सीबीएसई कक्षा 12 भौतिकी (2026–27)
अध्याय 4 : गतिमान आवेश और चुंबकत्व
20 महत्वपूर्ण प्रश्न एवं उत्तर
प्रश्न 1. लॉरेंट्ज बल क्या है? इसका सूत्र लिखिए।
उत्तर:
लॉरेंट्ज बल वह कुल बल है जो किसी आवेशित कण पर विद्युत क्षेत्र तथा चुंबकीय क्षेत्र में एक साथ गति करने पर कार्य करता है। यदि (q) आवेश वाला कण वेग (v) से विद्युत क्षेत्र (E) और चुंबकीय क्षेत्र (B) में गतिमान है, तो उस पर लगने वाला कुल बल
[F=q(E+v\times B)]
से व्यक्त किया जाता है। इसमें (qE) विद्युत बल तथा (q(v\times B)) चुंबकीय बल है। चुंबकीय बल सदैव वेग के लंबवत होता है, इसलिए यह कण की गति की दिशा बदलता है, परंतु उसकी चाल नहीं बदलता। लॉरेंट्ज बल का उपयोग साइक्लोट्रॉन, कण त्वरक तथा द्रव्यमान स्पेक्ट्रोमीटर जैसे उपकरणों में किया जाता है।
प्रश्न 2. चुंबकीय क्षेत्र में गतिमान आवेश पर लगने वाले बल का वर्णन कीजिए।
उत्तर:
जब कोई आवेशित कण चुंबकीय क्षेत्र में गति करता है, तब उस पर चुंबकीय बल कार्य करता है। इसका परिमाण
[F=qvB\sin\theta]
होता है, जहाँ (q) आवेश, (v) वेग, (B) चुंबकीय क्षेत्र तथा (\theta) वेग और चुंबकीय क्षेत्र के बीच का कोण है। यदि कण चुंबकीय क्षेत्र के लंबवत चलता है, तो बल अधिकतम होता है, जबकि समानांतर चलने पर बल शून्य होता है। बल की दिशा फ्लेमिंग के बाएँ हाथ के नियम से ज्ञात की जाती है। यह बल कण की चाल को नहीं बदलता, बल्कि उसकी गति की दिशा बदलकर उसे वृत्तीय पथ में चलने के लिए बाध्य करता है।
प्रश्न 3. एकसमान चुंबकीय क्षेत्र में आवेशित कण की गति समझाइए।
उत्तर:
जब कोई आवेशित कण एकसमान चुंबकीय क्षेत्र में क्षेत्र रेखाओं के लंबवत प्रवेश करता है, तो उस पर लगने वाला चुंबकीय बल सदैव उसकी गति की दिशा के लंबवत होता है। यह बल अभिकेंद्रीय बल का कार्य करता है और कण को वृत्तीय पथ पर चलाता है। वृत्तीय पथ की त्रिज्या
[r=\frac{mv}{qB}]
होती है। चूँकि चुंबकीय बल सदैव वेग के लंबवत होता है, इसलिए यह कोई कार्य नहीं करता। परिणामस्वरूप कण की गतिज ऊर्जा तथा चाल स्थिर रहती है। यदि कण किसी कोण पर प्रवेश करता है, तो वह हेलिकल (कुंडलीदार) पथ का अनुसरण करता है।
प्रश्न 4. चुंबकीय क्षेत्र में वृत्तीय गति करने वाले आवेशित कण की त्रिज्या का सूत्र लिखिए।
उत्तर:
जब कोई आवेशित कण चुंबकीय क्षेत्र के लंबवत गति करता है, तो चुंबकीय बल अभिकेंद्रीय बल प्रदान करता है।
[qvB=\frac{mv^2}{r}]
इससे,
[r=\frac{mv}{qB}]
प्राप्त होता है। यहाँ (m) कण का द्रव्यमान, (v) वेग, (q) आवेश तथा (B) चुंबकीय क्षेत्र है। यह स्पष्ट करता है कि त्रिज्या द्रव्यमान और वेग के समानुपाती तथा आवेश और चुंबकीय क्षेत्र के व्युत्क्रमानुपाती होती है। यही सिद्धांत द्रव्यमान स्पेक्ट्रोमीटर और कण पहचानने वाले उपकरणों में प्रयुक्त होता है।
प्रश्न 5. साइक्लोट्रॉन आवृत्ति क्या है? इसका व्यंजक लिखिए।
उत्तर:
साइक्लोट्रॉन आवृत्ति वह आवृत्ति है जिससे कोई आवेशित कण चुंबकीय क्षेत्र में वृत्तीय पथ पर घूमता है। वृत्तीय गति के लिए
[qvB=\frac{mv^2}{r}]
अतः,
[\omega=\frac{qB}{m}]
जहाँ (\omega) कोणीय वेग है। इसलिए साइक्लोट्रॉन आवृत्ति
[f=\frac{\omega}{2\pi}]
अर्थात
[f=\frac{qB}{2\pi m}]
होती है। यह आवृत्ति केवल आवेश, द्रव्यमान तथा चुंबकीय क्षेत्र पर निर्भर करती है। इसका उपयोग साइक्लोट्रॉन में आवेशित कणों को उच्च ऊर्जा तक त्वरित करने के लिए किया जाता है।
प्रश्न 6. बायोट–सावार्ट नियम का कथन कीजिए।
उत्तर:
बायोट–सावार्ट नियम किसी धारा-वाहित चालक के सूक्ष्म भाग द्वारा उत्पन्न चुंबकीय क्षेत्र का परिमाण बताता है। इसके अनुसार किसी बिंदु पर चुंबकीय क्षेत्र धारा (I), चालक तत्व (dl) तथा (\sin\theta) के समानुपाती और दूरी (r) के वर्ग के व्युत्क्रमानुपाती होता है।
[dB=\frac{\mu_0}{4\pi}\frac{Idl\sin\theta}{r^2}]
इस नियम द्वारा किसी सीधी तार, वृत्ताकार कुंडली तथा अन्य धारा-वितरणों के कारण उत्पन्न चुंबकीय क्षेत्र की गणना की जाती है। चुंबकीय क्षेत्र की दिशा दाएँ हाथ के नियम से ज्ञात की जाती है।
प्रश्न 7. एम्पियर का परिपथीय नियम लिखिए।
उत्तर:
एम्पियर का परिपथीय नियम बताता है कि किसी बंद पथ के चारों ओर चुंबकीय क्षेत्र का रेखा समाकल उस पथ द्वारा घिरी कुल धारा के (\mu_0) गुणनफल के बराबर होता है।
[\oint B\cdot dl=\mu_0 I]
यहाँ (B) चुंबकीय क्षेत्र तथा (I) घिरी हुई धारा है। यह नियम विशेष रूप से सममित धारा-वितरणों, जैसे लंबी सीधी तार, परिनालिका (Solenoid) तथा टोरॉयड के चुंबकीय क्षेत्र की गणना में उपयोगी है। यह बायोट–सावार्ट नियम की तुलना में गणनाओं को सरल बनाता है।
प्रश्न 8. लंबी सीधी धारा-वाहित तार के कारण चुंबकीय क्षेत्र का सूत्र प्राप्त कीजिए।
उत्तर:
मान लीजिए (I) धारा वाली एक लंबी सीधी तार के चारों ओर (r) त्रिज्या का वृत्ताकार पथ लिया गया है। एम्पियर के नियम के अनुसार,
[\oint B\cdot dl=\mu_0 I]
चूँकि वृत्त पर हर बिंदु पर (B) समान है,
[B(2\pi r)=\mu_0 I]
अतः,
[B=\frac{\mu_0 I}{2\pi r}]
यह दर्शाता है कि चुंबकीय क्षेत्र धारा के समानुपाती तथा दूरी के व्युत्क्रमानुपाती होता है। इसकी दिशा दाएँ हाथ के अंगूठा नियम से निर्धारित की जाती है।
प्रश्न 9. फ्लेमिंग का बाएँ हाथ का नियम क्या है?
उत्तर:
फ्लेमिंग का बाएँ हाथ का नियम चुंबकीय क्षेत्र में रखे धारा-वाहित चालक पर लगने वाले बल की दिशा ज्ञात करने के लिए प्रयोग किया जाता है। इसमें बाएँ हाथ के अंगूठे, तर्जनी और मध्यमा को परस्पर लंबवत फैलाया जाता है। यदि तर्जनी चुंबकीय क्षेत्र की दिशा तथा मध्यमा धारा की दिशा दर्शाए, तो अंगूठा चालक पर लगने वाले बल या गति की दिशा बताता है। यह नियम विद्युत मोटरों के कार्य सिद्धांत को समझने में अत्यंत महत्वपूर्ण है।
प्रश्न 10. धारा-लूप का चुंबकीय द्विध्रुव आघूर्ण क्या है?
उत्तर:
धारा-वाहित कुंडली का चुंबकीय द्विध्रुव आघूर्ण उसकी चुंबकीय शक्ति और दिशा को व्यक्त करता है। इसे धारा तथा कुंडली के क्षेत्रफल के गुणनफल के रूप में परिभाषित किया जाता है।
[M=IA]
जहाँ (I) धारा तथा (A) कुंडली का क्षेत्रफल है। इसकी दिशा कुंडली के तल पर लंबवत होती है तथा दाएँ हाथ के अंगूठा नियम से निर्धारित की जाती है। इसका SI मात्रक एम्पियर-मीटर² (A·m²) है। चुंबकीय क्षेत्र में कुंडली पर लगने वाले बलाघूर्ण का निर्धारण इसी से किया जाता है।
प्रश्न 11. चुंबकीय क्षेत्र में धारा-लूप पर लगने वाला बलाघूर्ण क्या है?
उत्तर:
जब धारा-वाहित कुंडली को चुंबकीय क्षेत्र में रखा जाता है, तो उस पर एक बलाघूर्ण कार्य करता है जो उसे घुमाने का प्रयास करता है। इसका मान
[\tau=MB\sin\theta]
होता है, जहाँ (M) चुंबकीय द्विध्रुव आघूर्ण, (B) चुंबकीय क्षेत्र तथा (\theta) उनके बीच का कोण है। बलाघूर्ण अधिकतम तब होता है जब कुंडली का तल चुंबकीय क्षेत्र के समानांतर हो तथा शून्य तब होता है जब द्विध्रुव आघूर्ण चुंबकीय क्षेत्र की दिशा में हो। यही सिद्धांत विद्युत मोटर और गैल्वेनोमीटर में प्रयुक्त होता है।
प्रश्न 12. चल कुंडली गैल्वेनोमीटर क्या है?
उत्तर:
चल कुंडली गैल्वेनोमीटर एक संवेदनशील उपकरण है जिसका उपयोग अत्यल्प विद्युत धारा को मापने के लिए किया जाता है। इसमें एक आयताकार कुंडली को शक्तिशाली चुंबक के ध्रुवों के बीच रखा जाता है। जब कुंडली में धारा प्रवाहित होती है, तो उस पर बलाघूर्ण कार्य करता है और वह घूम जाती है। कुंडली का विक्षेप धारा के समानुपाती होता है। एक स्प्रिंग पुनर्स्थापन बलाघूर्ण प्रदान करती है। यह उपकरण विद्युत धारा के चुंबकीय प्रभाव के सिद्धांत पर कार्य करता है।
प्रश्न 13. गैल्वेनोमीटर की संवेदनशीलता क्या है?
उत्तर:
गैल्वेनोमीटर की संवेदनशीलता से तात्पर्य है कि वह किसी निश्चित धारा के लिए कितना विक्षेप उत्पन्न करता है। इसे प्रति इकाई धारा उत्पन्न विक्षेप के रूप में परिभाषित किया जाता है।
[S=\frac{\theta}{I}]
जहाँ (\theta) विक्षेप तथा (I) धारा है। अधिक संवेदनशील गैल्वेनोमीटर छोटी धारा के लिए भी अधिक विक्षेप देता है। इसकी संवेदनशीलता बढ़ाने के लिए कुंडली के चक्करों की संख्या, क्षेत्रफल तथा चुंबकीय क्षेत्र बढ़ाया जाता है।
प्रश्न 14. गैल्वेनोमीटर को एमीटर में कैसे परिवर्तित किया जाता है?
उत्तर:
गैल्वेनोमीटर को एमीटर में बदलने के लिए उसके समानांतर कम प्रतिरोध वाला शंट जोड़ा जाता है। शंट अधिकांश धारा को अपने माध्यम से प्रवाहित कर देता है, जिससे गैल्वेनोमीटर सुरक्षित रहता है।
शंट प्रतिरोध
[S=\frac{I_gG}{I-I_g}]
होता है। यहाँ (I_g) गैल्वेनोमीटर की अधिकतम धारा तथा (G) उसका प्रतिरोध है। इस प्रकार प्राप्त एमीटर का प्रतिरोध बहुत कम होता है और इसे परिपथ में श्रेणीक्रम में जोड़ा जाता है।
प्रश्न 15. गैल्वेनोमीटर को वोल्टमीटर में कैसे परिवर्तित किया जाता है?
उत्तर:
गैल्वेनोमीटर को वोल्टमीटर में परिवर्तित करने के लिए उसके साथ श्रेणीक्रम में उच्च प्रतिरोध जोड़ा जाता है। यह प्रतिरोध धारा को सीमित करता है और गैल्वेनोमीटर को सुरक्षित रखता है।
आवश्यक प्रतिरोध
[R=\frac{V}{I_g}-G]
होता है। यहाँ (V) वोल्टमीटर की सीमा, (I_g) गैल्वेनोमीटर धारा तथा (G) उसका प्रतिरोध है। इस प्रकार प्राप्त वोल्टमीटर का प्रतिरोध बहुत अधिक होता है और इसे किसी अवयव के समानांतर जोड़ा जाता है।
प्रश्न 16. चुंबकीय क्षेत्र गतिमान आवेश पर कोई कार्य क्यों नहीं करता?
उत्तर:
चुंबकीय बल सदैव गतिमान आवेश के वेग की दिशा के लंबवत होता है। कार्य का सूत्र
[W=Fd\cos\theta]
है। चूँकि चुंबकीय बल और विस्थापन के बीच कोण (90^\circ) होता है,
[W=0]
अतः चुंबकीय क्षेत्र कोई कार्य नहीं करता। परिणामस्वरूप कण की गतिज ऊर्जा और चाल स्थिर रहती है। चुंबकीय क्षेत्र केवल गति की दिशा बदलता है, न कि उसकी ऊर्जा।
प्रश्न 17. दाएँ हाथ का अंगूठा नियम क्या है?
उत्तर:
दाएँ हाथ का अंगूठा नियम किसी सीधी धारा-वाहित चालक के चारों ओर उत्पन्न चुंबकीय क्षेत्र की दिशा ज्ञात करने के लिए उपयोग किया जाता है। यदि चालक को दाएँ हाथ से इस प्रकार पकड़ा जाए कि अंगूठा धारा की दिशा में हो, तो मुड़ी हुई उँगलियाँ चुंबकीय क्षेत्र रेखाओं की दिशा दर्शाती हैं। यह नियम विद्युत धारा के चुंबकीय प्रभाव को समझने का एक सरल तरीका है।
प्रश्न 18. परिनालिका (Solenoid) क्या है? इसके चुंबकीय गुण लिखिए।
उत्तर:
परिनालिका एक लंबी बेलनाकार कुंडली होती है जिसमें अनेक चक्कर निकटता से लिपटे होते हैं। जब इसमें धारा प्रवाहित की जाती है, तो इसके भीतर एक शक्तिशाली और लगभग एकसमान चुंबकीय क्षेत्र उत्पन्न होता है।
[B=\mu_0 nI]
जहाँ (n) प्रति इकाई लंबाई में चक्करों की संख्या है। परिनालिका एक दंड चुंबक की भाँति व्यवहार करती है तथा इसके उत्तर और दक्षिण ध्रुव होते हैं। इसका उपयोग विद्युत घंटी, रिले और विद्युत चुंबकों में किया जाता है।
प्रश्न 19. दो समानांतर धारा-वाहित चालकों के बीच लगने वाले बल का वर्णन कीजिए।
उत्तर:
दो समानांतर धारा-वाहित चालक एक-दूसरे पर चुंबकीय बल लगाते हैं। यदि दोनों में धारा समान दिशा में प्रवाहित हो, तो वे एक-दूसरे को आकर्षित करते हैं। यदि धाराएँ विपरीत दिशा में हों, तो वे प्रतिकर्षित करते हैं।
प्रति इकाई लंबाई बल
[\frac{F}{L}=\frac{\mu_0 I_1 I_2}{2\pi d}]
होता है। यहाँ (I_1) और (I_2) धाराएँ तथा (d) उनके बीच की दूरी है। यही सिद्धांत एम्पियर की परिभाषा का आधार है।
प्रश्न 20. विद्युत क्षेत्र रेखाओं और चुंबकीय क्षेत्र रेखाओं में अंतर बताइए।
उत्तर:
विद्युत क्षेत्र रेखाएँ धन आवेश से निकलकर ऋण आवेश पर समाप्त होती हैं, जबकि चुंबकीय क्षेत्र रेखाएँ सदैव बंद लूप बनाती हैं और उनका कोई प्रारंभ या अंत नहीं होता। विद्युत क्षेत्र स्थिर आवेशों के कारण उत्पन्न होता है, जबकि चुंबकीय क्षेत्र गतिमान आवेशों या चुंबकों के कारण उत्पन्न होता है। दोनों प्रकार की क्षेत्र रेखाओं का घनत्व क्षेत्र की तीव्रता को दर्शाता है। विद्युत क्षेत्र रेखाएँ खुली होती हैं, जबकि चुंबकीय क्षेत्र रेखाएँ हमेशा बंद होती हैं। यह अंतर विद्युत और चुंबकीय घटनाओं को समझने में महत्वपूर्ण है।
