CBSE कक्षा 12 समाजशास्त्र (2026-27)
पुस्तक: सामाजिक परिवर्तन एवं भारत में विकास
अध्याय 4: परिवर्तन और औद्योगिक समाज में विकास (Change and Development in Industrial Society)
यह अध्याय औद्योगीकरण, उदारीकरण, रोजगार, श्रम संबंधों, असंगठित क्षेत्र, ट्रेड यूनियनों तथा कार्य परिस्थितियों से संबंधित है।
1. औद्योगीकरण क्या है? इसके दो प्रमुख सामाजिक प्रभाव बताइए।
उत्तर:
औद्योगीकरण वह प्रक्रिया है जिसमें उत्पादन का कार्य मशीनों और कारखानों के माध्यम से बड़े पैमाने पर किया जाता है। इसके परिणामस्वरूप समाज में व्यापक परिवर्तन आते हैं। पहला प्रभाव शहरीकरण है, क्योंकि लोग रोजगार की तलाश में शहरों की ओर पलायन करते हैं। दूसरा प्रभाव सामाजिक संबंधों में परिवर्तन है, जहाँ पारंपरिक संबंधों की जगह औपचारिक और व्यावसायिक संबंध विकसित होते हैं। औद्योगीकरण से शिक्षा, तकनीक और जीवन स्तर में सुधार होता है, लेकिन साथ ही वर्ग असमानता और श्रमिक समस्याएँ भी बढ़ सकती हैं। इस प्रकार औद्योगीकरण सामाजिक विकास और चुनौतियों दोनों को जन्म देता है।
2. संगठित क्षेत्र (Organised Sector) से आप क्या समझते हैं?
उत्तर:
संगठित क्षेत्र उन उद्योगों और संस्थानों को कहा जाता है जो सरकार के नियमों के अनुसार पंजीकृत होते हैं। यहाँ कर्मचारियों को नियमित वेतन, भविष्य निधि (PF), चिकित्सा सुविधा, अवकाश तथा सामाजिक सुरक्षा प्राप्त होती है। इन संस्थानों में श्रम कानूनों का पालन अनिवार्य होता है। कर्मचारियों के अधिकारों की रक्षा के लिए स्पष्ट नियम और प्रक्रियाएँ होती हैं। बैंक, सरकारी कार्यालय तथा बड़े उद्योग इसके उदाहरण हैं। संगठित क्षेत्र श्रमिकों को अपेक्षाकृत सुरक्षित और स्थिर रोजगार प्रदान करता है, जिससे उनका सामाजिक और आर्थिक जीवन अधिक सुरक्षित बनता है।
3. असंगठित क्षेत्र (Unorganised Sector) की प्रमुख विशेषताएँ बताइए।
उत्तर:
असंगठित क्षेत्र में काम करने वाले श्रमिकों को नियमित वेतन, सामाजिक सुरक्षा या कानूनी संरक्षण नहीं मिलता। यहाँ रोजगार अस्थायी होता है और श्रम कानूनों का पालन सीमित रूप से किया जाता है। घरेलू उद्योग, निर्माण कार्य, रिक्शा चालक, घरेलू कामगार आदि इसके उदाहरण हैं। इस क्षेत्र के श्रमिकों को कम मजदूरी, लंबे कार्य घंटे और असुरक्षित कार्य परिस्थितियों का सामना करना पड़ता है। अधिकांश श्रमिकों के पास भविष्य निधि, पेंशन या स्वास्थ्य बीमा जैसी सुविधाएँ नहीं होतीं। इसलिए असंगठित क्षेत्र भारतीय श्रम शक्ति का बड़ा भाग होने के बावजूद अनेक सामाजिक और आर्थिक समस्याओं से जुड़ा हुआ है।
4. उदारीकरण (Liberalisation) क्या है?
उत्तर:
उदारीकरण वह आर्थिक नीति है जिसके अंतर्गत सरकार उद्योगों और व्यापार पर नियंत्रण कम करती है तथा निजी और विदेशी निवेश को प्रोत्साहित करती है। भारत में 1991 के आर्थिक सुधारों के बाद उदारीकरण को बढ़ावा मिला। इससे उद्योगों में प्रतिस्पर्धा बढ़ी, नई तकनीकों का प्रवेश हुआ और रोजगार के नए अवसर उत्पन्न हुए। दूसरी ओर, कुछ क्षेत्रों में रोजगार की असुरक्षा भी बढ़ी और श्रमिकों पर दबाव बढ़ा। उदारीकरण ने भारतीय अर्थव्यवस्था को वैश्विक बाजार से जोड़ने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई तथा औद्योगिक विकास की गति को तेज किया।
5. वैश्वीकरण का भारतीय उद्योगों पर क्या प्रभाव पड़ा?
उत्तर:
वैश्वीकरण के कारण भारतीय उद्योग विश्व बाजार से जुड़ गए। विदेशी कंपनियों के आगमन से प्रतिस्पर्धा बढ़ी और नई तकनीकों का विकास हुआ। इससे उत्पादन की गुणवत्ता और दक्षता में सुधार आया। अनेक क्षेत्रों में रोजगार के अवसर बढ़े, विशेषकर सूचना प्रौद्योगिकी और सेवा क्षेत्र में। दूसरी ओर, छोटे उद्योगों को बड़ी बहुराष्ट्रीय कंपनियों से प्रतिस्पर्धा करनी पड़ी। कई उद्योगों में ठेका श्रम और अस्थायी रोजगार बढ़ा। इस प्रकार वैश्वीकरण ने भारतीय उद्योगों को आधुनिक बनाया, लेकिन श्रमिकों के लिए नई चुनौतियाँ भी उत्पन्न कीं।
6. श्रम विभाजन (Division of Labour) क्या है?
उत्तर:
श्रम विभाजन वह व्यवस्था है जिसमें उत्पादन प्रक्रिया को अनेक छोटे-छोटे कार्यों में बाँट दिया जाता है और प्रत्येक श्रमिक एक विशेष कार्य करता है। इससे उत्पादन की गति और दक्षता बढ़ती है। औद्योगिक समाज में श्रम विभाजन का विशेष महत्व है क्योंकि बड़े पैमाने पर उत्पादन इसी के माध्यम से संभव होता है। हालांकि, लगातार एक ही कार्य करने से श्रमिकों में एकरसता और कार्य के प्रति उदासीनता भी उत्पन्न हो सकती है। इसलिए श्रम विभाजन उत्पादन वृद्धि के साथ-साथ सामाजिक और मनोवैज्ञानिक प्रभाव भी उत्पन्न करता है।
7. कार्ल मार्क्स के ‘अलगाव’ (Alienation) की अवधारणा समझाइए।
उत्तर:
कार्ल मार्क्स के अनुसार औद्योगिक समाज में श्रमिक अपने कार्य, उत्पाद और स्वयं से अलगाव महसूस करता है। मशीनों पर आधारित उत्पादन में श्रमिक केवल एक छोटा-सा कार्य बार-बार करता है और अंतिम उत्पाद पर उसका नियंत्रण नहीं होता। इससे उसे अपने श्रम का वास्तविक महत्व महसूस नहीं होता। कार्य नीरस और यांत्रिक बन जाता है, जिससे संतोष कम हो जाता है। मार्क्स ने इसे ‘अलगाव’ कहा। यह स्थिति श्रमिकों के मानसिक और सामाजिक जीवन को प्रभावित करती है तथा औद्योगिक समाज की एक महत्वपूर्ण समस्या मानी जाती है।
8. ट्रेड यूनियन क्या है?
उत्तर:
ट्रेड यूनियन श्रमिकों का एक संगठित समूह होता है जो उनके अधिकारों और हितों की रक्षा के लिए कार्य करता है। इसका उद्देश्य उचित मजदूरी, बेहतर कार्य परिस्थितियाँ, नौकरी की सुरक्षा और सामाजिक सुविधाएँ सुनिश्चित करना है। ट्रेड यूनियन सामूहिक सौदेबाजी के माध्यम से नियोक्ताओं के साथ बातचीत करती है। आवश्यकता पड़ने पर हड़ताल या अन्य शांतिपूर्ण आंदोलनों का भी सहारा लिया जाता है। औद्योगिक समाज में ट्रेड यूनियन श्रमिकों और प्रबंधन के बीच संतुलन स्थापित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है तथा श्रमिक कल्याण को बढ़ावा देती है।
9. ठेका श्रम (Contract Labour) क्या है?
उत्तर:
ठेका श्रम वह व्यवस्था है जिसमें श्रमिकों को सीधे कंपनी द्वारा नियुक्त न करके ठेकेदार के माध्यम से नियुक्त किया जाता है। ऐसे श्रमिकों को सामान्यतः स्थायी कर्मचारियों की तुलना में कम सुविधाएँ और कम सुरक्षा प्राप्त होती है। कंपनियाँ लागत कम करने और लचीलापन बढ़ाने के लिए इस व्यवस्था को अपनाती हैं। वैश्वीकरण और उदारीकरण के बाद ठेका श्रम का प्रयोग बढ़ा है। इससे रोजगार के अवसर तो बढ़े हैं, लेकिन श्रमिकों की नौकरी की सुरक्षा और सामाजिक सुरक्षा में कमी आई है।
10. घरेलू आधारित कार्य (Home-Based Work) क्या है?
उत्तर:
घरेलू आधारित कार्य वह कार्य है जो श्रमिक अपने घर पर रहकर करता है। बीड़ी बनाना, कढ़ाई, जरी कार्य, कालीन बुनाई आदि इसके उदाहरण हैं। इस प्रकार के कार्य में महिलाएँ और बच्चे बड़ी संख्या में शामिल होते हैं। श्रमिकों को प्रति वस्तु या प्रति पीस के आधार पर भुगतान किया जाता है। अधिकांश घरेलू उद्योग असंगठित क्षेत्र का हिस्सा होते हैं, जहाँ श्रमिकों को सामाजिक सुरक्षा और श्रम कानूनों का लाभ नहीं मिलता। इसलिए यह रोजगार का महत्वपूर्ण स्रोत होने के बावजूद कई चुनौतियों से जुड़ा हुआ है।
11. भारत में लोग नौकरी कैसे प्राप्त करते हैं?
उत्तर:
भारत में नौकरी प्राप्त करने के कई माध्यम हैं। पहले व्यक्तिगत संपर्कों और रिश्तेदारों की सहायता से रोजगार प्राप्त किया जाता था। वर्तमान समय में समाचार पत्र, रोजगार कार्यालय, ऑनलाइन पोर्टल, सोशल मीडिया और भर्ती एजेंसियाँ महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं। कुछ उद्योगों में ठेकेदारों के माध्यम से भी श्रमिकों की भर्ती की जाती है। शिक्षा, तकनीकी कौशल और अनुभव रोजगार प्राप्त करने में महत्वपूर्ण कारक बन गए हैं। आधुनिक औद्योगिक समाज में नौकरी खोजने की प्रक्रिया अधिक प्रतिस्पर्धी और संगठित हो गई है।
12. औद्योगीकरण और शहरीकरण में क्या संबंध है?
उत्तर:
औद्योगीकरण और शहरीकरण एक-दूसरे से घनिष्ठ रूप से जुड़े हैं। जब किसी क्षेत्र में उद्योग स्थापित होते हैं, तो रोजगार के अवसर बढ़ते हैं और लोग वहाँ बसने लगते हैं। इससे शहरों का विस्तार होता है तथा नई आवासीय और व्यावसायिक बस्तियाँ विकसित होती हैं। परिवहन, संचार, शिक्षा और स्वास्थ्य जैसी सुविधाओं का भी विकास होता है। हालांकि, जनसंख्या वृद्धि के कारण आवास की कमी, प्रदूषण और यातायात जैसी समस्याएँ भी उत्पन्न हो सकती हैं। इसलिए औद्योगीकरण शहरी विकास का प्रमुख आधार माना जाता है।
13. कार्य परिस्थितियाँ (Working Conditions) क्यों महत्वपूर्ण हैं?
उत्तर:
कार्य परिस्थितियाँ श्रमिकों के स्वास्थ्य, सुरक्षा और उत्पादकता को प्रभावित करती हैं। यदि कार्यस्थल सुरक्षित, स्वच्छ और सुविधाजनक हो तो श्रमिक अधिक कुशलता से कार्य कर सकते हैं। खराब कार्य परिस्थितियों में दुर्घटनाओं, बीमारियों और मानसिक तनाव की संभावना बढ़ जाती है। उचित वेतन, कार्य समय, विश्राम और सुरक्षा उपकरण भी कार्य परिस्थितियों का हिस्सा हैं। औद्योगिक समाज में श्रमिक कल्याण और उत्पादन वृद्धि के लिए बेहतर कार्य परिस्थितियाँ अत्यंत आवश्यक मानी जाती हैं।
14. हड़ताल (Strike) क्या है?
उत्तर:
हड़ताल श्रमिकों द्वारा अपनी मांगों को मनवाने के लिए कार्य बंद करने की सामूहिक प्रक्रिया है। जब नियोक्ता और श्रमिकों के बीच वेतन, कार्य परिस्थितियों या अन्य मुद्दों पर सहमति नहीं बनती, तब हड़ताल की जाती है। यह श्रमिकों का लोकतांत्रिक अधिकार माना जाता है। हड़ताल का उद्देश्य प्रबंधन का ध्यान समस्याओं की ओर आकर्षित करना और समाधान प्राप्त करना होता है। हालांकि, लंबे समय तक हड़ताल चलने पर उत्पादन और आर्थिक गतिविधियाँ प्रभावित हो सकती हैं।
15. निजीकरण (Privatisation) क्या है?
उत्तर:
निजीकरण वह प्रक्रिया है जिसमें सरकारी स्वामित्व वाले उद्योगों या सेवाओं का नियंत्रण निजी क्षेत्र को सौंप दिया जाता है। इसका उद्देश्य दक्षता बढ़ाना, प्रतिस्पर्धा को प्रोत्साहित करना और सरकारी व्यय को कम करना होता है। निजीकरण के बाद कंपनियाँ अधिक लाभ और उत्पादकता पर ध्यान देती हैं। इससे सेवा गुणवत्ता में सुधार हो सकता है, लेकिन कर्मचारियों की नौकरी की सुरक्षा को लेकर चिंताएँ भी बढ़ सकती हैं। भारत में 1991 के बाद निजीकरण आर्थिक सुधारों का एक महत्वपूर्ण भाग रहा है।
16. औद्योगिक समाज की दो प्रमुख विशेषताएँ बताइए।
उत्तर:
औद्योगिक समाज की पहली प्रमुख विशेषता मशीनों और तकनीक पर आधारित उत्पादन है। उत्पादन बड़े पैमाने पर कारखानों में किया जाता है। दूसरी विशेषता श्रम विभाजन और विशेषीकरण है, जहाँ प्रत्येक व्यक्ति एक विशेष कार्य करता है। इसके अतिरिक्त शहरीकरण, औपचारिक संबंध, उच्च गतिशीलता और शिक्षा का महत्व भी औद्योगिक समाज की पहचान हैं। औद्योगिक समाज आधुनिक आर्थिक विकास और सामाजिक परिवर्तन का आधार माना जाता है।
17. असंगठित क्षेत्र के श्रमिकों की समस्याएँ बताइए।
उत्तर:
असंगठित क्षेत्र के श्रमिकों को कम मजदूरी, अस्थायी रोजगार और सामाजिक सुरक्षा की कमी जैसी समस्याओं का सामना करना पड़ता है। उन्हें भविष्य निधि, पेंशन, चिकित्सा सुविधा और बीमा जैसी सुविधाएँ प्रायः नहीं मिलतीं। कार्यस्थलों पर सुरक्षा व्यवस्था भी अपर्याप्त होती है। कई बार श्रमिकों को लंबे समय तक कार्य करना पड़ता है और श्रम कानूनों का लाभ नहीं मिलता। इन कारणों से उनका आर्थिक और सामाजिक जीवन असुरक्षित बना रहता है।
18. उदारीकरण के बाद रोजगार के स्वरूप में क्या परिवर्तन आए?
उत्तर:
उदारीकरण के बाद भारतीय अर्थव्यवस्था में निजी निवेश और विदेशी कंपनियों की भागीदारी बढ़ी। इससे सूचना प्रौद्योगिकी, सेवा क्षेत्र और संचार उद्योगों में नए रोजगार अवसर उत्पन्न हुए। साथ ही, ठेका श्रम, आउटसोर्सिंग और अस्थायी रोजगार का चलन भी बढ़ा। कंपनियाँ लागत कम करने के लिए स्थायी कर्मचारियों की जगह अनुबंधित कर्मचारियों को नियुक्त करने लगीं। परिणामस्वरूप रोजगार के अवसर तो बढ़े, लेकिन नौकरी की सुरक्षा और श्रमिक कल्याण संबंधी चुनौतियाँ भी सामने आईं।
19. आउटसोर्सिंग (Outsourcing) क्या है?
उत्तर:
आउटसोर्सिंग वह प्रक्रिया है जिसमें कोई कंपनी अपने कुछ कार्य किसी बाहरी संस्था या एजेंसी को सौंप देती है। इसका उद्देश्य लागत कम करना और दक्षता बढ़ाना होता है। उदाहरण के लिए, ग्राहक सेवा, डेटा प्रबंधन या तकनीकी सहायता का कार्य दूसरी कंपनियों को दिया जा सकता है। वैश्वीकरण के दौर में आउटसोर्सिंग का महत्व बढ़ा है। इससे रोजगार के नए अवसर पैदा हुए हैं, लेकिन कई बार स्थायी रोजगार की जगह अस्थायी कार्य व्यवस्था को बढ़ावा मिला है।
20. औद्योगिक विकास का समाज पर सकारात्मक प्रभाव बताइए।
उत्तर:
औद्योगिक विकास ने समाज में आर्थिक प्रगति और तकनीकी उन्नति को बढ़ावा दिया है। इससे रोजगार के अवसर बढ़े, उत्पादन क्षमता में वृद्धि हुई और जीवन स्तर में सुधार आया। शिक्षा, परिवहन, संचार और स्वास्थ्य सेवाओं का विस्तार भी औद्योगिक विकास का परिणाम है। लोगों को नई तकनीकों और आधुनिक जीवन शैली का लाभ मिला है। इसके साथ ही महिलाओं की कार्यक्षेत्र में भागीदारी बढ़ी है और सामाजिक गतिशीलता को प्रोत्साहन मिला है। इसलिए औद्योगिक विकास आधुनिक समाज के निर्माण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।
