CBSE कक्षा 10 सामाजिक विज्ञान (राजनीति विज्ञान – Democratic Politics-II)

अध्याय 1 : सत्ता की साझेदारी

20 महत्वपूर्ण प्रश्न एवं उत्तर

प्रश्न 1. सत्ता की साझेदारी (Power Sharing) से क्या अभिप्राय है?

उत्तर:
सत्ता की साझेदारी का अर्थ है कि किसी देश में राजनीतिक शक्ति और निर्णय लेने के अधिकार को विभिन्न व्यक्तियों, समूहों तथा संस्थाओं के बीच बाँटा जाए। लोकतंत्र में यह व्यवस्था इसलिए आवश्यक है ताकि कोई एक व्यक्ति, समुदाय या संस्था सम्पूर्ण सत्ता पर नियंत्रण न कर सके। सत्ता की साझेदारी सामाजिक संघर्षों को कम करती है और विभिन्न समुदायों को शासन में भागीदारी का अवसर देती है। इससे सभी वर्गों के हितों की रक्षा होती है तथा राष्ट्रीय एकता मजबूत होती है। लोकतांत्रिक व्यवस्था में सत्ता का बँटवारा सरकार के विभिन्न अंगों, विभिन्न स्तरों की सरकारों तथा राजनीतिक दलों के बीच किया जाता है।


प्रश्न 2. लोकतंत्र में सत्ता की साझेदारी क्यों आवश्यक है?

उत्तर:
लोकतंत्र में सत्ता की साझेदारी आवश्यक है क्योंकि यह विभिन्न समुदायों और समूहों को शासन में भागीदारी प्रदान करती है। इससे किसी एक समूह का प्रभुत्व स्थापित नहीं होता और सामाजिक संघर्षों की संभावना कम हो जाती है। सत्ता की साझेदारी लोकतांत्रिक मूल्यों जैसे समानता, न्याय और सहभागिता को बढ़ावा देती है। जब सभी वर्गों को निर्णय प्रक्रिया में शामिल किया जाता है, तब सरकार अधिक उत्तरदायी और जनहितकारी बनती है। यह व्यवस्था राष्ट्रीय एकता, राजनीतिक स्थिरता और सामाजिक सद्भाव बनाए रखने में भी सहायक होती है। इसलिए लोकतंत्र की सफलता के लिए सत्ता की साझेदारी अत्यंत महत्वपूर्ण है।


प्रश्न 3. बेल्जियम में सत्ता की साझेदारी की व्यवस्था का वर्णन कीजिए।

उत्तर:
बेल्जियम में डच और फ्रेंच भाषी समुदायों के बीच लंबे समय तक मतभेद रहे। इन विवादों को समाप्त करने के लिए संविधान में कई संशोधन किए गए। केंद्रीय सरकार में दोनों समुदायों को समान प्रतिनिधित्व दिया गया। राज्य सरकारों को पर्याप्त अधिकार प्रदान किए गए और उन्हें केंद्र के अधीन नहीं रखा गया। राजधानी ब्रुसेल्स में दोनों समुदायों को समान अधिकार मिले। इसके अतिरिक्त ‘सामुदायिक सरकार’ की स्थापना की गई, जो भाषा और संस्कृति से जुड़े मामलों का निर्णय लेती है। इन व्यवस्थाओं ने विभिन्न समुदायों के बीच विश्वास बढ़ाया और देश में स्थिरता स्थापित की।


प्रश्न 4. श्रीलंका में बहुसंख्यकवाद (Majoritarianism) क्या था?

उत्तर:
श्रीलंका में स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद सिंहली समुदाय बहुसंख्यक था। सरकार ने ऐसी नीतियाँ अपनाईं जिनसे सिंहली समुदाय को विशेष लाभ मिला। 1956 में सिंहली भाषा को एकमात्र राजभाषा घोषित किया गया तथा सरकारी नौकरियों और शिक्षा में भी सिंहली लोगों को प्राथमिकता दी गई। इन नीतियों ने तमिल अल्पसंख्यकों में असंतोष उत्पन्न किया। परिणामस्वरूप दोनों समुदायों के बीच तनाव बढ़ा और देश में गृहयुद्ध जैसी स्थिति पैदा हो गई। इस प्रकार बहुसंख्यकवाद वह व्यवस्था थी जिसमें बहुसंख्यक समुदाय के हितों को प्राथमिकता देकर अल्पसंख्यकों की उपेक्षा की गई।


प्रश्न 5. बेल्जियम और श्रीलंका की सत्ता-साझेदारी नीतियों में अंतर बताइए।

उत्तर:
बेल्जियम ने विभिन्न भाषाई समुदायों के हितों को ध्यान में रखते हुए सत्ता का न्यायपूर्ण बँटवारा किया। वहाँ सभी प्रमुख समुदायों को शासन में भागीदारी दी गई और उनके अधिकारों की रक्षा की गई। इसके विपरीत, श्रीलंका में सिंहली बहुसंख्यक समुदाय को विशेष महत्व दिया गया तथा तमिल अल्पसंख्यकों की माँगों की उपेक्षा की गई। बेल्जियम की नीति ने राष्ट्रीय एकता और राजनीतिक स्थिरता को बढ़ावा दिया, जबकि श्रीलंका की नीति ने सामाजिक संघर्ष और गृहयुद्ध को जन्म दिया। इसलिए बेल्जियम सत्ता-साझेदारी का सफल उदाहरण है जबकि श्रीलंका बहुसंख्यकवाद के दुष्परिणामों को दर्शाता है।


प्रश्न 6. सत्ता की साझेदारी के विवेकपूर्ण (Prudential) कारण क्या हैं?

उत्तर:
विवेकपूर्ण कारण वे होते हैं जो सत्ता की साझेदारी के व्यावहारिक लाभों को दर्शाते हैं। सत्ता की साझेदारी सामाजिक संघर्षों और राजनीतिक अस्थिरता को कम करती है। यह विभिन्न समुदायों के बीच विश्वास और सहयोग को बढ़ावा देती है। जब सभी वर्गों को शासन में भागीदारी मिलती है, तब अलगाववाद और विद्रोह की संभावना घट जाती है। इससे राष्ट्रीय एकता मजबूत होती है और देश का विकास सुचारु रूप से होता है। बेल्जियम इसका अच्छा उदाहरण है, जहाँ सत्ता की साझेदारी ने विभिन्न समुदायों के बीच शांति और स्थिरता स्थापित की।


प्रश्न 7. सत्ता की साझेदारी के नैतिक (Moral) कारण क्या हैं?

उत्तर:
नैतिक कारण लोकतंत्र के मूल सिद्धांतों पर आधारित होते हैं। लोकतंत्र का आधार यह है कि सभी नागरिकों को शासन और निर्णय प्रक्रिया में भाग लेने का अधिकार हो। सत्ता की साझेदारी समानता, न्याय और सम्मान के सिद्धांतों को मजबूत करती है। यह मानती है कि किसी भी समुदाय या वर्ग को शासन से बाहर नहीं रखा जाना चाहिए। सभी समूहों की राय और हितों का सम्मान करना लोकतांत्रिक नैतिकता का महत्वपूर्ण हिस्सा है। इसलिए सत्ता की साझेदारी केवल लाभकारी ही नहीं, बल्कि लोकतंत्र की आत्मा और उसकी मूल भावना का भी प्रतिनिधित्व करती है।


प्रश्न 8. सत्ता की क्षैतिज (Horizontal) साझेदारी क्या है?

उत्तर:
जब सत्ता सरकार के विभिन्न अंगों—विधायिका, कार्यपालिका और न्यायपालिका—के बीच बाँटी जाती है, तो इसे क्षैतिज सत्ता-साझेदारी कहते हैं। इन सभी अंगों के अधिकार अलग-अलग होते हैं और वे एक-दूसरे पर नियंत्रण रखते हैं। इस व्यवस्था को ‘चेक्स एंड बैलेंस’ प्रणाली भी कहा जाता है। इसका उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि कोई भी अंग अपनी शक्ति का दुरुपयोग न कर सके। इससे लोकतंत्र मजबूत होता है और नागरिकों के अधिकार सुरक्षित रहते हैं। भारत सहित अधिकांश लोकतांत्रिक देशों में यह व्यवस्था लागू है।


प्रश्न 9. सत्ता की ऊर्ध्वाधर (Vertical) साझेदारी क्या है?

उत्तर:
जब सत्ता विभिन्न स्तरों की सरकारों—केंद्र, राज्य और स्थानीय निकायों—के बीच बाँटी जाती है, तो इसे ऊर्ध्वाधर सत्ता-साझेदारी कहा जाता है। इस व्यवस्था में प्रत्येक स्तर को संविधान द्वारा निश्चित अधिकार दिए जाते हैं। भारत में केंद्र सरकार राष्ट्रीय विषयों पर कार्य करती है, जबकि राज्य सरकारें क्षेत्रीय मामलों का संचालन करती हैं। पंचायतें और नगरपालिकाएँ स्थानीय समस्याओं का समाधान करती हैं। इस प्रकार सत्ता का विकेंद्रीकरण होता है और प्रशासन अधिक प्रभावी बनता है। इससे जनता की भागीदारी बढ़ती है तथा स्थानीय आवश्यकताओं को बेहतर ढंग से पूरा किया जा सकता है।


प्रश्न 10. ‘चेक्स एंड बैलेंस’ प्रणाली क्या है?

उत्तर:
‘चेक्स एंड बैलेंस’ प्रणाली वह व्यवस्था है जिसमें सरकार के विभिन्न अंग एक-दूसरे की शक्तियों पर नियंत्रण रखते हैं। विधायिका कानून बनाती है, कार्यपालिका उन्हें लागू करती है और न्यायपालिका उनकी वैधता की जाँच करती है। यदि कोई अंग अपनी सीमाओं से बाहर जाकर कार्य करता है, तो दूसरा अंग उसे नियंत्रित कर सकता है। इस व्यवस्था का उद्देश्य सत्ता के दुरुपयोग को रोकना और लोकतंत्र की रक्षा करना है। इससे किसी एक संस्था के हाथों में अत्यधिक शक्ति केंद्रित नहीं होती और शासन अधिक पारदर्शी एवं उत्तरदायी बनता है।


प्रश्न 11. सामुदायिक सरकार (Community Government) क्या है?

उत्तर:
सामुदायिक सरकार ऐसी सरकार होती है जो किसी विशेष भाषा, संस्कृति या समुदाय के लोगों द्वारा चुनी जाती है और उनके सांस्कृतिक, शैक्षिक तथा भाषाई मामलों का प्रबंधन करती है। बेल्जियम में यह व्यवस्था लागू की गई है। वहाँ डच, फ्रेंच और जर्मन भाषी समुदायों के लिए सामुदायिक सरकारें बनाई गई हैं। इन सरकारों को भाषा, शिक्षा और संस्कृति से जुड़े विषयों पर निर्णय लेने का अधिकार है। इससे विभिन्न समुदायों को अपनी पहचान बनाए रखने और अपने हितों की रक्षा करने का अवसर मिलता है। यह सत्ता-साझेदारी का एक महत्वपूर्ण रूप है।


प्रश्न 12. राजनीतिक दलों के बीच सत्ता की साझेदारी कैसे होती है?

उत्तर:
लोकतांत्रिक देशों में सत्ता की साझेदारी राजनीतिक दलों के माध्यम से भी होती है। विभिन्न दल चुनाव में भाग लेते हैं और जनता के समर्थन के आधार पर सत्ता प्राप्त करते हैं। जब किसी एक दल को स्पष्ट बहुमत नहीं मिलता, तब कई दल मिलकर गठबंधन सरकार बनाते हैं। गठबंधन सरकार में सभी दल शासन और निर्णय प्रक्रिया में भाग लेते हैं। इससे विभिन्न विचारों और हितों को प्रतिनिधित्व मिलता है। राजनीतिक दलों के बीच सत्ता-साझेदारी लोकतंत्र को अधिक समावेशी और उत्तरदायी बनाती है तथा विविध समूहों की आवाज़ को महत्व देती है।


प्रश्न 13. दबाव समूह और आंदोलनों की भूमिका सत्ता की साझेदारी में कैसे महत्वपूर्ण है?

उत्तर:
दबाव समूह और सामाजिक आंदोलन लोकतंत्र में जनता की आवाज़ को सरकार तक पहुँचाने का कार्य करते हैं। वे विभिन्न सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक मुद्दों पर सरकार को सुझाव देते हैं तथा आवश्यक होने पर विरोध भी करते हैं। इनके माध्यम से आम नागरिकों की समस्याएँ और माँगें नीति निर्माण प्रक्रिया तक पहुँचती हैं। इससे सरकार केवल राजनीतिक दलों तक सीमित नहीं रहती बल्कि विभिन्न सामाजिक समूहों के हितों को भी ध्यान में रखती है। इस प्रकार दबाव समूह और आंदोलन सत्ता की साझेदारी को व्यापक बनाते हैं तथा लोकतांत्रिक भागीदारी को मजबूत करते हैं।


प्रश्न 14. बहुसंख्यकवाद के क्या दुष्परिणाम होते हैं?

उत्तर:
बहुसंख्यकवाद में बहुसंख्यक समुदाय अपनी संख्या के बल पर शासन करता है और अल्पसंख्यकों के हितों की उपेक्षा करता है। इससे सामाजिक असमानता और असंतोष बढ़ता है। अल्पसंख्यक समुदाय स्वयं को उपेक्षित महसूस करते हैं और उनके बीच अलगाव की भावना विकसित हो सकती है। परिणामस्वरूप सामाजिक संघर्ष, राजनीतिक अस्थिरता और हिंसा की स्थिति उत्पन्न हो सकती है। श्रीलंका इसका प्रमुख उदाहरण है, जहाँ सिंहली प्रभुत्व वाली नीतियों ने तमिल समुदाय में असंतोष बढ़ाया और लंबे गृहयुद्ध को जन्म दिया। इसलिए लोकतंत्र में बहुसंख्यकवाद के स्थान पर सत्ता की साझेदारी को प्राथमिकता दी जाती है।


प्रश्न 15. बेल्जियम सत्ता-साझेदारी का सफल उदाहरण क्यों माना जाता है?

उत्तर:
बेल्जियम सत्ता-साझेदारी का सफल उदाहरण इसलिए माना जाता है क्योंकि वहाँ विभिन्न भाषाई और सांस्कृतिक समुदायों के बीच संतुलित शक्ति-वितरण की व्यवस्था की गई। संविधान में संशोधन करके सभी समुदायों को समान प्रतिनिधित्व और अधिकार दिए गए। सामुदायिक सरकारों की स्थापना की गई तथा केंद्र और राज्यों के बीच शक्तियों का उचित विभाजन किया गया। इन उपायों से विभिन्न समुदायों के बीच विश्वास और सहयोग बढ़ा। परिणामस्वरूप सामाजिक संघर्ष कम हुए और राजनीतिक स्थिरता स्थापित हुई। बेल्जियम ने यह सिद्ध किया कि विविधता को स्वीकार करके लोकतंत्र को मजबूत बनाया जा सकता है।


प्रश्न 16. लोकतंत्र और सत्ता-साझेदारी के बीच क्या संबंध है?

उत्तर:
लोकतंत्र और सत्ता-साझेदारी का गहरा संबंध है क्योंकि लोकतंत्र का मूल सिद्धांत जनता की भागीदारी है। सत्ता-साझेदारी यह सुनिश्चित करती है कि शासन में विभिन्न समूहों, समुदायों और संस्थाओं को प्रतिनिधित्व मिले। इससे निर्णय प्रक्रिया अधिक लोकतांत्रिक और पारदर्शी बनती है। लोकतंत्र में किसी एक व्यक्ति या समूह को असीमित शक्ति नहीं दी जाती, बल्कि शक्ति का वितरण किया जाता है। इससे नागरिक अधिकारों की रक्षा होती है और सरकार जनता के प्रति उत्तरदायी बनती है। इसलिए सत्ता-साझेदारी लोकतंत्र की सफलता और स्थायित्व का महत्वपूर्ण आधार है।


प्रश्न 17. सत्ता-साझेदारी राष्ट्रीय एकता को कैसे मजबूत करती है?

उत्तर:
सत्ता-साझेदारी विभिन्न समुदायों को शासन में समान अवसर प्रदान करती है। जब सभी समूहों को निर्णय प्रक्रिया में भागीदारी मिलती है, तो उनमें सम्मान और विश्वास की भावना विकसित होती है। इससे सामाजिक तनाव और संघर्ष कम होते हैं। लोग स्वयं को राष्ट्र का समान भागीदार समझते हैं और राष्ट्रीय हितों के प्रति अधिक प्रतिबद्ध होते हैं। विविधता वाले देशों में सत्ता-साझेदारी विशेष रूप से महत्वपूर्ण होती है क्योंकि यह विभिन्न भाषाई, धार्मिक और सांस्कृतिक समूहों को एक साथ जोड़ने का कार्य करती है। इस प्रकार सत्ता-साझेदारी राष्ट्रीय एकता और अखंडता को मजबूत बनाती है।


प्रश्न 18. लोकतंत्र में विभिन्न रूपों में सत्ता-साझेदारी का वर्णन कीजिए।

उत्तर:
लोकतंत्र में सत्ता-साझेदारी कई रूपों में दिखाई देती है। पहला, सरकार के विभिन्न अंगों के बीच सत्ता का विभाजन। दूसरा, केंद्र और राज्य सरकारों जैसे विभिन्न स्तरों के बीच शक्ति का बँटवारा। तीसरा, विभिन्न सामाजिक और भाषाई समुदायों को शासन में प्रतिनिधित्व देना। चौथा, राजनीतिक दलों, दबाव समूहों और आंदोलनों के माध्यम से सत्ता में भागीदारी सुनिश्चित करना। इन सभी रूपों का उद्देश्य सत्ता को विकेंद्रीकृत करना और अधिक लोगों को निर्णय प्रक्रिया में शामिल करना है। इससे लोकतंत्र अधिक समावेशी, उत्तरदायी और प्रभावी बनता है।


प्रश्न 19. श्रीलंका के अनुभव से क्या शिक्षा मिलती है?

उत्तर:
श्रीलंका का अनुभव यह सिखाता है कि बहुसंख्यक समुदाय के हितों को प्राथमिकता देकर अल्पसंख्यकों की उपेक्षा करना लोकतंत्र के लिए हानिकारक है। सिंहली प्रभुत्व वाली नीतियों ने तमिल समुदाय में असंतोष और अलगाव की भावना पैदा की। परिणामस्वरूप लंबे समय तक सामाजिक संघर्ष और गृहयुद्ध की स्थिति बनी रही। यह उदाहरण बताता है कि लोकतंत्र में सभी समुदायों के अधिकारों और हितों का सम्मान आवश्यक है। यदि सत्ता का न्यायपूर्ण वितरण नहीं किया जाता, तो राष्ट्रीय एकता और राजनीतिक स्थिरता को गंभीर खतरा उत्पन्न हो सकता है।


प्रश्न 20. सत्ता-साझेदारी लोकतंत्र की आत्मा क्यों कहलाती है?

उत्तर:
सत्ता-साझेदारी को लोकतंत्र की आत्मा कहा जाता है क्योंकि यह लोकतंत्र के मूल सिद्धांत—जनभागीदारी—को व्यवहार में लागू करती है। इसके माध्यम से विभिन्न समुदायों, संस्थाओं और राजनीतिक समूहों को शासन में भाग लेने का अवसर मिलता है। इससे निर्णय प्रक्रिया अधिक न्यायपूर्ण और समावेशी बनती है। सत्ता-साझेदारी नागरिकों के अधिकारों की रक्षा करती है और किसी एक समूह के प्रभुत्व को रोकती है। यह समानता, स्वतंत्रता और न्याय जैसे लोकतांत्रिक मूल्यों को मजबूत करती है। इसलिए लोकतंत्र की सफलता, स्थिरता और विश्वसनीयता के लिए सत्ता-साझेदारी अत्यंत आवश्यक मानी जाती है।