CBSE कक्षा 10 सामाजिक विज्ञान (भूगोल – Contemporary India-II)

अध्याय 6: विनिर्माण उद्योग

20 महत्वपूर्ण प्रश्न एवं उत्तर

1. विनिर्माण क्या है? इसका महत्व बताइए।

उत्तर:
कच्चे माल को संसाधित करके अधिक उपयोगी और मूल्यवान वस्तुओं में बदलने की प्रक्रिया को विनिर्माण कहते हैं। उदाहरण के लिए कपास से धागा और धागे से कपड़ा बनाना विनिर्माण है। विनिर्माण उद्योग किसी देश के आर्थिक विकास का आधार माना जाता है। यह रोजगार के अवसर बढ़ाता है, कृषि का आधुनिकीकरण करता है तथा लोगों की कृषि पर निर्भरता कम करता है। इसके माध्यम से निर्यात बढ़ता है और विदेशी मुद्रा प्राप्त होती है। औद्योगिक विकास गरीबी और बेरोजगारी को कम करने में भी सहायता करता है। इसलिए किसी देश की आर्थिक शक्ति का आकलन उसके विनिर्माण क्षेत्र के विकास से किया जाता है।


2. भारत के आर्थिक विकास में विनिर्माण उद्योगों की क्या भूमिका है?

उत्तर:
विनिर्माण उद्योग भारत के आर्थिक विकास में अत्यंत महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। ये उद्योग बड़े पैमाने पर रोजगार प्रदान करते हैं तथा राष्ट्रीय आय में योगदान देते हैं। उद्योग कृषि को उन्नत बनाने के लिए उर्वरक, मशीनें और उपकरण उपलब्ध कराते हैं। निर्मित वस्तुओं के निर्यात से विदेशी मुद्रा अर्जित होती है और व्यापार को बढ़ावा मिलता है। औद्योगिक विकास से पिछड़े क्षेत्रों का विकास होता है तथा क्षेत्रीय असमानताएँ कम होती हैं। उद्योगों के कारण परिवहन, संचार और बैंकिंग जैसी सेवाओं का भी विस्तार होता है। इस प्रकार विनिर्माण उद्योग देश की समग्र आर्थिक प्रगति के लिए आवश्यक हैं।


3. कृषि और उद्योग एक-दूसरे के पूरक कैसे हैं?

उत्तर:
कृषि और उद्योग एक-दूसरे के पूरक तथा परस्पर निर्भर हैं। कृषि उद्योगों को कपास, गन्ना, जूट और तिलहन जैसे कच्चे माल उपलब्ध कराती है। साथ ही कृषि क्षेत्र उद्योगों द्वारा निर्मित वस्तुओं का बड़ा बाजार भी प्रदान करता है। दूसरी ओर उद्योग कृषि को उर्वरक, कीटनाशक, ट्रैक्टर, सिंचाई उपकरण और आधुनिक मशीनें उपलब्ध कराते हैं। इससे कृषि उत्पादन में वृद्धि होती है। उद्योग ग्रामीण क्षेत्रों में रोजगार भी उत्पन्न करते हैं जिससे किसानों की आय बढ़ती है। इस प्रकार कृषि और उद्योग मिलकर आर्थिक विकास की प्रक्रिया को गति देते हैं और राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था को मजबूत बनाते हैं।


4. कच्चे माल के आधार पर उद्योगों का वर्गीकरण कीजिए।

उत्तर:
कच्चे माल के आधार पर उद्योगों को मुख्यतः कृषि-आधारित और खनिज-आधारित उद्योगों में विभाजित किया जाता है। कृषि-आधारित उद्योग वे हैं जो कृषि उत्पादों पर निर्भर होते हैं, जैसे सूती वस्त्र उद्योग, चीनी उद्योग, जूट उद्योग और खाद्य प्रसंस्करण उद्योग। खनिज-आधारित उद्योग खनिज संसाधनों का उपयोग करते हैं, जैसे लौह-इस्पात उद्योग, सीमेंट उद्योग और एल्यूमिनियम उद्योग। इन उद्योगों का विकास कच्चे माल की उपलब्धता पर निर्भर करता है। भारत में दोनों प्रकार के उद्योगों का व्यापक विकास हुआ है, जो देश की अर्थव्यवस्था को मजबूत बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।


5. सार्वजनिक और निजी क्षेत्र के उद्योगों में अंतर बताइए।

उत्तर:
सार्वजनिक क्षेत्र के उद्योग वे होते हैं जिनका स्वामित्व और प्रबंधन सरकार के हाथों में होता है। इनका उद्देश्य सार्वजनिक हित और राष्ट्रीय विकास होता है। उदाहरण के लिए इस्पात प्राधिकरण और भेल जैसे उपक्रम। दूसरी ओर निजी क्षेत्र के उद्योगों का स्वामित्व व्यक्तियों या निजी कंपनियों के पास होता है और उनका मुख्य उद्देश्य लाभ कमाना होता है। टाटा और रिलायंस इसके उदाहरण हैं। सार्वजनिक उद्योगों में सरकार निवेश करती है जबकि निजी उद्योगों में पूंजी निजी निवेशकों द्वारा लगाई जाती है। दोनों प्रकार के उद्योग देश की आर्थिक उन्नति और रोजगार सृजन में महत्वपूर्ण योगदान देते हैं।


6. सूती वस्त्र उद्योग का महत्व बताइए।

उत्तर:
सूती वस्त्र उद्योग भारत का सबसे पुराना और महत्वपूर्ण उद्योग है। यह उद्योग लाखों लोगों को रोजगार प्रदान करता है और देश की औद्योगिक उत्पादन तथा निर्यात आय में महत्वपूर्ण योगदान देता है। भारत विश्व के प्रमुख कपास उत्पादक देशों में से एक है, जिससे इस उद्योग को पर्याप्त कच्चा माल प्राप्त होता है। सूती वस्त्र उद्योग ग्रामीण तथा शहरी दोनों क्षेत्रों में रोजगार के अवसर उपलब्ध कराता है। यह उद्योग वस्त्रों की घरेलू मांग को पूरा करने के साथ-साथ विदेशी बाजारों में भी भारतीय उत्पादों की पहचान स्थापित करता है। इसलिए इसका भारतीय अर्थव्यवस्था में विशेष स्थान है।


7. भारत में सूती वस्त्र उद्योग किन समस्याओं का सामना कर रहा है?

उत्तर:
भारत का सूती वस्त्र उद्योग कई चुनौतियों का सामना कर रहा है। अनेक मिलों में पुरानी मशीनों का उपयोग होने के कारण उत्पादन क्षमता प्रभावित होती है। बिजली की अनियमित आपूर्ति भी उत्पादन में बाधा उत्पन्न करती है। विकसित देशों तथा अन्य प्रतिस्पर्धी देशों से कड़ी प्रतिस्पर्धा का सामना करना पड़ता है। उच्च उत्पादन लागत और गुणवत्ता सुधार की आवश्यकता भी महत्वपूर्ण समस्याएँ हैं। इसके अतिरिक्त कृत्रिम रेशों की बढ़ती लोकप्रियता ने सूती वस्त्रों की मांग को प्रभावित किया है। इन चुनौतियों के बावजूद यह उद्योग भारतीय अर्थव्यवस्था में महत्वपूर्ण योगदान देता है और निरंतर आधुनिकीकरण की दिशा में कार्य कर रहा है।


8. जूट उद्योग का महत्व बताइए।

उत्तर:
जूट उद्योग भारत का एक प्रमुख कृषि-आधारित उद्योग है। यह मुख्य रूप से पश्चिम बंगाल में विकसित हुआ है क्योंकि वहाँ जूट उत्पादन, जल संसाधन और परिवहन सुविधाएँ उपलब्ध हैं। यह उद्योग लाखों लोगों को प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रोजगार प्रदान करता है। जूट से बोरे, रस्सियाँ, थैले और पैकेजिंग सामग्री बनाई जाती है। जूट एक जैव-अवक्रमणीय और पर्यावरण-अनुकूल पदार्थ है, इसलिए इसकी मांग बढ़ रही है। जूट उद्योग विदेशी मुद्रा अर्जित करने में भी सहायक है। भारत विश्व के प्रमुख जूट उत्पादक देशों में से एक है और यह उद्योग राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था में महत्वपूर्ण योगदान देता है।


9. लौह एवं इस्पात उद्योग को आधारभूत उद्योग क्यों कहा जाता है?

उत्तर:
लौह एवं इस्पात उद्योग को आधारभूत उद्योग कहा जाता है क्योंकि यह अन्य उद्योगों को आवश्यक कच्चा माल प्रदान करता है। मशीन निर्माण, ऑटोमोबाइल, रेलवे, जहाज निर्माण और निर्माण कार्य जैसे अनेक उद्योग इस्पात पर निर्भर होते हैं। किसी देश की औद्योगिक प्रगति का स्तर उसके इस्पात उत्पादन और उपभोग से भी मापा जाता है। भारत में लौह एवं इस्पात उद्योग का विकास मुख्यतः खनिज संसाधनों की उपलब्धता वाले क्षेत्रों में हुआ है। यह उद्योग रोजगार सृजन, औद्योगिक विकास और आधारभूत संरचना निर्माण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। इसलिए इसे औद्योगिक विकास की रीढ़ माना जाता है।


10. भारत में लौह एवं इस्पात उद्योग की प्रमुख समस्याएँ बताइए।

उत्तर:
भारत का लौह एवं इस्पात उद्योग कई समस्याओं से प्रभावित है। कोकिंग कोयले की सीमित उपलब्धता और उसके आयात पर निर्भरता उत्पादन लागत बढ़ाती है। बिजली आपूर्ति की अनियमितता भी उत्पादन को प्रभावित करती है। कई संयंत्रों में तकनीकी आधुनिकीकरण की आवश्यकता है। परिवहन और आधारभूत ढाँचे की कमजोरियाँ उद्योग के विकास में बाधा उत्पन्न करती हैं। श्रम उत्पादकता अपेक्षाकृत कम होने तथा उत्पादन लागत अधिक होने से अंतरराष्ट्रीय प्रतिस्पर्धा कठिन हो जाती है। इन चुनौतियों के बावजूद भारत विश्व के प्रमुख इस्पात उत्पादक देशों में शामिल है और इस क्षेत्र में निरंतर सुधार के प्रयास किए जा रहे हैं।


11. एल्यूमिनियम उद्योग का महत्व बताइए।

उत्तर:
एल्यूमिनियम उद्योग भारत का एक महत्वपूर्ण खनिज-आधारित उद्योग है। एल्यूमिनियम हल्का, टिकाऊ, जंगरोधी तथा विद्युत का अच्छा चालक होता है। इसका उपयोग परिवहन, निर्माण, विद्युत उपकरण, पैकेजिंग और विमान निर्माण जैसे क्षेत्रों में किया जाता है। इसका प्रमुख कच्चा माल बॉक्साइट है। एल्यूमिनियम मिश्र धातुओं के निर्माण में भी उपयोगी है, जिससे इसकी मजबूती बढ़ जाती है। यह उद्योग आधुनिक औद्योगिक विकास के लिए अत्यंत आवश्यक है और देश की औद्योगिक प्रगति में महत्वपूर्ण योगदान देता है। इसकी मांग निरंतर बढ़ रही है, जिससे इसका आर्थिक महत्व और अधिक बढ़ गया है।


12. रासायनिक उद्योग का महत्व बताइए।

उत्तर:
रासायनिक उद्योग भारत के सबसे तेजी से विकसित होने वाले उद्योगों में से एक है। यह कृषि, स्वास्थ्य, वस्त्र, प्लास्टिक और औषधि उद्योगों को आवश्यक उत्पाद उपलब्ध कराता है। रासायनिक उद्योग को मुख्य रूप से कार्बनिक और अकार्बनिक रसायनों में विभाजित किया जाता है। उर्वरक, कीटनाशक, प्लास्टिक, साबुन, डिटर्जेंट और दवाइयाँ इसी उद्योग के उत्पाद हैं। यह उद्योग रोजगार सृजन के साथ-साथ निर्यात आय बढ़ाने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। आधुनिक जीवन की अनेक आवश्यकताएँ रासायनिक उद्योगों पर निर्भर हैं, इसलिए यह देश की अर्थव्यवस्था के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण माना जाता है।


13. उद्योगों से होने वाले वायु प्रदूषण का वर्णन कीजिए।

उत्तर:
उद्योगों से निकलने वाला धुआँ, धूल और हानिकारक गैसें वायु प्रदूषण का प्रमुख कारण हैं। रासायनिक कारखाने, ताप विद्युत गृह, सीमेंट उद्योग तथा धातु गलाने वाले संयंत्र बड़ी मात्रा में प्रदूषक तत्व छोड़ते हैं। सल्फर डाइऑक्साइड, कार्बन मोनोऑक्साइड और अन्य गैसें मानव स्वास्थ्य तथा पर्यावरण को प्रभावित करती हैं। वायु प्रदूषण से श्वसन संबंधी रोग बढ़ते हैं और वनस्पतियों को भी नुकसान पहुँचता है। इस समस्या को नियंत्रित करने के लिए आधुनिक तकनीकों, फिल्टरों तथा प्रदूषण नियंत्रण उपकरणों का उपयोग आवश्यक है। उद्योगों को पर्यावरणीय मानकों का पालन करना चाहिए ताकि प्रदूषण को कम किया जा सके।


14. उद्योगों द्वारा जल प्रदूषण कैसे होता है?

उत्तर:
जब उद्योग अपने अपशिष्ट पदार्थों और रासायनिक जल को बिना उपचार के नदियों, झीलों या अन्य जल स्रोतों में छोड़ देते हैं, तब जल प्रदूषण होता है। कागज, वस्त्र, रसायन और रंगाई उद्योग इस प्रकार के प्रदूषण के प्रमुख स्रोत हैं। प्रदूषित जल से जलीय जीवों का जीवन प्रभावित होता है तथा मानव स्वास्थ्य के लिए भी खतरा उत्पन्न होता है। जल की गुणवत्ता घटने से पेयजल संकट भी उत्पन्न हो सकता है। इस समस्या को रोकने के लिए अपशिष्ट जल का शोधन, पुनर्चक्रण तथा पर्यावरणीय नियमों का पालन आवश्यक है। इससे जल संसाधनों की सुरक्षा सुनिश्चित की जा सकती है।


15. तापीय प्रदूषण क्या है?

उत्तर:
तापीय प्रदूषण तब उत्पन्न होता है जब उद्योगों और ताप विद्युत संयंत्रों से निकलने वाला गर्म जल बिना ठंडा किए नदियों और तालाबों में छोड़ दिया जाता है। इससे जल का तापमान बढ़ जाता है और जलीय पारिस्थितिकी तंत्र प्रभावित होता है। उच्च तापमान के कारण पानी में घुलित ऑक्सीजन की मात्रा कम हो जाती है, जिससे मछलियों और अन्य जलीय जीवों के जीवन पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है। तापीय प्रदूषण जल गुणवत्ता को भी प्रभावित करता है। इस समस्या के समाधान के लिए गर्म जल को शीतलन टैंकों में ठंडा करने के बाद ही जल स्रोतों में छोड़ा जाना चाहिए।


16. औद्योगिक प्रदूषण को नियंत्रित करने के उपाय बताइए।

उत्तर:
औद्योगिक प्रदूषण को नियंत्रित करने के लिए कई उपाय अपनाए जा सकते हैं। उद्योगों को अपशिष्ट जल का उपचार करके ही उसे जल स्रोतों में छोड़ना चाहिए। प्रदूषण नियंत्रण उपकरणों और फिल्टरों का उपयोग वायु प्रदूषण कम करने में सहायक होता है। जल के पुनर्चक्रण और पुनः उपयोग को बढ़ावा दिया जाना चाहिए। ऊर्जा दक्ष तकनीकों तथा स्वच्छ ईंधन का प्रयोग भी प्रदूषण कम करता है। उद्योगों के आसपास हरित पट्टियों का विकास किया जाना चाहिए। पर्यावरणीय कानूनों का सख्ती से पालन और नियमित निरीक्षण भी आवश्यक है। इन उपायों से पर्यावरण संरक्षण और सतत विकास सुनिश्चित किया जा सकता है।


17. राष्ट्रीय ताप विद्युत निगम (NTPC) द्वारा पर्यावरण संरक्षण हेतु किए गए प्रयास बताइए।

उत्तर:
राष्ट्रीय ताप विद्युत निगम (NTPC) ने पर्यावरण संरक्षण के लिए अनेक महत्वपूर्ण कदम उठाए हैं। इसने प्रदूषण नियंत्रण उपकरणों का उपयोग बढ़ाया है तथा जल और ऊर्जा संरक्षण को प्रोत्साहित किया है। NTPC ने अपशिष्ट जल के उपचार और पुनः उपयोग की व्यवस्था विकसित की है। औद्योगिक क्षेत्रों में हरित पट्टियाँ विकसित की गई हैं ताकि वायु प्रदूषण कम हो सके। पर्यावरण प्रबंधन प्रणाली को अपनाकर प्रदूषण स्तर की नियमित निगरानी की जाती है। इन प्रयासों का उद्देश्य औद्योगिक विकास और पर्यावरण संरक्षण के बीच संतुलन स्थापित करना है। NTPC का मॉडल अन्य उद्योगों के लिए भी प्रेरणास्रोत माना जाता है।


18. उपभोक्ता उद्योग क्या होते हैं?

उत्तर:
उपभोक्ता उद्योग वे उद्योग हैं जो सीधे उपभोक्ताओं के उपयोग के लिए वस्तुओं का उत्पादन करते हैं। इन उद्योगों द्वारा निर्मित उत्पाद अंतिम उपभोक्ता तक सीधे पहुँचते हैं। वस्त्र, खाद्य पदार्थ, इलेक्ट्रॉनिक उपकरण, साबुन और दवाइयाँ उपभोक्ता उद्योगों के प्रमुख उदाहरण हैं। इन उद्योगों का मुख्य उद्देश्य लोगों की दैनिक आवश्यकताओं की पूर्ति करना है। उपभोक्ता उद्योग रोजगार सृजन के साथ-साथ बाजार की मांग को पूरा करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। बढ़ती जनसंख्या और जीवन स्तर में सुधार के कारण इन उद्योगों का महत्व लगातार बढ़ रहा है।


19. लघु उद्योगों का महत्व बताइए।

उत्तर:
लघु उद्योग कम पूंजी और सीमित संसाधनों से संचालित किए जाते हैं। ये उद्योग स्थानीय कच्चे माल और श्रम का उपयोग करते हैं, जिससे ग्रामीण और अर्ध-शहरी क्षेत्रों में रोजगार के अवसर बढ़ते हैं। लघु उद्योग क्षेत्रीय विकास को प्रोत्साहित करते हैं तथा बड़े उद्योगों पर दबाव कम करते हैं। हस्तशिल्प, खाद्य प्रसंस्करण और खादी उद्योग इसके प्रमुख उदाहरण हैं। ये उद्योग स्थानीय अर्थव्यवस्था को मजबूत बनाने के साथ-साथ पारंपरिक कौशल और सांस्कृतिक विरासत को भी संरक्षित रखते हैं। इसलिए लघु उद्योग भारत के संतुलित आर्थिक विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।


20. उद्योगों के स्थान निर्धारण को प्रभावित करने वाले कारक कौन-कौन से हैं?

उत्तर:
उद्योगों के स्थान निर्धारण पर कई कारकों का प्रभाव पड़ता है। कच्चे माल की उपलब्धता सबसे महत्वपूर्ण कारकों में से एक है। इसके अतिरिक्त ऊर्जा स्रोत, जल आपूर्ति, श्रम की उपलब्धता, परिवहन सुविधाएँ और बाजार की निकटता भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। पूंजी, सरकारी नीतियाँ तथा तकनीकी सुविधाएँ भी उद्योगों के स्थान चयन को प्रभावित करती हैं। उद्योग सामान्यतः ऐसे क्षेत्रों में स्थापित किए जाते हैं जहाँ उत्पादन लागत कम हो और आवश्यक संसाधन आसानी से उपलब्ध हों। इन सभी कारकों का संतुलित संयोजन उद्योगों के सफल संचालन और विकास के लिए आवश्यक होता है।