यहाँ CBSE कक्षा 12 राजनीति विज्ञान (Politics in India Since Independence) के
अध्याय 2: “एक दल के प्रभुत्व का युग (Era of One-Party Dominance)” से जुड़े
20 महत्वपूर्ण प्रश्न–उत्तर दिए गए हैं। सभी उत्तर परीक्षा के अनुसार सरल, सटीक के भीतर तैयार किए गए हैं।


1. भारत में एक दल के प्रभुत्व का क्या अर्थ है?

उत्तर:
एक दल के प्रभुत्व का अर्थ ऐसी राजनीतिक स्थिति से है जिसमें स्वतंत्रता के बाद शुरुआती वर्षों में कांग्रेस पार्टी लगातार चुनावों में सबसे अधिक सीटें जीतती रही और अन्य विपक्षी दल कमजोर स्थिति में रहे। 1952, 1957 और 1962 के आम चुनावों में कांग्रेस ने स्पष्ट बहुमत प्राप्त किया। इसका कारण संगठनात्मक मजबूती, स्वतंत्रता आंदोलन की विरासत और व्यापक सामाजिक आधार था। इस स्थिति को ‘एक दल का प्रभुत्व’ कहा जाता है, लेकिन यह एक दलीय व्यवस्था नहीं थी, क्योंकि विपक्षी दल भी मौजूद थे और लोकतांत्रिक प्रक्रिया जारी थी।


2. 1952 के चुनावों का क्या महत्व था?

उत्तर:
1952 के आम चुनाव स्वतंत्र भारत के पहले चुनाव थे, जो लोकतंत्र की सफलता का प्रतीक बने। इन चुनावों में लगभग सभी प्रमुख राजनीतिक दलों ने भाग लिया। कांग्रेस ने भारी बहुमत से जीत हासिल की, लेकिन विपक्षी दलों जैसे CPI और सोशलिस्ट पार्टी ने भी अपनी उपस्थिति दर्ज कराई। इन चुनावों ने यह साबित किया कि भारत एक लोकतांत्रिक देश के रूप में सफलतापूर्वक चुनाव करा सकता है। यह चुनाव भारत के राजनीतिक इतिहास में एक मजबूत लोकतांत्रिक आधार स्थापित करने वाला महत्वपूर्ण चरण था।


3. कांग्रेस पार्टी के प्रभुत्व के प्रमुख कारण क्या थे?

उत्तर:
कांग्रेस के प्रभुत्व के कई कारण थे। सबसे पहले, यह स्वतंत्रता आंदोलन से जुड़ी सबसे लोकप्रिय पार्टी थी। दूसरा, इसके पास मजबूत संगठन और राष्ट्रीय स्तर पर व्यापक समर्थन था। तीसरा, इसके नेता जैसे जवाहरलाल नेहरू की लोकप्रियता भी एक बड़ा कारण थी। चौथा, विपक्षी दल कमजोर और विभाजित थे। इसके अलावा, ग्रामीण क्षेत्रों में कांग्रेस की मजबूत पकड़ थी। इन सभी कारणों ने शुरुआती चुनावों में कांग्रेस को लगातार जीत दिलाई और एक दल के प्रभुत्व को स्थापित किया।


4. विपक्षी दलों की भूमिका क्या थी?

उत्तर:
हालांकि शुरुआती वर्षों में कांग्रेस का प्रभुत्व था, फिर भी विपक्षी दलों ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। उन्होंने सरकार की नीतियों की आलोचना की और लोकतंत्र को जीवंत बनाए रखा। भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी, समाजवादी पार्टी और जनसंघ जैसे दलों ने वैकल्पिक विचारधाराएँ प्रस्तुत कीं। विपक्ष ने जनता की समस्याओं को उठाया और सरकार को जवाबदेह बनाया। इससे लोकतंत्र में बहस और विचार-विमर्श की परंपरा मजबूत हुई।


5. भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी की भूमिका क्या थी?

उत्तर:
भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (CPI) 1950 के दशक में दूसरी सबसे बड़ी पार्टी के रूप में उभरी। इसने मजदूरों और किसानों के अधिकारों के लिए संघर्ष किया। 1957 में केरल में CPI की सरकार बनी, जो भारत में पहली लोकतांत्रिक रूप से चुनी गई कम्युनिस्ट सरकार थी। इसने सामाजिक न्याय और भूमि सुधारों पर जोर दिया। हालांकि राष्ट्रीय स्तर पर इसका प्रभाव सीमित रहा, लेकिन क्षेत्रीय राजनीति में इसकी महत्वपूर्ण भूमिका रही।


6. जनसंघ की विचारधारा क्या थी?

उत्तर:
भारतीय जनसंघ की स्थापना 1951 में श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने की थी। इसकी विचारधारा ‘एक देश, एक संस्कृति और एक राष्ट्र’ पर आधारित थी। यह पार्टी हिंदू राष्ट्रवाद और सांस्कृतिक एकता की समर्थक थी। यह कांग्रेस की नीतियों का विरोध करती थी और मजबूत राष्ट्रवाद पर जोर देती थी। हालांकि शुरुआती दौर में इसका प्रभाव सीमित था, लेकिन बाद में यह भारतीय राजनीति में महत्वपूर्ण पार्टी बनी।


7. एक पार्टी प्रभुत्व लोकतंत्र के लिए लाभकारी था या नहीं?

उत्तर:
एक दल का प्रभुत्व लोकतंत्र के लिए मिश्रित प्रभाव वाला था। एक ओर, इसने स्थिर सरकार और नीतिगत निरंतरता प्रदान की, जिससे राष्ट्र निर्माण आसान हुआ। दूसरी ओर, विपक्ष कमजोर होने से आलोचना की कमी रही। हालांकि लोकतंत्र पूरी तरह कार्यशील रहा क्योंकि चुनाव निष्पक्ष होते थे और विपक्ष मौजूद था। इसलिए इसे पूर्ण रूप से सकारात्मक या नकारात्मक नहीं कहा जा सकता।


8. प्रथम तीन चुनावों में कांग्रेस की जीत का क्या कारण था?

उत्तर:
प्रथम तीन चुनावों में कांग्रेस की जीत के पीछे कई कारण थे। स्वतंत्रता आंदोलन में इसकी भूमिका सबसे महत्वपूर्ण थी। नेहरू जैसे लोकप्रिय नेता जनता में विश्वास पैदा करते थे। विपक्षी दल कमजोर और बिखरे हुए थे। इसके अलावा, प्रशासनिक अनुभव और ग्रामीण समर्थन ने कांग्रेस को मजबूत बनाया। यही कारण था कि 1952, 1957 और 1962 में कांग्रेस ने लगातार बहुमत प्राप्त किया।


9. भारत में लोकतंत्र की स्थापना में चुनावों का क्या महत्व था?

उत्तर:
चुनावों ने भारत में लोकतंत्र को मजबूत आधार दिया। 1952 के चुनावों ने यह साबित किया कि एक विशाल और विविध देश में भी लोकतांत्रिक प्रक्रिया सफल हो सकती है। चुनावों ने जनता को राजनीतिक भागीदारी का अवसर दिया। इससे सरकार जनता के प्रति जवाबदेह बनी। यह प्रक्रिया लोकतंत्र की जड़ें मजबूत करने में सहायक रही।


10. एक दल प्रभुत्व को ‘अर्ध-प्रतिस्पर्धी प्रणाली’ क्यों कहा जाता है?

उत्तर:
इसे अर्ध-प्रतिस्पर्धी प्रणाली इसलिए कहा जाता है क्योंकि इसमें चुनाव होते थे और विपक्षी दल भी मौजूद थे, लेकिन कांग्रेस का प्रभुत्व इतना अधिक था कि अन्य दल उसे चुनौती नहीं दे पाते थे। इसलिए यह न तो पूर्ण एकदलीय व्यवस्था थी और न ही पूर्ण बहुदलीय प्रतिस्पर्धा। यह स्थिति संतुलित राजनीतिक प्रतिस्पर्धा की बजाय एकतरफा प्रभुत्व जैसी थी।


11. कांग्रेस पार्टी को ‘सर्वव्यापी दल’ क्यों कहा गया?

उत्तर:
कांग्रेस को सर्वव्यापी दल इसलिए कहा गया क्योंकि इसमें विभिन्न वर्गों, जातियों, धर्मों और क्षेत्रों के लोग शामिल थे। यह स्वतंत्रता आंदोलन से जुड़ी थी, इसलिए इसे व्यापक जनसमर्थन प्राप्त था। इसमें विचारधारा की विविधता थी, जिससे यह सभी वर्गों को साथ लेकर चलती थी। यही कारण था कि यह राष्ट्रीय स्तर पर सबसे प्रभावशाली पार्टी बनी।


12. केरल में 1957 की सरकार का महत्व क्या था?

उत्तर:
1957 में केरल में CPI की सरकार बनी, जो स्वतंत्र भारत की पहली गैर-कांग्रेसी सरकार थी। इसका नेतृत्व ई.एम.एस. नंबूदरीपाद ने किया। इस सरकार ने भूमि सुधार और सामाजिक न्याय के क्षेत्र में महत्वपूर्ण कदम उठाए। यह घटना भारतीय लोकतंत्र में राजनीतिक विविधता का प्रतीक थी।


13. एक दल प्रभुत्व के दौर में लोकतंत्र कैसे कायम रहा?

उत्तर:
हालांकि कांग्रेस का प्रभुत्व था, फिर भी लोकतंत्र कायम रहा क्योंकि नियमित चुनाव होते थे, विपक्षी दल सक्रिय थे और नागरिक स्वतंत्रता मौजूद थी। चुनाव आयोग स्वतंत्र था। सत्ता परिवर्तन की संभावना भी बनी रहती थी। इसलिए यह लोकतांत्रिक व्यवस्था के भीतर एक विशेष राजनीतिक स्थिति थी।


14. भारत के पहले चुनाव आयोग का महत्व क्या था?

उत्तर:
चुनाव आयोग ने स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव कराने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। इसके पहले मुख्य चुनाव आयुक्त सुकुमार सेन थे। आयोग ने मतदाता सूची तैयार की और विशाल चुनाव प्रक्रिया का सफल संचालन किया। इससे भारत में लोकतंत्र की नींव मजबूत हुई।


15. एक दल प्रभुत्व की मुख्य विशेषताएँ क्या थीं?

उत्तर:
इस प्रणाली की मुख्य विशेषताएँ थीं—कांग्रेस का लगातार बहुमत, विपक्ष की कमजोरी, लोकतांत्रिक चुनावों की उपस्थिति और व्यापक जनसमर्थन। यह व्यवस्था एक स्थिर लेकिन असंतुलित राजनीतिक प्रतिस्पर्धा को दर्शाती थी।


16. भारत में राजनीतिक प्रतिस्पर्धा कैसे विकसित हुई?

उत्तर:
प्रारंभ में कांग्रेस का प्रभुत्व था, लेकिन समय के साथ क्षेत्रीय और वैचारिक दल उभरने लगे। विपक्ष मजबूत हुआ और 1967 के बाद कांग्रेस की स्थिति कमजोर होने लगी। इससे बहुदलीय प्रतिस्पर्धा का विकास हुआ।


17. क्षेत्रीय दलों की भूमिका क्या थी?

उत्तर:
क्षेत्रीय दलों ने स्थानीय मुद्दों को उठाया और क्षेत्रीय पहचान को मजबूत किया। उन्होंने राष्ट्रीय राजनीति में विविधता लाई और केंद्र सरकार को जवाबदेह बनाया। इससे भारतीय राजनीति अधिक बहुदलीय और लोकतांत्रिक बनी।


18. 1967 का चुनाव क्यों महत्वपूर्ण था?

उत्तर:
1967 के चुनावों में कांग्रेस को कई राज्यों में हार का सामना करना पड़ा। इससे एक दल के प्रभुत्व का अंत शुरू हुआ और गठबंधन राजनीति का उदय हुआ। यह भारतीय राजनीति में बड़ा परिवर्तन था।


19. भारतीय लोकतंत्र की सबसे बड़ी उपलब्धि क्या थी?

उत्तर:
सबसे बड़ी उपलब्धि यह थी कि भारत ने स्वतंत्रता के तुरंत बाद लोकतांत्रिक प्रणाली को सफलतापूर्वक अपनाया। नियमित चुनाव, शांतिपूर्ण सत्ता परिवर्तन और जनता की भागीदारी इसकी प्रमुख उपलब्धियाँ हैं।


20. एक दल प्रभुत्व के दौर का समापन कैसे हुआ?

उत्तर:
1967 के बाद कांग्रेस का प्रभुत्व कमजोर होने लगा और विपक्षी दल मजबूत हुए। क्षेत्रीय दलों का उदय हुआ और गठबंधन सरकारों का दौर शुरू हुआ। इस प्रकार एक दल प्रभुत्व का युग समाप्त हुआ।