CBSE कक्षा 12 जीवविज्ञान (2026-27)
अध्याय 13 : जैव विविधता एवं संरक्षण (Biodiversity and Conservation)
20 महत्वपूर्ण प्रश्न एवं उत्तर
1. जैव विविधता (Biodiversity) क्या है? इसके प्रमुख स्तरों का वर्णन कीजिए।
उत्तर:
जैव विविधता से तात्पर्य पृथ्वी पर पाए जाने वाले जीवों, उनके जीनों तथा पारिस्थितिक तंत्रों की विविधता से है। इसके तीन प्रमुख स्तर हैं— आनुवंशिक विविधता, प्रजातीय विविधता तथा पारिस्थितिकीय विविधता। आनुवंशिक विविधता एक ही प्रजाति के विभिन्न सदस्यों में पाए जाने वाले जीनों के अंतर को दर्शाती है। प्रजातीय विविधता किसी क्षेत्र में विभिन्न प्रजातियों की संख्या को व्यक्त करती है। पारिस्थितिकीय विविधता विभिन्न पारिस्थितिक तंत्रों जैसे वन, घासभूमि, मरुस्थल तथा आर्द्रभूमि की विविधता को दर्शाती है। जैव विविधता पारिस्थितिक संतुलन बनाए रखने तथा मानव कल्याण के लिए अत्यंत आवश्यक है।
2. भारत को मेगा-विविधता वाला देश क्यों कहा जाता है?
उत्तर:
भारत विश्व के 17 मेगा-विविधता वाले देशों में शामिल है। यहाँ भौगोलिक, जलवायु एवं पारिस्थितिकीय विविधता अत्यधिक पाई जाती है। भारत में हिमालयी क्षेत्र, पश्चिमी घाट, मरुस्थल, मैंग्रोव वन, प्रवाल भित्तियाँ तथा उष्णकटिबंधीय वन जैसे अनेक पारिस्थितिक तंत्र मौजूद हैं। देश में लगभग 45,000 से अधिक पौधों तथा 90,000 से अधिक पशु प्रजातियों का वर्णन किया गया है। अनेक प्रजातियाँ स्थानिक (Endemic) हैं, जो केवल भारत में ही पाई जाती हैं। यह समृद्ध जैविक संपदा भारत को विश्व के महत्वपूर्ण जैव विविधता केंद्रों में स्थान दिलाती है तथा संरक्षण की दृष्टि से भी अत्यंत महत्वपूर्ण बनाती है।
3. अक्षांशीय प्रवणता (Latitudinal Gradient) से आप क्या समझते हैं?
उत्तर:
अक्षांशीय प्रवणता जैव विविधता के वितरण का एक महत्वपूर्ण प्रतिरूप है। इसके अनुसार भूमध्य रेखा के निकट क्षेत्रों में जैव विविधता अधिक तथा ध्रुवों की ओर जाने पर कम होती जाती है। उष्णकटिबंधीय क्षेत्रों में स्थिर जलवायु, पर्याप्त सूर्य प्रकाश तथा उच्च प्राथमिक उत्पादकता के कारण अधिक प्रजातियाँ पाई जाती हैं। उदाहरण के लिए, अमेज़न वर्षावन में अत्यधिक जैव विविधता मिलती है जबकि ध्रुवीय क्षेत्रों में प्रजातियों की संख्या अपेक्षाकृत कम होती है। यह सिद्धांत दर्शाता है कि पर्यावरणीय परिस्थितियाँ जैव विविधता को प्रभावित करती हैं तथा उष्णकटिबंधीय क्षेत्र संरक्षण की दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण हैं।
4. प्रजाति-क्षेत्र संबंध (Species-Area Relationship) का वर्णन कीजिए।
उत्तर:
प्रजाति-क्षेत्र संबंध के अनुसार किसी क्षेत्र का आकार बढ़ने पर वहाँ पाई जाने वाली प्रजातियों की संख्या भी बढ़ती है। इस संबंध का अध्ययन वैज्ञानिक अलेक्जेंडर वॉन हम्बोल्ट ने किया था। छोटे क्षेत्रों में यह संबंध आयताकार वक्र के रूप में तथा लॉग-लॉग पैमाने पर सीधी रेखा के रूप में प्रदर्शित होता है। बड़े क्षेत्रों में प्रजातियों की वृद्धि दर अधिक होती है। यह सिद्धांत संरक्षण जीवविज्ञान में अत्यंत महत्वपूर्ण है क्योंकि इससे यह समझने में सहायता मिलती है कि बड़े संरक्षित क्षेत्रों में अधिक जैव विविधता सुरक्षित रखी जा सकती है।
5. जैव विविधता के आर्थिक महत्व को स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
जैव विविधता मानव समाज को अनेक प्रत्यक्ष एवं अप्रत्यक्ष लाभ प्रदान करती है। यह भोजन, ईंधन, औषधियाँ, लकड़ी, रेशा तथा औद्योगिक कच्चा माल उपलब्ध कराती है। अनेक औषधियाँ पौधों एवं सूक्ष्मजीवों से प्राप्त होती हैं। कृषि में जैव विविधता नई एवं रोग-प्रतिरोधी किस्मों के विकास में सहायक होती है। इसके अतिरिक्त पारिस्थितिक तंत्र जल शुद्धिकरण, परागण, पोषक चक्रण तथा जलवायु नियंत्रण जैसी सेवाएँ प्रदान करते हैं। पर्यटन एवं पारिस्थितिक पर्यटन से भी आर्थिक लाभ प्राप्त होता है। इसलिए जैव विविधता का संरक्षण सतत विकास तथा मानव कल्याण के लिए अत्यंत आवश्यक है।
6. जैव विविधता ह्रास के चार प्रमुख कारणों (Evil Quartet) का वर्णन कीजिए।
उत्तर:
जैव विविधता ह्रास के चार प्रमुख कारणों को “ईविल क्वार्टेट” कहा जाता है। इनमें आवास विनाश एवं विखंडन, अतिदोहन, विदेशी प्रजातियों का आक्रमण तथा सह-विलुप्ति शामिल हैं। वनों की कटाई एवं शहरीकरण से प्राकृतिक आवास नष्ट होते हैं। अतिदोहन के कारण कई प्रजातियाँ विलुप्ति के कगार पर पहुँच जाती हैं। विदेशी प्रजातियाँ स्थानीय जीवों के लिए प्रतिस्पर्धा उत्पन्न करती हैं। सह-विलुप्ति में एक प्रजाति के नष्ट होने पर उससे संबंधित दूसरी प्रजाति भी समाप्त हो जाती है। ये सभी कारण वर्तमान जैव विविधता संकट के लिए उत्तरदायी हैं।
7. आवास विनाश एवं विखंडन जैव विविधता को कैसे प्रभावित करते हैं?
उत्तर:
आवास विनाश एवं विखंडन जैव विविधता ह्रास का प्रमुख कारण है। जब प्राकृतिक वन, घासभूमियाँ या आर्द्रभूमियाँ कृषि, उद्योग या शहरी विकास के लिए नष्ट की जाती हैं, तो अनेक जीवों का प्राकृतिक निवास स्थान समाप्त हो जाता है। बड़े आवास छोटे-छोटे टुकड़ों में विभाजित हो जाते हैं, जिससे जीवों का प्रवास, प्रजनन एवं भोजन प्राप्ति प्रभावित होती है। छोटी आबादियाँ आनुवंशिक विविधता खो देती हैं तथा विलुप्ति की संभावना बढ़ जाती है। इसलिए प्राकृतिक आवासों का संरक्षण जैव विविधता बनाए रखने के लिए अत्यंत आवश्यक है।
8. अतिदोहन (Over-exploitation) क्या है?
उत्तर:
जब किसी प्राकृतिक संसाधन या जीव का उपयोग उसकी पुनर्स्थापन क्षमता से अधिक किया जाता है, तो उसे अतिदोहन कहते हैं। अत्यधिक शिकार, मछली पकड़ना, लकड़ी कटाई तथा वन्यजीव व्यापार इसके प्रमुख उदाहरण हैं। अतिदोहन के कारण कई प्रजातियों की संख्या तेजी से घट जाती है और वे संकटग्रस्त हो जाती हैं। स्टेलर सी काउ तथा पैसेंजर पिजन जैसी प्रजातियाँ अतिदोहन के कारण विलुप्त हो चुकी हैं। प्राकृतिक संसाधनों का सतत उपयोग तथा कानूनी संरक्षण इस समस्या को कम करने के लिए आवश्यक है।
9. विदेशी प्रजातियों के आक्रमण से क्या तात्पर्य है?
उत्तर:
विदेशी या बाह्य प्रजातियाँ वे जीव हैं जिन्हें किसी क्षेत्र में प्राकृतिक रूप से नहीं पाया जाता, परंतु मानव द्वारा वहाँ पहुँचाया जाता है। ये प्रजातियाँ स्थानीय जीवों के साथ भोजन, स्थान एवं संसाधनों के लिए प्रतिस्पर्धा करती हैं। कई बार वे स्थानीय प्रजातियों को विस्थापित कर देती हैं तथा पारिस्थितिक संतुलन बिगाड़ देती हैं। उदाहरण के रूप में जलकुंभी तथा लैंटाना भारत में गंभीर समस्याएँ उत्पन्न कर चुकी हैं। विदेशी प्रजातियों का अनियंत्रित प्रसार जैव विविधता ह्रास का एक प्रमुख कारण माना जाता है।
10. सह-विलुप्ति (Co-extinction) क्या है?
उत्तर:
सह-विलुप्ति वह प्रक्रिया है जिसमें एक प्रजाति के विलुप्त होने पर उससे घनिष्ठ रूप से जुड़ी दूसरी प्रजाति भी विलुप्त हो जाती है। अनेक जीव पारस्परिक संबंधों पर निर्भर होते हैं, जैसे परजीवी-आश्रयदाता या पौधा-परागणकर्ता संबंध। यदि आश्रयदाता प्रजाति समाप्त हो जाए तो उससे जुड़े परजीवी भी नष्ट हो सकते हैं। इसी प्रकार किसी विशेष परागणकर्ता के समाप्त होने से संबंधित पौधों की प्रजातियाँ भी प्रभावित हो सकती हैं। इसलिए जैव विविधता संरक्षण में विभिन्न प्रजातियों के पारिस्थितिक संबंधों को समझना आवश्यक है।
11. जैव विविधता हॉटस्पॉट क्या हैं?
उत्तर:
जैव विविधता हॉटस्पॉट ऐसे क्षेत्र हैं जहाँ अत्यधिक संख्या में स्थानिक प्रजातियाँ पाई जाती हैं तथा जो विलुप्ति के गंभीर खतरे में होते हैं। इन क्षेत्रों में संरक्षण प्रयासों को प्राथमिकता दी जाती है। विश्व में कई जैव विविधता हॉटस्पॉट हैं, जिनमें भारत के पश्चिमी घाट-श्रीलंका, हिमालय तथा इंडो-बर्मा क्षेत्र प्रमुख हैं। हॉटस्पॉट संरक्षण से कम क्षेत्र में अधिक संख्या में दुर्लभ एवं संकटग्रस्त प्रजातियों को बचाया जा सकता है। इसलिए जैव विविधता संरक्षण रणनीतियों में इनका विशेष महत्व है।
12. इन-सीटू संरक्षण क्या है?
उत्तर:
इन-सीटू संरक्षण वह विधि है जिसमें जीवों को उनके प्राकृतिक आवास में ही संरक्षित किया जाता है। इसका उद्देश्य संपूर्ण पारिस्थितिक तंत्र तथा उससे संबंधित जैव विविधता का संरक्षण करना है। राष्ट्रीय उद्यान, वन्यजीव अभयारण्य, जैवमंडल आरक्षित क्षेत्र तथा पवित्र उपवन इसके प्रमुख उदाहरण हैं। इस विधि से जीव प्राकृतिक परिस्थितियों में विकसित होते रहते हैं तथा उनके पारिस्थितिक संबंध सुरक्षित बने रहते हैं। यह जैव विविधता संरक्षण की सबसे प्रभावी एवं दीर्घकालिक विधि मानी जाती है।
13. एक्स-सीटू संरक्षण क्या है?
उत्तर:
एक्स-सीटू संरक्षण में जीवों को उनके प्राकृतिक आवास से बाहर संरक्षित किया जाता है। यह विधि विशेष रूप से संकटग्रस्त प्रजातियों के लिए उपयोगी होती है। चिड़ियाघर, वनस्पति उद्यान, बीज बैंक, ऊतक संवर्धन तथा क्रायोप्रिजर्वेशन इसके प्रमुख उदाहरण हैं। इस विधि द्वारा दुर्लभ प्रजातियों के जर्मप्लाज्म को लंबे समय तक सुरक्षित रखा जा सकता है। जब प्राकृतिक आवास सुरक्षित नहीं रह जाते, तब एक्स-सीटू संरक्षण जैव विविधता बचाने का महत्वपूर्ण साधन बन जाता है।
14. जैवमंडल आरक्षित क्षेत्र (Biosphere Reserve) क्या है? इसका महत्व बताइए।
उत्तर:
जैवमंडल आरक्षित क्षेत्र ऐसे बड़े संरक्षित क्षेत्र होते हैं जिनका उद्देश्य जैव विविधता, प्राकृतिक संसाधनों तथा पारिस्थितिक तंत्रों का संरक्षण करना है। इनमें वनस्पतियों, जीव-जंतुओं तथा स्थानीय समुदायों के हितों का संतुलन बनाए रखा जाता है। जैवमंडल आरक्षित क्षेत्रों को मुख्य क्षेत्र (Core Zone), बफर क्षेत्र (Buffer Zone) तथा संक्रमण क्षेत्र (Transition Zone) में विभाजित किया जाता है। मुख्य क्षेत्र में मानवीय गतिविधियाँ प्रतिबंधित रहती हैं, जबकि बफर और संक्रमण क्षेत्रों में सीमित एवं सतत गतिविधियों की अनुमति होती है। ये क्षेत्र अनुसंधान, शिक्षा तथा संरक्षण के महत्वपूर्ण केंद्र हैं। भारत में नीलगिरि, नंदा देवी तथा सुंदरवन प्रमुख जैवमंडल आरक्षित क्षेत्र हैं।
15. पवित्र उपवन (Sacred Groves) क्या हैं? इनके संरक्षण में क्या भूमिका है?
उत्तर:
पवित्र उपवन ऐसे वन क्षेत्र हैं जिन्हें स्थानीय समुदाय धार्मिक, सांस्कृतिक या आध्यात्मिक कारणों से संरक्षित रखते हैं। इन क्षेत्रों में पेड़ों की कटाई, शिकार तथा अन्य विनाशकारी गतिविधियाँ निषिद्ध होती हैं। भारत के विभिन्न राज्यों जैसे राजस्थान, मेघालय, पश्चिम बंगाल तथा कर्नाटक में पवित्र उपवन पाए जाते हैं। ये क्षेत्र दुर्लभ एवं संकटग्रस्त पौधों तथा पशुओं के प्राकृतिक आश्रय स्थल के रूप में कार्य करते हैं। पवित्र उपवन स्थानीय जैव विविधता को संरक्षित रखने, मिट्टी के संरक्षण तथा जल स्रोतों को सुरक्षित रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। यह समुदाय आधारित संरक्षण का उत्कृष्ट उदाहरण है।
16. जैव विविधता संरक्षण के लिए राष्ट्रीय उद्यान और वन्यजीव अभयारण्य क्यों महत्वपूर्ण हैं?
उत्तर:
राष्ट्रीय उद्यान और वन्यजीव अभयारण्य जैव विविधता संरक्षण के महत्वपूर्ण साधन हैं। इन क्षेत्रों में वनस्पतियों एवं जीव-जंतुओं को कानूनी सुरक्षा प्रदान की जाती है। राष्ट्रीय उद्यानों में मानव हस्तक्षेप अत्यंत सीमित होता है, जबकि अभयारण्यों में कुछ नियंत्रित गतिविधियों की अनुमति दी जा सकती है। ये क्षेत्र संकटग्रस्त एवं दुर्लभ प्रजातियों के प्राकृतिक आवासों को सुरक्षित रखते हैं। इनके माध्यम से वन्यजीवों के प्रजनन, भोजन तथा प्रवास के लिए उपयुक्त वातावरण उपलब्ध होता है। साथ ही, ये पर्यावरण शिक्षा, अनुसंधान और पारिस्थितिक पर्यटन को भी बढ़ावा देते हैं, जिससे संरक्षण के प्रति जन-जागरूकता बढ़ती है।
17. जैव विविधता संरक्षण में क्रायोप्रिजर्वेशन (Cryopreservation) की भूमिका स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
क्रायोप्रिजर्वेशन एक आधुनिक संरक्षण तकनीक है जिसमें जीवों के बीज, परागकण, भ्रूण, ऊतक अथवा जर्मप्लाज्म को अत्यंत निम्न तापमान (-196°C) पर तरल नाइट्रोजन में सुरक्षित रखा जाता है। इस विधि द्वारा जैविक सामग्री को लंबे समय तक बिना किसी क्षति के संरक्षित किया जा सकता है। यह तकनीक विशेष रूप से दुर्लभ एवं संकटग्रस्त प्रजातियों के संरक्षण में उपयोगी है। भविष्य में आवश्यकता पड़ने पर इन संरक्षित नमूनों का उपयोग प्रजनन तथा पुनर्स्थापन कार्यक्रमों में किया जा सकता है। क्रायोप्रिजर्वेशन जैव विविधता संरक्षण के लिए एक प्रभावी एक्स-सीटू संरक्षण उपाय माना जाता है।
18. जैव विविधता संरक्षण में स्थानीय समुदायों की भूमिका का वर्णन कीजिए।
उत्तर:
स्थानीय समुदाय जैव विविधता संरक्षण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं क्योंकि उनका जीवन प्राकृतिक संसाधनों पर निर्भर होता है। वे पारंपरिक ज्ञान एवं संरक्षण पद्धतियों के माध्यम से वन, जल स्रोतों और वन्यजीवों की रक्षा करते हैं। कई क्षेत्रों में ग्रामीण समुदायों ने वनों की कटाई रोकने तथा पवित्र उपवनों को संरक्षित रखने में महत्वपूर्ण योगदान दिया है। चिपको आंदोलन जैसे उदाहरण बताते हैं कि जनभागीदारी संरक्षण को सफल बना सकती है। स्थानीय लोगों को संरक्षण कार्यक्रमों में शामिल करने से प्राकृतिक संसाधनों का सतत उपयोग सुनिश्चित होता है तथा जैव विविधता संरक्षण के प्रति सामाजिक जिम्मेदारी विकसित होती है।
19. जैव विविधता के पारिस्थितिकीय महत्व को स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
जैव विविधता पारिस्थितिक तंत्रों की स्थिरता एवं कार्यक्षमता बनाए रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। विभिन्न जीव पोषक तत्वों के चक्रण, परागण, अपघटन तथा ऊर्जा प्रवाह जैसी प्रक्रियाओं में योगदान देते हैं। अधिक जैव विविधता वाले पारिस्थितिक तंत्र पर्यावरणीय परिवर्तनों एवं प्राकृतिक आपदाओं का बेहतर सामना कर सकते हैं। जैव विविधता खाद्य श्रृंखलाओं और खाद्य जालों को संतुलित बनाए रखती है। इसके अतिरिक्त यह जलवायु नियंत्रण, मिट्टी की उर्वरता तथा जल संरक्षण जैसी पारिस्थितिक सेवाएँ भी प्रदान करती है। इसलिए पृथ्वी पर जीवन की निरंतरता के लिए जैव विविधता अत्यंत आवश्यक है।
20. जैव विविधता संरक्षण की आवश्यकता क्यों है?
उत्तर:
जैव विविधता संरक्षण आवश्यक है क्योंकि यह मानव जीवन तथा पर्यावरणीय संतुलन का आधार है। जैव विविधता भोजन, औषधियाँ, ईंधन, रेशा तथा अनेक प्राकृतिक संसाधन उपलब्ध कराती है। यह पारिस्थितिक तंत्रों की स्थिरता बनाए रखती है तथा जलवायु नियंत्रण, परागण और पोषक चक्रण जैसी सेवाएँ प्रदान करती है। वर्तमान में आवास विनाश, प्रदूषण, जलवायु परिवर्तन और अतिदोहन के कारण अनेक प्रजातियाँ विलुप्ति के खतरे में हैं। यदि जैव विविधता का संरक्षण नहीं किया गया तो पारिस्थितिक संतुलन बिगड़ सकता है और मानव जीवन पर गंभीर प्रभाव पड़ सकते हैं। इसलिए सतत विकास के लिए जैव विविधता संरक्षण अनिवार्य है।
