CBSE Class 12 Economics (Macroeconomics)

Chapter 3: आय एवं रोजगार का निर्धारण (Determination of Income and Employment)

20 महत्वपूर्ण प्रश्न एवं उत्तर

1. समष्टि मांग (Aggregate Demand) क्या है?
उत्तर:
समष्टि मांग (AD) से आशय अर्थव्यवस्था में एक निश्चित आय स्तर पर वस्तुओं एवं सेवाओं की कुल नियोजित मांग से है। दो-क्षेत्रीय अर्थव्यवस्था में इसका सूत्र AD = C + I होता है, जहाँ C उपभोग व्यय तथा I निवेश व्यय है। समष्टि मांग उत्पादन, आय और रोजगार के स्तर को प्रभावित करती है। यदि समष्टि मांग बढ़ती है तो उत्पादन एवं रोजगार में वृद्धि होती है, जबकि मांग घटने पर आय और रोजगार कम हो सकते हैं। कीन्स के अनुसार आय और रोजगार का निर्धारण मुख्य रूप से प्रभावी मांग पर निर्भर करता है। अतः समष्टि मांग व्यापक आर्थिक संतुलन का महत्वपूर्ण निर्धारक है।


2. समष्टि पूर्ति (Aggregate Supply) का अर्थ स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
समष्टि पूर्ति (AS) अर्थव्यवस्था में उत्पादकों द्वारा एक निश्चित अवधि में उत्पादित वस्तुओं एवं सेवाओं के कुल मूल्य को दर्शाती है। सरल अर्थव्यवस्था में AS = C + S होता है, जहाँ C उपभोग और S बचत है। समष्टि पूर्ति आय के स्तर के साथ बढ़ती है क्योंकि अधिक उत्पादन से अधिक आय उत्पन्न होती है। आय एवं रोजगार का संतुलन तब स्थापित होता है जब समष्टि मांग और समष्टि पूर्ति बराबर हो जाते हैं। यदि AS, AD से अधिक हो जाए तो उत्पादन में कमी आ सकती है। इसलिए AS आय निर्धारण प्रक्रिया का एक महत्वपूर्ण घटक है।


3. उपभोग फलन (Consumption Function) क्या है?
उत्तर:
उपभोग फलन आय और उपभोग के बीच संबंध को दर्शाता है। यह बताता है कि आय में परिवर्तन होने पर उपभोग किस प्रकार बदलता है। सामान्यतः इसे C = a + bY द्वारा व्यक्त किया जाता है, जहाँ ‘a’ स्वायत्त उपभोग, ‘b’ सीमांत उपभोग प्रवृत्ति (MPC) तथा Y आय है। आय बढ़ने पर उपभोग भी बढ़ता है, परंतु आय की तुलना में कम दर से। उपभोग फलन समष्टि मांग का प्रमुख घटक है और अर्थव्यवस्था में आय तथा रोजगार के स्तर को प्रभावित करता है। यह कीन्सियन सिद्धांत का महत्वपूर्ण आधार है।


4. बचत फलन (Saving Function) क्या है?
उत्तर:
बचत फलन आय और बचत के बीच संबंध को दर्शाता है। यह बताता है कि आय में वृद्धि होने पर व्यक्ति अपनी आय का कितना भाग बचाता है। बचत फलन का सामान्य रूप S = –a + (1 – b)Y है। प्रारंभिक आय स्तर पर बचत ऋणात्मक हो सकती है क्योंकि व्यक्ति अपनी आवश्यकताओं की पूर्ति हेतु उधार ले सकता है। जैसे-जैसे आय बढ़ती है, बचत भी बढ़ती जाती है। बचत फलन निवेश और राष्ट्रीय आय के निर्धारण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। बचत तथा निवेश की समानता आर्थिक संतुलन की एक आवश्यक शर्त है।


5. सीमांत उपभोग प्रवृत्ति (MPC) क्या है?
उत्तर:
सीमांत उपभोग प्रवृत्ति (Marginal Propensity to Consume) से आशय अतिरिक्त आय के उस भाग से है जिसे उपभोग पर खर्च किया जाता है। इसका सूत्र MPC = ΔC/ΔY है। यदि आय में ₹100 की वृद्धि होने पर उपभोग ₹80 बढ़ता है, तो MPC = 0.8 होगी। MPC का मान सदैव 0 और 1 के बीच होता है। उच्च MPC का अर्थ है कि लोग अपनी अतिरिक्त आय का बड़ा भाग खर्च कर रहे हैं। MPC निवेश गुणक तथा आय निर्धारण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। इसकी सहायता से अर्थव्यवस्था में मांग और रोजगार के स्तर का अनुमान लगाया जाता है।


6. सीमांत बचत प्रवृत्ति (MPS) क्या है?
उत्तर:
सीमांत बचत प्रवृत्ति (Marginal Propensity to Save) अतिरिक्त आय के उस भाग को दर्शाती है जिसे बचाया जाता है। इसका सूत्र MPS = ΔS/ΔY है। यदि आय में ₹100 की वृद्धि होने पर बचत ₹20 बढ़ती है, तो MPS = 0.2 होगी। MPC और MPS का योग सदैव 1 होता है। MPS निवेश गुणक के निर्धारण में महत्वपूर्ण है क्योंकि गुणक का मान MPS के व्युत्क्रम के बराबर होता है। अधिक MPS होने पर गुणक का प्रभाव कम हो जाता है। इसलिए आय और रोजगार निर्धारण में MPS की महत्वपूर्ण भूमिका होती है।


7. संतुलन आय (Equilibrium Income) क्या है?
उत्तर:
संतुलन आय वह आय स्तर है जहाँ समष्टि मांग और समष्टि पूर्ति बराबर होती हैं। इस स्थिति में उत्पादकों को उत्पादन बढ़ाने या घटाने की आवश्यकता नहीं होती। संतुलन की शर्त AD = AS होती है। इसी प्रकार बचत-निवेश दृष्टिकोण में संतुलन तब प्राप्त होता है जब S = I हो। संतुलन आय पर अर्थव्यवस्था स्थिर रहती है और आय में परिवर्तन की कोई प्रवृत्ति नहीं होती। यदि मांग अधिक हो तो आय बढ़ती है तथा यदि मांग कम हो तो आय घटती है। इस प्रकार संतुलन आय आय एवं रोजगार निर्धारण का केंद्रीय बिंदु है।


8. निवेश (Investment) से क्या अभिप्राय है?
उत्तर:
निवेश से आशय पूंजीगत वस्तुओं, मशीनों, भवनों तथा भंडार में वृद्धि हेतु किए गए व्यय से है। यह समष्टि मांग का महत्वपूर्ण घटक है। कीन्सियन मॉडल में निवेश को सामान्यतः स्वायत्त माना जाता है, अर्थात यह वर्तमान आय से स्वतंत्र होता है। निवेश में वृद्धि होने पर उत्पादन, आय और रोजगार बढ़ते हैं। निवेश उद्यमियों की भविष्य की अपेक्षाओं तथा ब्याज दरों से प्रभावित होता है। अर्थव्यवस्था में आर्थिक विकास और रोजगार सृजन के लिए निवेश अत्यंत आवश्यक है। इसलिए राष्ट्रीय आय निर्धारण में निवेश की महत्वपूर्ण भूमिका होती है।


9. निवेश गुणक (Investment Multiplier) क्या है?
उत्तर:
निवेश गुणक वह अनुपात है जो बताता है कि निवेश में हुई वृद्धि के परिणामस्वरूप राष्ट्रीय आय कितनी गुना बढ़ेगी। इसका सूत्र K = 1/(1 – MPC) या K = 1/MPS है। यदि MPC = 0.8 हो, तो गुणक 5 होगा। इसका अर्थ है कि ₹100 की अतिरिक्त निवेश वृद्धि से राष्ट्रीय आय ₹500 बढ़ेगी। गुणक का प्रभाव इसलिए उत्पन्न होता है क्योंकि एक व्यक्ति का व्यय दूसरे की आय बनता है। गुणक की अवधारणा रोजगार एवं आय वृद्धि को समझने में अत्यंत उपयोगी है।


10. गुणक प्रक्रिया (Multiplier Process) को समझाइए।
उत्तर:
गुणक प्रक्रिया वह क्रम है जिसके द्वारा प्रारंभिक निवेश में वृद्धि कई चरणों में आय और रोजगार को बढ़ाती है। उदाहरण के लिए, सरकार द्वारा ₹100 करोड़ का निवेश करने पर यह राशि मजदूरों और उत्पादकों की आय बनती है। वे इस आय का एक भाग खर्च करते हैं, जिससे दूसरों की आय बढ़ती है। यह प्रक्रिया लगातार चलती रहती है और कुल आय में कई गुना वृद्धि होती है। गुणक का प्रभाव MPC पर निर्भर करता है। जितनी अधिक MPC होगी, गुणक प्रभाव उतना ही अधिक होगा। यह सिद्धांत आर्थिक विकास और रोजगार सृजन की व्याख्या करता है।


11. एक्स-एंटे (Ex-Ante) और एक्स-पोस्ट (Ex-Post) में अंतर बताइए।
उत्तर:
Ex-Ante का अर्थ नियोजित या अपेक्षित आर्थिक क्रियाओं से है, जबकि Ex-Post का अर्थ वास्तविक रूप से घटित आर्थिक क्रियाओं से है। उदाहरण के लिए, यदि कोई परिवार ₹10,000 बचाने की योजना बनाता है, तो यह Ex-Ante बचत है। वर्ष के अंत में वास्तव में जितनी बचत हुई, वह Ex-Post बचत कहलाएगी। आय एवं रोजगार के निर्धारण में नियोजित मांग और नियोजित निवेश का विशेष महत्व है। कीन्सियन विश्लेषण मुख्य रूप से Ex-Ante अवधारणाओं पर आधारित है क्योंकि उत्पादन निर्णय योजनाबद्ध मांग के अनुसार लिए जाते हैं।


12. स्वायत्त उपभोग (Autonomous Consumption) क्या है?
उत्तर:
स्वायत्त उपभोग वह न्यूनतम उपभोग है जो आय शून्य होने पर भी किया जाता है। यह जीवन की आवश्यक आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए किया जाता है। उपभोग फलन में इसे ‘a’ द्वारा दर्शाया जाता है। आय न होने पर भी परिवार उधार लेकर या पूर्व बचत का उपयोग करके उपभोग कर सकता है। स्वायत्त उपभोग आय से स्वतंत्र होता है और उपभोग फलन का प्रारंभिक बिंदु निर्धारित करता है। यह समष्टि मांग का महत्वपूर्ण घटक है तथा आय निर्धारण की प्रक्रिया को प्रभावित करता है।


13. अल्प रोजगार संतुलन (Underemployment Equilibrium) क्या है?
उत्तर:
अल्प रोजगार संतुलन वह स्थिति है जिसमें अर्थव्यवस्था संतुलन में तो होती है, परंतु उपलब्ध संसाधनों का पूर्ण उपयोग नहीं हो रहा होता। इस स्थिति में बेरोजगारी बनी रहती है और उत्पादन क्षमता का पूरा उपयोग नहीं होता। कीन्स के अनुसार अर्थव्यवस्था लंबे समय तक अल्प रोजगार संतुलन पर रह सकती है क्योंकि समष्टि मांग पर्याप्त नहीं होती। ऐसी स्थिति में सरकार को सार्वजनिक व्यय बढ़ाकर या करों में कमी करके मांग बढ़ानी चाहिए। इससे उत्पादन, आय और रोजगार में वृद्धि होती है तथा अर्थव्यवस्था पूर्ण रोजगार की ओर बढ़ती है।


14. पूर्ण रोजगार संतुलन (Full Employment Equilibrium) क्या है?
उत्तर:
पूर्ण रोजगार संतुलन वह स्थिति है जिसमें अर्थव्यवस्था के सभी उपलब्ध संसाधनों का पूर्ण उपयोग हो रहा होता है। इस स्तर पर केवल स्वैच्छिक बेरोजगारी रह सकती है। जब समष्टि मांग और समष्टि पूर्ति पूर्ण रोजगार स्तर पर बराबर होती हैं, तब पूर्ण रोजगार संतुलन स्थापित होता है। यदि इस स्तर के बाद मांग बढ़ती है तो उत्पादन में अधिक वृद्धि संभव नहीं होती और कीमतें बढ़ने लगती हैं। इसलिए पूर्ण रोजगार संतुलन आर्थिक नीति का एक महत्वपूर्ण लक्ष्य माना जाता है। यह अधिकतम उत्पादन और रोजगार का संकेत देता है।


15. बचत और निवेश समानता (S = I) का महत्व बताइए।
उत्तर:
बचत और निवेश की समानता आर्थिक संतुलन की एक महत्वपूर्ण शर्त है। जब नियोजित बचत नियोजित निवेश के बराबर होती है, तब अर्थव्यवस्था संतुलन की स्थिति में होती है। यदि बचत निवेश से अधिक हो जाए, तो समष्टि मांग कम हो जाती है और आय घटने लगती है। इसके विपरीत, यदि निवेश बचत से अधिक हो, तो आय और उत्पादन बढ़ते हैं। अंततः आय में परिवर्तन के माध्यम से बचत और निवेश फिर से बराबर हो जाते हैं। इसलिए S = I की अवधारणा आय एवं रोजगार निर्धारण को समझने में अत्यंत महत्वपूर्ण है।


16. प्रभावी मांग (Effective Demand) क्या है?
उत्तर:
प्रभावी मांग वह मांग है जो क्रय-शक्ति द्वारा समर्थित होती है और वस्तुओं एवं सेवाओं की वास्तविक खरीद का आधार बनती है। कीन्स के अनुसार आय और रोजगार का स्तर प्रभावी मांग पर निर्भर करता है। जब प्रभावी मांग बढ़ती है तो उत्पादन और रोजगार में वृद्धि होती है। इसके विपरीत, प्रभावी मांग घटने पर बेरोजगारी बढ़ सकती है। प्रभावी मांग समष्टि मांग और समष्टि पूर्ति के प्रतिच्छेदन बिंदु पर निर्धारित होती है। इसलिए यह कीन्सियन आय एवं रोजगार सिद्धांत का मूल आधार है।


17. अत्यधिक मांग (Excess Demand) क्या है?
उत्तर:
अत्यधिक मांग वह स्थिति है जिसमें पूर्ण रोजगार स्तर पर समष्टि मांग, समष्टि पूर्ति से अधिक हो जाती है। इस स्थिति में अर्थव्यवस्था में वस्तुओं और सेवाओं की कमी अनुभव की जाती है। चूँकि उत्पादन क्षमता पहले से पूर्ण उपयोग में होती है, इसलिए अतिरिक्त मांग का परिणाम मुख्यतः कीमतों में वृद्धि के रूप में सामने आता है। इससे मुद्रास्फीति की स्थिति उत्पन्न होती है। अत्यधिक मांग को नियंत्रित करने के लिए सरकार सार्वजनिक व्यय कम कर सकती है, कर बढ़ा सकती है या केंद्रीय बैंक मौद्रिक नीति का उपयोग कर सकता है।


18. अल्प मांग (Deficient Demand) क्या है?
उत्तर:
अल्प मांग वह स्थिति है जिसमें पूर्ण रोजगार स्तर पर समष्टि मांग, समष्टि पूर्ति से कम होती है। इससे उत्पादन, आय और रोजगार में कमी आती है तथा बेरोजगारी बढ़ सकती है। अर्थव्यवस्था में मंदी जैसी स्थिति उत्पन्न हो जाती है। अल्प मांग को दूर करने के लिए सरकार सार्वजनिक व्यय बढ़ा सकती है, करों में कमी कर सकती है तथा निवेश को प्रोत्साहित कर सकती है। केंद्रीय बैंक ब्याज दरों में कमी करके भी मांग को बढ़ा सकता है। इस प्रकार अल्प मांग आर्थिक गतिविधियों को प्रभावित करने वाली एक महत्वपूर्ण समस्या है।


19. MPC और MPS के बीच संबंध स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
सीमांत उपभोग प्रवृत्ति (MPC) और सीमांत बचत प्रवृत्ति (MPS) आय में परिवर्तन के दो पूरक भाग हैं। अतिरिक्त आय का जो भाग उपभोग पर खर्च किया जाता है वह MPC कहलाता है और जो भाग बचाया जाता है वह MPS कहलाता है। दोनों के बीच संबंध MPC + MPS = 1 होता है। उदाहरण के लिए, यदि MPC = 0.75 है, तो MPS = 0.25 होगी। गुणक का मान MPC तथा MPS दोनों पर निर्भर करता है। इसलिए आय, उपभोग, बचत और निवेश के अध्ययन में इन दोनों अवधारणाओं का विशेष महत्व है।


20. आय एवं रोजगार निर्धारण में कीन्स का योगदान बताइए।
उत्तर:
कीन्स ने आय एवं रोजगार निर्धारण का आधुनिक सिद्धांत प्रस्तुत किया। उन्होंने बताया कि रोजगार का स्तर केवल मजदूरी दरों पर नहीं, बल्कि प्रभावी मांग पर निर्भर करता है। उनके अनुसार समष्टि मांग और समष्टि पूर्ति की समानता से आय का संतुलन स्तर निर्धारित होता है। उन्होंने उपभोग फलन, निवेश, गुणक तथा अल्प रोजगार संतुलन जैसी महत्वपूर्ण अवधारणाएँ दीं। कीन्स ने यह भी स्पष्ट किया कि सरकार वित्तीय और मौद्रिक नीतियों के माध्यम से मांग बढ़ाकर बेरोजगारी को कम कर सकती है। उनका सिद्धांत आधुनिक व्यापक अर्थशास्त्र की आधारशिला माना जाता है।