CBSE कक्षा 12 रसायन विज्ञान (भौतिक रसायन)

अध्याय 4: पृष्ठ रसायन (Surface Chemistry)


नीचे दिए गए 20 महत्वपूर्ण प्रश्न एवं उत्तर 2026–27 सत्र के लिए CBSE परीक्षा पैटर्न के अनुसार तैयार किए गए हैं। इनमें अधिशोषण, उत्प्रेरण तथा कोलॉइडी अवस्थाओं से संबंधित प्रमुख विषय शामिल हैं।


1. अधिशोषण (Adsorption) क्या है? इसके प्रकार बताइए।

उत्तर:
अधिशोषण वह प्रक्रिया है जिसमें किसी गैस या द्रव के अणु किसी ठोस या द्रव की सतह पर एकत्रित हो जाते हैं। यह मुख्यतः दो प्रकार का होता है—भौतिक अधिशोषण (Physisorption) तथा रासायनिक अधिशोषण (Chemisorption)। भौतिक अधिशोषण वान डर वाल्स बलों के कारण होता है, इसमें ऊष्मा परिवर्तन कम होता है तथा यह उत्क्रमणीय होता है। रासायनिक अधिशोषण रासायनिक बंधों के निर्माण द्वारा होता है, इसमें ऊष्मा परिवर्तन अधिक होता है तथा यह सामान्यतः अनुत्क्रमणीय होता है। अधिशोषण उद्योगों, गैस मास्क तथा उत्प्रेरण में अत्यंत महत्वपूर्ण है।


2. अधिशोषण और अवशोषण में अंतर स्पष्ट कीजिए।

उत्तर:
अधिशोषण में पदार्थ केवल सतह पर एकत्रित होता है, जबकि अवशोषण में पदार्थ संपूर्ण आयतन में समान रूप से फैल जाता है। उदाहरण के लिए, सिलिका जेल द्वारा जलवाष्प का ग्रहण अधिशोषण है, जबकि स्पंज द्वारा जल का ग्रहण अवशोषण है। अधिशोषण एक सतही परिघटना है, जबकि अवशोषण आयतन संबंधी परिघटना है। अधिशोषण में सांद्रता सतह पर अधिक होती है, जबकि अवशोषण में पूरे पदार्थ में समान रहती है। दोनों प्रक्रियाएँ अनेक औद्योगिक एवं वैज्ञानिक अनुप्रयोगों में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं।


3. भौतिक अधिशोषण की प्रमुख विशेषताएँ लिखिए।

उत्तर:
भौतिक अधिशोषण वान डर वाल्स बलों के कारण होता है। इसमें अधिशोषण की ऊष्मा कम होती है तथा यह निम्न ताप पर अधिक प्रभावी होता है। यह उत्क्रमणीय प्रक्रिया है तथा बहुस्तरीय परतें बना सकता है। गैस का दाब बढ़ाने पर अधिशोषण की मात्रा बढ़ जाती है। इस प्रक्रिया में सक्रियण ऊर्जा की आवश्यकता नहीं होती। सक्रिय चारकोल द्वारा गैसों का अधिशोषण इसका सामान्य उदाहरण है। गैस पृथक्करण, शुद्धिकरण तथा गैस मास्क में इसका व्यापक उपयोग किया जाता है।


4. रासायनिक अधिशोषण की विशेषताएँ बताइए।

उत्तर:
रासायनिक अधिशोषण में अधिशोषक और अधिशोष्य के बीच रासायनिक बंध बनते हैं। इसकी ऊष्मा अधिक होती है तथा यह प्रायः अनुत्क्रमणीय होता है। यह सामान्यतः उच्च ताप पर अधिक प्रभावी होता है और एकल परत (Monolayer) बनाता है। इसमें सक्रियण ऊर्जा की आवश्यकता होती है। गैस अणुओं की सतह के साथ विशिष्ट अभिक्रिया होती है। उदाहरण के लिए, हाइड्रोजन का निकेल की सतह पर अधिशोषण। औद्योगिक उत्प्रेरण प्रक्रियाओं में रासायनिक अधिशोषण का विशेष महत्व है।


5. गैसों के ठोसों पर अधिशोषण को प्रभावित करने वाले कारकों का वर्णन कीजिए।

उत्तर:
अधिशोषण की मात्रा कई कारकों पर निर्भर करती है। सतह क्षेत्रफल बढ़ने पर अधिशोषण बढ़ता है। गैस का दाब बढ़ाने से अधिक अणु सतह पर एकत्रित होते हैं। भौतिक अधिशोषण में ताप बढ़ाने पर अधिशोषण घटता है, जबकि रासायनिक अधिशोषण में प्रारंभ में बढ़ सकता है। गैस की प्रकृति तथा अधिशोषक की सक्रियता भी महत्वपूर्ण होती है। छिद्रयुक्त पदार्थ जैसे सक्रिय चारकोल अधिक अधिशोषण प्रदर्शित करते हैं। इन कारकों का उपयोग औद्योगिक गैस शुद्धिकरण में किया जाता है।


6. उत्प्रेरक (Catalyst) क्या है? इसकी विशेषताएँ लिखिए।

उत्तर:
उत्प्रेरक वह पदार्थ है जो किसी रासायनिक अभिक्रिया की दर को परिवर्तित करता है, परंतु स्वयं स्थायी रूप से उपभोगित नहीं होता। यह अभिक्रिया के लिए वैकल्पिक मार्ग प्रदान करता है जिसकी सक्रियण ऊर्जा कम होती है। उत्प्रेरक अभिक्रिया की संतुलन अवस्था को प्रभावित नहीं करता। थोड़ी मात्रा में भी यह अत्यधिक प्रभावी हो सकता है। इसकी सक्रियता ताप, सतह क्षेत्रफल तथा अशुद्धियों से प्रभावित होती है। उद्योगों में अमोनिया निर्माण, सल्फ्यूरिक अम्ल निर्माण तथा पेट्रोलियम परिष्करण में उत्प्रेरकों का व्यापक उपयोग किया जाता है। (STUDYCBSE)


7. समांगी और विषमांगी उत्प्रेरण में अंतर बताइए।

उत्तर:
समांगी उत्प्रेरण में अभिकारक तथा उत्प्रेरक एक ही अवस्था में होते हैं। उदाहरणतः SO₂ का ऑक्सीकरण नाइट्रोजन ऑक्साइड की उपस्थिति में। विषमांगी उत्प्रेरण में अभिकारक और उत्प्रेरक भिन्न अवस्थाओं में होते हैं। उदाहरणतः हैबर प्रक्रिया में ठोस लौह उत्प्रेरक तथा गैसीय अभिकारक। समांगी उत्प्रेरण में संपर्क पूरे माध्यम में होता है, जबकि विषमांगी उत्प्रेरण में अभिक्रिया सतह पर होती है। औद्योगिक स्तर पर विषमांगी उत्प्रेरण अधिक उपयोगी माना जाता है क्योंकि उत्प्रेरक को अलग करना सरल होता है।


8. एंजाइम उत्प्रेरण क्या है?

उत्तर:
एंजाइम जीवित कोशिकाओं द्वारा निर्मित जैविक उत्प्रेरक हैं जो विशिष्ट जैव-रासायनिक अभिक्रियाओं की दर बढ़ाते हैं। ये अत्यधिक चयनात्मक होते हैं तथा विशेष सब्सट्रेट पर ही कार्य करते हैं। एंजाइम कम ताप और सामान्य दाब पर भी प्रभावी रहते हैं। इनकी सक्रियता pH तथा तापमान पर निर्भर करती है। उदाहरण के लिए, यूरिएस एंजाइम यूरिया के अपघटन को उत्प्रेरित करता है। पाचन, किण्वन तथा जैव-प्रौद्योगिकी में एंजाइम उत्प्रेरण का विशेष महत्व है।


9. कोलॉइड (Colloid) क्या है?

उत्तर:
कोलॉइड वह विषमांगी तंत्र है जिसमें एक पदार्थ के सूक्ष्म कण दूसरे माध्यम में समान रूप से वितरित रहते हैं। इन कणों का आकार लगभग 1 nm से 1000 nm के बीच होता है। कोलॉइड न तो वास्तविक विलयन की तरह पूर्णतः समांगी होते हैं और न ही निलंबन की तरह शीघ्र बैठते हैं। दूध, धुआँ, कोहरा तथा जिलेटिन कोलॉइड के उदाहरण हैं। कोलॉइडी तंत्र अनेक जैविक, औद्योगिक तथा औषधीय प्रक्रियाओं में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।


10. वास्तविक विलयन, कोलॉइड और निलंबन में अंतर बताइए।

उत्तर:
वास्तविक विलयन के कणों का आकार 1 nm से कम होता है और वे पूर्णतः समांगी होते हैं। कोलॉइड के कण 1–1000 nm के बीच होते हैं तथा विषमांगी प्रकृति के होते हैं। निलंबन के कण 1000 nm से बड़े होते हैं और समय के साथ नीचे बैठ जाते हैं। वास्तविक विलयन तथा कोलॉइड सामान्यतः स्थायी होते हैं, जबकि निलंबन अस्थायी होता है। टिंडल प्रभाव कोलॉइड में दिखाई देता है, परंतु वास्तविक विलयन में नहीं।


11. लायोफिलिक तथा लायोफोबिक कोलॉइड में अंतर बताइए।

उत्तर:
लायोफिलिक कोलॉइड में प्रकीर्णित अवस्था और प्रकीर्णन माध्यम के बीच आकर्षण अधिक होता है। ये अत्यंत स्थायी होते हैं और आसानी से बन जाते हैं। स्टार्च तथा जिलेटिन इसके उदाहरण हैं। लायोफोबिक कोलॉइड में यह आकर्षण कम होता है, इसलिए ये कम स्थायी होते हैं। धातुओं के सोल इसके उदाहरण हैं। लायोफोबिक कोलॉइड को विशेष विधियों से तैयार करना पड़ता है। दोनों प्रकार के कोलॉइडों के गुण तथा उपयोग भिन्न होते हैं।


12. टिंडल प्रभाव क्या है?

उत्तर:
जब कोलॉइडी विलयन से प्रकाश की किरण गुजरती है तो उसके कण प्रकाश का प्रकीर्णन करते हैं, जिससे प्रकाश का मार्ग दिखाई देने लगता है। इस घटना को टिंडल प्रभाव कहते हैं। यह प्रभाव कोलॉइडी कणों के पर्याप्त आकार के कारण होता है। वास्तविक विलयन में यह प्रभाव नहीं दिखाई देता क्योंकि उसके कण अत्यंत छोटे होते हैं। कोहरा, धुआँ तथा दूध टिंडल प्रभाव प्रदर्शित करते हैं। इसका उपयोग कोलॉइड और वास्तविक विलयन में अंतर करने हेतु किया जाता है।


13. ब्राउनियन गति क्या है?

उत्तर:
कोलॉइडी कणों की अनियमित एवं निरंतर जिग-जैग गति को ब्राउनियन गति कहते हैं। यह गति प्रकीर्णन माध्यम के अणुओं द्वारा कणों पर असमान टक्करों के कारण उत्पन्न होती है। ब्राउनियन गति कोलॉइड की स्थिरता बनाए रखने में सहायता करती है क्योंकि इससे कण नीचे नहीं बैठते। ताप बढ़ने पर यह गति अधिक स्पष्ट हो जाती है। इस घटना का अध्ययन सर्वप्रथम वनस्पति वैज्ञानिक रॉबर्ट ब्राउन ने किया था।


14. वैद्युतकण संचलन (Electrophoresis) क्या है?

उत्तर:
जब कोलॉइडी विलयन में विद्युत क्षेत्र लगाया जाता है तो आवेशित कोलॉइडी कण विपरीत आवेश वाले इलेक्ट्रोड की ओर गति करते हैं। इस प्रक्रिया को वैद्युतकण संचलन कहते हैं। यह कोलॉइडी कणों पर उपस्थित आवेश को सिद्ध करता है। धनावेशित कण कैथोड की ओर तथा ऋणावेशित कण एनोड की ओर जाते हैं। जल शोधन, चिकित्सा तथा उद्योगों में इस सिद्धांत का उपयोग किया जाता है।


15. स्कंदन (Coagulation) क्या है?

उत्तर:
कोलॉइडी कणों का एकत्रित होकर बड़े कणों में परिवर्तित होना तथा विलयन से पृथक हो जाना स्कंदन कहलाता है। यह सामान्यतः विपरीत आवेश वाले आयनों को मिलाने पर होता है। स्कंदन के कारण कोलॉइड की स्थिरता समाप्त हो जाती है। जल शोधन संयंत्रों में फिटकरी मिलाकर अशुद्धियों का स्कंदन कराया जाता है। हार्डी-शुल्ज नियम स्कंदन प्रक्रिया की व्याख्या करता है। यह कोलॉइडी रसायन का महत्वपूर्ण अनुप्रयोग है।


16. हार्डी-शुल्ज नियम क्या है?

उत्तर:
हार्डी-शुल्ज नियम के अनुसार किसी कोलॉइड का स्कंदन करने की क्षमता उस आयन की संयोजकता के बढ़ने के साथ बढ़ती है जिसका आवेश कोलॉइडी कण के आवेश के विपरीत हो। उदाहरण के लिए, ऋणावेशित सोल के लिए Al³⁺ आयन, Ba²⁺ से अधिक प्रभावी होता है। यह नियम स्कंदन मान (Flocculation Value) को समझाने में सहायक है। जल शोधन तथा कोलॉइड नियंत्रण में इसका व्यावहारिक महत्व है।


17. बहुअणुक कोलॉइड क्या हैं?

उत्तर:
जब अनेक छोटे अणु या परमाणु मिलकर कोलॉइडी आकार के कण बनाते हैं तो उन्हें बहुअणुक कोलॉइड कहते हैं। इन कणों का आकार कोलॉइडी सीमा में होता है। स्वर्ण सोल तथा गंधक सोल इसके प्रमुख उदाहरण हैं। इनका निर्माण अनेक सूक्ष्म कणों के समुच्चयन से होता है। ये सामान्यतः लायोफोबिक प्रकृति के होते हैं और विशेष विधियों द्वारा तैयार किए जाते हैं।


18. मैक्रोमॉलिक्यूलर कोलॉइड क्या हैं?

उत्तर:
वे कोलॉइड जिनके कण स्वयं विशाल अणु होते हैं, मैक्रोमॉलिक्यूलर कोलॉइड कहलाते हैं। इनके अणुओं का आकार कोलॉइडी सीमा में होता है। स्टार्च, प्रोटीन तथा सेलूलोज इसके उदाहरण हैं। ये प्रायः लायोफिलिक प्रकृति के होते हैं तथा अत्यधिक स्थिर रहते हैं। जैविक प्रणालियों तथा उद्योगों में इनका व्यापक उपयोग होता है। इनके गुण सामान्य कोलॉइडों से भिन्न होते हैं।


19. स्वर्ण संख्या (Gold Number) क्या है?

उत्तर:
स्वर्ण संख्या किसी रक्षी कोलॉइड की संरक्षण क्षमता का माप है। यह उस रक्षी कोलॉइड के मिलीग्राम की संख्या है जो 10 mL मानक स्वर्ण सोल को स्कंदन से बचाने के लिए आवश्यक होती है। स्वर्ण संख्या जितनी कम होगी, रक्षी कोलॉइड उतना ही अधिक प्रभावी माना जाएगा। जिलेटिन और गोंद जैसे पदार्थ अच्छे रक्षी कोलॉइड होते हैं। यह अवधारणा कोलॉइडों की स्थिरता के अध्ययन में उपयोगी है।


20. इमल्शन (Emulsion) क्या है? इसके प्रकार बताइए।

उत्तर:
इमल्शन दो परस्पर अमिश्रणीय द्रवों का कोलॉइडी मिश्रण है, जिसमें एक द्रव दूसरे में सूक्ष्म बूंदों के रूप में वितरित रहता है। इसके दो प्रमुख प्रकार हैं—तेल-में-जल (Oil in Water) तथा जल-में-तेल (Water in Oil) इमल्शन। दूध तेल-में-जल इमल्शन का उदाहरण है, जबकि मक्खन जल-में-तेल इमल्शन का। इमल्शन की स्थिरता बनाए रखने के लिए इमल्सीकारक पदार्थों का उपयोग किया जाता है। खाद्य, औषधि तथा सौंदर्य प्रसाधन उद्योगों में इनका व्यापक उपयोग होता है।