CBSE कक्षा 12 भौतिकी (2026–27)
अध्याय 11 : विकिरण तथा पदार्थ की द्वैत प्रकृति (Dual Nature of Radiation and Matter)
20 महत्वपूर्ण प्रश्न एवं उत्तर
1. विकिरण की द्वैत प्रकृति क्या है?
उत्तर:
विकिरण की द्वैत प्रकृति का अर्थ है कि प्रकाश तरंग तथा कण दोनों प्रकार के गुण प्रदर्शित करता है। प्रकाश का तरंग स्वरूप व्यतिकरण, विवर्तन तथा ध्रुवण जैसी घटनाओं से सिद्ध होता है। दूसरी ओर, प्रकाश-वैद्युत प्रभाव यह दर्शाता है कि प्रकाश ऊर्जा के सूक्ष्म कणों अर्थात् फोटॉनों के रूप में भी व्यवहार करता है। प्रत्येक फोटॉन की ऊर्जा (E = h\nu) होती है, जहाँ (h) प्लैंक नियतांक तथा (\nu) आवृत्ति है। किसी प्रयोग की प्रकृति के अनुसार प्रकाश कभी तरंग तो कभी कण जैसा व्यवहार करता है। इसी कारण इसे प्रकाश की द्वैत प्रकृति कहा जाता है।
2. आइंस्टीन का प्रकाश-वैद्युत समीकरण लिखिए तथा इसका महत्व बताइए।
उत्तर:
आइंस्टीन का प्रकाश-वैद्युत समीकरण है:
[
h\nu = \phi + K_{max}
]
जहाँ (h\nu) आपतित फोटॉन की ऊर्जा, (\phi) धातु का कार्य-फलन तथा (K_{max}) उत्सर्जित इलेक्ट्रॉन की अधिकतम गतिज ऊर्जा है। यह समीकरण बताता है कि फोटॉन की ऊर्जा का एक भाग इलेक्ट्रॉन को धातु से बाहर निकालने में तथा शेष भाग उसकी गतिज ऊर्जा बढ़ाने में प्रयुक्त होता है। इस समीकरण ने प्रकाश-वैद्युत प्रभाव की सफल व्याख्या की और प्रकाश के कण स्वरूप को सिद्ध किया। यही कारण है कि यह आधुनिक क्वांटम सिद्धांत की आधारशिला माना जाता है।
3. प्रकाश-वैद्युत प्रभाव क्या है?
उत्तर:
जब किसी धातु की सतह पर पर्याप्त उच्च आवृत्ति का प्रकाश डाला जाता है और उससे इलेक्ट्रॉनों का उत्सर्जन होने लगता है, तो इस घटना को प्रकाश-वैद्युत प्रभाव कहते हैं। उत्सर्जित इलेक्ट्रॉनों को प्रकाश-इलेक्ट्रॉन या फोटोइलेक्ट्रॉन कहा जाता है। यह प्रभाव तभी उत्पन्न होता है जब प्रकाश की आवृत्ति धातु की दहलीज आवृत्ति से अधिक हो। उत्सर्जित इलेक्ट्रॉनों की संख्या प्रकाश की तीव्रता पर निर्भर करती है, जबकि उनकी गतिज ऊर्जा प्रकाश की आवृत्ति पर निर्भर करती है। इस प्रभाव की व्याख्या आइंस्टीन ने फोटॉन सिद्धांत द्वारा की थी।
4. दहलीज आवृत्ति (Threshold Frequency) क्या है?
उत्तर:
दहलीज आवृत्ति वह न्यूनतम आवृत्ति है जिस पर किसी धातु की सतह से इलेक्ट्रॉनों का उत्सर्जन प्रारम्भ होता है। इसे (\nu_0) द्वारा प्रदर्शित किया जाता है। यदि आपतित प्रकाश की आवृत्ति दहलीज आवृत्ति से कम हो, तो चाहे प्रकाश की तीव्रता कितनी भी अधिक क्यों न हो, फोटोइलेक्ट्रॉन उत्सर्जित नहीं होंगे। दहलीज आवृत्ति धातु की प्रकृति पर निर्भर करती है। इसका कार्य-फलन से संबंध है:
[
\phi = h\nu_0
]
जिस धातु का कार्य-फलन कम होता है, उसकी दहलीज आवृत्ति भी कम होती है।
5. धातु का कार्य-फलन (Work Function) क्या है?
उत्तर:
कार्य-फलन किसी धातु की सतह से एक इलेक्ट्रॉन को बाहर निकालने हेतु आवश्यक न्यूनतम ऊर्जा है। इसे (\phi) द्वारा व्यक्त किया जाता है तथा इसकी इकाई इलेक्ट्रॉन-वोल्ट (eV) होती है। प्रत्येक धातु का कार्य-फलन अलग-अलग होता है क्योंकि इलेक्ट्रॉनों का बंधन बल भिन्न होता है। कार्य-फलन और दहलीज आवृत्ति का संबंध निम्न है:
[
\phi = h\nu_0
]
यदि आपतित फोटॉन की ऊर्जा कार्य-फलन से कम हो, तो इलेक्ट्रॉन उत्सर्जित नहीं होगा। कार्य-फलन प्रकाश-वैद्युत प्रभाव को समझने में अत्यंत महत्वपूर्ण है।
6. फोटॉन क्या हैं?
उत्तर:
फोटॉन विद्युतचुंबकीय विकिरण के ऊर्जा-कण हैं। प्लैंक के क्वांटम सिद्धांत के अनुसार प्रकाश ऊर्जा छोटे-छोटे पैकेटों के रूप में उत्सर्जित एवं अवशोषित होती है, जिन्हें फोटॉन कहते हैं। फोटॉन की ऊर्जा निम्नलिखित होती है:
[
E = h\nu
]
जहाँ (h) प्लैंक नियतांक तथा (\nu) प्रकाश की आवृत्ति है। फोटॉन का विश्राम द्रव्यमान शून्य होता है और यह निर्वात में प्रकाश के वेग से चलता है। फोटॉन संवेग भी रखते हैं, जो (p = h/\lambda) द्वारा दिया जाता है। फोटॉन अवधारणा प्रकाश के कण स्वरूप को स्पष्ट करती है।
7. प्रकाश-वैद्युत उत्सर्जन तात्कालिक क्यों होता है?
उत्तर:
प्रकाश-वैद्युत उत्सर्जन तात्कालिक होता है क्योंकि एक फोटॉन अपनी सम्पूर्ण ऊर्जा एक ही इलेक्ट्रॉन को एक साथ प्रदान करता है। यदि फोटॉन की ऊर्जा धातु के कार्य-फलन से अधिक है, तो इलेक्ट्रॉन तुरंत उत्सर्जित हो जाता है। शास्त्रीय तरंग सिद्धांत के अनुसार इलेक्ट्रॉन को ऊर्जा धीरे-धीरे प्राप्त होनी चाहिए थी, जिससे समय विलंब होना चाहिए था। लेकिन प्रयोगों में उत्सर्जन तुरंत पाया गया। यह तथ्य आइंस्टीन के फोटॉन सिद्धांत का समर्थन करता है और सिद्ध करता है कि प्रकाश ऊर्जा सतत नहीं बल्कि क्वांटम रूप में स्थानांतरित होती है।
8. प्रकाश की तीव्रता का प्रकाश-वैद्युत धारा पर क्या प्रभाव पड़ता है?
उत्तर:
यदि प्रकाश की आवृत्ति दहलीज आवृत्ति से अधिक हो, तो प्रकाश की तीव्रता बढ़ाने पर प्रकाश-वैद्युत धारा बढ़ जाती है। इसका कारण यह है कि अधिक तीव्रता का अर्थ है कि प्रति सेकंड अधिक फोटॉन धातु की सतह पर गिरते हैं। परिणामस्वरूप अधिक इलेक्ट्रॉन उत्सर्जित होते हैं और धारा बढ़ जाती है। हालांकि, उत्सर्जित इलेक्ट्रॉनों की अधिकतम गतिज ऊर्जा में कोई परिवर्तन नहीं होता क्योंकि वह केवल प्रकाश की आवृत्ति पर निर्भर करती है। इस प्रकार तीव्रता इलेक्ट्रॉनों की संख्या को प्रभावित करती है, उनकी ऊर्जा को नहीं।
9. प्रकाश की आवृत्ति का प्रकाश-वैद्युत प्रभाव पर क्या प्रभाव पड़ता है?
उत्तर:
प्रकाश-वैद्युत प्रभाव में आवृत्ति का अत्यंत महत्वपूर्ण योगदान होता है। यदि प्रकाश की आवृत्ति दहलीज आवृत्ति से कम है, तो कोई उत्सर्जन नहीं होगा। जैसे-जैसे आवृत्ति बढ़ती है, उत्सर्जित इलेक्ट्रॉनों की अधिकतम गतिज ऊर्जा भी बढ़ती है। आइंस्टीन के समीकरण के अनुसार:
[
K_{max}=h\nu-\phi
]
इससे स्पष्ट है कि आवृत्ति बढ़ने पर गतिज ऊर्जा बढ़ती है। जबकि इलेक्ट्रॉनों की संख्या मुख्यतः प्रकाश की तीव्रता पर निर्भर करती है। यह तथ्य प्रकाश के क्वांटम सिद्धांत का समर्थन करता है।
10. अवरोधक विभव (Stopping Potential) क्या है?
उत्तर:
अवरोधक विभव वह न्यूनतम ऋणात्मक विभव है जिसे संग्राहक प्लेट पर लगाने से सबसे अधिक ऊर्जा वाले फोटोइलेक्ट्रॉन भी संग्राहक तक नहीं पहुँच पाते। इसे (V_0) द्वारा प्रदर्शित किया जाता है। इस स्थिति में प्रकाश-वैद्युत धारा शून्य हो जाती है। अधिकतम गतिज ऊर्जा और अवरोधक विभव का संबंध है:
[
K_{max}=eV_0
]
जहाँ (e) इलेक्ट्रॉन का आवेश है। अवरोधक विभव प्रकाश की आवृत्ति पर निर्भर करता है तथा तीव्रता से स्वतंत्र होता है।
11. डी-ब्रॉग्ली परिकल्पना क्या है?
उत्तर:
डी-ब्रॉग्ली ने प्रस्तावित किया कि प्रत्येक गतिशील पदार्थ कण के साथ तरंगें संबद्ध होती हैं। जिस प्रकार प्रकाश में तरंग एवं कण दोनों गुण होते हैं, उसी प्रकार इलेक्ट्रॉन, प्रोटॉन तथा अन्य कण भी तरंग प्रकृति प्रदर्शित करते हैं। किसी कण से संबद्ध तरंगदैर्ध्य को डी-ब्रॉग्ली तरंगदैर्ध्य कहते हैं, जो निम्न प्रकार दिया जाता है:
[
\lambda=\frac{h}{p}
]
जहाँ (p) कण का संवेग है। इस परिकल्पना ने पदार्थ की द्वैत प्रकृति को स्थापित किया और आधुनिक क्वांटम यांत्रिकी के विकास का मार्ग प्रशस्त किया।
12. डी-ब्रॉग्ली तरंगदैर्ध्य क्या है?
उत्तर:
किसी गतिशील पदार्थ कण के साथ संबद्ध तरंगदैर्ध्य को डी-ब्रॉग्ली तरंगदैर्ध्य कहते हैं। इसका मान निम्न सूत्र से प्राप्त होता है:
[
\lambda=\frac{h}{mv}
]
जहाँ (m) कण का द्रव्यमान तथा (v) उसका वेग है। यह तरंगदैर्ध्य संवेग के व्युत्क्रमानुपाती होता है। सूक्ष्म कणों जैसे इलेक्ट्रॉन के लिए इसका मान पर्याप्त होता है, इसलिए उनकी तरंग प्रकृति देखी जा सकती है। जबकि स्थूल वस्तुओं के लिए यह अत्यंत छोटा होता है।
13. स्थूल वस्तुओं का डी-ब्रॉग्ली तरंगदैर्ध्य नगण्य क्यों होता है?
उत्तर:
डी-ब्रॉग्ली तरंगदैर्ध्य का सूत्र है:
[
\lambda=\frac{h}{mv}
]
स्थूल वस्तुओं का द्रव्यमान बहुत अधिक होता है। चूँकि तरंगदैर्ध्य द्रव्यमान के व्युत्क्रमानुपाती होता है, इसलिए उनका तरंगदैर्ध्य अत्यंत छोटा हो जाता है। यह इतना सूक्ष्म होता है कि प्रयोगात्मक रूप से इसका पता लगाना संभव नहीं होता। इसलिए दैनिक जीवन की वस्तुओं में तरंग गुण दिखाई नहीं देते। दूसरी ओर इलेक्ट्रॉन जैसे सूक्ष्म कणों में यह प्रभाव स्पष्ट रूप से देखा जा सकता है।
14. फोटॉन के संवेग का व्यंजक लिखिए।
उत्तर:
फोटॉन का विश्राम द्रव्यमान शून्य होता है, फिर भी उसमें संवेग होता है। फोटॉन का संवेग निम्नलिखित है:
[
p=\frac{h}{\lambda}
]
जहाँ (h) प्लैंक नियतांक तथा (\lambda) तरंगदैर्ध्य है। चूँकि (E=h\nu), इसलिए संवेग को
[
p=\frac{E}{c}
]
के रूप में भी लिखा जा सकता है। फोटॉन संवेग की अवधारणा विकिरण दाब तथा कॉम्पटन प्रभाव जैसी घटनाओं की व्याख्या करती है।
15. डी-ब्रॉग्ली परिकल्पना के समर्थन में कौन-सा प्रयोगात्मक प्रमाण है?
उत्तर:
डी-ब्रॉग्ली परिकल्पना का सबसे महत्वपूर्ण प्रमाण डेविसन-जर्मर प्रयोग है। इस प्रयोग में इलेक्ट्रॉनों को निकेल क्रिस्टल पर गिराया गया और उनके विवर्तन पैटर्न का अध्ययन किया गया। प्राप्त परिणाम तरंगों के विवर्तन के समान थे। प्रयोग से प्राप्त तरंगदैर्ध्य डी-ब्रॉग्ली द्वारा भविष्यवाणी किए गए मान के अनुरूप था। इसके अतिरिक्त जी.पी. थॉमसन के प्रयोगों ने भी इलेक्ट्रॉनों की तरंग प्रकृति की पुष्टि की। इन प्रयोगों ने पदार्थ की द्वैत प्रकृति को प्रमाणित किया।
16. डेविसन-जर्मर प्रयोग का वर्णन कीजिए।
उत्तर:
डेविसन और जर्मर ने इलेक्ट्रॉनों की तरंग प्रकृति सिद्ध करने के लिए यह प्रयोग किया। उन्होंने त्वरित इलेक्ट्रॉनों की किरण को निकेल क्रिस्टल पर डाला। परावर्तित इलेक्ट्रॉनों की तीव्रता विभिन्न कोणों पर मापी गई। परिणामस्वरूप विवर्तन पैटर्न प्राप्त हुआ, जो केवल तरंगों में संभव है। ब्रैग के नियम से प्राप्त तरंगदैर्ध्य का मान डी-ब्रॉग्ली तरंगदैर्ध्य के बराबर पाया गया। इस प्रयोग ने यह सिद्ध कर दिया कि इलेक्ट्रॉन तरंग के समान व्यवहार करते हैं और डी-ब्रॉग्ली परिकल्पना सही है।
17. फोटॉन और इलेक्ट्रॉन में अंतर बताइए।
उत्तर:
फोटॉन प्रकाश का कण है, जबकि इलेक्ट्रॉन पदार्थ का कण है। फोटॉन का विश्राम द्रव्यमान शून्य होता है, जबकि इलेक्ट्रॉन का विश्राम द्रव्यमान निश्चित होता है। फोटॉन सदैव प्रकाश के वेग से चलता है, जबकि इलेक्ट्रॉन का वेग प्रकाश के वेग से कम होता है। फोटॉन पर कोई आवेश नहीं होता, जबकि इलेक्ट्रॉन ऋणात्मक आवेशित होता है। दोनों में तरंग-कण द्वैतता पाई जाती है। फोटॉन व्यतिकरण और विवर्तन प्रदर्शित करते हैं, जबकि इलेक्ट्रॉन भी विवर्तन प्रयोगों में तरंग गुण दर्शाते हैं।
18. प्रकाश-वैद्युत प्रभाव की व्याख्या करने में शास्त्रीय तरंग सिद्धांत की सीमाएँ क्या थीं?
उत्तर:
शास्त्रीय तरंग सिद्धांत प्रकाश-वैद्युत प्रभाव की कई विशेषताओं को समझाने में असफल रहा। यह दहलीज आवृत्ति की अवधारणा को नहीं समझा सका। इसके अनुसार ऊर्जा प्रकाश की तीव्रता पर निर्भर होनी चाहिए थी, जबकि प्रयोगों में ऊर्जा आवृत्ति पर निर्भर पाई गई। सिद्धांत के अनुसार उत्सर्जन में समय विलंब होना चाहिए था, परन्तु उत्सर्जन तात्कालिक था। इसके अतिरिक्त यह अवरोधक विभव और अधिकतम गतिज ऊर्जा के आवृत्ति पर निर्भर होने की भी व्याख्या नहीं कर सका। इन सीमाओं को आइंस्टीन के फोटॉन सिद्धांत ने दूर किया।
19. त्वरक विभव बढ़ाने पर डी-ब्रॉग्ली तरंगदैर्ध्य पर क्या प्रभाव पड़ता है?
उत्तर:
जब किसी इलेक्ट्रॉन को विभवांतर (V) द्वारा त्वरित किया जाता है, तो उसका डी-ब्रॉग्ली तरंगदैर्ध्य निम्न होता है:
[
\lambda=\frac{h}{\sqrt{2meV}}
]
यहाँ (m) इलेक्ट्रॉन का द्रव्यमान तथा (e) उसका आवेश है। इस सूत्र से स्पष्ट है कि तरंगदैर्ध्य विभवांतर के वर्गमूल के व्युत्क्रमानुपाती होता है। इसलिए त्वरक विभव बढ़ाने पर इलेक्ट्रॉन का संवेग बढ़ता है और उसका तरंगदैर्ध्य घट जाता है। यही सिद्धांत इलेक्ट्रॉन सूक्ष्मदर्शी में उच्च विभेदन क्षमता प्राप्त करने के लिए उपयोग किया जाता है।
20. विकिरण एवं पदार्थ की द्वैत प्रकृति के मुख्य निष्कर्ष लिखिए।
उत्तर:
द्वैत प्रकृति का सिद्धांत बताता है कि विकिरण तथा पदार्थ दोनों में तरंग और कण दोनों गुण पाए जाते हैं। प्रकाश व्यतिकरण एवं विवर्तन में तरंग जैसा व्यवहार करता है, जबकि प्रकाश-वैद्युत प्रभाव में कण (फोटॉन) के रूप में कार्य करता है। इसी प्रकार इलेक्ट्रॉन जैसे पदार्थ कण भी डी-ब्रॉग्ली तरंगों के कारण तरंग गुण प्रदर्शित करते हैं। किसी वस्तु का व्यवहार प्रयोग की परिस्थितियों पर निर्भर करता है। इस सिद्धांत ने क्वांटम यांत्रिकी के विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई और आधुनिक इलेक्ट्रॉनिकी, लेजर, अर्धचालक तथा इलेक्ट्रॉन सूक्ष्मदर्शी जैसी तकनीकों का आधार प्रदान किया।
