CBSE कक्षा 12 अर्थशास्त्र (Indian Economic Development)
अध्याय 6 – विकास अनुभव (1947–90)
20 महत्वपूर्ण प्रश्न एवं उत्तर
स्वतंत्रता के बाद भारत ने नियोजित आर्थिक विकास, सार्वजनिक क्षेत्र के विस्तार, कृषि सुधार, हरित क्रांति, औद्योगिक नीति तथा आयात-प्रतिस्थापन जैसी नीतियाँ अपनाईं। यही इस अध्याय के प्रमुख विषय हैं।
1. स्वतंत्रता के समय भारतीय अर्थव्यवस्था की प्रमुख विशेषताएँ क्या थीं?
उत्तर:
1947 में स्वतंत्रता प्राप्ति के समय भारतीय अर्थव्यवस्था अत्यंत पिछड़ी हुई थी। कृषि क्षेत्र पर अत्यधिक निर्भरता थी, लेकिन उत्पादकता बहुत कम थी। औद्योगिक विकास सीमित था और आधुनिक उद्योगों का अभाव था। विदेशी व्यापार मुख्यतः ब्रिटिश हितों के अनुसार संचालित होता था। गरीबी, बेरोजगारी और अशिक्षा व्यापक थीं। परिवहन, संचार तथा स्वास्थ्य जैसी आधारभूत सुविधाएँ भी पर्याप्त विकसित नहीं थीं। विभाजन के कारण कृषि भूमि और औद्योगिक संसाधनों का भी नुकसान हुआ। इसलिए स्वतंत्र भारत के सामने आर्थिक विकास, आत्मनिर्भरता तथा रोजगार सृजन जैसी बड़ी चुनौतियाँ थीं।
2. स्वतंत्र भारत ने मिश्रित अर्थव्यवस्था को क्यों अपनाया?
उत्तर:
स्वतंत्रता के बाद भारत ने पूंजीवादी और समाजवादी व्यवस्थाओं के बीच संतुलन बनाने हेतु मिश्रित अर्थव्यवस्था को अपनाया। इस व्यवस्था में सार्वजनिक और निजी दोनों क्षेत्रों को कार्य करने का अवसर दिया गया। सरकार ने भारी उद्योगों, आधारभूत ढाँचे तथा सामाजिक कल्याण के क्षेत्रों में निवेश किया, जबकि निजी क्षेत्र को उपभोक्ता वस्तुओं के उत्पादन में भागीदारी दी गई। मिश्रित अर्थव्यवस्था का उद्देश्य आर्थिक विकास, सामाजिक न्याय, आय की असमानता को कम करना तथा संसाधनों का उचित उपयोग सुनिश्चित करना था। इससे विकास और कल्याण दोनों लक्ष्यों को प्राप्त करने का प्रयास किया गया।
3. आर्थिक नियोजन का क्या अर्थ है?
उत्तर:
आर्थिक नियोजन वह प्रक्रिया है जिसके अंतर्गत सरकार देश के संसाधनों का उपयोग निर्धारित लक्ष्यों की प्राप्ति के लिए योजनाबद्ध तरीके से करती है। भारत में नियोजन का कार्य योजना आयोग के माध्यम से किया गया। नियोजन का मुख्य उद्देश्य आर्थिक विकास को गति देना, गरीबी कम करना, रोजगार बढ़ाना और आत्मनिर्भरता प्राप्त करना था। योजनाओं के माध्यम से कृषि, उद्योग, शिक्षा, स्वास्थ्य और आधारभूत संरचना के विकास पर विशेष ध्यान दिया गया। इस प्रकार आर्थिक नियोजन संसाधनों के सर्वोत्तम उपयोग तथा संतुलित विकास का साधन है।
4. पंचवर्षीय योजनाओं के प्रमुख उद्देश्य क्या थे?
उत्तर:
भारत की पंचवर्षीय योजनाओं के चार प्रमुख उद्देश्य थे—वृद्धि, आधुनिकीकरण, आत्मनिर्भरता और समानता। वृद्धि का अर्थ राष्ट्रीय आय और उत्पादन में वृद्धि करना था। आधुनिकीकरण के अंतर्गत नई तकनीकों और वैज्ञानिक तरीकों को अपनाना शामिल था। आत्मनिर्भरता का उद्देश्य विदेशी सहायता और आयात पर निर्भरता कम करना था। समानता के माध्यम से आय और संपत्ति की असमानताओं को कम करने का प्रयास किया गया। इन उद्देश्यों के द्वारा भारत को एक मजबूत, आत्मनिर्भर और न्यायपूर्ण अर्थव्यवस्था बनाने की दिशा में कार्य किया गया।
5. महालनोबिस रणनीति क्या थी?
उत्तर:
द्वितीय पंचवर्षीय योजना में प्रोफेसर पी.सी. महालनोबिस द्वारा प्रस्तुत विकास रणनीति को महालनोबिस रणनीति कहा जाता है। इस रणनीति में भारी और पूंजीगत उद्योगों के विकास पर विशेष बल दिया गया। इसका उद्देश्य दीर्घकाल में औद्योगिक आधार को मजबूत बनाना तथा आर्थिक आत्मनिर्भरता प्राप्त करना था। सरकार ने इस नीति के तहत इस्पात, मशीन निर्माण और इंजीनियरिंग उद्योगों में बड़े निवेश किए। यद्यपि इससे औद्योगिक विकास को बढ़ावा मिला, लेकिन उपभोक्ता वस्तुओं और रोजगार सृजन पर अपेक्षाकृत कम ध्यान दिया गया।
6. भूमि सुधारों का महत्व स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
भूमि सुधार कृषि क्षेत्र में समानता और उत्पादकता बढ़ाने के लिए लागू किए गए थे। इनके अंतर्गत जमींदारी प्रथा का उन्मूलन, भूमि की अधिकतम सीमा निर्धारित करना तथा भूमिहीन किसानों को भूमि उपलब्ध कराना शामिल था। भूमि सुधारों का उद्देश्य किसानों को भूमि का स्वामित्व प्रदान करना तथा शोषण को समाप्त करना था। इससे किसानों में उत्पादन बढ़ाने की प्रेरणा उत्पन्न हुई। हालांकि विभिन्न राज्यों में इन सुधारों का प्रभाव अलग-अलग रहा, फिर भी इनसे ग्रामीण समाज में सामाजिक और आर्थिक परिवर्तन आए।
7. हरित क्रांति क्या थी?
उत्तर:
हरित क्रांति कृषि उत्पादन बढ़ाने के लिए अपनाई गई नई कृषि रणनीति थी। इसका आरंभ 1960 के दशक में हुआ। इसके अंतर्गत उच्च उपज वाले बीज, रासायनिक उर्वरक, कीटनाशक, सिंचाई सुविधाएँ और आधुनिक कृषि उपकरणों का उपयोग किया गया। इसका मुख्य उद्देश्य खाद्यान्न उत्पादन बढ़ाकर देश को खाद्यान्न के क्षेत्र में आत्मनिर्भर बनाना था। हरित क्रांति का सबसे अधिक प्रभाव पंजाब, हरियाणा और पश्चिमी उत्तर प्रदेश में देखा गया। इससे गेहूँ और चावल के उत्पादन में उल्लेखनीय वृद्धि हुई।
8. हरित क्रांति की दो प्रमुख उपलब्धियाँ बताइए।
उत्तर:
हरित क्रांति की पहली प्रमुख उपलब्धि खाद्यान्न उत्पादन में भारी वृद्धि थी, जिससे भारत खाद्यान्न आयात पर निर्भरता कम कर सका। दूसरी उपलब्धि कृषि क्षेत्र में आधुनिक तकनीकों का प्रसार था। किसानों ने बेहतर बीज, उर्वरक और सिंचाई तकनीकों का उपयोग करना शुरू किया। इससे कृषि उत्पादकता बढ़ी और ग्रामीण अर्थव्यवस्था को गति मिली। इसके अतिरिक्त देश खाद्यान्न के मामले में आत्मनिर्भर बनने की दिशा में आगे बढ़ा। इन उपलब्धियों ने भारत की खाद्य सुरक्षा को मजबूत किया।
9. हरित क्रांति की सीमाएँ क्या थीं?
उत्तर:
हरित क्रांति का लाभ मुख्यतः कुछ राज्यों और बड़े किसानों तक सीमित रहा। छोटे किसानों के पास आधुनिक तकनीकों को अपनाने के लिए पर्याप्त संसाधन नहीं थे। इससे क्षेत्रीय और आय संबंधी असमानताएँ बढ़ीं। इसके अलावा रासायनिक उर्वरकों और कीटनाशकों के अत्यधिक उपयोग से पर्यावरणीय समस्याएँ उत्पन्न हुईं। भूजल स्तर में गिरावट और मिट्टी की उर्वरता में कमी जैसी चुनौतियाँ भी सामने आईं। इसलिए हरित क्रांति के सकारात्मक प्रभावों के साथ कुछ नकारात्मक परिणाम भी जुड़े रहे।
10. औद्योगिक नीति संकल्प, 1956 की मुख्य विशेषताएँ क्या थीं?
उत्तर:
औद्योगिक नीति संकल्प, 1956 ने भारत के औद्योगिक विकास की दिशा निर्धारित की। इसमें उद्योगों को तीन श्रेणियों में विभाजित किया गया। कुछ उद्योग केवल सार्वजनिक क्षेत्र के लिए आरक्षित किए गए, जबकि कुछ में सार्वजनिक और निजी दोनों क्षेत्रों को अनुमति दी गई। शेष उद्योग निजी क्षेत्र के लिए खुले थे। इस नीति का उद्देश्य औद्योगिक विकास, आत्मनिर्भरता तथा सामाजिक न्याय सुनिश्चित करना था। इसने सार्वजनिक क्षेत्र की भूमिका को मजबूत बनाया और भारी उद्योगों के विकास को बढ़ावा दिया।
11. सार्वजनिक क्षेत्र का महत्व क्या था?
उत्तर:
स्वतंत्रता के बाद सार्वजनिक क्षेत्र को आर्थिक विकास का प्रमुख साधन माना गया। सरकार ने इस्पात, ऊर्जा, परिवहन और भारी उद्योगों जैसे क्षेत्रों में निवेश किया। सार्वजनिक क्षेत्र का उद्देश्य आधारभूत संरचना का विकास, रोजगार सृजन तथा क्षेत्रीय संतुलन स्थापित करना था। निजी क्षेत्र के लिए जोखिमपूर्ण या कम लाभदायक क्षेत्रों में भी सार्वजनिक क्षेत्र ने कार्य किया। इससे औद्योगिक आधार मजबूत हुआ और देश के दीर्घकालीन विकास को समर्थन मिला।
12. लघु उद्योगों को बढ़ावा देने के कारण बताइए।
उत्तर:
लघु उद्योग श्रम प्रधान होते हैं और कम पूंजी में अधिक रोजगार उत्पन्न करते हैं। स्वतंत्रता के बाद सरकार ने लघु उद्योगों को प्रोत्साहन दिया ताकि बेरोजगारी कम हो और क्षेत्रीय विकास को बढ़ावा मिले। ये उद्योग ग्रामीण और अर्ध-शहरी क्षेत्रों में आर्थिक गतिविधियों को बढ़ाते हैं। लघु उद्योग स्थानीय संसाधनों का उपयोग करते हैं तथा आय के अधिक समान वितरण में सहायता करते हैं। इसलिए इन्हें आर्थिक विकास की प्रक्रिया में महत्वपूर्ण स्थान दिया गया।
13. आयात प्रतिस्थापन नीति क्या थी?
उत्तर:
आयात प्रतिस्थापन नीति का उद्देश्य विदेशी वस्तुओं के आयात को कम करके घरेलू उद्योगों को बढ़ावा देना था। इसके अंतर्गत सरकार ने आयात पर प्रतिबंध और ऊँचे शुल्क लगाए ताकि भारतीय उद्योग विदेशी प्रतिस्पर्धा से सुरक्षित रह सकें। इस नीति से देश में औद्योगिकीकरण को बढ़ावा मिला और आत्मनिर्भरता की दिशा में प्रगति हुई। हालांकि लंबे समय में इससे कुछ उद्योगों में प्रतिस्पर्धा और दक्षता की कमी भी देखी गई।
14. आत्मनिर्भरता का क्या अर्थ है?
उत्तर:
आत्मनिर्भरता का अर्थ है कि देश अपनी आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए विदेशी देशों पर अत्यधिक निर्भर न रहे। स्वतंत्रता के बाद भारत ने आत्मनिर्भरता को आर्थिक नीति का महत्वपूर्ण लक्ष्य बनाया। इसका उद्देश्य घरेलू उत्पादन को बढ़ाना, विदेशी सहायता पर निर्भरता कम करना और राष्ट्रीय संसाधनों का बेहतर उपयोग करना था। आत्मनिर्भरता से देश आर्थिक और राजनीतिक रूप से अधिक मजबूत बनता है तथा बाहरी दबावों से मुक्त रह सकता है।
15. योजना आयोग की भूमिका क्या थी?
उत्तर:
योजना आयोग की स्थापना 1950 में की गई थी। इसका मुख्य कार्य पंचवर्षीय योजनाओं का निर्माण और कार्यान्वयन की निगरानी करना था। आयोग देश के संसाधनों का आकलन करता था और विकास की प्राथमिकताएँ निर्धारित करता था। कृषि, उद्योग, शिक्षा और स्वास्थ्य जैसे क्षेत्रों के लिए योजनाएँ तैयार की जाती थीं। योजना आयोग ने भारत के प्रारंभिक विकास चरण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई और आर्थिक नियोजन को दिशा प्रदान की।
16. कृषि क्षेत्र की प्रमुख समस्याएँ क्या थीं?
उत्तर:
स्वतंत्रता के बाद भारतीय कृषि कई समस्याओं से ग्रस्त थी। भूमि जोतों का छोटा आकार, सिंचाई सुविधाओं की कमी, पारंपरिक तकनीकों का उपयोग और किसानों की गरीबी प्रमुख समस्याएँ थीं। कृषि मानसून पर अत्यधिक निर्भर थी, जिससे उत्पादन में अस्थिरता बनी रहती थी। ग्रामीण क्षेत्रों में ऋण और विपणन सुविधाओं का भी अभाव था। इन समस्याओं के समाधान के लिए भूमि सुधार, सहकारी संस्थाओं और हरित क्रांति जैसी नीतियाँ लागू की गईं।
17. औद्योगीकरण को विकास का इंजन क्यों कहा गया?
उत्तर:
औद्योगीकरण को विकास का इंजन इसलिए कहा जाता है क्योंकि यह उत्पादन, रोजगार और आय में वृद्धि करता है। उद्योग कृषि को मशीनें, उर्वरक और अन्य आवश्यक वस्तुएँ उपलब्ध कराते हैं। औद्योगिक विकास से निर्यात बढ़ता है और तकनीकी प्रगति को प्रोत्साहन मिलता है। स्वतंत्र भारत ने आर्थिक विकास को गति देने के लिए औद्योगीकरण पर विशेष बल दिया। इससे देश के आर्थिक ढाँचे को मजबूत बनाने में सहायता मिली।
18. क्षेत्रीय असंतुलन से क्या अभिप्राय है?
उत्तर:
जब किसी देश के विभिन्न क्षेत्रों में विकास का स्तर समान नहीं होता, तो उसे क्षेत्रीय असंतुलन कहा जाता है। हरित क्रांति और औद्योगिक विकास का लाभ कुछ राज्यों को अधिक मिला जबकि अन्य राज्य अपेक्षाकृत पीछे रह गए। इससे आय, रोजगार और आधारभूत सुविधाओं में असमानता बढ़ी। क्षेत्रीय असंतुलन को कम करने के लिए सरकार ने पिछड़े क्षेत्रों में निवेश और विशेष योजनाएँ लागू कीं।
19. आर्थिक नियोजन की दो उपलब्धियाँ बताइए।
उत्तर:
आर्थिक नियोजन की पहली उपलब्धि औद्योगिक आधार का विकास था। सार्वजनिक क्षेत्र और भारी उद्योगों की स्थापना से देश की उत्पादन क्षमता बढ़ी। दूसरी उपलब्धि कृषि क्षेत्र में प्रगति थी, विशेषकर हरित क्रांति के माध्यम से खाद्यान्न उत्पादन में वृद्धि हुई। इन प्रयासों ने भारत को आत्मनिर्भरता की दिशा में आगे बढ़ाया। साथ ही शिक्षा, स्वास्थ्य और परिवहन जैसी आधारभूत सुविधाओं का भी विस्तार हुआ।
20. 1947–90 की विकास रणनीति का समग्र मूल्यांकन कीजिए।
उत्तर:
1947–90 की विकास रणनीति ने भारत को एक मजबूत औद्योगिक और कृषि आधार प्रदान किया। पंचवर्षीय योजनाओं, सार्वजनिक क्षेत्र और हरित क्रांति के माध्यम से उत्पादन तथा आत्मनिर्भरता में वृद्धि हुई। हालांकि आर्थिक वृद्धि अपेक्षाकृत धीमी रही और गरीबी, बेरोजगारी तथा असमानता जैसी समस्याएँ पूरी तरह समाप्त नहीं हो सकीं। कई उद्योगों में दक्षता की कमी और अत्यधिक सरकारी नियंत्रण भी चुनौतियाँ बने रहे। फिर भी इस अवधि ने भारत के दीर्घकालीन आर्थिक विकास की नींव रखी।
