CBSE कक्षा 12 मनोविज्ञान (Psychology)

अध्याय 4 : मनोवैज्ञानिक विकार (Psychological Disorders)

20 महत्वपूर्ण प्रश्न एवं उत्तर

मनोवैज्ञानिक विकार अध्याय में असामान्य व्यवहार, विकारों का वर्गीकरण, कारण तथा प्रमुख विकार जैसे चिंता विकार, अवसाद, सिज़ोफ्रेनिया, OCD, PTSD आदि शामिल हैं। यह अध्याय CBSE 2026–27 पाठ्यक्रम का महत्वपूर्ण भाग है।


1. मनोवैज्ञानिक विकार से क्या तात्पर्य है?

उत्तर:
मनोवैज्ञानिक विकार ऐसी मानसिक स्थिति है जिसमें व्यक्ति के विचार, भावनाएँ और व्यवहार सामान्य सामाजिक मानकों से भिन्न हो जाते हैं तथा उसके दैनिक जीवन में बाधा उत्पन्न करते हैं। ऐसे व्यवहार व्यक्ति को स्वयं या दूसरों के लिए कष्टदायक हो सकते हैं। मनोवैज्ञानिक विकारों की पहचान प्रायः चार D के आधार पर की जाती है—Deviance (विचलन), Distress (कष्ट), Dysfunction (कार्य-असमर्थता) और Danger (खतरा)। जब किसी व्यक्ति का व्यवहार इन विशेषताओं को प्रदर्शित करता है, तब उसे असामान्य माना जा सकता है। इन विकारों के कारण जैविक, मनोवैज्ञानिक तथा सामाजिक कारक हो सकते हैं।


2. असामान्य व्यवहार की ‘चार D’ अवधारणा समझाइए।

उत्तर:
असामान्य व्यवहार की पहचान चार D के माध्यम से की जाती है। पहला, Deviance अर्थात सामाजिक मानकों से विचलन। दूसरा, Distress, जिसमें व्यक्ति स्वयं मानसिक कष्ट अनुभव करता है। तीसरा, Dysfunction, जब व्यक्ति की दैनिक कार्यक्षमता प्रभावित हो जाती है। चौथा, Danger, जिसमें व्यक्ति स्वयं या दूसरों के लिए खतरा बन सकता है। यदि किसी व्यक्ति के व्यवहार में ये विशेषताएँ दिखाई देती हैं, तो उसे असामान्य व्यवहार की श्रेणी में रखा जा सकता है। हालांकि केवल एक विशेषता के आधार पर किसी को मानसिक रोगी नहीं कहा जा सकता; समग्र मूल्यांकन आवश्यक होता है।


3. मनोवैज्ञानिक विकारों के वर्गीकरण का महत्व बताइए।

उत्तर:
मनोवैज्ञानिक विकारों का वर्गीकरण विभिन्न विकारों को व्यवस्थित रूप से समझने और पहचानने में सहायता करता है। इससे चिकित्सकों को सही निदान और उपचार योजना बनाने में सुविधा मिलती है। वर्गीकरण से विभिन्न विकारों के कारणों, लक्षणों और उपचारों का अध्ययन सरल हो जाता है। विश्व स्वास्थ्य संगठन द्वारा ICD तथा अमेरिकन साइकियाट्रिक एसोसिएशन द्वारा DSM प्रणाली विकसित की गई है। इन प्रणालियों के माध्यम से विश्वभर में मानसिक रोगों का समान मानकों के आधार पर निदान किया जाता है।


4. असामान्य व्यवहार के जैविक कारणों का वर्णन कीजिए।

उत्तर:
असामान्य व्यवहार के पीछे कई जैविक कारण हो सकते हैं। इनमें आनुवंशिक दोष, मस्तिष्क की संरचना में परिवर्तन, हार्मोनल असंतुलन तथा न्यूरोट्रांसमीटरों की असामान्य गतिविधि शामिल है। उदाहरण के लिए, सेरोटोनिन की कमी अवसाद से तथा डोपामीन की अधिकता सिज़ोफ्रेनिया से संबंधित मानी जाती है। कुछ मानसिक विकार परिवारों में पीढ़ी-दर-पीढ़ी भी पाए जाते हैं। जैविक कारक व्यक्ति की मानसिक कार्यप्रणाली को प्रभावित करके असामान्य व्यवहार उत्पन्न कर सकते हैं। इसलिए मानसिक रोगों के अध्ययन में जैविक पक्ष का विशेष महत्व है।


5. चिंता विकार (Anxiety Disorder) क्या है?

उत्तर:
चिंता विकार एक ऐसा मानसिक विकार है जिसमें व्यक्ति अत्यधिक और लगातार भय, चिंता या घबराहट अनुभव करता है। सामान्य परिस्थितियों में भी उसे खतरे का आभास हो सकता है। इसके प्रमुख लक्षणों में बेचैनी, तनाव, हृदय गति का बढ़ना, पसीना आना और ध्यान केंद्रित करने में कठिनाई शामिल हैं। यह विकार व्यक्ति के सामाजिक, शैक्षिक और व्यावसायिक जीवन को प्रभावित कर सकता है। सामान्यीकृत चिंता विकार, पैनिक विकार तथा फोबिया इसके प्रमुख प्रकार हैं। उचित उपचार और परामर्श से इसकी तीव्रता कम की जा सकती है।


6. फोबिया क्या है? इसके प्रमुख प्रकार बताइए।

उत्तर:
फोबिया एक चिंता विकार है जिसमें व्यक्ति किसी विशेष वस्तु, परिस्थिति या गतिविधि से अत्यधिक और अवास्तविक भय अनुभव करता है। यह भय वास्तविक खतरे की तुलना में बहुत अधिक होता है। फोबिया के प्रमुख प्रकार हैं—विशिष्ट फोबिया, जिसमें किसी विशेष वस्तु जैसे ऊँचाई या जानवरों से डर लगता है; सामाजिक फोबिया, जिसमें व्यक्ति सामाजिक परिस्थितियों से भयभीत रहता है; तथा एगोरोफोबिया, जिसमें खुले स्थानों या भीड़भाड़ वाले क्षेत्रों का डर होता है। फोबिया व्यक्ति की दैनिक गतिविधियों और सामाजिक जीवन को गंभीर रूप से प्रभावित कर सकता है।


7. OCD (Obsessive-Compulsive Disorder) क्या है?

उत्तर:
OCD अर्थात ऑब्सेसिव-कम्पल्सिव डिसऑर्डर एक मानसिक विकार है जिसमें व्यक्ति के मन में बार-बार अवांछित विचार आते हैं जिन्हें Obsessions कहा जाता है। इन विचारों से उत्पन्न चिंता को कम करने के लिए व्यक्ति कुछ क्रियाएँ बार-बार करता है, जिन्हें Compulsions कहा जाता है। उदाहरण के लिए, बार-बार हाथ धोना, ताले की जाँच करना या सफाई करना। व्यक्ति जानता है कि उसका व्यवहार तर्कसंगत नहीं है, फिर भी वह उसे रोक नहीं पाता। यह विकार व्यक्ति के समय, ऊर्जा और सामाजिक जीवन को प्रभावित करता है।


8. PTSD क्या है?

उत्तर:
PTSD अर्थात पोस्ट-ट्रॉमेटिक स्ट्रेस डिसऑर्डर एक ऐसा विकार है जो किसी अत्यंत भयावह या दर्दनाक घटना के बाद विकसित होता है। दुर्घटना, युद्ध, प्राकृतिक आपदा या हिंसा जैसी घटनाएँ इसका कारण बन सकती हैं। इस विकार से पीड़ित व्यक्ति बार-बार उस घटना को याद करता है, बुरे सपने देखता है तथा अत्यधिक भय और तनाव महसूस करता है। वह ऐसी परिस्थितियों से बचने की कोशिश करता है जो उसे उस घटना की याद दिलाती हों। PTSD व्यक्ति के सामाजिक और भावनात्मक जीवन को गंभीर रूप से प्रभावित कर सकता है।


9. सोमैटिक सिम्पटम विकार क्या है?

उत्तर:
सोमैटिक सिम्पटम विकार में व्यक्ति शारीरिक लक्षणों की शिकायत करता है, लेकिन इन लक्षणों का स्पष्ट चिकित्सकीय कारण नहीं मिलता। व्यक्ति अपने स्वास्थ्य को लेकर अत्यधिक चिंतित रहता है और छोटी समस्याओं को भी गंभीर बीमारी मान सकता है। सिरदर्द, थकान, दर्द या अन्य शारीरिक असुविधाएँ इसके सामान्य लक्षण हैं। यह चिंता व्यक्ति के दैनिक जीवन और मानसिक स्वास्थ्य को प्रभावित करती है। ऐसे मामलों में मनोवैज्ञानिक परामर्श तथा भावनात्मक सहयोग महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।


10. डिसोसिएटिव विकार क्या है?

उत्तर:
डिसोसिएटिव विकार में व्यक्ति की चेतना, स्मृति या पहचान में असामान्य परिवर्तन दिखाई देते हैं। कभी-कभी व्यक्ति अपनी व्यक्तिगत जानकारी भूल सकता है या अपनी पहचान से अलगाव महसूस कर सकता है। यह विकार प्रायः अत्यधिक तनाव या आघातपूर्ण अनुभवों के कारण उत्पन्न होता है। डिसोसिएटिव अम्नेसिया और डिसोसिएटिव आइडेंटिटी डिसऑर्डर इसके प्रमुख उदाहरण हैं। इस विकार में व्यक्ति वास्तविकता और अपनी पहचान के बीच संबंध बनाए रखने में कठिनाई अनुभव करता है।


11. अवसाद (Depression) क्या है?

उत्तर:
अवसाद एक मनोदशा विकार है जिसमें व्यक्ति लंबे समय तक उदासी, निराशा और रुचि की कमी अनुभव करता है। उसे पहले आनंद देने वाली गतिविधियाँ भी आकर्षक नहीं लगतीं। नींद और भूख में परिवर्तन, थकान, आत्मग्लानि तथा ध्यान केंद्रित करने में कठिनाई इसके सामान्य लक्षण हैं। गंभीर स्थिति में आत्महत्या के विचार भी आ सकते हैं। अवसाद केवल सामान्य उदासी नहीं है, बल्कि एक गंभीर मानसिक स्वास्थ्य समस्या है जिसका उपचार संभव है।


12. द्विध्रुवीय विकार (Bipolar Disorder) क्या है?

उत्तर:
द्विध्रुवीय विकार एक मनोदशा विकार है जिसमें व्यक्ति की भावनाएँ अत्यधिक उतार-चढ़ाव से गुजरती हैं। कभी वह अत्यधिक उत्साह, ऊर्जा और आत्मविश्वास की स्थिति में रहता है जिसे मैनिक अवस्था कहते हैं, जबकि कभी गहरे अवसाद में चला जाता है। इन दोनों अवस्थाओं के बीच सामान्य मनोदशा भी हो सकती है। यह विकार व्यक्ति के निर्णय, संबंधों और कार्यक्षमता को प्रभावित करता है। उचित उपचार और दवाओं से इसे नियंत्रित किया जा सकता है।


13. सिज़ोफ्रेनिया क्या है?

उत्तर:
सिज़ोफ्रेनिया एक गंभीर मनोविकारी विकार है जिसमें व्यक्ति की सोच, भावनाएँ और व्यवहार असंगठित हो जाते हैं। उसे वास्तविकता और कल्पना में अंतर करने में कठिनाई होती है। इसके लक्षणों में भ्रम (Delusions), मतिभ्रम (Hallucinations), अव्यवस्थित विचार तथा भावनात्मक अभिव्यक्ति में कमी शामिल हैं। यह विकार व्यक्ति के सामाजिक और व्यावसायिक जीवन को गंभीर रूप से प्रभावित करता है। प्रारंभिक पहचान और उपचार से रोगी की स्थिति में सुधार लाया जा सकता है।


14. भ्रम (Delusion) और मतिभ्रम (Hallucination) में अंतर बताइए।

उत्तर:
भ्रम (Delusion) एक गलत विश्वास है जिसे व्यक्ति बिना किसी वास्तविक प्रमाण के सत्य मानता है। उदाहरण के लिए, यह विश्वास कि लोग उसके विरुद्ध षड्यंत्र कर रहे हैं। दूसरी ओर, मतिभ्रम (Hallucination) ऐसी संवेदनात्मक अनुभूति है जो वास्तव में मौजूद नहीं होती, जैसे आवाजें सुनना या ऐसी चीजें देखना जो वास्तविक नहीं हैं। भ्रम सोच से संबंधित है जबकि मतिभ्रम संवेदनाओं से संबंधित है। दोनों सिज़ोफ्रेनिया के प्रमुख लक्षण माने जाते हैं।


15. न्यूरोडेवलपमेंटल विकार क्या हैं?

उत्तर:
न्यूरोडेवलपमेंटल विकार वे मानसिक विकार हैं जो बाल्यावस्था में मस्तिष्क के विकास से संबंधित समस्याओं के कारण उत्पन्न होते हैं। इनमें बौद्धिक अक्षमता, ऑटिज़्म स्पेक्ट्रम विकार, ADHD तथा विशिष्ट अधिगम विकार शामिल हैं। इन विकारों से प्रभावित बच्चों को सीखने, संचार करने, ध्यान केंद्रित करने तथा सामाजिक संबंध बनाने में कठिनाई हो सकती है। समय पर पहचान और विशेष प्रशिक्षण से उनके विकास में सुधार किया जा सकता है।


16. ADHD पर संक्षिप्त टिप्पणी लिखिए।

उत्तर:
ADHD अर्थात Attention Deficit Hyperactivity Disorder एक न्यूरोडेवलपमेंटल विकार है। इसमें बच्चे को ध्यान केंद्रित करने, शांत बैठने तथा आवेगों को नियंत्रित करने में कठिनाई होती है। ऐसे बच्चे अत्यधिक सक्रिय, जल्दबाज और आसानी से विचलित हो सकते हैं। यह समस्या उनकी पढ़ाई, सामाजिक संबंधों और दैनिक गतिविधियों को प्रभावित करती है। उचित परामर्श, व्यवहार संशोधन तथा शैक्षिक सहयोग द्वारा इसके प्रभाव को कम किया जा सकता है।


17. भोजन एवं खाने से संबंधित विकार क्या हैं?

उत्तर:
भोजन एवं खाने से संबंधित विकार वे मानसिक विकार हैं जिनमें व्यक्ति की खाने की आदतें असामान्य हो जाती हैं। प्रमुख उदाहरण हैं—एनोरेक्सिया नर्वोसा और बुलिमिया नर्वोसा। एनोरेक्सिया में व्यक्ति वजन बढ़ने के डर से भोजन कम कर देता है, जबकि बुलिमिया में अत्यधिक भोजन करने के बाद उसे बाहर निकालने का प्रयास किया जाता है। ये विकार शारीरिक स्वास्थ्य, आत्मसम्मान और मानसिक संतुलन को प्रभावित करते हैं। समय पर उपचार आवश्यक है।


18. नशीले पदार्थों से संबंधित विकार क्या हैं?

उत्तर:
नशीले पदार्थों से संबंधित विकार तब उत्पन्न होते हैं जब व्यक्ति शराब, तंबाकू या अन्य मादक पदार्थों पर निर्भर हो जाता है। ऐसी स्थिति में व्यक्ति इन पदार्थों के बिना सामान्य रूप से कार्य नहीं कर पाता। धीरे-धीरे उसकी शारीरिक, मानसिक और सामाजिक कार्यक्षमता प्रभावित होने लगती है। नशे की लत परिवार, शिक्षा और रोजगार पर भी नकारात्मक प्रभाव डालती है। उचित उपचार, परामर्श और पुनर्वास कार्यक्रम इसके प्रबंधन में सहायक होते हैं।


19. जैव-मनो-सामाजिक मॉडल क्या है?

उत्तर:
जैव-मनो-सामाजिक मॉडल के अनुसार मनोवैज्ञानिक विकार किसी एक कारण से नहीं बल्कि जैविक, मनोवैज्ञानिक और सामाजिक कारकों की संयुक्त क्रिया से उत्पन्न होते हैं। जैविक कारकों में आनुवंशिकता और मस्तिष्क की कार्यप्रणाली शामिल है। मनोवैज्ञानिक कारकों में तनाव, व्यक्तित्व और सीखने के अनुभव आते हैं। सामाजिक कारकों में परिवार, संस्कृति और सामाजिक वातावरण शामिल हैं। यह मॉडल मानसिक विकारों को समझने का व्यापक दृष्टिकोण प्रदान करता है।


20. मनोवैज्ञानिक विकारों की प्रारंभिक पहचान क्यों आवश्यक है?

उत्तर:
मनोवैज्ञानिक विकारों की प्रारंभिक पहचान से समय रहते उपचार शुरू किया जा सकता है, जिससे रोग की गंभीरता कम हो जाती है। प्रारंभिक हस्तक्षेप व्यक्ति की कार्यक्षमता, आत्मविश्वास और सामाजिक संबंधों को बनाए रखने में सहायता करता है। इससे रोग के दीर्घकालिक प्रभावों तथा जटिलताओं को भी रोका जा सकता है। परिवार, विद्यालय और समाज की जागरूकता प्रारंभिक पहचान में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। उचित उपचार और सहयोग से अधिकांश मानसिक विकारों का प्रभावी प्रबंधन संभव है।