CBSE कक्षा 12 जीवविज्ञान (2026-27)
अध्याय 12 – पारितंत्र (Ecosystem)
20 महत्वपूर्ण प्रश्न एवं उत्तर
पारितंत्र अध्याय में पारितंत्र की संरचना, उत्पादकता, अपघटन, ऊर्जा प्रवाह तथा पारिस्थितिक पिरामिड प्रमुख विषय हैं। यह अध्याय CBSE 2026-27 पाठ्यक्रम में शामिल है।
1. पारितंत्र (Ecosystem) क्या है? इसके मुख्य घटकों का वर्णन कीजिए।
उत्तर:
पारितंत्र प्रकृति की एक क्रियात्मक इकाई है, जिसमें जीवधारी (जैविक घटक) तथा उनका भौतिक पर्यावरण (अजैविक घटक) परस्पर क्रिया करते हैं। जैविक घटकों में उत्पादक, उपभोक्ता तथा अपघटक शामिल होते हैं। उत्पादक हरे पौधे होते हैं जो प्रकाश संश्लेषण द्वारा भोजन बनाते हैं। उपभोक्ता प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से पौधों पर निर्भर रहते हैं। अपघटक मृत जैव पदार्थों का विघटन करते हैं। अजैविक घटकों में जल, वायु, प्रकाश, तापमान तथा खनिज लवण शामिल हैं। इन सभी घटकों की पारस्परिक क्रियाओं से ऊर्जा प्रवाह और पोषक चक्र संचालित होते हैं, जिससे पारितंत्र संतुलित बना रहता है।
2. उत्पादक, उपभोक्ता तथा अपघटक में अंतर स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
उत्पादक वे स्वपोषी जीव होते हैं जो सूर्य के प्रकाश की सहायता से भोजन बनाते हैं। उदाहरण—हरे पौधे। उपभोक्ता परपोषी जीव होते हैं जो अपना भोजन स्वयं नहीं बना सकते और अन्य जीवों पर निर्भर रहते हैं। शाकाहारी, मांसाहारी तथा सर्वाहारी सभी उपभोक्ता हैं। अपघटक मुख्यतः जीवाणु एवं कवक होते हैं, जो मृत पौधों और जन्तुओं का विघटन कर पोषक तत्वों को पुनः पर्यावरण में लौटाते हैं। उत्पादक ऊर्जा का स्रोत हैं, उपभोक्ता ऊर्जा का उपयोग करते हैं तथा अपघटक पदार्थों के पुनर्चक्रण में सहायता करते हैं। इस प्रकार तीनों मिलकर पारितंत्र को कार्यशील बनाए रखते हैं।
3. प्राथमिक उत्पादकता तथा द्वितीयक उत्पादकता में अंतर लिखिए।
उत्तर:
प्राथमिक उत्पादकता वह दर है जिस पर हरे पौधे प्रकाश संश्लेषण द्वारा जैवभार का निर्माण करते हैं। इसे प्रति इकाई क्षेत्रफल और समय में मापा जाता है। दूसरी ओर, द्वितीयक उत्पादकता वह दर है जिस पर उपभोक्ता जीव भोजन से प्राप्त ऊर्जा को अपने जैवभार में परिवर्तित करते हैं। प्राथमिक उत्पादकता सीधे सूर्य ऊर्जा पर आधारित होती है, जबकि द्वितीयक उत्पादकता प्राथमिक उत्पादकों पर निर्भर करती है। किसी भी पारितंत्र में ऊर्जा का मूल स्रोत प्राथमिक उत्पादकता ही होती है। दोनों प्रकार की उत्पादकता पारितंत्र की कार्यक्षमता और जैविक उत्पादन क्षमता को दर्शाती हैं।
4. GPP तथा NPP में अंतर स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
सकल प्राथमिक उत्पादकता (GPP) वह कुल जैविक पदार्थ है जो पौधों द्वारा प्रकाश संश्लेषण के माध्यम से निर्मित किया जाता है। इस ऊर्जा का कुछ भाग पौधों की श्वसन क्रियाओं में खर्च हो जाता है। श्वसन के बाद बची हुई ऊर्जा को शुद्ध प्राथमिक उत्पादकता (NPP) कहते हैं। NPP ही वह ऊर्जा है जो आगे उपभोक्ताओं के लिए उपलब्ध रहती है। इसका संबंध निम्न प्रकार से व्यक्त किया जाता है:
NPP = GPP – श्वसन हानि
इस प्रकार GPP कुल उत्पादन को तथा NPP वास्तविक उपलब्ध उत्पादन को दर्शाता है। पारितंत्र की उत्पादकता का मूल्यांकन करने में दोनों महत्वपूर्ण हैं।
5. अपघटन (Decomposition) क्या है?
उत्तर:
अपघटन वह प्रक्रिया है जिसमें मृत पौधों, जन्तुओं तथा अन्य कार्बनिक पदार्थों को सूक्ष्मजीव सरल अकार्बनिक पदार्थों में परिवर्तित कर देते हैं। यह कार्य मुख्यतः जीवाणु और कवक करते हैं। अपघटन के परिणामस्वरूप कार्बन डाइऑक्साइड, जल तथा खनिज लवण मुक्त होते हैं। यह प्रक्रिया पोषक तत्वों के पुनर्चक्रण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। यदि अपघटक न हों तो मृत जैव पदार्थों का अत्यधिक संचय हो जाएगा और पोषक तत्व पुनः पर्यावरण में नहीं लौट पाएँगे। इसलिए अपघटन पारितंत्र के संतुलन और स्थिरता के लिए अत्यंत आवश्यक है।
6. अपघटन की विभिन्न अवस्थाओं का वर्णन कीजिए।
उत्तर:
अपघटन पाँच प्रमुख चरणों में सम्पन्न होता है—विखंडन (Fragmentation), लीचिंग (Leaching), अपचयन/अपघटन (Catabolism), ह्यूमीकरण (Humification) तथा खनिजीकरण (Mineralisation)। विखंडन में डिट्राइटिवोर मृत पदार्थों को छोटे टुकड़ों में तोड़ते हैं। लीचिंग में जल के द्वारा घुलनशील पदार्थ नीचे पहुँच जाते हैं। कैटाबोलिज्म में सूक्ष्मजीव जटिल पदार्थों को सरल पदार्थों में बदलते हैं। ह्यूमीकरण से ह्यूमस का निर्माण होता है। अंत में खनिजीकरण द्वारा पोषक तत्व अकार्बनिक रूप में मुक्त हो जाते हैं। ये सभी चरण पोषक तत्वों के पुनर्चक्रण में सहायता करते हैं।
7. खाद्य श्रृंखला (Food Chain) क्या है?
उत्तर:
खाद्य श्रृंखला जीवों के बीच भोजन और ऊर्जा के स्थानांतरण का क्रम है। इसमें ऊर्जा उत्पादकों से प्रारम्भ होकर विभिन्न उपभोक्ताओं तक पहुँचती है। उदाहरण के लिए—घास → टिड्डा → मेंढक → साँप → बाज। प्रत्येक स्तर को पोषण स्तर (Trophic Level) कहा जाता है। खाद्य श्रृंखला में ऊर्जा का प्रवाह एकदिशीय होता है और प्रत्येक स्तर पर कुछ ऊर्जा ऊष्मा के रूप में नष्ट हो जाती है। खाद्य श्रृंखला पारितंत्र में जीवों की पारस्परिक निर्भरता को प्रदर्शित करती है तथा ऊर्जा प्रवाह को समझने में सहायता करती है।
8. खाद्य जाल (Food Web) क्या है?
उत्तर:
जब अनेक खाद्य श्रृंखलाएँ आपस में जुड़ जाती हैं तो खाद्य जाल का निर्माण होता है। प्राकृतिक परिस्थितियों में कोई भी जीव केवल एक ही प्रकार के भोजन पर निर्भर नहीं रहता, इसलिए कई खाद्य श्रृंखलाएँ परस्पर संबद्ध होती हैं। खाद्य जाल पारितंत्र को अधिक स्थिर बनाता है क्योंकि किसी एक जीव की संख्या घटने पर अन्य वैकल्पिक मार्ग उपलब्ध रहते हैं। यह जीवों के बीच जटिल संबंधों और ऊर्जा प्रवाह को दर्शाता है। खाद्य जाल जैव विविधता बनाए रखने और पारितंत्र के संतुलन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।
9. पोषण स्तर (Trophic Level) क्या है?
उत्तर:
खाद्य श्रृंखला में प्रत्येक चरण या स्तर को पोषण स्तर कहा जाता है। प्रथम पोषण स्तर पर उत्पादक होते हैं। द्वितीय स्तर पर प्राथमिक उपभोक्ता, तृतीय स्तर पर द्वितीयक उपभोक्ता तथा चतुर्थ स्तर पर तृतीयक उपभोक्ता पाए जाते हैं। प्रत्येक स्तर पर ऊर्जा का एक भाग ऊष्मा के रूप में नष्ट हो जाता है, इसलिए उच्च पोषण स्तरों पर उपलब्ध ऊर्जा कम होती जाती है। पोषण स्तरों का अध्ययन ऊर्जा प्रवाह, जैवभार तथा पारिस्थितिक पिरामिडों को समझने के लिए आवश्यक है।
10. 10 प्रतिशत नियम (Ten Percent Law) क्या है?
उत्तर:
10 प्रतिशत नियम का प्रतिपादन लिंडेमैन ने किया था। इसके अनुसार किसी खाद्य श्रृंखला में एक पोषण स्तर से अगले पोषण स्तर तक केवल लगभग 10% ऊर्जा ही स्थानांतरित होती है। शेष 90% ऊर्जा जीवों की चयापचय क्रियाओं तथा ऊष्मा के रूप में नष्ट हो जाती है। उदाहरणतः यदि उत्पादकों में 10,000 कैलोरी ऊर्जा है, तो प्राथमिक उपभोक्ताओं को लगभग 1,000 कैलोरी तथा द्वितीयक उपभोक्ताओं को केवल 100 कैलोरी ऊर्जा प्राप्त होगी। यही कारण है कि खाद्य श्रृंखलाएँ सामान्यतः छोटी होती हैं।
11. पारिस्थितिक पिरामिड क्या हैं?
उत्तर:
पारिस्थितिक पिरामिड किसी पारितंत्र में विभिन्न पोषण स्तरों पर जीवों की संख्या, जैवभार अथवा ऊर्जा को दर्शाने वाले आरेख हैं। ये पिरामिड उत्पादकों से प्रारम्भ होकर शीर्ष उपभोक्ताओं तक बनते हैं। इनके अध्ययन से ऊर्जा वितरण तथा पारितंत्र की संरचना को समझा जा सकता है। मुख्यतः तीन प्रकार के पिरामिड होते हैं—संख्या पिरामिड, जैवभार पिरामिड तथा ऊर्जा पिरामिड। अधिकांश पारितंत्रों में ऊर्जा पिरामिड सदैव सीधा होता है क्योंकि ऊर्जा लगातार घटती जाती है।
12. संख्या पिरामिड का वर्णन कीजिए।
उत्तर:
संख्या पिरामिड किसी खाद्य श्रृंखला के विभिन्न पोषण स्तरों पर उपस्थित जीवों की संख्या को दर्शाता है। घासभूमि पारितंत्र में यह सामान्यतः सीधा होता है क्योंकि उत्पादकों की संख्या अधिक होती है और शीर्ष उपभोक्ताओं की संख्या कम होती है। वृक्ष आधारित पारितंत्र में यह उल्टा भी हो सकता है, क्योंकि एक वृक्ष पर अनेक कीट और पक्षी निर्भर रहते हैं। संख्या पिरामिड जीवों की जनसंख्या संरचना को समझने में सहायक होता है तथा पारितंत्र की जैविक व्यवस्था का चित्र प्रस्तुत करता है।
13. जैवभार पिरामिड क्या है?
उत्तर:
जैवभार पिरामिड विभिन्न पोषण स्तरों पर उपस्थित जीवों के कुल शुष्क भार को दर्शाता है। स्थलीय पारितंत्रों में यह सामान्यतः सीधा होता है क्योंकि उत्पादकों का जैवभार सर्वाधिक होता है। जलीय पारितंत्रों में यह उल्टा हो सकता है क्योंकि फाइटोप्लैंकटन का जैवभार कम होते हुए भी उनकी उत्पादकता अधिक होती है। जैवभार पिरामिड किसी पारितंत्र में जैविक पदार्थों के वितरण और ऊर्जा संचयन की स्थिति को समझने में उपयोगी है।
14. ऊर्जा पिरामिड सदैव सीधा क्यों होता है?
उत्तर:
ऊर्जा पिरामिड सदैव सीधा होता है क्योंकि खाद्य श्रृंखला के प्रत्येक पोषण स्तर पर ऊर्जा का एक बड़ा भाग ऊष्मा के रूप में नष्ट हो जाता है। ऊर्जा का प्रवाह एकदिशीय होता है और यह पुनः उत्पादकों तक नहीं लौटती। 10 प्रतिशत नियम के अनुसार अगले स्तर को केवल थोड़ी ऊर्जा प्राप्त होती है। परिणामस्वरूप उत्पादकों में सर्वाधिक ऊर्जा तथा शीर्ष उपभोक्ताओं में न्यूनतम ऊर्जा पाई जाती है। इसलिए ऊर्जा पिरामिड कभी उल्टा नहीं हो सकता।
15. चराई खाद्य श्रृंखला तथा अपरद खाद्य श्रृंखला में अंतर लिखिए।
उत्तर:
चराई खाद्य श्रृंखला (Grazing Food Chain) हरे पौधों से प्रारम्भ होती है और शाकाहारी तथा मांसाहारी जीवों तक जाती है। इसके विपरीत अपरद खाद्य श्रृंखला (Detritus Food Chain) मृत कार्बनिक पदार्थों से प्रारम्भ होती है। इसमें अपघटक और डिट्राइटिवोर प्रमुख भूमिका निभाते हैं। चराई खाद्य श्रृंखला में ऊर्जा सीधे उत्पादकों से प्राप्त होती है, जबकि अपरद खाद्य श्रृंखला में ऊर्जा मृत पदार्थों से मिलती है। दोनों प्रकार की खाद्य श्रृंखलाएँ पारितंत्र में ऊर्जा प्रवाह और पोषक तत्वों के पुनर्चक्रण को बनाए रखती हैं।
16. पोषक चक्रण (Nutrient Cycling) क्या है?
उत्तर:
पोषक चक्रण वह प्रक्रिया है जिसके द्वारा आवश्यक पोषक तत्व जैविक और अजैविक घटकों के बीच निरंतर संचरित होते रहते हैं। पौधे मिट्टी और वायुमंडल से पोषक तत्व ग्रहण करते हैं, जिन्हें उपभोक्ता भोजन के माध्यम से प्राप्त करते हैं। जीवों की मृत्यु के बाद अपघटक इन्हें पुनः पर्यावरण में लौटा देते हैं। इस प्रकार पोषक तत्वों का पुनर्चक्रण होता रहता है। कार्बन तथा फॉस्फोरस चक्र इसके प्रमुख उदाहरण हैं। पोषक चक्रण पारितंत्र की उत्पादकता बनाए रखने के लिए आवश्यक है।
17. कार्बन चक्र का संक्षिप्त वर्णन कीजिए।
उत्तर:
कार्बन चक्र वायुमंडल, जीवधारियों तथा पृथ्वी के अन्य घटकों के बीच कार्बन के संचरण को दर्शाता है। पौधे प्रकाश संश्लेषण द्वारा वायुमंडलीय कार्बन डाइऑक्साइड को ग्रहण करते हैं। यह कार्बन खाद्य श्रृंखला के माध्यम से अन्य जीवों तक पहुँचता है। श्वसन, अपघटन तथा जीवाश्म ईंधनों के दहन से कार्बन पुनः वायुमंडल में लौट आता है। महासागर कार्बन का एक प्रमुख भंडार हैं। कार्बन चक्र पृथ्वी के जलवायु संतुलन तथा जैविक प्रक्रियाओं के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है।
18. अपघटन को प्रभावित करने वाले कारक कौन-कौन से हैं?
उत्तर:
अपघटन की गति मुख्य रूप से तापमान, नमी, ऑक्सीजन की उपलब्धता तथा मृत पदार्थों की रासायनिक संरचना पर निर्भर करती है। उच्च तापमान और पर्याप्त नमी अपघटन को तेज करते हैं। अत्यधिक शुष्क या अत्यधिक ठंडी परिस्थितियों में अपघटन धीमा हो जाता है। लिग्निन और काइटिन जैसे जटिल पदार्थों का अपघटन कठिन होता है, जबकि शर्करा और प्रोटीन जैसे सरल पदार्थ जल्दी विघटित हो जाते हैं। इसलिए पर्यावरणीय तथा जैविक दोनों कारक अपघटन की दर को प्रभावित करते हैं।
19. तालाब पारितंत्र को आदर्श पारितंत्र क्यों माना जाता है?
उत्तर:
तालाब पारितंत्र एक स्व-नियंत्रित एवं स्व-स्थायी प्राकृतिक पारितंत्र है। इसमें सभी आवश्यक जैविक तथा अजैविक घटक उपस्थित होते हैं। शैवाल और जलीय पौधे उत्पादक का कार्य करते हैं, जबकि मछलियाँ, कीट तथा अन्य जीव उपभोक्ता के रूप में कार्य करते हैं। जीवाणु और कवक अपघटक का कार्य करते हैं। तालाब में ऊर्जा प्रवाह, खाद्य श्रृंखला, खाद्य जाल तथा पोषक चक्रण स्पष्ट रूप से देखा जा सकता है। इसी कारण इसे पारितंत्र के अध्ययन के लिए आदर्श उदाहरण माना जाता है।
20. पारितंत्र में अपघटकों का महत्व बताइए।
उत्तर:
अपघटक पारितंत्र के “प्राकृतिक सफाईकर्मी” कहलाते हैं। ये मृत पौधों, जन्तुओं तथा अपशिष्ट पदार्थों का विघटन करके उन्हें सरल अकार्बनिक पदार्थों में बदल देते हैं। इससे पोषक तत्व पुनः मिट्टी और जल में उपलब्ध हो जाते हैं, जिन्हें उत्पादक पुनः उपयोग करते हैं। अपघटक न केवल पोषक चक्रण को बनाए रखते हैं बल्कि मृत पदार्थों के संचय को भी रोकते हैं। इनके बिना पारितंत्र में पोषक तत्वों की कमी हो जाएगी और जीवन प्रक्रियाएँ बाधित हो जाएँगी। अतः अपघटक पारितंत्र के संतुलन और निरंतरता के लिए अत्यंत आवश्यक हैं।
