते हैं। इनमें मूल धातु के गुण काफी हद तक बने रहते हैं। औद्योगिक दृष्टि से इनका महत्व बहुत अधिक है क्योंकि इनका उपयोग कठोर औजार तथा विशेष मिश्रधातुओं के निर्माण में किया जाता है।


9. लैन्थेनाइड तत्व किसे कहते हैं?

उत्तर:
वे f-ब्लॉक तत्व जिनमें 4f कक्षकों का क्रमिक भराव होता है, लैन्थेनाइड कहलाते हैं। इनका विस्तार Ce (58) से Lu (71) तक होता है। इनका सामान्य इलेक्ट्रॉनिक विन्यास [Xe]4f¹⁻¹⁴5d⁰⁻¹6s² होता है। अधिकांश लैन्थेनाइड +3 ऑक्सीकरण अवस्था प्रदर्शित करते हैं। ये चाँदी जैसे चमकीले धातु होते हैं तथा प्रायः अनुचुंबकीय गुण प्रदर्शित करते हैं। इनका उपयोग काँच उद्योग, लेज़र तथा विशेष मिश्रधातुओं के निर्माण में किया जाता है।


10. लैन्थेनाइड संकुचन (Lanthanoid Contraction) क्या है?

उत्तर:
लैन्थेनाइड श्रेणी में परमाणु क्रमांक बढ़ने के साथ परमाणु एवं आयनिक त्रिज्या में होने वाली क्रमिक कमी को लैन्थेनाइड संकुचन कहते हैं। इसका कारण 4f इलेक्ट्रॉनों की कमजोर परिरक्षण क्षमता है। नाभिकीय आवेश बढ़ता जाता है, परन्तु 4f इलेक्ट्रॉन उसे प्रभावी रूप से ढक नहीं पाते। फलस्वरूप बाहरी इलेक्ट्रॉन नाभिक की ओर अधिक आकर्षित होते हैं और आकार घटता जाता है। यह f-ब्लॉक रसायन की अत्यंत महत्वपूर्ण अवधारणा है।


11. लैन्थेनाइड संकुचन के दो परिणाम लिखिए।

उत्तर:
लैन्थेनाइड संकुचन के प्रमुख परिणाम हैं—
(1) द्वितीय और तृतीय संक्रमण श्रेणी के तत्वों की त्रिज्याएँ लगभग समान हो जाती हैं, जैसे Zr और Hf।
(2) लैन्थेनाइड तत्वों के गुण अत्यधिक समान हो जाते हैं, जिससे उनका पृथक्करण कठिन हो जाता है।
इसके अतिरिक्त इन तत्वों के जटिल यौगिक बनाने की प्रवृत्ति भी प्रभावित होती है। यही कारण है कि लैन्थेनाइड तत्वों का पृथक्करण रसायन विज्ञान की एक चुनौतीपूर्ण प्रक्रिया माना जाता है।


12. ऐक्टिनाइड क्या हैं?

उत्तर:
वे f-ब्लॉक तत्व जिनमें 5f कक्षकों का क्रमिक भराव होता है, ऐक्टिनाइड कहलाते हैं। इनका विस्तार Th (90) से Lr (103) तक होता है। अधिकांश ऐक्टिनाइड रेडियोधर्मी होते हैं और अनेक ऑक्सीकरण अवस्थाएँ प्रदर्शित करते हैं। इनके 5f, 6d तथा 7s इलेक्ट्रॉन रासायनिक अभिक्रियाओं में भाग लेते हैं। यूरेनियम और प्लूटोनियम इनके महत्वपूर्ण सदस्य हैं। इनका उपयोग नाभिकीय ऊर्जा उत्पादन तथा वैज्ञानिक अनुसंधान में किया जाता है।


13. ऐक्टिनाइडों में ऑक्सीकरण अवस्थाओं की विविधता क्यों अधिक होती है?

उत्तर:
ऐक्टिनाइड तत्वों में 5f, 6d और 7s कक्षकों की ऊर्जा लगभग समान होती है। इसलिए इन कक्षकों के इलेक्ट्रॉन रासायनिक बंध निर्माण में भाग लेते हैं। परिणामस्वरूप ये +3 से +7 तक अनेक ऑक्सीकरण अवस्थाएँ प्रदर्शित करते हैं। उदाहरण के लिए यूरेनियम +3, +4, +5 और +6 अवस्थाएँ प्रदर्शित करता है। यह गुण लैन्थेनाइडों की तुलना में अधिक स्पष्ट होता है। ऑक्सीकरण अवस्थाओं की यह विविधता ऐक्टिनाइड रसायन को जटिल बनाती है।


14. K₂Cr₂O₇ एक अच्छा ऑक्सीकारक क्यों है?

उत्तर:
पोटैशियम डाइक्रोमेट अम्लीय माध्यम में शक्तिशाली ऑक्सीकारक के रूप में कार्य करता है। इसमें Cr की ऑक्सीकरण अवस्था +6 होती है, जो Cr³⁺ में परिवर्तित होकर इलेक्ट्रॉन ग्रहण करती है। इस प्रक्रिया में अन्य पदार्थों का ऑक्सीकरण होता है। इसका उपयोग Fe²⁺ को Fe³⁺ में तथा आयोडाइड को आयोडीन में ऑक्सीकृत करने में किया जाता है। इसकी स्थिरता और प्रबल ऑक्सीकारक प्रकृति के कारण यह प्रयोगशाला तथा उद्योग दोनों में अत्यंत महत्वपूर्ण है।


15. KMnO₄ एक प्रबल ऑक्सीकारक क्यों है?

उत्तर:
पोटैशियम परमैंगनेट में मैंगनीज की ऑक्सीकरण अवस्था +7 होती है, जो अत्यधिक उच्च है। अम्लीय माध्यम में MnO₄⁻ आयन Mn²⁺ में परिवर्तित होकर पाँच इलेक्ट्रॉन ग्रहण करता है। इस कारण यह शक्तिशाली ऑक्सीकारक के रूप में कार्य करता है। इसका उपयोग जल शोधन, कार्बनिक यौगिकों के ऑक्सीकरण तथा रासायनिक विश्लेषण में किया जाता है। बैंगनी रंग का यह यौगिक संक्रमण तत्वों के महत्वपूर्ण यौगिकों में से एक है।


16. Zn, Cd और Hg को सामान्य संक्रमण तत्व क्यों नहीं माना जाता?

उत्तर:
संक्रमण तत्व की परिभाषा के अनुसार उसके परमाणु या किसी सामान्य आयन में d-कक्षक आंशिक रूप से भरा होना चाहिए। Zn, Cd तथा Hg के परमाणुओं में d¹⁰ विन्यास होता है और इनके सामान्य आयन Zn²⁺, Cd²⁺ तथा Hg²⁺ में भी d-कक्षक पूर्णतः भरे रहते हैं। इसलिए इनमें रंग, अनुचुंबकत्व तथा परिवर्ती ऑक्सीकरण अवस्था जैसे संक्रमण तत्वों के विशिष्ट गुण नहीं पाए जाते। इसी कारण इन्हें सामान्य संक्रमण तत्वों की श्रेणी में शामिल नहीं किया जाता।


17. संक्रमण तत्व उच्च गलनांक क्यों प्रदर्शित करते हैं?

उत्तर:
संक्रमण तत्वों में बड़ी संख्या में अयुग्मित d-इलेक्ट्रॉन उपस्थित होते हैं। ये इलेक्ट्रॉन धात्विक बंधों को मजबूत बनाते हैं, जिससे परमाणुओं के बीच आकर्षण बल बढ़ जाता है। परिणामस्वरूप इन तत्वों के गलनांक और क्वथनांक सामान्यतः उच्च होते हैं। मजबूत धात्विक बंधन इनके कठोर तथा सघन होने का भी कारण है। हालांकि Zn, Cd और Hg जैसे कुछ अपवाद भी पाए जाते हैं क्योंकि इनमें अयुग्मित इलेक्ट्रॉनों की संख्या कम होती है।


18. f-ब्लॉक तत्वों को आंतरिक संक्रमण तत्व क्यों कहते हैं?

उत्तर:
f-ब्लॉक तत्वों में इलेक्ट्रॉन बाहरी कक्षक में नहीं बल्कि आंतरिक (n−2)f कक्षकों में भरते हैं। इसी कारण इन्हें आंतरिक संक्रमण तत्व कहा जाता है। इनमें लैन्थेनाइड तथा ऐक्टिनाइड दोनों श्रेणियाँ सम्मिलित हैं। ये तत्व आवर्त सारणी के मुख्य भाग के नीचे अलग से प्रदर्शित किए जाते हैं। इनके रासायनिक गुण विशेष इलेक्ट्रॉनिक संरचना के कारण संक्रमण तत्वों से भिन्न होते हैं तथा तकनीकी एवं नाभिकीय क्षेत्रों में इनका व्यापक उपयोग है।


19. संक्रमण तत्व संकुल यौगिक आसानी से क्यों बनाते हैं?

उत्तर:
संक्रमण तत्वों के आयनों का आकार अपेक्षाकृत छोटा तथा आवेश अधिक होता है। इनके पास रिक्त d-कक्षक भी उपलब्ध रहते हैं जो लिगैण्डों से इलेक्ट्रॉन युग्म स्वीकार कर सकते हैं। परिणामस्वरूप ये स्थायी संकुल यौगिक बनाते हैं। उदाहरण के लिए [Fe(CN)₆]⁴⁻ तथा [Cu(NH₃)₄]²⁺ महत्वपूर्ण संकुल हैं। संकुल निर्माण की यह प्रवृत्ति संक्रमण तत्वों की विशिष्ट विशेषताओं में से एक है और समन्वय रसायन का आधार बनती है।


20. लैन्थेनाइड और ऐक्टिनाइड में दो अंतर लिखिए।

उत्तर:
लैन्थेनाइडों में 4f कक्षकों का भराव होता है जबकि ऐक्टिनाइडों में 5f कक्षकों का भराव होता है। लैन्थेनाइड अधिकांशतः +3 ऑक्सीकरण अवस्था प्रदर्शित करते हैं, जबकि ऐक्टिनाइड अनेक ऑक्सीकरण अवस्थाएँ दर्शाते हैं। अधिकांश लैन्थेनाइड रेडियोधर्मी नहीं होते, जबकि लगभग सभी ऐक्टिनाइड रेडियोधर्मी होते हैं। लैन्थेनाइडों के रासायनिक गुण अपेक्षाकृत समान होते हैं, जबकि ऐक्टिनाइडों में गुणों की विविधता अधिक पाई जाती है। यही अंतर दोनों श्रेणियों की रासायनिक प्रकृति को अलग बनाता है।