CBSE कक्षा 12 समाजशास्त्र (Indian Society)

अध्याय 4 – सामाजिक असमानता के प्रतिमान (Patterns of Social Inequality and Exclusion)

यह अध्याय सामाजिक असमानता, सामाजिक बहिष्करण, जाति, जनजाति, अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC), महिलाओं तथा दिव्यांग व्यक्तियों के संघर्षों पर आधारित है।


1. सामाजिक असमानता क्या है?

उत्तर:
सामाजिक असमानता वह स्थिति है जिसमें समाज के विभिन्न व्यक्तियों या समूहों को संसाधनों, अवसरों और अधिकारों तक समान पहुँच प्राप्त नहीं होती। यह असमानता आर्थिक, सामाजिक, शैक्षिक तथा राजनीतिक रूपों में दिखाई देती है। समाज में जाति, लिंग, धर्म, वर्ग और जनजातीय पहचान के आधार पर लोगों के साथ भिन्न व्यवहार किया जाता है। सामाजिक असमानता जन्म से प्राप्त स्थिति तथा सामाजिक संरचना से जुड़ी होती है। इसके कारण कुछ समूह विशेषाधिकार प्राप्त कर लेते हैं जबकि अन्य समूह वंचित रह जाते हैं। इसलिए समान अवसरों की व्यवस्था और सामाजिक न्याय की स्थापना आवश्यक मानी जाती है।


2. सामाजिक बहिष्करण (Social Exclusion) से क्या अभिप्राय है?

उत्तर:
सामाजिक बहिष्करण वह प्रक्रिया है जिसके अंतर्गत कुछ व्यक्तियों या समूहों को समाज के मुख्यधारा के अवसरों, संस्थाओं और गतिविधियों से अलग रखा जाता है। यह बहिष्करण जाति, लिंग, धर्म, विकलांगता या आर्थिक स्थिति के आधार पर हो सकता है। बहिष्कृत समूहों को शिक्षा, रोजगार, स्वास्थ्य और राजनीतिक भागीदारी में कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है। सामाजिक बहिष्करण केवल व्यक्तिगत भेदभाव नहीं बल्कि सामाजिक संरचनाओं में निहित होता है। इससे समाज में असमानता और अन्याय बढ़ता है। सामाजिक समावेशन के माध्यम से इस समस्या को कम किया जा सकता है।


3. सामाजिक स्तरीकरण (Social Stratification) क्या है?

उत्तर:
सामाजिक स्तरीकरण समाज को विभिन्न स्तरों या श्रेणियों में बाँटने की प्रक्रिया है। इन स्तरों का निर्धारण जाति, वर्ग, शक्ति, प्रतिष्ठा और संपत्ति के आधार पर होता है। स्तरीकरण के कारण समाज में कुछ समूह उच्च स्थान प्राप्त करते हैं जबकि अन्य समूह निम्न स्तर पर रहते हैं। यह व्यवस्था पीढ़ी-दर-पीढ़ी चलती रहती है और जीवन के अवसरों को प्रभावित करती है। भारतीय समाज में जाति व्यवस्था सामाजिक स्तरीकरण का प्रमुख उदाहरण है। सामाजिक स्तरीकरण असमानता को स्थायी बनाता है और समाज में संसाधनों के असमान वितरण को बढ़ावा देता है।


4. जाति व्यवस्था असमानता को कैसे बनाए रखती है?

उत्तर:
जाति व्यवस्था जन्म आधारित सामाजिक व्यवस्था है जिसमें व्यक्ति की सामाजिक स्थिति जन्म के साथ निर्धारित हो जाती है। इसमें ऊँच-नीच, शुद्धता-अशुद्धता तथा सामाजिक दूरी जैसी धारणाएँ शामिल होती हैं। जाति के आधार पर विवाह, भोजन और व्यवसाय संबंधी नियम बनाए गए। निम्न जातियों को शिक्षा, धार्मिक स्थलों तथा सामाजिक संसाधनों से वंचित रखा गया। इस कारण सामाजिक गतिशीलता सीमित रही और असमानता पीढ़ियों तक बनी रही। आधुनिक भारत में संवैधानिक प्रावधानों और आरक्षण नीतियों के माध्यम से जातिगत असमानताओं को कम करने का प्रयास किया जा रहा है।


5. अनुसूचित जातियों के संघर्षों का महत्व बताइए।

उत्तर:
अनुसूचित जातियों ने सदियों से चली आ रही अस्पृश्यता, भेदभाव और सामाजिक बहिष्करण के विरुद्ध संघर्ष किया है। इन संघर्षों का उद्देश्य समान अधिकार, सम्मान और अवसर प्राप्त करना था। शिक्षा, राजनीतिक प्रतिनिधित्व और आरक्षण जैसी सुविधाओं ने उनकी स्थिति सुधारने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। सामाजिक आंदोलनों और संवैधानिक प्रावधानों ने दलित समुदाय को सशक्त बनाया। इन संघर्षों ने भारतीय लोकतंत्र में सामाजिक न्याय की अवधारणा को मजबूत किया। आज भी समानता और सम्मान प्राप्त करने के लिए जागरूकता तथा संगठनात्मक प्रयास जारी हैं।


6. अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) कौन हैं?

उत्तर:
अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) उन सामाजिक समूहों को कहा जाता है जो सामाजिक और शैक्षिक दृष्टि से पिछड़े माने जाते हैं। ये समूह अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति की श्रेणी में नहीं आते, लेकिन ऐतिहासिक रूप से वंचना और पिछड़ेपन का सामना करते रहे हैं। सरकार ने इनके उत्थान के लिए शिक्षा और सरकारी नौकरियों में आरक्षण की व्यवस्था की है। मंडल आयोग की सिफारिशों के आधार पर OBC को विशेष अवसर प्रदान किए गए। इससे उनकी सामाजिक और आर्थिक स्थिति में सुधार लाने का प्रयास किया गया है।


7. जनजातियों (Tribes) को सामाजिक असमानता का सामना क्यों करना पड़ता है?

उत्तर:
जनजातीय समुदाय मुख्यतः दूरस्थ और वन क्षेत्रों में निवास करते हैं। विकास परियोजनाओं, खनन तथा वन नीतियों के कारण उन्हें विस्थापन और संसाधनों की हानि का सामना करना पड़ा। शिक्षा, स्वास्थ्य और रोजगार की सुविधाओं तक उनकी पहुँच सीमित रही है। मुख्यधारा समाज में उनकी संस्कृति और पहचान को अक्सर पर्याप्त सम्मान नहीं मिलता। इन कारणों से वे सामाजिक और आर्थिक रूप से पिछड़े रह गए हैं। सरकार द्वारा विशेष योजनाओं और संवैधानिक सुरक्षा के माध्यम से उनकी स्थिति सुधारने के प्रयास किए जा रहे हैं।


8. आदिवासी संघर्षों के प्रमुख कारण क्या हैं?

उत्तर:
आदिवासी संघर्षों का मुख्य कारण भूमि, जंगल और जल जैसे प्राकृतिक संसाधनों पर अधिकार का प्रश्न है। विकास परियोजनाओं, बाँधों, उद्योगों तथा खनन कार्यों के कारण अनेक आदिवासी समुदायों को अपने पारंपरिक निवास स्थान छोड़ने पड़े। इससे उनकी आजीविका और सांस्कृतिक पहचान प्रभावित हुई। आदिवासी समुदाय अपने अधिकारों, संसाधनों की सुरक्षा और सांस्कृतिक स्वायत्तता के लिए संघर्ष करते हैं। ये आंदोलन सामाजिक न्याय और समान विकास की माँग को भी व्यक्त करते हैं। इसलिए आदिवासी संघर्ष भारतीय समाज में महत्वपूर्ण सामाजिक आंदोलनों का हिस्सा माने जाते हैं।


9. महिलाओं के समानता आंदोलन का उद्देश्य क्या है?

उत्तर:
महिलाओं के समानता आंदोलन का उद्देश्य महिलाओं को पुरुषों के समान अधिकार, अवसर और सम्मान दिलाना है। यह आंदोलन शिक्षा, रोजगार, संपत्ति, राजनीतिक भागीदारी तथा सामाजिक स्वतंत्रता के क्षेत्रों में समानता की माँग करता है। लंबे समय तक महिलाओं को पितृसत्तात्मक व्यवस्था के कारण अनेक प्रकार के भेदभाव का सामना करना पड़ा। महिला आंदोलनों ने बाल विवाह, दहेज, घरेलू हिंसा और लैंगिक असमानता जैसे मुद्दों को उठाया। इन प्रयासों से महिलाओं की स्थिति में सुधार हुआ तथा समाज में लैंगिक न्याय की भावना मजबूत हुई।


10. पितृसत्ता (Patriarchy) क्या है?

उत्तर:
पितृसत्ता वह सामाजिक व्यवस्था है जिसमें पुरुषों को परिवार और समाज में प्रमुख अधिकार प्राप्त होते हैं। इस व्यवस्था में महिलाओं की भूमिका सीमित मानी जाती है और निर्णय लेने की शक्ति मुख्यतः पुरुषों के हाथों में रहती है। पितृसत्ता महिलाओं की शिक्षा, रोजगार और स्वतंत्रता को प्रभावित कर सकती है। यह व्यवस्था लैंगिक असमानता को बढ़ावा देती है। आधुनिक समाज में शिक्षा, कानून और महिला आंदोलनों के माध्यम से पितृसत्तात्मक सोच को चुनौती दी जा रही है। लैंगिक समानता स्थापित करने के लिए पितृसत्ता की सीमाओं को समझना आवश्यक है।


11. दिव्यांग व्यक्तियों को किन समस्याओं का सामना करना पड़ता है?

उत्तर:
दिव्यांग व्यक्तियों को समाज में अनेक प्रकार की चुनौतियों का सामना करना पड़ता है। उन्हें शिक्षा, रोजगार, परिवहन और सार्वजनिक सुविधाओं तक पहुँच में कठिनाई होती है। कई बार समाज में उनके प्रति पूर्वाग्रह और नकारात्मक दृष्टिकोण भी देखने को मिलता है। इससे उनका सामाजिक समावेशन प्रभावित होता है। आधुनिक समय में ‘दिव्यांगता’ को केवल शारीरिक कमी नहीं बल्कि सामाजिक बाधाओं का परिणाम माना जाता है। सरकार और समाज द्वारा समावेशी शिक्षा, आरक्षण तथा विशेष सुविधाओं के माध्यम से उनके अधिकारों की रक्षा की जा रही है।


12. सामाजिक पूँजी (Social Capital) क्या है?

उत्तर:
सामाजिक पूँजी से तात्पर्य व्यक्ति के सामाजिक संबंधों, नेटवर्क और संपर्कों से है। ये संबंध व्यक्ति को अवसर प्राप्त करने, सहयोग पाने तथा सामाजिक प्रतिष्ठा अर्जित करने में सहायता करते हैं। जिन लोगों के पास मजबूत सामाजिक नेटवर्क होते हैं, उन्हें शिक्षा, रोजगार और अन्य संसाधनों तक पहुँच आसान हो जाती है। सामाजिक पूँजी समाज में अवसरों के वितरण को प्रभावित करती है। यह आर्थिक पूँजी और सांस्कृतिक पूँजी के साथ मिलकर व्यक्ति की सामाजिक स्थिति को निर्धारित करती है।


13. सांस्कृतिक पूँजी (Cultural Capital) क्या है?

उत्तर:
सांस्कृतिक पूँजी से आशय उन ज्ञान, कौशल, शैक्षिक योग्यताओं और सांस्कृतिक मूल्यों से है जो व्यक्ति को समाज में सम्मान और अवसर दिलाते हैं। अच्छी शिक्षा, भाषा का ज्ञान, सांस्कृतिक व्यवहार तथा सामाजिक शिष्टाचार इसके प्रमुख तत्व हैं। जिन व्यक्तियों के पास अधिक सांस्कृतिक पूँजी होती है, उन्हें सामाजिक और व्यावसायिक जीवन में लाभ मिलता है। यह पूँजी परिवार और शैक्षणिक संस्थाओं के माध्यम से प्राप्त होती है। सांस्कृतिक पूँजी सामाजिक असमानता को बनाए रखने या कम करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है।


14. आर्थिक पूँजी क्या है?

उत्तर:
आर्थिक पूँजी से तात्पर्य धन, संपत्ति, आय और भौतिक संसाधनों से है। यह व्यक्ति की जीवन-शैली, शिक्षा और अवसरों को प्रभावित करती है। जिन लोगों के पास अधिक आर्थिक पूँजी होती है, वे बेहतर स्वास्थ्य, शिक्षा और रोजगार के अवसर प्राप्त कर सकते हैं। आर्थिक असमानता समाज में वर्ग विभाजन को बढ़ावा देती है। सामाजिक असमानता के कई रूप आर्थिक पूँजी के असमान वितरण से जुड़े होते हैं। इसलिए आर्थिक न्याय सामाजिक समानता की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम माना जाता है।


15. अस्पृश्यता क्या है?

उत्तर:
अस्पृश्यता भारतीय जाति व्यवस्था से जुड़ी एक सामाजिक प्रथा है जिसमें कुछ जातियों को ‘अशुद्ध’ मानकर उनसे सामाजिक दूरी बनाई जाती थी। उन्हें मंदिरों, कुओं और सार्वजनिक स्थानों के उपयोग से वंचित रखा जाता था। यह प्रथा मानव गरिमा और समानता के सिद्धांतों के विरुद्ध है। भारतीय संविधान ने अस्पृश्यता को अपराध घोषित किया है। इसके बावजूद सामाजिक जागरूकता और शिक्षा के माध्यम से इस समस्या को पूरी तरह समाप्त करने के प्रयास जारी हैं। अस्पृश्यता सामाजिक बहिष्करण का प्रमुख उदाहरण है।


16. समानता और सामाजिक न्याय में क्या संबंध है?

उत्तर:
समानता और सामाजिक न्याय एक-दूसरे से घनिष्ठ रूप से जुड़े हैं। समानता का अर्थ है सभी व्यक्तियों को समान अवसर और अधिकार प्रदान करना, जबकि सामाजिक न्याय का उद्देश्य ऐतिहासिक रूप से वंचित समूहों को विशेष सहायता देकर उन्हें बराबरी के स्तर पर लाना है। सामाजिक न्याय के बिना वास्तविक समानता संभव नहीं है। आरक्षण, शिक्षा और कल्याणकारी योजनाएँ सामाजिक न्याय के उदाहरण हैं। इन उपायों के माध्यम से समाज में व्याप्त असमानताओं को कम करने का प्रयास किया जाता है और लोकतांत्रिक मूल्यों को सुदृढ़ किया जाता है।


17. आरक्षण नीति का महत्व क्या है?

उत्तर:
आरक्षण नीति का उद्देश्य ऐतिहासिक रूप से वंचित और पिछड़े वर्गों को शिक्षा, रोजगार और राजनीतिक प्रतिनिधित्व में अवसर प्रदान करना है। यह नीति सामाजिक न्याय और समानता की स्थापना का महत्वपूर्ण साधन है। अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति और अन्य पिछड़ा वर्ग इसके प्रमुख लाभार्थी हैं। आरक्षण के माध्यम से इन समुदायों की भागीदारी बढ़ी है तथा उनकी सामाजिक स्थिति में सुधार हुआ है। यह नीति केवल आर्थिक सहायता नहीं बल्कि सामाजिक भेदभाव को कम करने का भी प्रयास करती है।


18. लैंगिक असमानता क्या है?

उत्तर:
लैंगिक असमानता वह स्थिति है जिसमें पुरुषों और महिलाओं को समान अवसर, अधिकार और संसाधन प्राप्त नहीं होते। यह असमानता शिक्षा, रोजगार, वेतन, राजनीतिक प्रतिनिधित्व और पारिवारिक निर्णयों में दिखाई देती है। पितृसत्तात्मक सोच और सामाजिक रूढ़ियाँ इसके प्रमुख कारण हैं। महिलाओं के प्रति भेदभाव उनके विकास और आत्मनिर्भरता को प्रभावित करता है। शिक्षा, कानूनी सुधार और महिला सशक्तिकरण कार्यक्रमों के माध्यम से लैंगिक असमानता को कम करने का प्रयास किया जा रहा है। समानता पर आधारित समाज के निर्माण के लिए लैंगिक न्याय आवश्यक है।


19. सामाजिक समावेशन (Social Inclusion) क्या है?

उत्तर:
सामाजिक समावेशन वह प्रक्रिया है जिसके माध्यम से समाज के सभी वर्गों को समान अवसर, अधिकार और भागीदारी प्रदान की जाती है। इसका उद्देश्य सामाजिक बहिष्करण और भेदभाव को समाप्त करना है। समावेशन के अंतर्गत शिक्षा, रोजगार, स्वास्थ्य और राजनीतिक प्रक्रियाओं में सभी समूहों की भागीदारी सुनिश्चित की जाती है। विशेष रूप से दलितों, आदिवासियों, महिलाओं और दिव्यांग व्यक्तियों को मुख्यधारा से जोड़ना इसका महत्वपूर्ण लक्ष्य है। सामाजिक समावेशन से लोकतंत्र मजबूत होता है और सामाजिक एकता बढ़ती है।


20. सामाजिक असमानता को कम करने के उपाय बताइए।

उत्तर:
सामाजिक असमानता को कम करने के लिए शिक्षा का प्रसार, सामाजिक जागरूकता, आरक्षण नीति, आर्थिक अवसरों का विस्तार तथा भेदभाव-विरोधी कानूनों का प्रभावी क्रियान्वयन आवश्यक है। महिलाओं, दलितों, आदिवासियों और दिव्यांग व्यक्तियों के सशक्तिकरण पर विशेष ध्यान दिया जाना चाहिए। लोकतांत्रिक मूल्यों, मानवाधिकारों और सामाजिक न्याय की भावना को बढ़ावा देना भी आवश्यक है। सरकार, नागरिक समाज और शैक्षणिक संस्थाओं को मिलकर समावेशी विकास की दिशा में कार्य करना चाहिए। इन उपायों से अधिक समान और न्यायपूर्ण समाज का निर्माण संभव है।