CBSE कक्षा 12 भौतिकी (2026–27)
अध्याय 2 : वैद्युत विभव तथा धारिता (Electrostatic Potential and Capacitance)
20 महत्वपूर्ण प्रश्न एवं उत्तर
प्रश्न 1. वैद्युत विभव क्या है? वैद्युत विभव और विभवांतर में अंतर स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
किसी बिंदु पर वैद्युत विभव वह कार्य है जो अनंत से उस बिंदु तक एकांक धनात्मक परीक्षण आवेश को बिना त्वरण के लाने में किया जाता है। इसका SI मात्रक वोल्ट (V) है। दूसरी ओर, विभवांतर दो बिंदुओं के बीच एकांक आवेश को ले जाने में किए गए कार्य को दर्शाता है। वैद्युत विभव किसी एक बिंदु की विशेषता है, जबकि विभवांतर दो बिंदुओं के बीच का अंतर बताता है। यदि एक कूलॉम आवेश को एक बिंदु से दूसरे बिंदु तक ले जाने में एक जूल कार्य करना पड़े, तो विभवांतर एक वोल्ट होगा। दोनों अवधारणाएँ विद्युत क्षेत्र को समझने में महत्वपूर्ण हैं।
प्रश्न 2. बिंदु आवेश के कारण उत्पन्न वैद्युत विभव का व्यंजक प्राप्त कीजिए।
उत्तर:
मान लीजिए कि (Q) एक बिंदु आवेश है। इस आवेश से (r) दूरी पर स्थित बिंदु का वैद्युत विभव ज्ञात करना है। वैद्युत क्षेत्र की तीव्रता
[E=\frac{1}{4\pi\epsilon_0}\frac{Q}{r^2}]
होती है। अनंत से (r) दूरी तक एकांक धनात्मक आवेश को लाने में किए गए कार्य के बराबर वैद्युत विभव होता है। समाकलन करने पर प्राप्त होता है:
[V=\frac{1}{4\pi\epsilon_0}\frac{Q}{r}]
यह व्यंजक दर्शाता है कि वैद्युत विभव आवेश के समानुपाती तथा दूरी के व्युत्क्रमानुपाती होता है। धनात्मक आवेश के लिए विभव धनात्मक तथा ऋणात्मक आवेश के लिए विभव ऋणात्मक होता है।
प्रश्न 3. समविभव पृष्ठ (Equipotential Surface) के चार गुण लिखिए।
उत्तर:
समविभव पृष्ठ वह पृष्ठ होता है जिसके प्रत्येक बिंदु पर वैद्युत विभव समान होता है। इसके प्रमुख गुण निम्नलिखित हैं—
- समविभव पृष्ठ पर आवेश को स्थानांतरित करने में कोई कार्य नहीं होता।
- विद्युत क्षेत्र रेखाएँ सदैव समविभव पृष्ठ के लंबवत होती हैं।
- दो समविभव पृष्ठ कभी एक-दूसरे को नहीं काटते क्योंकि किसी बिंदु का विभव एक ही समय में दो मान नहीं हो सकता।
- जहाँ समविभव पृष्ठ अधिक निकट होते हैं, वहाँ विद्युत क्षेत्र अधिक प्रबल होता है।
बिंदु आवेश के चारों ओर संकेन्द्रित गोलाकार पृष्ठ तथा समान विद्युत क्षेत्र में समानांतर तल समविभव पृष्ठों के उदाहरण हैं।
प्रश्न 4. वैद्युतस्थैतिक बल को संरक्षी (Conservative) बल क्यों कहा जाता है?
उत्तर:
वैद्युतस्थैतिक बल को संरक्षी बल कहा जाता है क्योंकि इसके द्वारा किया गया कार्य केवल प्रारंभिक और अंतिम बिंदुओं पर निर्भर करता है, न कि अपनाए गए मार्ग पर। यदि किसी आवेश को बंद पथ पर घुमाकर पुनः उसी बिंदु पर लाया जाए, तो कुल कार्य शून्य होता है। यही संरक्षी बल की मुख्य विशेषता है। इस गुण के कारण वैद्युत विभव और वैद्युत स्थितिज ऊर्जा की परिभाषा संभव होती है। संरक्षी बल होने से ऊर्जा संरक्षण का सिद्धांत भी लागू होता है। गुरुत्वाकर्षण बल की तरह वैद्युतस्थैतिक बल भी संरक्षी प्रकृति का होता है।
प्रश्न 5. धारिता (Capacitance) की परिभाषा दीजिए तथा इसका SI मात्रक लिखिए।
उत्तर:
किसी चालक या संधारित्र की विद्युत आवेश संग्रहित करने की क्षमता को उसकी धारिता कहते हैं। इसे संग्रहित आवेश और विभवांतर के अनुपात के रूप में परिभाषित किया जाता है।
[C=\frac{Q}{V}]
जहाँ (Q) आवेश तथा (V) विभवांतर है। धारिता का SI मात्रक फैरड (F) है। यदि किसी चालक में एक कूलॉम आवेश संग्रहित करने पर उसके सिरों के बीच एक वोल्ट का विभवांतर उत्पन्न हो, तो उसकी धारिता एक फैरड कहलाती है। व्यवहार में माइक्रोफैरड (μF), नैनोफैरड (nF) तथा पिकोफैरड (pF) का अधिक उपयोग किया जाता है क्योंकि एक फैरड बहुत बड़ी इकाई है।
प्रश्न 6. संधारित्र (Capacitor) क्या है? इसके उपयोग लिखिए।
उत्तर:
संधारित्र एक ऐसा विद्युत उपकरण है जो विद्युत आवेश तथा ऊर्जा को संग्रहित करता है। इसमें दो चालक प्लेटें होती हैं जिनके बीच एक कुचालक पदार्थ (डाइलेक्ट्रिक) रखा जाता है। जब इसे विद्युत स्रोत से जोड़ा जाता है, तो प्लेटों पर समान परिमाण के विपरीत आवेश एकत्रित हो जाते हैं। संधारित्रों का उपयोग ऊर्जा संग्रहण, रेडियो ट्यूनिंग, विद्युत आपूर्ति को स्थिर बनाने, कैमरा फ्लैश, कंप्यूटर मेमोरी तथा विभिन्न इलेक्ट्रॉनिक परिपथों में किया जाता है। ये बहुत कम समय में ऊर्जा संग्रहित और मुक्त कर सकते हैं, इसलिए आधुनिक इलेक्ट्रॉनिक्स में इनका अत्यधिक महत्व है।
प्रश्न 7. समांतर प्लेट संधारित्र की धारिता का व्यंजक प्राप्त कीजिए।
उत्तर:
समांतर प्लेट संधारित्र में दो बड़ी चालक प्लेटें (d) दूरी पर रखी जाती हैं। प्रत्येक प्लेट का क्षेत्रफल (A) है। यदि प्लेटों पर (Q) आवेश हो, तो उनके बीच विद्युत क्षेत्र
[E=\frac{\sigma}{\epsilon_0}]
होगा, जहाँ
[\sigma=\frac{Q}{A}]
है। विभवांतर
[V=Ed=\frac{Qd}{A\epsilon_0}]
होगा। अतः धारिता
[C=\frac{Q}{V}
=\frac{\epsilon_0A}{d}]
प्राप्त होती है। इससे स्पष्ट है कि धारिता प्लेटों के क्षेत्रफल के समानुपाती तथा उनके बीच की दूरी के व्युत्क्रमानुपाती होती है।
प्रश्न 8. डाइलेक्ट्रिक ध्रुवण (Dielectric Polarization) क्या है?
उत्तर:
जब किसी कुचालक (डाइलेक्ट्रिक) पदार्थ को बाह्य विद्युत क्षेत्र में रखा जाता है, तब उसके अणुओं के धनात्मक और ऋणात्मक आवेश थोड़े-थोड़े विपरीत दिशाओं में विस्थापित हो जाते हैं। इस प्रक्रिया को डाइलेक्ट्रिक ध्रुवण कहते हैं। परिणामस्वरूप पदार्थ में सूक्ष्म विद्युत द्विध्रुव बन जाते हैं। ध्रुवण के कारण डाइलेक्ट्रिक के भीतर प्रभावी विद्युत क्षेत्र कम हो जाता है। इसी कारण संधारित्र की धारिता बढ़ जाती है। काँच, अभ्रक, कागज तथा चीनी मिट्टी जैसे पदार्थ अच्छे डाइलेक्ट्रिक होते हैं। संधारित्रों की दक्षता बढ़ाने में डाइलेक्ट्रिक ध्रुवण की महत्वपूर्ण भूमिका होती है।
प्रश्न 9. संधारित्र में डाइलेक्ट्रिक रखने का क्या प्रभाव पड़ता है?
उत्तर:
जब संधारित्र की प्लेटों के बीच डाइलेक्ट्रिक पदार्थ रखा जाता है, तो उसकी धारिता बढ़ जाती है। यदि डाइलेक्ट्रिक स्थिरांक (K) हो, तो नई धारिता
[C’=KC]
हो जाती है। डाइलेक्ट्रिक पदार्थ ध्रुवित होकर आंतरिक विद्युत क्षेत्र उत्पन्न करता है, जो मूल विद्युत क्षेत्र का विरोध करता है। परिणामस्वरूप प्रभावी विद्युत क्षेत्र तथा विभवांतर कम हो जाता है। इससे संधारित्र समान विभव पर अधिक आवेश संग्रहित कर सकता है। डाइलेक्ट्रिक विद्युत रोधन भी प्रदान करता है तथा ऊर्जा हानि को कम करता है। इसलिए संधारित्रों में डाइलेक्ट्रिक का उपयोग अत्यंत लाभकारी होता है।
प्रश्न 10. चालक और कुचालक में अंतर स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
चालक वे पदार्थ हैं जिनमें मुक्त इलेक्ट्रॉन उपस्थित होते हैं, इसलिए वे विद्युत धारा का संचालन करते हैं। ताँबा, चाँदी और एल्युमिनियम इसके उदाहरण हैं। चालक के अंदर वैद्युतस्थैतिक संतुलन की अवस्था में विद्युत क्षेत्र शून्य होता है। दूसरी ओर, कुचालकों में मुक्त इलेक्ट्रॉनों का अभाव होता है, इसलिए वे विद्युत धारा का संचालन नहीं करते। रबर, प्लास्टिक, लकड़ी और काँच इसके उदाहरण हैं। कुचालक विद्युत क्षेत्र में ध्रुवित तो हो सकते हैं, लेकिन उनमें आवेश स्वतंत्र रूप से नहीं बहता। विद्युत परिपथों में चालक धारा प्रवाह हेतु तथा कुचालक सुरक्षा हेतु उपयोग किए जाते हैं।
प्रश्न 11. आवेशों के निकाय की स्थितिज ऊर्जा क्या होती है?
उत्तर:
आवेशों के किसी निकाय की वैद्युत स्थितिज ऊर्जा वह कार्य है जो उन आवेशों को अनंत से उनकी निश्चित स्थितियों तक लाने में किया जाता है। यह ऊर्जा आवेशों की व्यवस्था पर निर्भर करती है। दो बिंदु आवेश (q_1) तथा (q_2) के लिए, जो (r) दूरी पर स्थित हैं,
[U=\frac{1}{4\pi\epsilon_0}\frac{q_1q_2}{r}]
होती है। समान चिह्न वाले आवेशों के लिए स्थितिज ऊर्जा धनात्मक होती है, जबकि विपरीत चिह्न वाले आवेशों के लिए ऋणात्मक होती है। इसका SI मात्रक जूल (J) है। यह ऊर्जा विद्युत बलों के कारण संग्रहित होती है।
प्रश्न 12. विद्युत क्षेत्र और वैद्युत विभव के बीच संबंध लिखिए।
उत्तर:
विद्युत क्षेत्र तथा वैद्युत विभव एक-दूसरे से संबंधित राशियाँ हैं। किसी दिशा में विद्युत क्षेत्र उस दिशा में विभव के परिवर्तन की दर के बराबर होता है।
[E=-\frac{dV}{dr}]
ऋणात्मक चिह्न यह दर्शाता है कि विद्युत क्षेत्र उच्च विभव से निम्न विभव की ओर होता है। जहाँ विभव का परिवर्तन अधिक तीव्र होता है, वहाँ विद्युत क्षेत्र अधिक प्रबल होता है। यदि किसी क्षेत्र में विभव स्थिर है, तो वहाँ विद्युत क्षेत्र शून्य होगा। यह संबंध विभव ज्ञात होने पर विद्युत क्षेत्र तथा विद्युत क्षेत्र ज्ञात होने पर विभव निर्धारित करने में सहायक है।
प्रश्न 13. समविभव पृष्ठ पर आवेश को ले जाने में कार्य क्यों नहीं होता?
उत्तर:
समविभव पृष्ठ पर स्थित प्रत्येक बिंदु का वैद्युत विभव समान होता है। इसलिए किसी भी दो बिंदुओं के बीच विभवांतर शून्य होता है। कार्य का सूत्र
[W=q\Delta V]
है। चूँकि (\Delta V=0) है, अतः कार्य भी शून्य होगा। इसका अर्थ है कि समविभव पृष्ठ पर किसी आवेश को एक स्थान से दूसरे स्थान तक ले जाने के लिए ऊर्जा की आवश्यकता नहीं होती। साथ ही, विद्युत क्षेत्र सदैव समविभव पृष्ठ के लंबवत होता है, इसलिए गति की दिशा में कोई विद्युत बल कार्य नहीं करता।
प्रश्न 14. विद्युत द्विध्रुव तथा द्विध्रुव आघूर्ण की परिभाषा दीजिए।
उत्तर:
दो समान परिमाण के विपरीत चिन्ह वाले आवेश, जो थोड़ी दूरी पर स्थित हों, विद्युत द्विध्रुव कहलाते हैं। द्विध्रुव की शक्ति को द्विध्रुव आघूर्ण द्वारा व्यक्त किया जाता है। इसका मान
[p=q(2a)]
होता है, जहाँ (q) प्रत्येक आवेश का मान तथा (2a) उनके बीच की दूरी है। द्विध्रुव आघूर्ण एक सदिश राशि है और इसकी दिशा ऋणात्मक आवेश से धनात्मक आवेश की ओर होती है। इसका SI मात्रक कूलॉम-मीटर (C·m) है। विद्युत द्विध्रुव डाइलेक्ट्रिक ध्रुवण और अणु संरचना के अध्ययन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।
प्रश्न 15. वैद्युतस्थैतिक परिरक्षण (Electrostatic Shielding) क्या है?
उत्तर:
वैद्युतस्थैतिक परिरक्षण वह प्रक्रिया है जिसमें किसी क्षेत्र को बाहरी विद्युत क्षेत्र के प्रभाव से बचाने के लिए उसे चालक आवरण से घेर दिया जाता है। चालक के भीतर मुक्त आवेश पुनर्व्यवस्थित होकर ऐसा वितरण बना लेते हैं कि चालक के अंदर विद्युत क्षेत्र शून्य हो जाता है। फलस्वरूप, चालक के अंदर रखा कोई भी उपकरण बाहरी विद्युत प्रभावों से सुरक्षित रहता है। इस सिद्धांत का उपयोग फैराडे पिंजरे, संचार केबलों तथा संवेदनशील इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों की सुरक्षा में किया जाता है।
प्रश्न 16. श्रेणी क्रम (Series Combination) में जुड़े संधारित्रों की व्याख्या कीजिए।
उत्तर:
जब कई संधारित्रों को एक के बाद एक जोड़ा जाता है, तो उन्हें श्रेणी क्रम में जुड़ा हुआ कहा जाता है। इस संयोजन में प्रत्येक संधारित्र पर समान आवेश होता है, जबकि विभवांतर विभाजित हो जाता है। तुल्य धारिता का संबंध
[\frac{1}{C_s}=\frac{1}{C_1}+\frac{1}{C_2}+\frac{1}{C_3}]
से व्यक्त किया जाता है। श्रेणी संयोजन की तुल्य धारिता सदैव सबसे छोटी धारिता से भी कम होती है। इसका उपयोग उच्च विभव वाले परिपथों में किया जाता है, जहाँ अधिक वोल्टेज सहन करने की आवश्यकता होती है।
प्रश्न 17. समानांतर क्रम (Parallel Combination) में जुड़े संधारित्रों की व्याख्या कीजिए।
उत्तर:
समानांतर संयोजन में सभी संधारित्रों के सिरों पर समान विभवांतर होता है। कुल संग्रहित आवेश प्रत्येक संधारित्र पर संग्रहित आवेशों के योग के बराबर होता है। तुल्य धारिता
[C_p=C_1+C_2+C_3]
होती है। समानांतर संयोजन की तुल्य धारिता सदैव किसी भी एकल संधारित्र की धारिता से अधिक होती है। इसका उपयोग अधिक आवेश संग्रहित करने के लिए किया जाता है। इलेक्ट्रॉनिक परिपथों में बड़ी धारिता प्राप्त करने हेतु संधारित्रों को प्रायः समानांतर क्रम में जोड़ा जाता है।
प्रश्न 18. संधारित्र में संग्रहित ऊर्जा का व्यंजक लिखिए।
उत्तर:
संधारित्र को आवेशित करने में किया गया कार्य उसकी विद्युत स्थितिज ऊर्जा के रूप में संग्रहित हो जाता है। संग्रहित ऊर्जा का व्यंजक
[U=\frac{1}{2}CV^2]
है। इसे
[U=\frac{Q^2}{2C}]
या
[U=\frac{1}{2}QV]
के रूप में भी लिखा जा सकता है। यह ऊर्जा संधारित्र की प्लेटों के बीच उपस्थित विद्युत क्षेत्र में संग्रहित रहती है। जब संधारित्र डिस्चार्ज होता है, तो यही ऊर्जा मुक्त होकर परिपथ को प्रदान की जाती है।
प्रश्न 19. वैद्युत विभव एक अदिश राशि क्यों है?
उत्तर:
वैद्युत विभव को प्रति इकाई आवेश पर किए गए कार्य के रूप में परिभाषित किया जाता है। चूँकि कार्य तथा आवेश दोनों अदिश राशियाँ हैं, इसलिए उनका अनुपात भी अदिश होगा। अतः वैद्युत विभव एक अदिश राशि है। इसका केवल परिमाण होता है, दिशा नहीं। अनेक आवेशों के कारण उत्पन्न कुल विभव को बीजगणितीय रूप से जोड़ा जाता है, जबकि विद्युत क्षेत्र एक सदिश राशि होने के कारण सदिश योग के नियमों का पालन करता है। इसी कारण विभव की गणनाएँ अपेक्षाकृत सरल होती हैं।
प्रश्न 20. दैनिक जीवन में संधारित्रों का महत्व बताइए।
उत्तर:
संधारित्र आधुनिक विद्युत एवं इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों का एक महत्वपूर्ण घटक है। इनका उपयोग विद्युत ऊर्जा संग्रहित करने, वोल्टेज को स्थिर रखने तथा संकेतों को फ़िल्टर करने में किया जाता है। कैमरा फ्लैश, रेडियो, टेलीविजन, कंप्यूटर, मोबाइल फोन तथा पावर सप्लाई में संधारित्रों का व्यापक उपयोग होता है। प्रत्यावर्ती धारा (AC) परिपथों में ये शक्ति गुणांक सुधारने तथा अनावश्यक संकेतों को हटाने में सहायता करते हैं। ऊर्जा को शीघ्रता से संग्रहित और मुक्त करने की क्षमता के कारण संधारित्र आधुनिक तकनीक और उद्योगों में अत्यंत महत्वपूर्ण स्थान रखते हैं।
