CBSE कक्षा 12 भौतिकी (2026–27)
अध्याय 13 : अर्धचालक इलेक्ट्रॉनिकी (Semiconductor Electronics)
महत्वपूर्ण प्रश्न एवं उत्तर
1. अर्धचालक (Semiconductor) क्या है? यह चालक और कुचालक से कैसे भिन्न है?
उत्तर:
अर्धचालक ऐसे पदार्थ होते हैं जिनकी विद्युत चालकता चालक और कुचालक के बीच होती है। सिलिकॉन (Si) तथा जर्मेनियम (Ge) इसके प्रमुख उदाहरण हैं। चालकों में इलेक्ट्रॉन आसानी से प्रवाहित होते हैं, जबकि कुचालकों में इलेक्ट्रॉनों का प्रवाह लगभग नहीं होता। अर्धचालकों में ऊर्जा अंतराल (Energy Gap) छोटा होता है, इसलिए सामान्य ताप पर कुछ इलेक्ट्रॉन चालक बैंड में पहुँच जाते हैं और विद्युत धारा का संचालन करते हैं। इनकी चालकता तापमान बढ़ने पर बढ़ती है, जबकि धातुओं में घटती है। अर्धचालक आधुनिक इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों जैसे डायोड, ट्रांजिस्टर, आईसी और कंप्यूटर चिप्स के निर्माण में व्यापक रूप से प्रयुक्त होते हैं।
2. आंतरिक (Intrinsic) अर्धचालक क्या होते हैं?
उत्तर:
आंतरिक अर्धचालक शुद्ध अर्धचालक होते हैं जिनमें किसी प्रकार की अशुद्धि नहीं मिलाई जाती। शुद्ध सिलिकॉन और जर्मेनियम इसके उदाहरण हैं। इनमें तापीय ऊर्जा के कारण इलेक्ट्रॉन-होल युग्म उत्पन्न होते हैं। उत्पन्न इलेक्ट्रॉनों और होलों की संख्या समान होती है, इसलिए दोनों विद्युत चालन में भाग लेते हैं। इनकी चालकता अपेक्षाकृत कम होती है क्योंकि मुक्त आवेश वाहकों की संख्या सीमित होती है। तापमान बढ़ने पर अधिक इलेक्ट्रॉन-होल युग्म बनते हैं, जिससे चालकता बढ़ जाती है। आंतरिक अर्धचालक अर्धचालकों के मूल गुणों को समझने का आधार प्रदान करते हैं।
3. n-प्रकार (N-Type) अर्धचालक क्या है?
उत्तर:
जब शुद्ध सिलिकॉन या जर्मेनियम में पंचसंयोजी (Pentavalent) अशुद्धियाँ जैसे फॉस्फोरस, आर्सेनिक या एंटीमनी मिलाई जाती हैं, तब n-प्रकार अर्धचालक बनता है। अशुद्धि परमाणु के पाँच संयोजक इलेक्ट्रॉनों में से चार सहसंयोजक बंध बनाते हैं और पाँचवाँ इलेक्ट्रॉन मुक्त हो जाता है। यह मुक्त इलेक्ट्रॉन विद्युत चालन में योगदान देता है। इस प्रकार इलेक्ट्रॉन बहुसंख्यक (Majority) वाहक तथा होल अल्पसंख्यक (Minority) वाहक बन जाते हैं। मुक्त इलेक्ट्रॉनों की अधिक संख्या के कारण इसकी चालकता आंतरिक अर्धचालक की अपेक्षा अधिक होती है। n-प्रकार अर्धचालक इलेक्ट्रॉनिक परिपथों में व्यापक रूप से उपयोग किए जाते हैं।
4. p-प्रकार (P-Type) अर्धचालक क्या है?
उत्तर:
जब शुद्ध अर्धचालक में त्रिसंयोजी (Trivalent) अशुद्धियाँ जैसे बोरॉन, गैलियम या इंडियम मिलाई जाती हैं, तब p-प्रकार अर्धचालक बनता है। अशुद्धि परमाणु के केवल तीन संयोजक इलेक्ट्रॉन होते हैं, जिससे एक सहसंयोजक बंध अपूर्ण रह जाता है और एक होल उत्पन्न होता है। यह होल धनात्मक आवेश वाहक की तरह कार्य करता है। p-प्रकार अर्धचालक में होल बहुसंख्यक वाहक तथा इलेक्ट्रॉन अल्पसंख्यक वाहक होते हैं। होलों की गति के कारण विद्युत धारा प्रवाहित होती है। p-प्रकार अर्धचालक p-n संधि डायोड और अन्य इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों के निर्माण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।
5. p-n संधि डायोड क्या है?
उत्तर:
जब p-प्रकार और n-प्रकार अर्धचालकों को जोड़कर एक संधि बनाई जाती है, तो उसे p-n संधि डायोड कहते हैं। संधि बनने पर n-पक्ष के इलेक्ट्रॉन और p-पक्ष के होल एक-दूसरे की ओर विसरित होकर पुनर्संयोजन करते हैं। इससे संधि के पास एक अवक्षय (Depletion) क्षेत्र बन जाता है। यह क्षेत्र एक विभव अवरोध (Potential Barrier) उत्पन्न करता है जो आवेश वाहकों के आगे के प्रवाह को रोकता है। डायोड अग्र अभिनति (Forward Bias) में धारा प्रवाहित करता है तथा पश्च अभिनति (Reverse Bias) में धारा को रोकता है। इसी गुण के कारण इसका उपयोग दिष्टकारी (Rectifier) तथा स्विचिंग परिपथों में किया जाता है।
6. अवक्षय क्षेत्र (Depletion Region) क्या है?
उत्तर:
p-n संधि के आसपास का वह क्षेत्र जहाँ मुक्त इलेक्ट्रॉन और होल नहीं होते, अवक्षय क्षेत्र कहलाता है। यह तब बनता है जब n-पक्ष के इलेक्ट्रॉन और p-पक्ष के होल संधि पर पहुँचकर पुनर्संयोजन कर लेते हैं। इसके परिणामस्वरूप स्थिर धनात्मक और ऋणात्मक आयन पीछे रह जाते हैं। ये आयन एक विद्युत क्षेत्र उत्पन्न करते हैं जो आगे के विसरण को रोकता है। अवक्षय क्षेत्र p-n संधि के महत्वपूर्ण गुणों को नियंत्रित करता है। इसकी चौड़ाई बाहरी वोल्टेज के अनुसार बदलती रहती है और डायोड की कार्यप्रणाली में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है।
7. p-n संधि डायोड की अग्र अभिनति (Forward Biasing) समझाइए।
उत्तर:
जब p-पक्ष को बैटरी के धनात्मक तथा n-पक्ष को ऋणात्मक टर्मिनल से जोड़ा जाता है, तब डायोड अग्र अभिनति में होता है। इससे विभव अवरोध कम हो जाता है और अवक्षय क्षेत्र की चौड़ाई घट जाती है। परिणामस्वरूप बहुसंख्यक आवेश वाहकों को संधि पार करने में आसानी होती है। डायोड का प्रतिरोध कम हो जाता है और पर्याप्त धारा प्रवाहित होने लगती है। एक निश्चित सीमा वोल्टेज प्राप्त होने पर धारा तेजी से बढ़ती है। अग्र अभिनति का उपयोग दिष्टकारी, इलेक्ट्रॉनिक स्विच और विभिन्न इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों में किया जाता है।
8. p-n संधि डायोड की पश्च अभिनति (Reverse Biasing) समझाइए।
उत्तर:
जब p-पक्ष को ऋणात्मक तथा n-पक्ष को धनात्मक टर्मिनल से जोड़ा जाता है, तब डायोड पश्च अभिनति में होता है। इस स्थिति में विभव अवरोध बढ़ जाता है और अवक्षय क्षेत्र चौड़ा हो जाता है। बहुसंख्यक आवेश वाहक संधि से दूर खिंच जाते हैं, जिससे धारा का प्रवाह लगभग रुक जाता है। केवल अल्पसंख्यक वाहकों के कारण बहुत कम धारा प्रवाहित होती है, जिसे विपरीत संतृप्ति धारा कहते हैं। इसलिए डायोड उच्च प्रतिरोध प्रदर्शित करता है। पश्च अभिनति का उपयोग वोल्टेज नियमन, सुरक्षा परिपथों तथा जेनर डायोड के संचालन में किया जाता है।
9. दिष्टकारी (Rectifier) क्या है? इसका उपयोग क्यों किया जाता है?
उत्तर:
दिष्टकारी एक ऐसा इलेक्ट्रॉनिक उपकरण है जो प्रत्यावर्ती धारा (AC) को दिष्ट धारा (DC) में परिवर्तित करता है। यह मुख्यतः p-n संधि डायोड का उपयोग करता है। डायोड AC के एक अर्धचक्र में धारा को प्रवाहित करता है और दूसरे अर्धचक्र में रोक देता है। इस प्रकार आउटपुट में स्पंदित DC प्राप्त होती है। दिष्टकारी दो प्रकार के होते हैं—अर्ध-तरंग (Half Wave) तथा पूर्ण-तरंग (Full Wave) दिष्टकारी। इनका उपयोग मोबाइल चार्जर, कंप्यूटर, टेलीविजन तथा अन्य इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों की विद्युत आपूर्ति में किया जाता है क्योंकि अधिकांश इलेक्ट्रॉनिक परिपथ DC पर कार्य करते हैं।
10. जेनर डायोड (Zener Diode) क्या है?
उत्तर:
जेनर डायोड एक विशेष प्रकार का p-n संधि डायोड है जिसे पश्च अभिनति में कार्य करने के लिए बनाया जाता है। इसे अत्यधिक डोप किया जाता है ताकि कम वोल्टेज पर ही ब्रेकडाउन हो सके। एक निश्चित पश्च वोल्टेज, जिसे जेनर वोल्टेज कहते हैं, प्राप्त होने पर यह चालक बन जाता है और इसके सिरों के बीच वोल्टेज लगभग स्थिर रहता है। इसी विशेषता के कारण इसका उपयोग वोल्टेज नियामक (Voltage Regulator) के रूप में किया जाता है। जेनर डायोड विद्युत उपकरणों को वोल्टेज में उतार-चढ़ाव से बचाने और स्थिर वोल्टेज उपलब्ध कराने में सहायक होता है।
11. जेनर डायोड को वोल्टेज नियामक के रूप में क्यों उपयोग किया जाता है?
उत्तर:
जेनर डायोड पश्च ब्रेकडाउन क्षेत्र में कार्य करते समय अपने सिरों के बीच लगभग स्थिर वोल्टेज बनाए रखता है। यदि इनपुट वोल्टेज बढ़ता या घटता है, तो जेनर डायोड में प्रवाहित धारा बदलती है लेकिन आउटपुट वोल्टेज लगभग समान रहता है। यही गुण इसे उत्कृष्ट वोल्टेज नियामक बनाता है। यह इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों को वोल्टेज के उतार-चढ़ाव से सुरक्षा प्रदान करता है तथा संवेदनशील परिपथों को स्थिर विद्युत आपूर्ति उपलब्ध कराता है। इसलिए इसका उपयोग विद्युत आपूर्ति इकाइयों, मापन उपकरणों तथा विभिन्न इलेक्ट्रॉनिक परिपथों में किया जाता है।
12. ट्रांजिस्टर क्या है?
उत्तर:
ट्रांजिस्टर एक तीन-परत वाला अर्धचालक उपकरण है जिसमें उत्सर्जक (Emitter), आधार (Base) और संग्राहक (Collector) नामक तीन भाग होते हैं। यह NPN तथा PNP दो प्रकार का होता है। ट्रांजिस्टर की विशेषता यह है कि यह छोटे आधार धारा द्वारा बड़ी संग्राहक धारा को नियंत्रित कर सकता है। इसी कारण इसका उपयोग प्रवर्धक (Amplifier) और स्विच के रूप में किया जाता है। ट्रांजिस्टर आधुनिक इलेक्ट्रॉनिक्स का आधार है और कंप्यूटर, रेडियो, टेलीविजन, मोबाइल फोन तथा डिजिटल परिपथों में व्यापक रूप से उपयोग किया जाता है।
13. NPN तथा PNP ट्रांजिस्टर में अंतर बताइए।
उत्तर:
NPN ट्रांजिस्टर में दो n-प्रकार परतों के बीच एक पतली p-प्रकार परत होती है, जबकि PNP ट्रांजिस्टर में दो p-प्रकार परतों के बीच एक पतली n-प्रकार परत होती है। NPN ट्रांजिस्टर में इलेक्ट्रॉन बहुसंख्यक आवेश वाहक होते हैं, जबकि PNP ट्रांजिस्टर में होल बहुसंख्यक वाहक होते हैं। NPN ट्रांजिस्टर अधिक लोकप्रिय हैं क्योंकि इलेक्ट्रॉनों की गतिशीलता होलों से अधिक होती है, जिससे उनकी कार्यक्षमता बेहतर होती है। दोनों प्रकार के ट्रांजिस्टर प्रवर्धन तथा स्विचिंग कार्यों में प्रयुक्त होते हैं।
14. ट्रांजिस्टर प्रवर्धक (Amplifier) के रूप में कैसे कार्य करता है?
उत्तर:
जब ट्रांजिस्टर सक्रिय क्षेत्र (Active Region) में कार्य करता है, तब यह प्रवर्धक की तरह कार्य करता है। आधार और उत्सर्जक के बीच दिया गया छोटा इनपुट संकेत आधार धारा उत्पन्न करता है। यह छोटी धारा संग्राहक परिपथ में बहुत बड़ी धारा को नियंत्रित करती है। परिणामस्वरूप आउटपुट संकेत का आयाम इनपुट संकेत की तुलना में अधिक हो जाता है। इस प्रकार ट्रांजिस्टर कमजोर संकेतों को शक्तिशाली बनाता है। यही कारण है कि इसका उपयोग ऑडियो प्रवर्धकों, रेडियो रिसीवरों, संचार प्रणालियों तथा इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों में किया जाता है।
15. लॉजिक गेट (Logic Gate) क्या हैं?
उत्तर:
लॉजिक गेट ऐसे इलेक्ट्रॉनिक परिपथ हैं जो द्विआधारी (Binary) संकेतों पर तार्किक क्रियाएँ करते हैं। इनका इनपुट और आउटपुट केवल 0 और 1 के रूप में व्यक्त किया जाता है। ये डिजिटल इलेक्ट्रॉनिक्स और कंप्यूटर प्रणालियों के मूल निर्माण खंड हैं। प्रमुख लॉजिक गेट AND, OR, NOT, NAND और NOR हैं। प्रत्येक गेट का अपना सत्यता सारणी (Truth Table) होता है जो उसके कार्य को दर्शाता है। लॉजिक गेट ट्रांजिस्टरों और समाकलित परिपथों (ICs) से बनाए जाते हैं तथा कंप्यूटर, कैलकुलेटर, मोबाइल फोन और डिजिटल नियंत्रण प्रणालियों में उपयोग किए जाते हैं।
16. AND गेट का कार्य समझाइए।
उत्तर:
AND गेट तार्किक गुणन (Logical Multiplication) करता है। इसका आउटपुट केवल तभी 1 होता है जब उसके सभी इनपुट 1 हों। यदि किसी भी इनपुट का मान 0 है, तो आउटपुट 0 प्राप्त होता है। दो इनपुट वाले AND गेट के लिए बूलियन व्यंजक Y = A·B होता है। इसका उपयोग उन परिपथों में किया जाता है जहाँ किसी कार्य के निष्पादन के लिए सभी शर्तों का पूरा होना आवश्यक होता है। सुरक्षा प्रणालियों, नियंत्रण परिपथों और डिजिटल उपकरणों में AND गेट का व्यापक उपयोग किया जाता है।
17. OR गेट का कार्य समझाइए।
उत्तर:
OR गेट तार्किक योग (Logical Addition) करता है। इसका आउटपुट 1 तब प्राप्त होता है जब कम से कम एक इनपुट 1 हो। केवल तभी आउटपुट 0 होता है जब सभी इनपुट 0 हों। दो इनपुट वाले OR गेट के लिए बूलियन व्यंजक Y = A + B होता है। इसका उपयोग उन परिपथों में किया जाता है जहाँ किसी भी एक शर्त के पूर्ण होने पर कार्य करना आवश्यक हो। अलार्म प्रणाली, नियंत्रण परिपथ तथा डिजिटल संचार प्रणालियों में OR गेट का व्यापक उपयोग किया जाता है।
18. NOT गेट क्या है?
उत्तर:
NOT गेट को इन्वर्टर (Inverter) भी कहा जाता है। यह केवल एक इनपुट और एक आउटपुट वाला लॉजिक गेट है। इसका कार्य इनपुट का विपरीत आउटपुट देना होता है। यदि इनपुट 1 है तो आउटपुट 0 होगा और यदि इनपुट 0 है तो आउटपुट 1 होगा। इसका बूलियन व्यंजक Y = Ā होता है। NOT गेट डिजिटल परिपथों में संकेतों को उलटने के लिए प्रयोग किया जाता है। यह कंप्यूटर, मेमोरी डिवाइस, माइक्रोप्रोसेसर तथा अन्य डिजिटल प्रणालियों का महत्वपूर्ण घटक है।
19. NAND और NOR गेट को सार्वत्रिक (Universal) गेट क्यों कहा जाता है?
उत्तर:
NAND गेट, AND और NOT गेट का संयोजन है, जबकि NOR गेट, OR और NOT गेट का संयोजन है। इन्हें सार्वत्रिक गेट कहा जाता है क्योंकि किसी भी प्रकार का लॉजिक गेट या डिजिटल परिपथ केवल NAND गेटों अथवा केवल NOR गेटों की सहायता से बनाया जा सकता है। इस विशेषता के कारण इनका उपयोग समाकलित परिपथों और डिजिटल इलेक्ट्रॉनिक्स में अत्यधिक होता है। ये परिपथों को सरल बनाते हैं तथा निर्माण लागत को कम करते हैं।
20. निर्वात नलिकाओं (Vacuum Tubes) की तुलना में अर्धचालक उपकरणों के क्या लाभ हैं?
उत्तर:
अर्धचालक उपकरण आकार में छोटे, हल्के और कम ऊर्जा खपत वाले होते हैं। ये कम वोल्टेज पर कार्य करते हैं तथा कम ऊष्मा उत्पन्न करते हैं। इनकी विश्वसनीयता अधिक होती है और इनका जीवनकाल भी लंबा होता है। अर्धचालक उपकरण झटकों और कंपन को बेहतर ढंग से सहन कर सकते हैं। इनके द्वारा लाखों घटकों को एक ही चिप पर समाकलित किया जा सकता है, जिससे आधुनिक कंप्यूटर और मोबाइल जैसे उपकरण संभव हो पाए हैं। इन सभी लाभों के कारण अर्धचालकों ने लगभग सभी क्षेत्रों में निर्वात नलिकाओं का स्थान ले लिया है।
