CBSE कक्षा 12 राजनीति विज्ञान (Contemporary World Politics)

अध्याय 1 : द्विध्रुवीयता का अंत (The End of Bipolarity)

20 महत्वपूर्ण प्रश्न एवं उत्तर

यह अध्याय सोवियत संघ के विघटन, शीत युद्ध की समाप्ति, गोर्बाचेव के सुधारों, शॉक थेरेपी तथा भारत-रूस संबंधों पर केंद्रित है।


1. द्विध्रुवीयता (Bipolarity) से क्या आशय है?

उत्तर:
द्विध्रुवीयता उस अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था को कहा जाता है जिसमें विश्व राजनीति दो महाशक्तियों के प्रभाव में विभाजित होती है। द्वितीय विश्व युद्ध के बाद अमेरिका और सोवियत संघ दो प्रमुख शक्ति केंद्र बन गए। दोनों की विचारधाराएँ अलग थीं—अमेरिका पूँजीवाद और लोकतंत्र का समर्थक था, जबकि सोवियत संघ समाजवाद और साम्यवादी व्यवस्था का पक्षधर था। इनके बीच राजनीतिक, आर्थिक और सैन्य प्रतिस्पर्धा ने विश्व को दो गुटों में बाँट दिया। इस व्यवस्था को द्विध्रुवीय विश्व व्यवस्था कहा गया। 1991 में सोवियत संघ के विघटन के साथ यह व्यवस्था समाप्त हो गई।


2. सोवियत प्रणाली की दो प्रमुख विशेषताएँ लिखिए।

उत्तर:
सोवियत प्रणाली समाजवादी विचारधारा पर आधारित थी। इसकी पहली विशेषता यह थी कि उत्पादन के साधनों पर राज्य का नियंत्रण था तथा निजी संपत्ति को सीमित महत्व दिया जाता था। दूसरी विशेषता यह थी कि वहाँ एक-दलीय राजनीतिक व्यवस्था थी, जिसमें साम्यवादी दल का प्रभुत्व था। सरकार का उद्देश्य सामाजिक और आर्थिक समानता स्थापित करना था। शिक्षा, स्वास्थ्य तथा रोजगार जैसी मूलभूत सुविधाएँ राज्य द्वारा उपलब्ध कराई जाती थीं। प्रारंभिक वर्षों में इस व्यवस्था ने तीव्र औद्योगिक विकास और सामाजिक सुरक्षा प्रदान की, परंतु बाद में इसकी कठोरता और आर्थिक अक्षमता समस्याओं का कारण बनी।


3. मिखाइल गोर्बाचेव द्वारा शुरू किए गए सुधारों का वर्णन कीजिए।

उत्तर:
मिखाइल गोर्बाचेव ने 1985 में सोवियत संघ को मजबूत बनाने के लिए दो प्रमुख सुधार आरंभ किए—ग्लासनोस्त (खुलापन) और पेरेस्त्रोइका (पुनर्गठन)। ग्लासनोस्त का उद्देश्य शासन में पारदर्शिता बढ़ाना और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता देना था। पेरेस्त्रोइका के अंतर्गत आर्थिक सुधारों को लागू किया गया ताकि उत्पादन और दक्षता बढ़ सके। इन सुधारों से लोगों को अधिक स्वतंत्रता मिली, लेकिन साथ ही सरकार की कमजोरियाँ भी उजागर हुईं। विभिन्न गणराज्यों में राष्ट्रवादी आंदोलन तेज हुए और अंततः सोवियत संघ का विघटन हो गया।


4. ग्लासनोस्त क्या था?

उत्तर:
ग्लासनोस्त का अर्थ है “खुलापन”। यह नीति मिखाइल गोर्बाचेव ने 1985 के बाद लागू की थी। इसका उद्देश्य सोवियत शासन को अधिक पारदर्शी और उत्तरदायी बनाना था। इस नीति के अंतर्गत नागरिकों को सरकार की आलोचना करने, स्वतंत्र विचार व्यक्त करने और मीडिया को अपेक्षाकृत अधिक स्वतंत्रता देने की अनुमति दी गई। परिणामस्वरूप जनता को शासन की वास्तविक स्थिति और आर्थिक समस्याओं की जानकारी मिलने लगी। इससे लोकतांत्रिक चेतना बढ़ी, लेकिन साथ ही सरकार के प्रति असंतोष भी बढ़ा। यही कारण था कि ग्लासनोस्त ने सोवियत संघ के विघटन की प्रक्रिया को तेज करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।


5. पेरेस्त्रोइका से क्या अभिप्राय है?

उत्तर:
पेरेस्त्रोइका का अर्थ है “पुनर्गठन”। यह सोवियत अर्थव्यवस्था और प्रशासनिक व्यवस्था में सुधार लाने की नीति थी। गोर्बाचेव ने महसूस किया कि केंद्रीयकृत अर्थव्यवस्था प्रभावी ढंग से काम नहीं कर रही थी, इसलिए उन्होंने कुछ बाजारोन्मुख सुधारों को लागू किया। उद्योगों को अधिक स्वायत्तता दी गई तथा उत्पादन बढ़ाने के प्रयास किए गए। हालांकि इन सुधारों से अपेक्षित सफलता नहीं मिली। आर्थिक संकट और राजनीतिक अस्थिरता बढ़ती गई। परिणामस्वरूप लोगों का विश्वास कम हुआ और विभिन्न गणराज्यों में अलगाववादी आंदोलनों को बल मिला। इस प्रकार पेरेस्त्रोइका अप्रत्यक्ष रूप से सोवियत संघ के विघटन का कारण बनी।


6. सोवियत संघ के विघटन के कोई दो कारण बताइए।

उत्तर:
सोवियत संघ के विघटन के प्रमुख कारणों में पहला आर्थिक संकट था। केंद्रीकृत अर्थव्यवस्था उत्पादन और विकास की आवश्यकताओं को पूरा नहीं कर पा रही थी। दूसरा कारण विभिन्न गणराज्यों में बढ़ता राष्ट्रवाद था। कई गणराज्य स्वतंत्रता की मांग करने लगे थे। इसके अतिरिक्त गोर्बाचेव के सुधारों ने राजनीतिक स्वतंत्रता को बढ़ावा दिया, जिससे सरकार की कमजोरियाँ सामने आईं। जनता में असंतोष बढ़ा और साम्यवादी शासन की पकड़ कमजोर हो गई। अंततः दिसंबर 1991 में सोवियत संघ टूट गया और कई स्वतंत्र राष्ट्र अस्तित्व में आए।


7. सोवियत संघ के विघटन के दो प्रमुख परिणाम लिखिए।

उत्तर:
सोवियत संघ के विघटन का पहला प्रमुख परिणाम शीत युद्ध की समाप्ति था। इससे अमेरिका और सोवियत संघ के बीच लंबे समय से चल रही वैचारिक प्रतिस्पर्धा समाप्त हो गई। दूसरा परिणाम यह हुआ कि विश्व में अमेरिका एकमात्र महाशक्ति के रूप में उभरा और एकध्रुवीय विश्व व्यवस्था का उदय हुआ। इसके अतिरिक्त 15 नए स्वतंत्र राष्ट्र अस्तित्व में आए और अंतरराष्ट्रीय राजनीति की दिशा बदल गई। वैश्वीकरण की प्रक्रिया को भी गति मिली तथा विश्व राजनीति में नए शक्ति केंद्र उभरने लगे।


8. राष्ट्रवाद ने सोवियत संघ के विघटन में कैसे योगदान दिया?

उत्तर:
सोवियत संघ अनेक गणराज्यों का संघ था, जिनकी भाषाएँ, संस्कृतियाँ और पहचान अलग-अलग थीं। समय के साथ इन क्षेत्रों में राष्ट्रवादी भावनाएँ मजबूत होने लगीं। लोग अपनी स्वतंत्र पहचान और स्वशासन की मांग करने लगे। गोर्बाचेव की नीतियों ने अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता बढ़ाई, जिससे राष्ट्रवादी आंदोलनों को बल मिला। बाल्टिक राज्यों, यूक्रेन और अन्य गणराज्यों में स्वतंत्रता की मांग तेज हो गई। केंद्रीय सरकार इन आंदोलनों को नियंत्रित नहीं कर सकी। परिणामस्वरूप कई गणराज्यों ने स्वतंत्रता की घोषणा कर दी और अंततः सोवियत संघ का विघटन हो गया।


9. शीत युद्ध की समाप्ति का क्या महत्व था?

उत्तर:
शीत युद्ध की समाप्ति विश्व राजनीति की एक ऐतिहासिक घटना थी। इससे अमेरिका और सोवियत संघ के बीच वैचारिक तथा सैन्य प्रतिस्पर्धा समाप्त हो गई। परमाणु हथियारों की होड़ में कमी आई और विश्व शांति की संभावनाएँ बढ़ीं। अनेक देशों को अपने विकास पर अधिक ध्यान देने का अवसर मिला। अंतरराष्ट्रीय संबंधों में सहयोग और आर्थिक वैश्वीकरण को प्रोत्साहन मिला। इसके साथ ही संयुक्त राष्ट्र जैसी संस्थाओं की भूमिका भी बढ़ी। शीत युद्ध का अंत विश्व व्यवस्था में एक नए युग की शुरुआत माना जाता है।


10. ‘शॉक थेरेपी’ क्या थी?

उत्तर:
शॉक थेरेपी उन आर्थिक सुधारों का समूह था जिसे सोवियत संघ के विघटन के बाद कई पूर्व समाजवादी देशों ने अपनाया। इसका उद्देश्य समाजवादी अर्थव्यवस्था को तेजी से बाजार आधारित पूँजीवादी अर्थव्यवस्था में बदलना था। इसके अंतर्गत निजीकरण, व्यापार उदारीकरण और सरकारी नियंत्रण में कमी जैसे कदम उठाए गए। यद्यपि इससे कुछ देशों में आर्थिक विकास की संभावनाएँ बढ़ीं, लेकिन प्रारंभिक वर्षों में बेरोजगारी, महँगाई और सामाजिक असमानता भी बढ़ी। इसलिए शॉक थेरेपी को मिश्रित परिणामों वाली नीति माना जाता है।


11. शॉक थेरेपी के दो दुष्परिणाम बताइए।

उत्तर:
शॉक थेरेपी के कारण कई पूर्व सोवियत देशों में आर्थिक अस्थिरता उत्पन्न हुई। पहला दुष्परिणाम बेरोजगारी में वृद्धि था, क्योंकि सरकारी उद्योगों का निजीकरण होने लगा। दूसरा दुष्परिणाम महँगाई और गरीबी में बढ़ोतरी था। राज्य द्वारा प्रदान की जाने वाली सामाजिक सुरक्षा कमजोर हो गई। कई लोगों की बचत का मूल्य घट गया और जीवन स्तर प्रभावित हुआ। यद्यपि लंबे समय में कुछ देशों ने आर्थिक प्रगति की, लेकिन शुरुआती दौर में आम जनता को गंभीर कठिनाइयों का सामना करना पड़ा।


12. राष्ट्रमंडल स्वतंत्र राज्यों (CIS) का गठन क्यों किया गया?

उत्तर:
सोवियत संघ के विघटन के बाद उसके कई पूर्व गणराज्यों ने आपसी सहयोग बनाए रखने के लिए राष्ट्रमंडल स्वतंत्र राज्यों (CIS) का गठन किया। इसका उद्देश्य आर्थिक, राजनीतिक और सुरक्षा संबंधी मामलों में सहयोग को बढ़ावा देना था। CIS ने सदस्य देशों को स्वतंत्र राष्ट्र के रूप में कार्य करने की अनुमति दी, साथ ही साझा हितों के मुद्दों पर समन्वय बनाए रखा। यह संगठन सोवियत संघ के पूर्ण विघटन के बाद क्षेत्रीय स्थिरता बनाए रखने का एक प्रयास था।


13. रूस को सोवियत संघ का उत्तराधिकारी राज्य क्यों कहा जाता है?

उत्तर:
सोवियत संघ के विघटन के बाद रूस सबसे बड़ा और सबसे शक्तिशाली गणराज्य था। उसने सोवियत संघ की अधिकांश अंतरराष्ट्रीय जिम्मेदारियाँ और अधिकार अपने हाथ में ले लिए। संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में स्थायी सदस्यता भी रूस को प्राप्त हुई। इसके अतिरिक्त सोवियत संघ की सैन्य शक्ति, परमाणु हथियारों और अधिकांश संसाधनों का नियंत्रण रूस के पास आ गया। इसलिए रूस को सोवियत संघ का उत्तराधिकारी राज्य कहा जाता है।


14. बाल्कन राज्यों का महत्व स्पष्ट कीजिए।

उत्तर:
बाल्कन क्षेत्र यूरोप का एक महत्वपूर्ण भाग है, जहाँ विभिन्न जातीय और सांस्कृतिक समूह रहते हैं। सोवियत संघ और साम्यवादी शासन के पतन के बाद इस क्षेत्र में कई नए राष्ट्र अस्तित्व में आए। यहाँ जातीय संघर्ष और राजनीतिक अस्थिरता भी देखने को मिली। बाल्कन राज्यों का महत्व इसलिए है क्योंकि उन्होंने राष्ट्रवाद, आत्मनिर्णय और क्षेत्रीय संघर्षों की जटिलताओं को उजागर किया। यह क्षेत्र अंतरराष्ट्रीय राजनीति में शांति स्थापना और क्षेत्रीय सहयोग के अध्ययन का महत्वपूर्ण उदाहरण है।


15. मध्य एशियाई राज्यों का उदय क्यों महत्वपूर्ण है?

उत्तर:
सोवियत संघ के विघटन के बाद कजाकिस्तान, उज़्बेकिस्तान, तुर्कमेनिस्तान, किर्गिस्तान और ताजिकिस्तान जैसे मध्य एशियाई राज्य स्वतंत्र बने। ये देश प्राकृतिक संसाधनों, विशेषकर तेल और गैस, से समृद्ध हैं। इनके उदय से अंतरराष्ट्रीय राजनीति में नए रणनीतिक और आर्थिक अवसर उत्पन्न हुए। ये देश एशिया और यूरोप के बीच महत्वपूर्ण भौगोलिक स्थिति रखते हैं। इसलिए ऊर्जा सुरक्षा, व्यापार और क्षेत्रीय सहयोग के संदर्भ में इनका महत्व लगातार बढ़ रहा है।


16. भारत और रूस के संबंधों का महत्व बताइए।

उत्तर:
भारत और रूस के संबंध लंबे समय से मैत्रीपूर्ण रहे हैं। रक्षा, विज्ञान, अंतरिक्ष और ऊर्जा के क्षेत्रों में दोनों देशों के बीच घनिष्ठ सहयोग है। सोवियत संघ के विघटन के बाद भी यह सहयोग जारी रहा। रूस भारत का महत्वपूर्ण रक्षा साझेदार है और दोनों देश अंतरराष्ट्रीय मुद्दों पर भी सहयोग करते हैं। भारत की विदेश नीति में रूस एक महत्वपूर्ण रणनीतिक भागीदार माना जाता है। इन संबंधों ने दोनों देशों के बीच विश्वास और पारस्परिक हितों को मजबूत किया है।


17. बर्लिन की दीवार का पतन क्यों महत्वपूर्ण माना जाता है?

उत्तर:
1989 में बर्लिन की दीवार का पतन शीत युद्ध के अंत का प्रतीक माना जाता है। यह दीवार पूर्वी और पश्चिमी जर्मनी को अलग करती थी तथा पूँजीवादी और साम्यवादी गुटों के बीच विभाजन का प्रतीक थी। इसके गिरने से जर्मनी का पुनः एकीकरण संभव हुआ और पूर्वी यूरोप में साम्यवादी शासन कमजोर पड़ने लगा। यह घटना जनता की लोकतांत्रिक आकांक्षाओं और राजनीतिक परिवर्तन की शक्ति को दर्शाती है। इसलिए बर्लिन की दीवार का पतन विश्व इतिहास की एक महत्वपूर्ण घटना माना जाता है।


18. एकध्रुवीय विश्व व्यवस्था से क्या आशय है?

उत्तर:
एकध्रुवीय विश्व व्यवस्था वह स्थिति है जिसमें एक ही देश वैश्विक राजनीति में प्रमुख शक्ति बन जाता है। सोवियत संघ के विघटन के बाद अमेरिका विश्व की एकमात्र महाशक्ति के रूप में उभरा। उसकी सैन्य, आर्थिक और राजनीतिक शक्ति अन्य देशों की तुलना में अधिक थी। इस कारण 1990 के दशक में विश्व व्यवस्था को एकध्रुवीय कहा गया। हालांकि बाद में चीन, यूरोपीय संघ और अन्य शक्तियों के उभरने से बहुध्रुवीयता की प्रवृत्ति भी दिखाई देने लगी।


19. सोवियत संघ के विघटन का वैश्वीकरण पर क्या प्रभाव पड़ा?

उत्तर:
सोवियत संघ के विघटन के बाद विश्व में बाजार आधारित अर्थव्यवस्था का विस्तार हुआ। अनेक देशों ने आर्थिक उदारीकरण और मुक्त व्यापार की नीतियाँ अपनाईं। अंतरराष्ट्रीय व्यापार, निवेश और तकनीकी सहयोग में वृद्धि हुई। पूँजीवादी आर्थिक मॉडल को व्यापक स्वीकृति मिली। इसके परिणामस्वरूप वैश्वीकरण की प्रक्रिया तेज हुई और विश्व अर्थव्यवस्था अधिक परस्पर जुड़ी हुई बन गई। हालांकि इसके साथ आर्थिक असमानताओं और प्रतिस्पर्धा में भी वृद्धि देखी गई।


20. ‘द्विध्रुवीयता का अंत’ अध्याय का मुख्य संदेश क्या है?

उत्तर:
इस अध्याय का मुख्य संदेश यह है कि अंतरराष्ट्रीय राजनीति स्थायी नहीं होती, बल्कि समय के साथ बदलती रहती है। सोवियत संघ के विघटन और शीत युद्ध की समाप्ति ने विश्व व्यवस्था को पूरी तरह बदल दिया। इससे नई राजनीतिक, आर्थिक और रणनीतिक चुनौतियाँ उत्पन्न हुईं। अध्याय यह समझाता है कि किस प्रकार आंतरिक कमजोरियाँ, आर्थिक संकट और राष्ट्रवादी आंदोलनों ने एक महाशक्ति को समाप्त कर दिया। साथ ही यह भी दर्शाता है कि इन परिवर्तनों ने वैश्विक राजनीति, भारत के विदेश संबंधों और विश्व शक्ति संतुलन को किस प्रकार प्रभावित किया।