CBSE कक्षा 12 भौतिकी (2026–27)

अध्याय 12 : परमाणु (Atoms)

20 महत्वपूर्ण प्रश्न एवं उत्तर

1. रदरफोर्ड के परमाणु मॉडल के मुख्य सिद्धांत क्या थे?

उत्तर:
रदरफोर्ड के अनुसार परमाणु के केंद्र में एक अत्यंत छोटा, सघन तथा धनावेशित नाभिक होता है। परमाणु का लगभग पूरा द्रव्यमान इसी नाभिक में केंद्रित रहता है। इलेक्ट्रॉन नाभिक के चारों ओर वृत्ताकार कक्षाओं में घूमते हैं। परमाणु का अधिकांश भाग रिक्त स्थान होता है, इसलिए अधिकांश अल्फा कण बिना विचलित हुए निकल जाते हैं। कुछ अल्फा कण नाभिक के निकट आने पर तीव्र प्रतिकर्षण के कारण बड़े कोण से विचलित हो जाते हैं। यह मॉडल अल्फा-कण प्रकीर्णन प्रयोग की व्याख्या तो करता था, लेकिन परमाणु की स्थिरता तथा हाइड्रोजन के रेखीय स्पेक्ट्रम की व्याख्या नहीं कर सका।


2. रदरफोर्ड का परमाणु मॉडल अस्थिर क्यों माना गया?

उत्तर:
शास्त्रीय विद्युतचुंबकीय सिद्धांत के अनुसार कोई भी आवेशित कण यदि त्वरणयुक्त गति करता है तो वह ऊर्जा का विकिरण करता है। रदरफोर्ड मॉडल में इलेक्ट्रॉन नाभिक के चारों ओर घूमते हैं, इसलिए उन्हें लगातार ऊर्जा का उत्सर्जन करना चाहिए। ऊर्जा खोने के कारण इलेक्ट्रॉन की कक्षा सिकुड़ती जाएगी और अंततः वह नाभिक में गिर जाएगा। इस प्रकार परमाणु बहुत कम समय में नष्ट हो जाना चाहिए था। लेकिन वास्तविकता में परमाणु स्थिर होते हैं। रदरफोर्ड का मॉडल इस स्थिरता तथा परमाणुओं द्वारा उत्सर्जित विविक्त वर्णक्रमीय रेखाओं की व्याख्या नहीं कर पाया।


3. बोहर के परमाणु मॉडल के प्रथम और द्वितीय अभिगृहीत लिखिए।

उत्तर:
बोहर के प्रथम अभिगृहीत के अनुसार इलेक्ट्रॉन केवल कुछ निश्चित स्थिर वृत्ताकार कक्षाओं में ही घूम सकते हैं जिन्हें स्थायी कक्षाएँ (Stationary Orbits) कहा जाता है। इन कक्षाओं में घूमते समय इलेक्ट्रॉन ऊर्जा का विकिरण नहीं करते। द्वितीय अभिगृहीत के अनुसार केवल वही कक्षाएँ अनुमत हैं जिनमें इलेक्ट्रॉन का कोणीय संवेग क्वांटित होता है। इसका गणितीय रूप है:

[
mvr=\frac{nh}{2\pi}
]

जहाँ (n) मुख्य क्वांटम संख्या है। इन अभिगृहीतों ने परमाणु की स्थिरता तथा हाइड्रोजन वर्णक्रम की सफल व्याख्या की।


4. बोहर सिद्धांत में स्थायी कक्षाओं से क्या अभिप्राय है?

उत्तर:
स्थायी कक्षाएँ वे विशेष वृत्ताकार कक्षाएँ हैं जिनमें इलेक्ट्रॉन नाभिक के चारों ओर बिना ऊर्जा खोए घूमते रहते हैं। बोहर के अनुसार इन कक्षाओं में इलेक्ट्रॉन न तो ऊर्जा का उत्सर्जन करते हैं और न ही अवशोषण। प्रत्येक कक्षा की एक निश्चित ऊर्जा होती है। इलेक्ट्रॉन तब तक उसी कक्षा में बने रहते हैं जब तक उन्हें अतिरिक्त ऊर्जा न दी जाए या वे ऊर्जा न खो दें। जब इलेक्ट्रॉन एक कक्षा से दूसरी कक्षा में जाता है तब ही विकिरण का उत्सर्जन या अवशोषण होता है। यह अवधारणा परमाणु की स्थिरता को समझाने में अत्यंत महत्वपूर्ण है।


5. बोहर की आवृत्ति शर्त (Frequency Condition) क्या है?

उत्तर:
बोहर की आवृत्ति शर्त के अनुसार जब कोई इलेक्ट्रॉन उच्च ऊर्जा स्तर से निम्न ऊर्जा स्तर पर आता है, तब एक फोटॉन उत्सर्जित होता है। इसी प्रकार निम्न स्तर से उच्च स्तर पर जाने के लिए इलेक्ट्रॉन को ऊर्जा अवशोषित करनी पड़ती है। उत्सर्जित या अवशोषित विकिरण की आवृत्ति निम्न समीकरण द्वारा दी जाती है:

[
h\nu = E_2 – E_1
]

जहाँ (h) प्लांक नियतांक, (\nu) विकिरण की आवृत्ति तथा (E_1) और (E_2) दोनों ऊर्जा स्तरों की ऊर्जा हैं। यह सिद्धांत हाइड्रोजन के रेखीय वर्णक्रम को समझाने में अत्यंत सफल रहा।


6. प्रथम बोहर कक्षा की त्रिज्या क्या है? इसका महत्व बताइए।

उत्तर:
प्रथम बोहर कक्षा की त्रिज्या को बोहर त्रिज्या कहते हैं। इसका मान है:

[
a_0 = 0.529 \times 10^{-10},m
]

यह हाइड्रोजन परमाणु में इलेक्ट्रॉन की सबसे छोटी स्थिर कक्षा की त्रिज्या है। बोहर त्रिज्या परमाणु के आकार को मापने की एक मूलभूत इकाई मानी जाती है। उच्च कक्षाओं की त्रिज्या मुख्य क्वांटम संख्या के वर्ग के समानुपाती होती है। इस अवधारणा ने परमाणुओं के वास्तविक आकार का अनुमान लगाने में सहायता की। आज भी बोहर त्रिज्या परमाणु भौतिकी का एक महत्वपूर्ण नियतांक है।


7. मुख्य क्वांटम संख्या (Principal Quantum Number) क्या है?

उत्तर:
मुख्य क्वांटम संख्या (n) इलेक्ट्रॉन के ऊर्जा स्तर या कोश को दर्शाती है। इसके मान 1, 2, 3, 4 आदि पूर्णांक होते हैं। (n) का मान बढ़ने पर इलेक्ट्रॉन की ऊर्जा तथा नाभिक से उसकी दूरी दोनों बढ़ती हैं। उच्च ऊर्जा स्तरों में स्थित इलेक्ट्रॉन नाभिक से कम बंधे होते हैं। बोहर मॉडल में कक्षा की त्रिज्या तथा ऊर्जा दोनों मुख्य क्वांटम संख्या पर निर्भर करती हैं। इसलिए यह संख्या परमाणु में इलेक्ट्रॉन की स्थिति, ऊर्जा और कक्षा के आकार को निर्धारित करती है।


8. nवीं कक्षा में इलेक्ट्रॉन की ऊर्जा का व्यंजक लिखिए।

उत्तर:
बोहर सिद्धांत के अनुसार हाइड्रोजन परमाणु में nवीं कक्षा में इलेक्ट्रॉन की कुल ऊर्जा निम्न प्रकार होती है:

[
E_n=-\frac{13.6}{n^2},eV
]

ऋणात्मक चिह्न दर्शाता है कि इलेक्ट्रॉन नाभिक से बंधा हुआ है। जैसे-जैसे (n) का मान बढ़ता है, ऊर्जा का मान कम ऋणात्मक होता जाता है, अर्थात इलेक्ट्रॉन नाभिक से दूर होता जाता है। जब (n=\infty) होता है, तब ऊर्जा शून्य हो जाती है और इलेक्ट्रॉन पूर्णतः मुक्त माना जाता है। यह समीकरण हाइड्रोजन के विविक्त ऊर्जा स्तरों की सफल व्याख्या करता है।


9. उत्तेजना ऊर्जा (Excitation Energy) क्या है?

उत्तर:
किसी परमाणु के इलेक्ट्रॉन को आधार अवस्था से किसी उच्च ऊर्जा अवस्था में पहुँचाने के लिए आवश्यक न्यूनतम ऊर्जा को उत्तेजना ऊर्जा कहते हैं। हाइड्रोजन परमाणु की आधार अवस्था ऊर्जा –13.6 eV होती है। यदि इलेक्ट्रॉन को प्रथम उत्तेजित अवस्था ((n=2)) में ले जाना हो तो 10.2 eV ऊर्जा की आवश्यकता होती है। यह ऊर्जा प्राप्त करने पर इलेक्ट्रॉन उच्च कक्षा में पहुँच जाता है और परमाणु उत्तेजित अवस्था में आ जाता है। उत्तेजना ऊर्जा परमाणु के ऊर्जा स्तरों को समझने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है।


10. हाइड्रोजन परमाणु की आयनीकरण ऊर्जा क्या है?

उत्तर:
आयनीकरण ऊर्जा वह न्यूनतम ऊर्जा है जो किसी परमाणु से उसके इलेक्ट्रॉन को पूर्णतः बाहर निकालने के लिए आवश्यक होती है। हाइड्रोजन परमाणु की आधार अवस्था में इलेक्ट्रॉन की ऊर्जा –13.6 eV होती है। इसलिए इलेक्ट्रॉन को नाभिक के आकर्षण से पूर्णतः मुक्त करने के लिए 13.6 eV ऊर्जा देनी पड़ती है। इस प्रक्रिया को आयनीकरण कहते हैं। आयनीकरण के बाद हाइड्रोजन परमाणु धनायन में परिवर्तित हो जाता है। आयनीकरण ऊर्जा इलेक्ट्रॉन और नाभिक के बीच आकर्षण की शक्ति का माप है।


11. आधार अवस्था तथा उत्तेजित अवस्था में क्या अंतर है?

उत्तर:
आधार अवस्था परमाणु की न्यूनतम ऊर्जा अवस्था होती है, जिसमें इलेक्ट्रॉन नाभिक के सबसे निकट स्थित कक्षा में रहता है। हाइड्रोजन के लिए यह (n=1) है। जब इलेक्ट्रॉन ऊर्जा अवशोषित करके उच्च ऊर्जा स्तर ((n>1)) में पहुँचता है, तो परमाणु उत्तेजित अवस्था में कहलाता है। उत्तेजित अवस्थाएँ अस्थिर होती हैं। कुछ समय बाद इलेक्ट्रॉन पुनः निम्न ऊर्जा स्तर पर लौट आता है और ऊर्जा का उत्सर्जन करता है। इसी प्रक्रिया के कारण वर्णक्रमीय रेखाएँ उत्पन्न होती हैं।


12. वर्णक्रमीय रेखाएँ (Spectral Lines) क्या हैं?

उत्तर:
वर्णक्रमीय रेखाएँ किसी तत्व द्वारा उत्सर्जित या अवशोषित प्रकाश के वर्णक्रम में दिखाई देने वाली विशिष्ट चमकीली या अंधेरी रेखाएँ होती हैं। जब इलेक्ट्रॉन उच्च ऊर्जा स्तर से निम्न स्तर पर आता है, तब विशिष्ट तरंगदैर्ध्य का प्रकाश उत्सर्जित होता है, जिससे उत्सर्जन रेखाएँ बनती हैं। इसी प्रकार ऊर्जा अवशोषित करने पर अवशोषण रेखाएँ प्राप्त होती हैं। प्रत्येक तत्व का ऊर्जा स्तर विन्यास अलग होता है, इसलिए उसका वर्णक्रम भी विशिष्ट होता है। इन्हीं वर्णक्रमीय रेखाओं के आधार पर तत्वों की पहचान की जाती है।


13. हाइड्रोजन वर्णक्रम के लिए राइडबर्ग सूत्र लिखिए।

उत्तर:
हाइड्रोजन वर्णक्रम की तरंगदैर्ध्य निम्न राइडबर्ग सूत्र द्वारा व्यक्त की जाती है:

[
\frac{1}{\lambda}=R\left(\frac{1}{n_1^2}-\frac{1}{n_2^2}\right)
]

जहाँ (R = 1.097 \times 10^7,m^{-1}) राइडबर्ग नियतांक है। (n_1) निम्न ऊर्जा स्तर तथा (n_2) उच्च ऊर्जा स्तर को दर्शाते हैं। यह सूत्र हाइड्रोजन की विभिन्न वर्णक्रमीय श्रेणियों जैसे लाइमन, बाल्मर और पास्चेन श्रेणी की तरंगदैर्ध्य की सही गणना करता है। बाद में बोहर सिद्धांत ने इस सूत्र का सैद्धांतिक आधार प्रदान किया।


14. लाइमन श्रेणी (Lyman Series) क्या है?

उत्तर:
जब हाइड्रोजन परमाणु में इलेक्ट्रॉन उच्च ऊर्जा स्तरों ((n=2,3,4…)) से प्रथम ऊर्जा स्तर ((n=1)) पर आता है, तब उत्पन्न वर्णक्रमीय रेखाओं के समूह को लाइमन श्रेणी कहते हैं। इस श्रेणी की सभी रेखाएँ पराबैंगनी (Ultraviolet) क्षेत्र में स्थित होती हैं। लाइमन श्रेणी हाइड्रोजन वर्णक्रम की सबसे महत्वपूर्ण श्रेणियों में से एक है। इसकी खोज ने ऊर्जा स्तरों की क्वांटम प्रकृति को समझने में महत्वपूर्ण योगदान दिया।


15. बाल्मर श्रेणी (Balmer Series) क्या है?

उत्तर:
जब इलेक्ट्रॉन उच्च ऊर्जा स्तरों ((n=3,4,5…)) से द्वितीय ऊर्जा स्तर ((n=2)) पर आते हैं, तब प्राप्त वर्णक्रमीय रेखाओं को बाल्मर श्रेणी कहते हैं। इस श्रेणी की अधिकांश रेखाएँ दृश्य प्रकाश क्षेत्र में होती हैं, इसलिए इन्हें सामान्य स्पेक्ट्रोस्कोप से देखा जा सकता है। बाल्मर श्रेणी की खोज बोहर मॉडल से पहले हुई थी, लेकिन इसकी सफल व्याख्या बोहर सिद्धांत द्वारा की गई। यह श्रेणी हाइड्रोजन के विविक्त ऊर्जा स्तरों का प्रत्यक्ष प्रमाण प्रदान करती है।


16. पास्चेन श्रेणी (Paschen Series) क्या है?

उत्तर:
हाइड्रोजन परमाणु में जब इलेक्ट्रॉन उच्च ऊर्जा स्तरों ((n=4,5,6…)) से तृतीय ऊर्जा स्तर ((n=3)) पर आते हैं, तब उत्पन्न वर्णक्रमीय रेखाओं को पास्चेन श्रेणी कहते हैं। इस श्रेणी की रेखाएँ अवरक्त (Infrared) क्षेत्र में स्थित होती हैं और नग्न आँखों से दिखाई नहीं देतीं। इन्हें विशेष उपकरणों की सहायता से देखा जाता है। पास्चेन श्रेणी भी ऊर्जा स्तरों के क्वांटीकरण का प्रमाण प्रदान करती है तथा खगोल विज्ञान एवं अवरक्त स्पेक्ट्रोस्कोपी में उपयोगी है।


17. बोहर सिद्धांत ने हाइड्रोजन वर्णक्रम की व्याख्या कैसे की?

उत्तर:
बोहर के अनुसार इलेक्ट्रॉन केवल निश्चित ऊर्जा स्तरों में ही रह सकते हैं। जब इलेक्ट्रॉन एक ऊर्जा स्तर से दूसरे स्तर में जाता है, तो ऊर्जा का उत्सर्जन या अवशोषण होता है। उत्सर्जित या अवशोषित ऊर्जा दोनों स्तरों के ऊर्जा अंतर के बराबर होती है। चूँकि केवल निश्चित ऊर्जा स्तर ही संभव हैं, इसलिए केवल निश्चित आवृत्तियों का विकिरण उत्पन्न होता है। परिणामस्वरूप निरंतर वर्णक्रम के बजाय विविक्त रेखीय वर्णक्रम प्राप्त होता है। इस प्रकार बोहर सिद्धांत ने हाइड्रोजन के वर्णक्रम की सफल व्याख्या की।


18. बोहर मॉडल की दो प्रमुख सफलताएँ लिखिए।

उत्तर:
बोहर मॉडल ने परमाणु की स्थिरता की सफल व्याख्या की। इसके अनुसार इलेक्ट्रॉन स्थायी कक्षाओं में घूमते समय ऊर्जा का विकिरण नहीं करते। दूसरी महत्वपूर्ण सफलता हाइड्रोजन के रेखीय वर्णक्रम की व्याख्या थी। इस मॉडल ने ऊर्जा स्तरों के क्वांटीकरण की अवधारणा प्रस्तुत की और राइडबर्ग सूत्र को सैद्धांतिक आधार दिया। बोहर द्वारा प्राप्त परिणाम प्रयोगात्मक आंकड़ों से काफी मेल खाते थे। इन उपलब्धियों ने आधुनिक क्वांटम सिद्धांत के विकास की नींव रखी।


19. बोहर मॉडल की दो सीमाएँ लिखिए।

उत्तर:
बोहर मॉडल केवल हाइड्रोजन और हाइड्रोजन-सदृश परमाणुओं की व्याख्या कर सका। यह बहु-इलेक्ट्रॉन परमाणुओं के वर्णक्रम को समझाने में असफल रहा। इसके अतिरिक्त यह स्पेक्ट्रल रेखाओं की सूक्ष्म संरचना तथा चुंबकीय क्षेत्र (Zeeman Effect) और विद्युत क्षेत्र (Stark Effect) में रेखाओं के विभाजन की व्याख्या नहीं कर सका। यह मॉडल इलेक्ट्रॉनों की तरंग प्रकृति को भी नहीं समझा पाया। इन सीमाओं के कारण बाद में क्वांटम यांत्रिकी का विकास हुआ।


20. हाइड्रोजन-सदृश परमाणु (Hydrogen-like Atoms) क्या हैं?

उत्तर:
वे परमाणु या आयन जिनमें केवल एक ही इलेक्ट्रॉन होता है, हाइड्रोजन-सदृश परमाणु कहलाते हैं। उदाहरण के लिए He⁺, Li²⁺ तथा Be³⁺। इनकी संरचना हाइड्रोजन के समान होती है क्योंकि इनमें केवल एक इलेक्ट्रॉन नाभिक के चारों ओर परिक्रमा करता है। इसलिए बोहर का सिद्धांत इन पर सफलतापूर्वक लागू किया जा सकता है। इनके ऊर्जा स्तर तथा वर्णक्रमीय रेखाएँ नाभिकीय आवेश (Z) पर निर्भर करती हैं और परमाणु संरचना के अध्ययन में अत्यंत महत्वपूर्ण हैं।