CBSE कक्षा 12 रसायन विज्ञान (2026-27)
कार्बनिक रसायन अध्याय 7: हैलोएल्केन्स एवं हैलोएरीन्स (Haloalkanes and Haloarenes)
यह अध्याय हैलोएल्केन्स एवं हैलोएरीन्स के वर्गीकरण, नामकरण, C–X बंध की प्रकृति, निर्माण विधियों, रासायनिक अभिक्रियाओं तथा SN1 एवं SN2 तंत्रों पर आधारित है।


1. हैलोएल्केन और हैलोएरीन में क्या अंतर है?

उत्तर:
हैलोएल्केन वे यौगिक हैं जिनमें हैलोजन परमाणु किसी sp³ संकरित कार्बन से जुड़ा होता है, जबकि हैलोएरीन में हैलोजन परमाणु सीधे बेंजीन वलय के sp² संकरित कार्बन से जुड़ा होता है। उदाहरण के लिए क्लोरोएथेन एक हैलोएल्केन है जबकि क्लोरोबेंजीन एक हैलोएरीन है। हैलोएल्केन्स न्यूक्लियोफिलिक प्रतिस्थापन अभिक्रियाएँ आसानी से करते हैं, जबकि हैलोएरीन्स में अनुनाद के कारण C–X बंध अधिक मजबूत होता है, इसलिए वे कम अभिक्रियाशील होते हैं। यही कारण है कि दोनों वर्गों के रासायनिक गुणों में महत्वपूर्ण अंतर पाया जाता है।


2. C–X बंध ध्रुवीय क्यों होता है?

उत्तर:
कार्बन और हैलोजन के बीच विद्युतऋणात्मकता का अंतर होने के कारण C–X बंध ध्रुवीय सहसंयोजक बंध बनता है। हैलोजन कार्बन की अपेक्षा अधिक विद्युतऋणात्मक होता है, इसलिए साझा इलेक्ट्रॉन युग्म हैलोजन की ओर खिंच जाता है। परिणामस्वरूप कार्बन पर आंशिक धनात्मक आवेश (δ⁺) तथा हैलोजन पर आंशिक ऋणात्मक आवेश (δ⁻) उत्पन्न हो जाता है। इसी ध्रुवीयता के कारण हैलोएल्केन्स न्यूक्लियोफिलिक प्रतिस्थापन अभिक्रियाएँ करते हैं। यह गुण इनके रासायनिक व्यवहार को नियंत्रित करता है और विभिन्न अभिक्रियाओं में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।


3. स्वार्ट्स अभिक्रिया क्या है?

उत्तर:
स्वार्ट्स अभिक्रिया वह प्रक्रिया है जिसमें एल्किल क्लोराइड या एल्किल ब्रोमाइड को धात्विक फ्लोराइड (जैसे AgF, Hg₂F₂, CoF₂) के साथ अभिक्रिया कराकर एल्किल फ्लोराइड बनाया जाता है। यह फ्लोरीन युक्त कार्बनिक यौगिकों के निर्माण की एक महत्वपूर्ण विधि है। इस अभिक्रिया में क्लोरीन या ब्रोमीन परमाणु का स्थान फ्लोरीन ले लेता है। उदाहरणतः
R–Cl + AgF → R–F + AgCl
इस विधि का उपयोग विशेष रूप से फ्लोरीन युक्त औषधियों और औद्योगिक रसायनों के निर्माण में किया जाता है।


4. फिंकेलस्टीन अभिक्रिया क्या है?

उत्तर:
फिंकेलस्टीन अभिक्रिया में एल्किल क्लोराइड या एल्किल ब्रोमाइड को शुष्क एसीटोन में सोडियम आयोडाइड (NaI) के साथ अभिक्रिया कराकर एल्किल आयोडाइड प्राप्त किया जाता है। यह एक हैलोजन विनिमय अभिक्रिया है। अभिक्रिया के दौरान NaCl या NaBr अवक्षेपित हो जाता है, जिससे अभिक्रिया आगे बढ़ती है।
R–Cl + NaI → R–I + NaCl
यह विधि शुद्ध एल्किल आयोडाइड तैयार करने के लिए प्रयोग की जाती है। बोर्ड परीक्षाओं में इसका सिद्धांत और कारण पूछे जाते हैं।


5. SN1 अभिक्रिया क्या है?

उत्तर:
SN1 (Substitution Nucleophilic Unimolecular) अभिक्रिया दो चरणों में होती है। पहले चरण में हैलोजन आयन निकलकर कार्बोकैटायन बनाता है, जो धीमा एवं दर-निर्धारक चरण होता है। दूसरे चरण में न्यूक्लियोफाइल कार्बोकैटायन पर आक्रमण करता है। इस अभिक्रिया की दर केवल सब्सट्रेट की सांद्रता पर निर्भर करती है। तृतीयक (3°) एल्किल हैलाइड SN1 अभिक्रिया सबसे तेजी से करते हैं क्योंकि उनसे स्थिर कार्बोकैटायन बनता है। यह अभिक्रिया ध्रुवीय प्रोटिक विलायकों में अधिक अनुकूल होती है।


6. SN2 अभिक्रिया क्या है?

उत्तर:
SN2 (Substitution Nucleophilic Bimolecular) अभिक्रिया एक ही चरण में सम्पन्न होती है। इसमें न्यूक्लियोफाइल पीछे की ओर से कार्बन परमाणु पर आक्रमण करता है और उसी समय हैलोजन समूह बाहर निकल जाता है। इस कारण इसे बैक-साइड अटैक कहते हैं। इसकी दर सब्सट्रेट और न्यूक्लियोफाइल दोनों की सांद्रता पर निर्भर करती है। प्राथमिक (1°) एल्किल हैलाइड SN2 अभिक्रिया सबसे तेजी से करते हैं क्योंकि उनमें स्थानिक अवरोध कम होता है। इस अभिक्रिया में विन्यास का व्युत्क्रमण (Walden inversion) भी देखा जाता है।


7. SN1 और SN2 अभिक्रियाओं में दो अंतर लिखिए।

उत्तर:
SN1 अभिक्रिया दो चरणों में होती है तथा इसमें कार्बोकैटायन मध्यवर्ती बनता है, जबकि SN2 अभिक्रिया एक चरणीय होती है और कोई मध्यवर्ती नहीं बनता। SN1 की दर केवल सब्सट्रेट की सांद्रता पर निर्भर करती है, जबकि SN2 की दर सब्सट्रेट और न्यूक्लियोफाइल दोनों पर निर्भर करती है। तृतीयक एल्किल हैलाइड SN1 के लिए तथा प्राथमिक एल्किल हैलाइड SN2 के लिए अधिक उपयुक्त होते हैं। SN2 में विन्यास का व्युत्क्रमण होता है जबकि SN1 में रेसिमीकरण देखा जा सकता है।


8. क्लोरोबेंजीन न्यूक्लियोफिलिक प्रतिस्थापन अभिक्रिया आसानी से क्यों नहीं करता?

उत्तर:
क्लोरोबेंजीन में क्लोरीन का एकाकी इलेक्ट्रॉन युग्म बेंजीन वलय के साथ अनुनाद करता है। इसके कारण C–Cl बंध में आंशिक द्विबंधीय गुण आ जाता है, जिससे बंध छोटा और मजबूत हो जाता है। साथ ही क्लोरीन sp² संकरित कार्बन से जुड़ा होता है। इसलिए C–Cl बंध को तोड़ना कठिन होता है। परिणामस्वरूप क्लोरोबेंजीन सामान्य परिस्थितियों में न्यूक्लियोफिलिक प्रतिस्थापन अभिक्रिया नहीं करता। यही कारण है कि हैलोएरीन्स की अभिक्रियाशीलता हैलोएल्केन्स से कम होती है।


9. वुर्ट्ज अभिक्रिया क्या है?

उत्तर:
वुर्ट्ज अभिक्रिया में दो एल्किल हैलाइड अणुओं को शुष्क ईथर की उपस्थिति में सोडियम धातु के साथ अभिक्रिया कराकर उच्च एल्केन प्राप्त किया जाता है।
2R–X + 2Na → R–R + 2NaX
यह अभिक्रिया सम संख्या वाले कार्बन परमाणुओं वाले एल्केन बनाने के लिए उपयोगी है। उदाहरणतः एथिल ब्रोमाइड से n-ब्यूटेन प्राप्त किया जा सकता है। यह कार्बन-कार्बन बंध निर्माण की महत्वपूर्ण विधि है और बोर्ड परीक्षाओं में अक्सर पूछी जाती है।


10. वुर्ट्ज-फिटिग अभिक्रिया क्या है?

उत्तर:
वुर्ट्ज-फिटिग अभिक्रिया में एक एल्किल हैलाइड और एक एरिल हैलाइड को सोडियम धातु तथा शुष्क ईथर की उपस्थिति में अभिक्रिया कराकर एल्किल बेंजीन प्राप्त किया जाता है।
Ar–X + R–X + 2Na → Ar–R + 2NaX
उदाहरण के लिए क्लोरोबेंजीन और मिथाइल क्लोराइड से टोल्यून प्राप्त किया जाता है। यह अभिक्रिया एरोमैटिक यौगिकों में एल्किल समूह जोड़ने की उपयोगी विधि है और कार्बनिक संश्लेषण में महत्वपूर्ण स्थान रखती है।


11. फिटिग अभिक्रिया क्या है?

उत्तर:
फिटिग अभिक्रिया में दो एरिल हैलाइड अणुओं को सोडियम धातु और शुष्क ईथर की उपस्थिति में अभिक्रिया कराकर बाइफिनाइल जैसे एरोमैटिक यौगिक प्राप्त किए जाते हैं।
2Ar–X + 2Na → Ar–Ar + 2NaX
यह अभिक्रिया एरोमैटिक कार्बन-कार्बन बंध निर्माण की एक महत्वपूर्ण विधि है। फिटिग अभिक्रिया का उपयोग विभिन्न सुगंधित यौगिकों के संश्लेषण में किया जाता है और यह CBSE बोर्ड परीक्षा में एक महत्वपूर्ण नामित अभिक्रिया है।


12. ग्रिगनार्ड अभिकर्मक क्या है?

उत्तर:
ग्रिगनार्ड अभिकर्मक ऑर्गेनोमैग्नीशियम यौगिक होते हैं जिनका सामान्य सूत्र RMgX होता है। इन्हें एल्किल या एरिल हैलाइड की मैग्नीशियम धातु के साथ शुष्क ईथर में अभिक्रिया कराकर बनाया जाता है।
R–X + Mg → RMgX
ये अत्यंत अभिक्रियाशील होते हैं तथा कार्बन-कार्बन बंध निर्माण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। जल की उपस्थिति में ये विघटित हो जाते हैं, इसलिए इन्हें शुष्क माध्यम में तैयार किया जाता है। कार्बनिक संश्लेषण में इनका विशेष महत्व है।


13. पॉलीहैलोजन यौगिक क्या हैं?

उत्तर:
वे यौगिक जिनमें एक से अधिक हैलोजन परमाणु उपस्थित होते हैं, पॉलीहैलोजन यौगिक कहलाते हैं। उदाहरणतः क्लोरोफॉर्म (CHCl₃), कार्बन टेट्राक्लोराइड (CCl₄), DDT तथा आयोडोफॉर्म (CHI₃)। इनका उपयोग विलायक, कीटनाशक तथा औद्योगिक रसायनों के रूप में किया जाता है। कुछ पॉलीहैलोजन यौगिक पर्यावरण और स्वास्थ्य के लिए हानिकारक भी होते हैं। इसलिए इनके उपयोग पर नियंत्रण रखा जाता है। इनके गुण और उपयोग बोर्ड परीक्षा में महत्वपूर्ण हैं।


14. क्लोरोफॉर्म के दो उपयोग लिखिए।

उत्तर:
क्लोरोफॉर्म (CHCl₃) एक रंगहीन, मीठी गंध वाला द्रव है। इसका उपयोग मुख्य रूप से कार्बनिक यौगिकों के विलायक के रूप में किया जाता है। पहले इसे शल्य चिकित्सा में निश्चेतक (Anaesthetic) के रूप में भी प्रयोग किया जाता था, लेकिन इसके विषैले प्रभावों के कारण अब इसका उपयोग सीमित हो गया है। इसके अतिरिक्त यह रंग, औषधि तथा अन्य रासायनिक उत्पादों के निर्माण में भी प्रयुक्त होता है। क्लोरोफॉर्म एक महत्वपूर्ण पॉलीहैलोजन यौगिक है।


15. DDT क्या है? इसके उपयोग बताइए।

उत्तर:
DDT (Dichloro Diphenyl Trichloroethane) एक शक्तिशाली कीटनाशक है। इसका उपयोग पहले मच्छरों, मक्खियों तथा कृषि कीटों को नष्ट करने के लिए व्यापक रूप से किया जाता था। यह अत्यधिक स्थायी (Persistent) होता है तथा पर्यावरण में लंबे समय तक बना रहता है। जैव आवर्धन (Biomagnification) के कारण यह खाद्य श्रृंखला में जमा होकर जीवों को हानि पहुँचा सकता है। इसी कारण अनेक देशों में इसके उपयोग पर प्रतिबंध या नियंत्रण लगाया गया है। यह पर्यावरणीय रसायन विज्ञान का महत्वपूर्ण उदाहरण है।


16. हैलोएल्केन्स की अभिक्रियाशीलता क्रम RI > RBr > RCl > RF क्यों होता है?

उत्तर:
हैलोएल्केन्स की अभिक्रियाशीलता मुख्यतः C–X बंध की दृढ़ता पर निर्भर करती है। C–I बंध सबसे कमजोर तथा C–F बंध सबसे मजबूत होता है। कमजोर बंध आसानी से टूटता है, इसलिए आयोडोएल्केन सबसे अधिक अभिक्रियाशील होते हैं। इसके विपरीत फ्लोरोएल्केन में C–F बंध अत्यंत मजबूत होने के कारण उसका टूटना कठिन होता है। इसलिए न्यूक्लियोफिलिक प्रतिस्थापन अभिक्रियाओं में अभिक्रियाशीलता का क्रम RI > RBr > RCl > RF पाया जाता है।


17. न्यूक्लियोफाइल किसे कहते हैं?

उत्तर:
वे आयन या अणु जिनमें इलेक्ट्रॉनों का अतिरिक्त युग्म होता है तथा जो इलेक्ट्रॉन-अल्प (धनात्मक) केंद्र पर आक्रमण कर सकते हैं, न्यूक्लियोफाइल कहलाते हैं। उदाहरण के लिए OH⁻, CN⁻, NH₃, H₂O आदि। न्यूक्लियोफाइल इलेक्ट्रॉन युग्म दान करके नया सहसंयोजक बंध बनाते हैं। हैलोएल्केन्स की न्यूक्लियोफिलिक प्रतिस्थापन अभिक्रियाओं में इनकी महत्वपूर्ण भूमिका होती है। न्यूक्लियोफाइल की शक्ति और संरचना अभिक्रिया की गति को प्रभावित करती है।


18. एम्बीडेंट न्यूक्लियोफाइल क्या हैं?

उत्तर:
वे न्यूक्लियोफाइल जिनमें दो अलग-अलग परमाणुओं के माध्यम से आक्रमण करने की क्षमता होती है, एम्बीडेंट न्यूक्लियोफाइल कहलाते हैं। उदाहरण के लिए CN⁻ आयन कार्बन अथवा नाइट्रोजन दोनों के माध्यम से अभिक्रिया कर सकता है। इसी प्रकार NO₂⁻ भी दो भिन्न केंद्रों से आक्रमण कर सकता है। विभिन्न अभिक्रिया परिस्थितियों में अलग-अलग उत्पाद प्राप्त हो सकते हैं। एम्बीडेंट न्यूक्लियोफाइलों का अध्ययन कार्बनिक अभिक्रियाओं की चयनात्मकता को समझने में सहायक होता है।


19. क्लोरोबेंजीन इलेक्ट्रोफिलिक प्रतिस्थापन अभिक्रिया कहाँ कराता है?

उत्तर:
क्लोरोबेंजीन में क्लोरीन परमाणु अनुनाद के माध्यम से बेंजीन वलय को इलेक्ट्रॉन प्रदान करता है। परिणामस्वरूप ऑर्थो तथा पैरा स्थानों पर इलेक्ट्रॉन घनत्व बढ़ जाता है। इसलिए नाइट्रेशन, सल्फोनेशन तथा हैलोजनीकरण जैसी इलेक्ट्रोफिलिक प्रतिस्थापन अभिक्रियाएँ मुख्यतः ऑर्थो और पैरा स्थानों पर होती हैं। यद्यपि क्लोरीन की –I प्रभाव के कारण वलय की सक्रियता कुछ कम हो जाती है, फिर भी यह ऑर्थो-पैरा निर्देशक समूह के रूप में कार्य करता है।


20. हैलोएल्केन्स के प्रमुख उपयोग लिखिए।

उत्तर:
हैलोएल्केन्स का उपयोग औषधियों, शीतलक पदार्थों, विलायकों तथा कार्बनिक संश्लेषण में किया जाता है। अनेक हैलोएल्केन्स विभिन्न रासायनिक यौगिकों के निर्माण में मध्यवर्ती (Intermediate) के रूप में प्रयुक्त होते हैं। कुछ यौगिक अग्निशामक, कीटनाशक तथा औद्योगिक उत्पादों के निर्माण में उपयोगी हैं। ग्रिगनार्ड अभिकर्मक तथा अन्य कार्बनिक यौगिकों के संश्लेषण में भी इनकी महत्वपूर्ण भूमिका है। आधुनिक रासायनिक उद्योग में हैलोएल्केन्स का व्यापक महत्व है।