CBSE कक्षा 12 जीवविज्ञान (2026-27)

अध्याय 5: आणविक वंशागति का आधार (Molecular Basis of Inheritance)

20 महत्वपूर्ण प्रश्न एवं उत्तर

1. DNA की द्विकुंडली (Double Helix) संरचना का वर्णन कीजिए।

उत्तर:
DNA की द्विकुंडली संरचना का प्रतिपादन James Watson एवं Francis Crick ने 1953 में किया। DNA दो पॉलीन्यूक्लियोटाइड श्रृंखलाओं से बना होता है जो एक-दूसरे के विपरीत दिशा (Antiparallel) में व्यवस्थित रहती हैं। प्रत्येक न्यूक्लियोटाइड में डिऑक्सीराइबोज शर्करा, फॉस्फेट समूह तथा नाइट्रोजनी क्षारक होते हैं। एडेनिन (A) थाइमिन (T) से दो हाइड्रोजन बंधों द्वारा तथा ग्वानिन (G) साइटोसिन (C) से तीन हाइड्रोजन बंधों द्वारा जुड़ा रहता है। DNA का व्यास 2 nm तथा एक कुंडली में लगभग 10 क्षार युग्म होते हैं। यह संरचना आनुवंशिक सूचनाओं के संग्रहण और स्थानांतरण के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है।


2. चार्गाफ के नियम (Chargaff’s Rule) क्या हैं?

उत्तर:
चार्गाफ ने DNA के क्षारकों की मात्रा का अध्ययन कर महत्वपूर्ण नियम प्रस्तुत किए। उनके अनुसार द्विसूत्री DNA में एडेनिन (A) की मात्रा थाइमिन (T) के बराबर तथा ग्वानिन (G) की मात्रा साइटोसिन (C) के बराबर होती है। अर्थात A = T तथा G = C। इसके अतिरिक्त कुल प्यूरिन (A+G) की मात्रा कुल पिरिमिडीन (T+C) के बराबर होती है। ये नियम DNA की द्विकुंडली संरचना को समझाने में अत्यंत सहायक सिद्ध हुए। Watson और Crick ने भी अपनी DNA मॉडल की पुष्टि के लिए इन नियमों का उपयोग किया। DNA की स्थिरता और आनुवंशिक सूचना के संरक्षण में इन नियमों का विशेष महत्व है।


3. ग्रिफिथ के रूपांतरण प्रयोग का वर्णन कीजिए।

उत्तर:
1928 में Frederick Griffith ने Streptococcus pneumoniae जीवाणु पर प्रयोग किया। उन्होंने रोगजनक S-प्रकार और गैर-रोगजनक R-प्रकार जीवाणुओं का उपयोग किया। जब जीवित R-प्रकार को मृत S-प्रकार के साथ चूहों में प्रविष्ट कराया गया तो चूहे मर गए और उनके शरीर से जीवित S-प्रकार प्राप्त हुए। इससे निष्कर्ष निकला कि मृत S-प्रकार से कोई “रूपांतरणकारी पदार्थ” R-प्रकार में स्थानांतरित होकर उसे रोगजनक बना देता है। इस प्रयोग ने आनुवंशिक पदार्थ की खोज का मार्ग प्रशस्त किया। बाद में Avery, MacLeod और McCarty ने सिद्ध किया कि यह रूपांतरणकारी पदार्थ DNA है।


4. हर्शी एवं चेस प्रयोग का महत्व बताइए।

उत्तर:
1952 में Alfred Hershey और Martha Chase ने बैक्टीरियोफेज वायरस का उपयोग करके सिद्ध किया कि DNA ही आनुवंशिक पदार्थ है। उन्होंने DNA को रेडियोधर्मी फॉस्फोरस (³²P) तथा प्रोटीन को रेडियोधर्मी सल्फर (³⁵S) से चिह्नित किया। संक्रमण के बाद पाया गया कि केवल DNA जीवाणु कोशिकाओं में प्रवेश करता है जबकि प्रोटीन बाहर ही रहता है। इससे स्पष्ट हुआ कि आनुवंशिक सूचना DNA द्वारा वहन की जाती है। यह प्रयोग DNA को आनुवंशिक पदार्थ सिद्ध करने वाला निर्णायक प्रमाण माना जाता है।


5. अर्ध-संरक्षी प्रतिकृति (Semiconservative Replication) क्या है?

उत्तर:
DNA प्रतिकृति की अर्ध-संरक्षी प्रकृति का अर्थ है कि नई DNA अणु में एक पुरानी तथा एक नई श्रृंखला उपस्थित होती है। इस सिद्धांत का प्रतिपादन Watson और Crick ने किया तथा बाद में Matthew Meselson एवं Franklin Stahl ने 1958 में प्रयोग द्वारा इसकी पुष्टि की। उन्होंने E. coli को ¹⁵N तथा ¹⁴N माध्यम में उगाकर घनत्व प्रवणता अपकेंद्रण तकनीक का प्रयोग किया। परिणामों से सिद्ध हुआ कि प्रत्येक नई DNA अणु में एक मूल श्रृंखला सुरक्षित रहती है। यह प्रक्रिया आनुवंशिक स्थिरता बनाए रखने में सहायक होती है।


6. ओकाजाकी खंड (Okazaki Fragments) क्या हैं?

उत्तर:
DNA प्रतिकृति के दौरान अग्रगामी (Leading) श्रृंखला का संश्लेषण निरंतर होता है, जबकि पश्चगामी (Lagging) श्रृंखला का संश्लेषण छोटे-छोटे खंडों में होता है। इन खंडों को ओकाजाकी खंड कहते हैं। इनकी खोज Reiji Okazaki ने की थी। प्रत्येक खंड RNA प्राइमर से प्रारंभ होता है तथा DNA पॉलिमरेज़ द्वारा बढ़ाया जाता है। बाद में DNA लाइगेज़ एंजाइम इन खंडों को जोड़कर एक सतत श्रृंखला बनाता है। ओकाजाकी खंड DNA प्रतिकृति की दिशा संबंधी समस्या को हल करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।


7. प्रतिलेखन (Transcription) क्या है?

उत्तर:
प्रतिलेखन वह प्रक्रिया है जिसमें DNA की एक श्रृंखला को साँचे (Template) के रूप में उपयोग कर RNA का निर्माण किया जाता है। यह प्रक्रिया RNA पॉलिमरेज़ एंजाइम द्वारा संपन्न होती है। प्रतिलेखन के दौरान DNA का केवल एक भाग पढ़ा जाता है और उसके अनुरूप RNA संश्लेषित होता है। यूकैरियोट्स में प्रारंभिक RNA को hnRNA कहते हैं, जिसमें बाद में कैपिंग, टेलिंग और स्प्लाइसिंग की प्रक्रियाएँ होती हैं। परिणामस्वरूप परिपक्व mRNA बनता है जो प्रोटीन संश्लेषण में भाग लेता है। यह प्रक्रिया जीन अभिव्यक्ति का प्रथम चरण है।


8. आनुवंशिक कूट (Genetic Code) की चार विशेषताएँ लिखिए।

उत्तर:
आनुवंशिक कूट वह व्यवस्था है जिसके द्वारा mRNA के कोडॉन अमीनो अम्लों को निर्दिष्ट करते हैं। इसकी प्रमुख विशेषताएँ हैं—
(1) यह त्रिक (Triplet) होता है, अर्थात एक कोडॉन में तीन न्यूक्लियोटाइड होते हैं।
(2) यह सार्वभौमिक (Universal) है, अर्थात अधिकांश जीवों में समान रहता है।
(3) यह अपसारी (Degenerate) है, क्योंकि एक अमीनो अम्ल के लिए अनेक कोडॉन हो सकते हैं।
(4) यह असंदिग्ध (Unambiguous) है, क्योंकि एक कोडॉन केवल एक अमीनो अम्ल को ही दर्शाता है। AUG प्रारंभ कोडॉन तथा UAA, UAG एवं UGA समापन कोडॉन कहलाते हैं।


9. tRNA को अनुकूलक अणु (Adaptor Molecule) क्यों कहा जाता है?

उत्तर:
tRNA को अनुकूलक अणु कहा जाता है क्योंकि यह mRNA और अमीनो अम्लों के बीच सेतु का कार्य करता है। इसके एक सिरे पर विशिष्ट अमीनो अम्ल जुड़ता है जबकि दूसरे सिरे पर एंटीकोडॉन उपस्थित होता है। एंटीकोडॉन mRNA के पूरक कोडॉन से जुड़ता है। इस प्रकार tRNA सही अमीनो अम्ल को राइबोसोम तक पहुँचाकर प्रोटीन संश्लेषण सुनिश्चित करता है। यदि tRNA न हो तो आनुवंशिक सूचना को प्रोटीन के रूप में व्यक्त करना संभव नहीं होगा। इसलिए इसे अनुकूलक अणु कहा जाता है।


10. अनुवादन (Translation) क्या है?

उत्तर:
अनुवादन वह प्रक्रिया है जिसमें mRNA पर उपस्थित आनुवंशिक सूचना के आधार पर प्रोटीन का निर्माण होता है। यह प्रक्रिया राइबोसोम पर संपन्न होती है। सर्वप्रथम tRNA अमीनो अम्लों को राइबोसोम तक लाता है। mRNA के कोडॉन तथा tRNA के एंटीकोडॉन के बीच पूरक युग्मन होता है। इसके बाद पेप्टाइड बंध बनते हैं और अमीनो अम्ल क्रमशः जुड़ते जाते हैं। जब समापन कोडॉन प्राप्त होता है, तब प्रोटीन संश्लेषण समाप्त हो जाता है। यह जीन अभिव्यक्ति का अंतिम चरण है।


11. लैक ऑपेरॉन (Lac Operon) क्या है?

उत्तर:
लैक ऑपेरॉन जीन नियमन का एक मॉडल है जिसे Francois Jacob और Jacques Monod ने प्रस्तुत किया। यह E. coli में लैक्टोज के उपापचय को नियंत्रित करता है। इसमें नियामक जीन (i), प्रमोटर, ऑपरेटर तथा तीन संरचनात्मक जीन (z, y, a) होते हैं। लैक्टोज की अनुपस्थिति में रिप्रेसर ऑपरेटर से जुड़कर प्रतिलेखन रोक देता है। लैक्टोज की उपस्थिति में रिप्रेसर निष्क्रिय हो जाता है और जीन सक्रिय हो जाते हैं। यह प्रेरणीय (Inducible) ऑपेरॉन का उदाहरण है।


12. मानव जीनोम परियोजना (HGP) के उद्देश्य लिखिए।

उत्तर:
Human Genome Project का मुख्य उद्देश्य मानव DNA में उपस्थित सभी जीनों तथा न्यूक्लियोटाइड अनुक्रमों की पहचान करना था। इसके अंतर्गत मानव जीनों का मानचित्रण, DNA अनुक्रमण, आनुवंशिक रोगों से संबंधित जीनों की पहचान तथा जैव-सूचनाविज्ञान डेटाबेस का विकास किया गया। इस परियोजना से मानव विकास, रोग निदान तथा जीन चिकित्सा के क्षेत्र में नई संभावनाएँ विकसित हुईं। परियोजना 1990 में प्रारंभ हुई और 2003 में पूर्ण हुई।


13. मानव जीनोम की चार प्रमुख विशेषताएँ लिखिए।

उत्तर:
मानव जीनोम परियोजना से प्राप्त प्रमुख निष्कर्ष निम्नलिखित हैं—
(1) मानव जीनोम में लगभग 3 अरब क्षार युग्म होते हैं।
(2) लगभग 20,000–25,000 जीन पाए जाते हैं।
(3) केवल लगभग 2% DNA प्रोटीन निर्माण के लिए कूटबद्ध करता है।
(4) सभी मनुष्यों के DNA में लगभग 99.9% समानता होती है।
इन तथ्यों से स्पष्ट हुआ कि मानवों में आनुवंशिक विविधता बहुत कम है तथा अधिकांश DNA नियामक एवं पुनरावृत्त अनुक्रमों से बना है।


14. DNA फिंगरप्रिंटिंग क्या है?

उत्तर:
DNA फिंगरप्रिंटिंग एक आणविक तकनीक है जिसके द्वारा किसी व्यक्ति की विशिष्ट आनुवंशिक पहचान की जाती है। इसका विकास Alec Jeffreys ने 1985 में किया। यह तकनीक DNA में उपस्थित VNTR (Variable Number Tandem Repeats) अनुक्रमों पर आधारित है। प्रत्येक व्यक्ति में इन अनुक्रमों का पैटर्न अलग होता है। इसका उपयोग अपराधियों की पहचान, पितृत्व परीक्षण, जैव-विविधता अध्ययन तथा न्यायिक मामलों में किया जाता है। यह आधुनिक जैव-प्रौद्योगिकी की अत्यंत महत्वपूर्ण उपलब्धि है।


15. RNA विश्व परिकल्पना क्या है?

उत्तर:
RNA विश्व परिकल्पना के अनुसार पृथ्वी पर जीवन की प्रारंभिक अवस्था में RNA ही आनुवंशिक पदार्थ और उत्प्रेरक दोनों का कार्य करता था। RNA में स्व-प्रतिकृति तथा रासायनिक अभिक्रियाओं को उत्प्रेरित करने की क्षमता होती है। ऐसे उत्प्रेरक RNA को राइबोजाइम कहा जाता है। बाद में DNA अधिक स्थिर होने के कारण आनुवंशिक पदार्थ बन गया तथा प्रोटीन प्रमुख एंजाइम के रूप में विकसित हुए। यह परिकल्पना जीवन की उत्पत्ति और जैव-अणुओं के विकास को समझाने में महत्वपूर्ण मानी जाती है।


16. DNA पैकेजिंग क्या है?

उत्तर:
यूकैरियोटिक कोशिकाओं में DNA की लंबाई बहुत अधिक होती है, इसलिए उसे केंद्रक में समाहित करने के लिए विशेष पैकेजिंग की आवश्यकता होती है। DNA हिस्टोन प्रोटीनों के चारों ओर लिपटकर न्यूक्लियोसोम बनाता है। प्रत्येक न्यूक्लियोसोम में लगभग 146 क्षार युग्म DNA होते हैं। न्यूक्लियोसोम आगे संघनित होकर क्रोमैटिन तंतु बनाते हैं, जो कोशिका विभाजन के समय गुणसूत्रों का निर्माण करते हैं। DNA पैकेजिंग आनुवंशिक पदार्थ की सुरक्षा तथा जीन अभिव्यक्ति के नियमन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है।


17. सेंट्रल डॉग्मा (Central Dogma) क्या है?

उत्तर:
सेंट्रल डॉग्मा का प्रतिपादन Francis Crick ने किया था। इसके अनुसार आनुवंशिक सूचना का प्रवाह DNA से RNA और RNA से प्रोटीन की ओर होता है। DNA प्रतिकृति द्वारा अपनी प्रतियाँ बनाता है, प्रतिलेखन द्वारा RNA का निर्माण करता है तथा RNA अनुवादन द्वारा प्रोटीन बनाता है। इसे DNA → RNA → Protein के रूप में दर्शाया जाता है। यह सिद्धांत जीवों में आनुवंशिक सूचना की अभिव्यक्ति और नियंत्रण को समझाने का आधार है।


18. उत्परिवर्तन (Mutation) क्या है?

उत्तर:
DNA के न्यूक्लियोटाइड अनुक्रम में होने वाले स्थायी परिवर्तन को उत्परिवर्तन कहते हैं। यह स्वतः या विकिरण, रसायनों तथा अन्य उत्परिवर्तकों के प्रभाव से हो सकता है। उत्परिवर्तन के कारण जीन की संरचना या कार्य में परिवर्तन आ सकता है। कुछ उत्परिवर्तन लाभकारी होते हैं और विकासक्रम में योगदान देते हैं, जबकि कुछ हानिकारक होकर आनुवंशिक रोग उत्पन्न कर सकते हैं। जीन उत्परिवर्तन तथा गुणसूत्रीय उत्परिवर्तन इसके प्रमुख प्रकार हैं।


19. DNA और RNA में अंतर लिखिए।

उत्तर:
DNA तथा RNA दोनों न्यूक्लिक अम्ल हैं, परंतु इनमें कई अंतर हैं। DNA में डिऑक्सीराइबोज शर्करा तथा थाइमिन पाया जाता है, जबकि RNA में राइबोज शर्करा तथा यूरैसिल पाया जाता है। DNA सामान्यतः द्विसूत्री होता है जबकि RNA प्रायः एकसूत्री होता है। DNA आनुवंशिक सूचना का संग्रहण करता है, जबकि RNA प्रोटीन संश्लेषण में भाग लेता है। DNA अधिक स्थिर होता है जबकि RNA अपेक्षाकृत कम स्थिर होता है। ये दोनों अणु कोशिका की आनुवंशिक क्रियाओं के लिए आवश्यक हैं।


20. DNA पॉलिमरेज़ का कार्य क्या है?

उत्तर:
DNA पॉलिमरेज़ DNA प्रतिकृति में भाग लेने वाला प्रमुख एंजाइम है। इसका मुख्य कार्य साँचे (Template) DNA के अनुरूप नए न्यूक्लियोटाइड जोड़कर नई DNA श्रृंखला बनाना है। यह केवल 5′ से 3′ दिशा में कार्य करता है और संश्लेषण प्रारंभ करने के लिए RNA प्राइमर की आवश्यकता होती है। DNA पॉलिमरेज़ प्रतिकृति की शुद्धता बनाए रखने के लिए त्रुटियों का सुधार (Proofreading) भी करता है। इस प्रकार यह आनुवंशिक सूचना के सही संचरण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।