CBSE कक्षा 10 सामाजिक विज्ञान (भूगोल – Contemporary India-II)

अध्याय 1: संसाधन और विकास

20 महत्वपूर्ण प्रश्न एवं उत्तर

संसाधनों के प्रकार, संसाधन नियोजन, भूमि उपयोग, भूमि क्षरण, मृदा संरक्षण तथा सतत विकास इस अध्याय के प्रमुख विषय हैं।


प्रश्न 1. संसाधन क्या हैं? मानव को सबसे महत्वपूर्ण संसाधन क्यों माना जाता है?

उत्तर:
संसाधन वे सभी वस्तुएँ, पदार्थ या तत्व हैं जो मानव की आवश्यकताओं को पूरा करते हैं तथा तकनीकी रूप से सुलभ, आर्थिक रूप से व्यवहार्य और सांस्कृतिक रूप से स्वीकार्य होते हैं। संसाधन प्राकृतिक या मानव निर्मित हो सकते हैं। मानव को सबसे महत्वपूर्ण संसाधन माना जाता है क्योंकि वही अपनी बुद्धि, ज्ञान और तकनीक के माध्यम से प्राकृतिक वस्तुओं को उपयोगी संसाधनों में परिवर्तित करता है। उदाहरण के लिए, खनिज तभी संसाधन बनते हैं जब मानव उन्हें खोजकर उपयोग में लाता है। इसलिए संसाधनों का विकास और उपयोग मानव की क्षमता पर निर्भर करता है।


प्रश्न 2. जैविक और अजैविक संसाधनों में अंतर स्पष्ट कीजिए।

उत्तर:
उत्पत्ति के आधार पर संसाधनों को जैविक और अजैविक संसाधनों में बाँटा जाता है। जैविक संसाधन वे हैं जो जीवमंडल से प्राप्त होते हैं तथा जिनमें जीवन होता है, जैसे वनस्पति, पशु, मत्स्य और मानव। दूसरी ओर, अजैविक संसाधन निर्जीव पदार्थों से बने होते हैं, जैसे चट्टानें, धातुएँ, जल और वायु। जैविक संसाधनों का संबंध जीवित प्राणियों से होता है जबकि अजैविक संसाधनों का संबंध निर्जीव तत्वों से होता है। दोनों प्रकार के संसाधन मानव जीवन और आर्थिक विकास के लिए अत्यंत आवश्यक हैं।


प्रश्न 3. नवीकरणीय और अनवीकरणीय संसाधनों में अंतर बताइए।

उत्तर:
नवीकरणीय संसाधन वे होते हैं जिन्हें प्राकृतिक प्रक्रियाओं द्वारा पुनः प्राप्त किया जा सकता है। जैसे सूर्य ऊर्जा, पवन ऊर्जा, जल और वन। इनका उपयोग करने पर भी ये पुनः उपलब्ध हो जाते हैं। इसके विपरीत, अनवीकरणीय संसाधनों का निर्माण लाखों वर्षों में होता है और एक बार समाप्त होने पर इन्हें शीघ्र पुनः प्राप्त नहीं किया जा सकता। कोयला, पेट्रोलियम और प्राकृतिक गैस इसके उदाहरण हैं। अनवीकरणीय संसाधनों का अत्यधिक दोहन भविष्य के लिए संकट उत्पन्न कर सकता है, इसलिए उनका विवेकपूर्ण उपयोग आवश्यक है।


प्रश्न 4. संसाधन नियोजन का क्या महत्व है?

उत्तर:
संसाधन नियोजन का अर्थ संसाधनों की पहचान, विकास और उचित उपयोग के लिए योजनाबद्ध व्यवस्था करना है। भारत जैसे विशाल देश में संसाधनों का वितरण असमान है, इसलिए उनका संतुलित विकास आवश्यक है। संसाधन नियोजन से प्राकृतिक संसाधनों का संरक्षण होता है, क्षेत्रीय असमानताएँ कम होती हैं तथा सतत विकास को बढ़ावा मिलता है। इसके माध्यम से वर्तमान आवश्यकताओं की पूर्ति के साथ-साथ भविष्य की पीढ़ियों के लिए भी संसाधन सुरक्षित रखे जा सकते हैं। इसलिए आर्थिक विकास और पर्यावरण संरक्षण दोनों के लिए संसाधन नियोजन अत्यंत महत्वपूर्ण है।


प्रश्न 5. भारत में संसाधन नियोजन के प्रमुख चरण लिखिए।

उत्तर:
भारत में संसाधन नियोजन के तीन प्रमुख चरण हैं। पहला चरण देश के विभिन्न क्षेत्रों में उपलब्ध संसाधनों की पहचान और उनका सर्वेक्षण करना है। दूसरा चरण उपयुक्त तकनीक, कौशल और संस्थागत ढाँचे की सहायता से विकास योजनाएँ तैयार करना है। तीसरा चरण इन योजनाओं को राष्ट्रीय विकास योजनाओं के साथ समन्वित करके लागू करना है। इन चरणों के माध्यम से संसाधनों का संतुलित उपयोग सुनिश्चित किया जाता है। इससे आर्थिक प्रगति, पर्यावरण संरक्षण और क्षेत्रीय विकास को बढ़ावा मिलता है।


प्रश्न 6. सतत विकास से आप क्या समझते हैं?

उत्तर:
सतत विकास वह विकास है जिसमें वर्तमान पीढ़ी की आवश्यकताओं की पूर्ति इस प्रकार की जाती है कि भविष्य की पीढ़ियों की आवश्यकताओं को पूरा करने की क्षमता प्रभावित न हो। इसका उद्देश्य आर्थिक विकास और पर्यावरण संरक्षण के बीच संतुलन स्थापित करना है। संसाधनों का अत्यधिक दोहन पर्यावरणीय समस्याएँ उत्पन्न करता है, इसलिए उनका विवेकपूर्ण उपयोग आवश्यक है। जल संरक्षण, वनीकरण, ऊर्जा बचत और प्रदूषण नियंत्रण जैसे उपाय सतत विकास को बढ़ावा देते हैं। यह विकास का दीर्घकालिक और पर्यावरण-अनुकूल मॉडल है।


प्रश्न 7. भूमि संसाधन का महत्व बताइए।

उत्तर:
भूमि एक अत्यंत महत्वपूर्ण प्राकृतिक संसाधन है क्योंकि मानव की अधिकांश आर्थिक गतिविधियाँ भूमि पर आधारित होती हैं। कृषि, उद्योग, परिवहन, आवास और खनन जैसे कार्य भूमि के बिना संभव नहीं हैं। भूमि प्राकृतिक वनस्पति और वन्य जीवों का भी आधार है। बढ़ती जनसंख्या के कारण भूमि पर दबाव लगातार बढ़ रहा है। इसलिए भूमि का उचित उपयोग और संरक्षण आवश्यक है। भूमि संसाधनों के विवेकपूर्ण उपयोग से आर्थिक विकास को गति मिलती है तथा पर्यावरणीय संतुलन भी बना रहता है।


प्रश्न 8. भूमि क्षरण के प्रमुख कारण लिखिए।

उत्तर:
भूमि क्षरण का अर्थ भूमि की गुणवत्ता और उत्पादकता में कमी आना है। इसके प्रमुख कारण वनों की कटाई, अत्यधिक चराई, खनन गतिविधियाँ, औद्योगिक अपशिष्ट तथा अत्यधिक सिंचाई हैं। कुछ क्षेत्रों में रासायनिक उर्वरकों और कीटनाशकों के अत्यधिक उपयोग से भी भूमि की उर्वरता घटती है। भूमि क्षरण के कारण कृषि उत्पादन कम हो जाता है और पर्यावरणीय समस्याएँ बढ़ती हैं। इसलिए भूमि संरक्षण के लिए वैज्ञानिक कृषि पद्धतियों और वृक्षारोपण को प्रोत्साहित करना आवश्यक है।


प्रश्न 9. भूमि संरक्षण के उपाय बताइए।

उत्तर:
भूमि संरक्षण के लिए अनेक उपाय अपनाए जा सकते हैं। वृक्षारोपण और वनों का संरक्षण भूमि कटाव को रोकते हैं। अत्यधिक चराई पर नियंत्रण, खनन क्षेत्रों का पुनर्वास तथा औद्योगिक अपशिष्टों का उचित निपटान भी आवश्यक है। पर्वतीय क्षेत्रों में सीढ़ीदार खेती और समोच्च जुताई से भूमि का संरक्षण किया जा सकता है। जलभराव और लवणता की समस्या को नियंत्रित करने के लिए वैज्ञानिक सिंचाई पद्धतियाँ अपनानी चाहिए। इन उपायों से भूमि की उत्पादकता और गुणवत्ता लंबे समय तक बनी रहती है।


प्रश्न 10. मृदा को एक महत्वपूर्ण संसाधन क्यों माना जाता है?

उत्तर:
मृदा पृथ्वी की ऊपरी परत है जो पौधों की वृद्धि के लिए आवश्यक पोषक तत्व प्रदान करती है। कृषि उत्पादन पूरी तरह मृदा पर निर्भर करता है, इसलिए इसे महत्वपूर्ण संसाधन माना जाता है। मृदा का निर्माण चट्टानों के अपक्षय तथा जैविक पदार्थों के विघटन से होता है। यह जल को संग्रहित करती है और पौधों की जड़ों को सहारा प्रदान करती है। विभिन्न प्रकार की मृदाएँ अलग-अलग फसलों के लिए उपयुक्त होती हैं। इसलिए खाद्य सुरक्षा और कृषि विकास के लिए मृदा संरक्षण अत्यंत आवश्यक है।


प्रश्न 11. जलोढ़ मृदा की विशेषताएँ बताइए।

उत्तर:
जलोढ़ मृदा भारत की सबसे व्यापक और उपजाऊ मृदा है। इसका निर्माण नदियों द्वारा लाई गई गाद और अवसादों से होता है। इसमें पोटाश, चूना और फॉस्फोरिक अम्ल पर्याप्त मात्रा में पाए जाते हैं। यह मृदा गेहूँ, धान, गन्ना, दालें और तिलहन जैसी फसलों के लिए अत्यंत उपयुक्त है। गंगा, ब्रह्मपुत्र और सतलुज के मैदानों में इसका व्यापक विस्तार है। इसकी उच्च उर्वरता के कारण यह भारत की कृषि अर्थव्यवस्था में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है।


प्रश्न 12. काली मृदा की प्रमुख विशेषताएँ लिखिए।

उत्तर:
काली मृदा को रेगुर मृदा भी कहा जाता है। इसका निर्माण ज्वालामुखीय चट्टानों से हुआ है और यह मुख्य रूप से महाराष्ट्र, मध्य प्रदेश तथा गुजरात में पाई जाती है। इसमें नमी को लंबे समय तक बनाए रखने की क्षमता होती है। यह मृदा कैल्शियम कार्बोनेट, मैग्नीशियम और पोटाश से समृद्ध होती है। कपास की खेती के लिए यह सबसे उपयुक्त मानी जाती है, इसलिए इसे “कपास मृदा” भी कहा जाता है। इसकी उर्वरता और जल धारण क्षमता इसे कृषि के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण बनाती है।


प्रश्न 13. लाल और पीली मृदा का वर्णन कीजिए।

उत्तर:
लाल और पीली मृदा मुख्य रूप से दक्षिणी तथा पूर्वी भारत के क्षेत्रों में पाई जाती है। इसमें लौह तत्व की अधिकता के कारण इसका रंग लाल होता है। जलयोजन की स्थिति में यह पीली दिखाई देती है। यह मृदा अपेक्षाकृत कम उपजाऊ होती है, लेकिन उचित उर्वरकों के उपयोग से इसकी उत्पादकता बढ़ाई जा सकती है। इसमें धान, बाजरा, दालें और मूँगफली जैसी फसलें उगाई जाती हैं। यह मृदा मुख्यतः तमिलनाडु, कर्नाटक, ओडिशा और छत्तीसगढ़ में पाई जाती है।


प्रश्न 14. लेटराइट मृदा की विशेषताएँ बताइए।

उत्तर:
लेटराइट मृदा उच्च तापमान और भारी वर्षा वाले क्षेत्रों में विकसित होती है। इसमें लौह और एल्युमिनियम की मात्रा अधिक होती है जबकि ह्यूमस की मात्रा कम होती है। यह मृदा अपेक्षाकृत कम उपजाऊ होती है, परंतु उर्वरकों के उपयोग से इसमें कृषि की जा सकती है। चाय, कॉफी, काजू और रबर जैसी फसलें इस मृदा में अच्छी तरह उगाई जाती हैं। यह मुख्य रूप से पश्चिमी घाट, पूर्वी घाट और कुछ पहाड़ी क्षेत्रों में पाई जाती है।


प्रश्न 15. मृदा अपरदन क्या है?

उत्तर:
मृदा अपरदन वह प्रक्रिया है जिसमें जल, वायु या अन्य प्राकृतिक कारकों द्वारा मृदा की ऊपरी उपजाऊ परत हट जाती है। यह कृषि उत्पादन के लिए हानिकारक है क्योंकि सबसे अधिक पोषक तत्व इसी परत में पाए जाते हैं। वनों की कटाई, अत्यधिक चराई और अनुचित कृषि पद्धतियाँ मृदा अपरदन को बढ़ावा देती हैं। इसके कारण भूमि की उर्वरता कम हो जाती है और कृषि उत्पादन प्रभावित होता है। मृदा संरक्षण उपायों के माध्यम से इस समस्या को नियंत्रित किया जा सकता है।


प्रश्न 16. मृदा संरक्षण के उपाय बताइए।

उत्तर:
मृदा संरक्षण के लिए वृक्षारोपण, समोच्च जुताई, पट्टीदार खेती और सीढ़ीदार खेती जैसे उपाय अपनाए जाते हैं। पर्वतीय क्षेत्रों में सीढ़ीदार खेती मृदा को बहने से रोकती है। समोच्च जुताई वर्षा जल के प्रवाह को नियंत्रित करती है। वृक्षारोपण से वायु और जल द्वारा होने वाला कटाव कम होता है। बंजर भूमि का पुनर्वास तथा अत्यधिक चराई पर नियंत्रण भी आवश्यक है। इन उपायों से मृदा की उर्वरता बनी रहती है और कृषि उत्पादन में वृद्धि होती है।


प्रश्न 17. एजेंडा 21 क्या है?

उत्तर:
एजेंडा 21 एक वैश्विक कार्ययोजना है जिसे 1992 में ब्राज़ील के रियो डी जेनेरो में आयोजित पृथ्वी सम्मेलन में अपनाया गया था। इसका उद्देश्य पर्यावरण संरक्षण और सतत विकास को बढ़ावा देना है। इस योजना में देशों से प्राकृतिक संसाधनों के संरक्षण, प्रदूषण नियंत्रण और पर्यावरण-अनुकूल विकास नीतियाँ अपनाने का आग्रह किया गया है। भारत सहित अनेक देशों ने इसके सिद्धांतों को स्वीकार किया है। एजेंडा 21 वर्तमान और भविष्य की पीढ़ियों के लिए संसाधनों के संरक्षण पर बल देता है।


प्रश्न 18. संसाधनों के अंधाधुंध उपयोग से उत्पन्न समस्याएँ बताइए।

उत्तर:
संसाधनों के अंधाधुंध उपयोग से अनेक गंभीर समस्याएँ उत्पन्न होती हैं। प्राकृतिक संसाधनों का तेजी से क्षय होता है और पर्यावरणीय संतुलन बिगड़ता है। संसाधनों का असमान वितरण समाज में आर्थिक विषमता बढ़ाता है। अत्यधिक दोहन के कारण प्रदूषण, वैश्विक ऊष्मीकरण और जैव विविधता का ह्रास जैसी समस्याएँ उत्पन्न होती हैं। भविष्य की पीढ़ियों के लिए संसाधनों की उपलब्धता भी कम हो जाती है। इसलिए संसाधनों का उपयोग संतुलित और सतत विकास की भावना के अनुरूप होना चाहिए।


प्रश्न 19. भारत में भूमि उपयोग के प्रमुख वर्ग कौन-कौन से हैं?

उत्तर:
भारत में भूमि उपयोग को विभिन्न वर्गों में विभाजित किया गया है। इनमें वन क्षेत्र, कृषि योग्य भूमि, चारागाह भूमि, बंजर भूमि, गैर-कृषि उपयोग की भूमि तथा परती भूमि प्रमुख हैं। भूमि उपयोग का स्वरूप क्षेत्र की भौतिक परिस्थितियों, जनसंख्या घनत्व और आर्थिक गतिविधियों पर निर्भर करता है। कृषि और वन भूमि का उचित प्रबंधन पर्यावरणीय संतुलन बनाए रखने में सहायता करता है। भूमि उपयोग की वैज्ञानिक योजना से संसाधनों का संरक्षण और सतत विकास संभव होता है।


प्रश्न 20. संसाधन संरक्षण क्यों आवश्यक है?

उत्तर:
संसाधन संरक्षण आवश्यक है क्योंकि अधिकांश संसाधन सीमित हैं और उनके अंधाधुंध उपयोग से उनका क्षय हो सकता है। संरक्षण से प्राकृतिक संतुलन बना रहता है और भविष्य की पीढ़ियों के लिए संसाधन सुरक्षित रहते हैं। यह पर्यावरणीय समस्याओं जैसे प्रदूषण, भूमि क्षरण और जल संकट को कम करने में भी सहायक है। संसाधन संरक्षण आर्थिक विकास और पर्यावरणीय सुरक्षा के बीच संतुलन स्थापित करता है। इसलिए सतत विकास के लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए संसाधनों का संरक्षण अत्यंत महत्वपूर्ण है।