CBSE कक्षा 12 जीवविज्ञान (2026-27)
अध्याय 1: पुष्पीय पौधों में लैंगिक जनन (Sexual Reproduction in Flowering Plants)
20 महत्वपूर्ण प्रश्न एवं उत्तर
1. परागकण (Pollen Grain) की संरचना का वर्णन कीजिए।
उत्तर:
परागकण नर युग्मकोद्भिद (Male Gametophyte) की प्रारंभिक अवस्था है। इसकी बाहरी दीवार एक्साइन (Exine) कहलाती है, जो स्पोरोपोलेनिन नामक अत्यंत प्रतिरोधी पदार्थ से बनी होती है। एक्साइन में कुछ स्थानों पर जर्म पोर (Germ Pore) पाए जाते हैं जहाँ यह पतली होती है। अंदर की दीवार इंटाइन (Intine) कहलाती है, जो सेल्यूलोज एवं पेक्टिन से बनी होती है। परिपक्व परागकण सामान्यतः द्विकोषिकीय होता है, जिसमें एक जनन कोशिका (Generative Cell) तथा एक वानस्पतिक कोशिका (Vegetative Cell) होती है। जनन कोशिका बाद में दो नर युग्मकों का निर्माण करती है।
2. सूक्ष्मबीजाणुजनन (Microsporogenesis) क्या है?
उत्तर:
परागकोष (Anther) में स्थित सूक्ष्मबीजाणु मातृ कोशिकाओं (Microspore Mother Cells) से अर्धसूत्री विभाजन द्वारा सूक्ष्मबीजाणुओं के निर्माण की प्रक्रिया को सूक्ष्मबीजाणुजनन कहते हैं। प्रत्येक मातृ कोशिका अर्धसूत्री विभाजन के पश्चात चार अगुणित सूक्ष्मबीजाणु बनाती है, जिन्हें टेट्राड कहते हैं। ये सूक्ष्मबीजाणु बाद में अलग होकर परागकणों में विकसित होते हैं। यह प्रक्रिया पुष्पीय पौधों में नर युग्मकोद्भिद निर्माण का पहला चरण है। सूक्ष्मबीजाणुजनन के परिणामस्वरूप आनुवंशिक विविधता उत्पन्न होती है, जो पौधों के विकास एवं अनुकूलन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है।
3. मेगास्पोरोजेनेसिस (Megasporogenesis) को समझाइए।
उत्तर:
बीजांड (Ovule) के न्यूसेलस में स्थित मेगास्पोर मातृ कोशिका से अर्धसूत्री विभाजन द्वारा चार मेगास्पोर बनने की प्रक्रिया मेगास्पोरोजेनेसिस कहलाती है। सामान्यतः चार में से तीन मेगास्पोर नष्ट हो जाते हैं तथा एक क्रियाशील मेगास्पोर बचता है। यही क्रियाशील मेगास्पोर क्रमिक समसूत्री विभाजनों द्वारा भ्रूणकोष (Embryo Sac) का निर्माण करता है। यह प्रक्रिया मादा युग्मकोद्भिद निर्माण की शुरुआत है। भ्रूणकोष में अंड कोशिका, सहायक कोशिकाएँ, प्रतिपाद कोशिकाएँ तथा ध्रुवीय नाभिक उपस्थित रहते हैं, जो निषेचन में भाग लेते हैं।
4. भ्रूणकोष (Embryo Sac) की संरचना का वर्णन कीजिए।
उत्तर:
सामान्यतः आवृतबीजी पौधों में भ्रूणकोष 7-कोशिकीय एवं 8-नाभिकीय होता है। माइक्रोपाइलर सिरे पर एक अंड उपकरण (Egg Apparatus) होता है जिसमें एक अंड कोशिका और दो सहायक कोशिकाएँ होती हैं। मध्य भाग में दो ध्रुवीय नाभिक उपस्थित रहते हैं, जो बाद में द्वितीयक केंद्रक बनाते हैं। चालाजा सिरे पर तीन प्रतिपाद कोशिकाएँ होती हैं। अंड कोशिका नर युग्मक के साथ मिलकर युग्मनज बनाती है, जबकि द्वितीयक केंद्रक दूसरे नर युग्मक के साथ मिलकर प्राथमिक भ्रूणपोष केंद्रक बनाता है। यही संरचना द्विगुण निषेचन की विशेषता को संभव बनाती है।
5. परागण (Pollination) क्या है? इसके प्रकार बताइए।
उत्तर:
परागकोष से परागकणों का उसी या किसी अन्य पुष्प के वर्तिकाग्र (Stigma) तक स्थानांतरण परागण कहलाता है। इसके तीन प्रमुख प्रकार हैं— ऑटोगैमी (Autogamy), गीटोनोगैमी (Geitonogamy) और जीनोगैमी (Xenogamy)। ऑटोगैमी में परागण उसी पुष्प के भीतर होता है। गीटोनोगैमी में एक ही पौधे के विभिन्न पुष्पों के बीच परागण होता है। जीनोगैमी में दो अलग-अलग पौधों के पुष्पों के बीच परागण होता है। जीनोगैमी आनुवंशिक विविधता उत्पन्न करती है, जबकि ऑटोगैमी शुद्ध वंश बनाए रखने में सहायक होती है।
6. स्वपरागण और परपरागण में अंतर स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
स्वपरागण में परागकण उसी पुष्प या उसी पौधे के अन्य पुष्प पर पहुँचते हैं, जबकि परपरागण में परागकण एक पौधे से दूसरे पौधे के पुष्प पर स्थानांतरित होते हैं। स्वपरागण से आनुवंशिक शुद्धता बनी रहती है तथा परागकणों की कम आवश्यकता होती है। दूसरी ओर, परपरागण आनुवंशिक विविधता उत्पन्न करता है, जिससे नई विशेषताएँ विकसित होती हैं। स्वपरागण में परागण कारकों की आवश्यकता कम होती है, जबकि परपरागण में हवा, जल या जीवों की सहायता आवश्यक होती है। विकास की दृष्टि से परपरागण अधिक लाभकारी माना जाता है।
7. वायु परागण (Anemophily) की विशेषताएँ लिखिए।
उत्तर:
वायु द्वारा होने वाले परागण को वायु परागण कहते हैं। ऐसे पौधों में पुष्प सामान्यतः छोटे, रंगहीन तथा गंधरहित होते हैं। परागकण हल्के, सूखे एवं बड़ी संख्या में उत्पन्न होते हैं ताकि हवा उन्हें आसानी से दूर तक ले जा सके। वर्तिकाग्र प्रायः पंखदार (Feathery) होता है, जिससे परागकण आसानी से फँस सकें। मक्का, नारियल तथा घास इसके प्रमुख उदाहरण हैं। वायु परागण में ऊर्जा की बचत होती है क्योंकि पौधों को आकर्षक पुष्प या मधु बनाने की आवश्यकता नहीं होती।
8. कीट परागण (Entomophily) का महत्व बताइए।
उत्तर:
कीटों द्वारा संपन्न परागण को कीट परागण कहते हैं। ऐसे पौधों के पुष्प बड़े, चमकीले, सुगंधित तथा मधुरसयुक्त होते हैं, जो कीटों को आकर्षित करते हैं। परागकण प्रायः चिपचिपे होते हैं ताकि वे कीटों के शरीर से चिपक सकें। मधुमक्खियाँ, तितलियाँ और भौंरे प्रमुख परागणकर्ता हैं। कीट परागण से परपरागण की संभावना बढ़ती है, जिससे आनुवंशिक विविधता उत्पन्न होती है। कृषि फसलों के उत्पादन में भी कीट परागण अत्यंत महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।
9. पराग-स्त्रीकेसर अंतःक्रिया (Pollen-Pistil Interaction) क्या है?
उत्तर:
वर्तिकाग्र पर परागकण के पहुँचने के बाद स्त्रीकेसर और परागकण के बीच होने वाली जैव-रासायनिक एवं शारीरिक क्रियाओं को पराग-स्त्रीकेसर अंतःक्रिया कहते हैं। इस प्रक्रिया में वर्तिकाग्र उपयुक्त परागकणों को पहचानकर अंकुरण की अनुमति देता है तथा अनुपयुक्त परागकणों को अस्वीकार कर देता है। अनुकूल परागकण परागनलिका बनाते हैं जो वर्तिका से होकर बीजांड तक पहुँचती है। यह प्रक्रिया सफल निषेचन सुनिश्चित करती है और प्रजातीय शुद्धता बनाए रखने में सहायता करती है।
10. द्विगुण निषेचन (Double Fertilization) क्या है?
उत्तर:
आवृतबीजी पौधों में होने वाली विशिष्ट निषेचन प्रक्रिया को द्विगुण निषेचन कहते हैं। इसमें एक नर युग्मक अंड कोशिका से मिलकर द्विगुणित युग्मनज (Zygote) बनाता है, जिसे संयुग्मन (Syngamy) कहते हैं। दूसरा नर युग्मक द्वितीयक केंद्रक से मिलकर त्रिगुणित प्राथमिक भ्रूणपोष केंद्रक बनाता है, जिसे त्रिगुण संलयन (Triple Fusion) कहते हैं। ये दोनों प्रक्रियाएँ एक ही भ्रूणकोष में होती हैं। यह घटना केवल आवृतबीजी पौधों में पाई जाती है और भ्रूण तथा भ्रूणपोष दोनों के निर्माण में सहायक होती है।
11. त्रिगुण संलयन (Triple Fusion) क्या है?
उत्तर:
द्विगुण निषेचन के दौरान दूसरा नर युग्मक भ्रूणकोष के केंद्रीय कोश में स्थित दो ध्रुवीय नाभिकों अथवा द्वितीयक केंद्रक से संलयित होता है। इस प्रक्रिया को त्रिगुण संलयन कहते हैं। इसके परिणामस्वरूप त्रिगुणित (3n) प्राथमिक भ्रूणपोष केंद्रक का निर्माण होता है, जो आगे चलकर भ्रूणपोष (Endosperm) बनाता है। भ्रूणपोष विकसित हो रहे भ्रूण को पोषण प्रदान करता है। इस प्रकार त्रिगुण संलयन बीज के विकास और पोषण व्यवस्था में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।
12. भ्रूणपोष (Endosperm) का महत्व बताइए।
उत्तर:
भ्रूणपोष निषेचन के पश्चात विकसित होने वाला पोषक ऊतक है। यह विकसित हो रहे भ्रूण को कार्बोहाइड्रेट, प्रोटीन, वसा तथा अन्य आवश्यक पोषक तत्व प्रदान करता है। अनेक बीजों जैसे गेहूँ, मक्का और नारियल में भ्रूणपोष परिपक्व अवस्था तक बना रहता है, जबकि कुछ बीजों में यह भ्रूण द्वारा उपयोग कर लिया जाता है। भ्रूणपोष बीज अंकुरण के समय भी ऊर्जा का स्रोत प्रदान करता है। इसलिए इसे भ्रूण के पोषण और विकास का प्रमुख आधार माना जाता है।
13. अपोमिक्सिस (Apomixis) क्या है?
उत्तर:
बिना निषेचन और युग्मक संलयन के बीज बनने की प्रक्रिया अपोमिक्सिस कहलाती है। इसमें भ्रूण का निर्माण सीधे अंड कोशिका या अन्य द्विगुणित कोशिकाओं से हो सकता है। अपोमिक्सिस द्वारा उत्पन्न पौधे माता-पिता के समान आनुवंशिक गुणों वाले होते हैं। यह प्रक्रिया कृषि में महत्वपूर्ण है क्योंकि इससे संकर गुणों को कई पीढ़ियों तक बनाए रखा जा सकता है। कुछ घासों एवं एस्टरेसी कुल के पौधों में अपोमिक्सिस पाया जाता है। यह पौध प्रजनन की एक विशेष विधि है।
14. बहुभ्रूणता (Polyembryony) क्या है?
उत्तर:
एक बीज में एक से अधिक भ्रूणों की उपस्थिति को बहुभ्रूणता कहते हैं। यह स्थिति एक ही भ्रूणकोष में अनेक भ्रूण बनने या न्यूसेलस की कोशिकाओं से अतिरिक्त भ्रूण बनने के कारण उत्पन्न हो सकती है। साइट्रस और आम इसके प्रमुख उदाहरण हैं। बहुभ्रूणता कृषि की दृष्टि से महत्वपूर्ण है क्योंकि इससे एक बीज से अनेक पौधे प्राप्त हो सकते हैं। इनमें से कुछ भ्रूण मातृ पौधे के समान गुणों वाले होते हैं, जिससे वांछित विशेषताओं का संरक्षण संभव होता है।
15. निषेचन के बाद बीजांड में होने वाले परिवर्तन लिखिए।
उत्तर:
निषेचन के पश्चात बीजांड में अनेक परिवर्तन होते हैं। युग्मनज भ्रूण में विकसित होता है तथा प्राथमिक भ्रूणपोष केंद्रक भ्रूणपोष बनाता है। बीजांड बीज में परिवर्तित हो जाता है। बीजावरण (Seed Coat) बीजांडावरणों से बनता है। न्यूसेलस का कुछ भाग अवशिष्ट रूप में बना रह सकता है। माइक्रोपाइल बना रहता है और अंकुरण के समय जल प्रवेश का मार्ग प्रदान करता है। ये सभी परिवर्तन बीज के निर्माण एवं भ्रूण की सुरक्षा के लिए आवश्यक हैं।
16. निषेचन के बाद अंडाशय में होने वाले परिवर्तन बताइए।
उत्तर:
निषेचन के बाद अंडाशय फल में परिवर्तित हो जाता है। अंडाशय भित्ति विकसित होकर फलभित्ति (Pericarp) बनाती है, जो फल की बाहरी संरचना बनाती है। फलभित्ति तीन भागों— बाह्यफलभित्ति, मध्यफलभित्ति और अंतःफलभित्ति— में विभेदित हो सकती है। अंडाशय के भीतर उपस्थित बीजांड बीज बन जाते हैं। फल बीजों की सुरक्षा तथा उनके प्रसार में सहायता करता है। इस प्रकार निषेचन के बाद अंडाशय का फल में परिवर्तन पौधों के जीवन चक्र की महत्वपूर्ण घटना है।
17. स्व-असंगति (Self-Incompatibility) क्या है?
उत्तर:
स्व-असंगति एक आनुवंशिक तंत्र है जिसमें किसी पौधे का वर्तिकाग्र अपने ही परागकणों को स्वीकार नहीं करता। परिणामस्वरूप स्वपरागण होने पर भी निषेचन नहीं हो पाता। यह प्रक्रिया परपरागण को प्रोत्साहित करती है तथा आनुवंशिक विविधता बनाए रखने में सहायता करती है। स्व-असंगति S-जीन द्वारा नियंत्रित होती है। यह पौधों में अंतःप्रजनन के दुष्प्रभावों को कम करती है और स्वस्थ संतानों के निर्माण में सहायक होती है।
18. कृत्रिम संकरण (Artificial Hybridization) क्या है?
उत्तर:
वांछित गुणों वाले पौधों के बीच नियंत्रित परपरागण कराने की प्रक्रिया कृत्रिम संकरण कहलाती है। इसमें पहले पुंकेसरों को हटाकर विपुंसीकरण (Emasculation) किया जाता है। इसके बाद पुष्प को बैगिंग द्वारा ढक दिया जाता है ताकि अवांछित परागण न हो सके। उचित समय पर वांछित पौधे के परागकण वर्तिकाग्र पर डाले जाते हैं। इस विधि से रोग-प्रतिरोधी, उच्च उपज एवं बेहतर गुणवत्ता वाली नई किस्में विकसित की जाती हैं। पादप प्रजनन में इसका व्यापक उपयोग होता है।
19. विपुंसीकरण (Emasculation) और बैगिंग (Bagging) का महत्व बताइए।
उत्तर:
विपुंसीकरण वह प्रक्रिया है जिसमें उभयलिंगी पुष्प से परागकोषों को परिपक्व होने से पहले हटा दिया जाता है ताकि स्वपरागण न हो सके। इसके बाद पुष्प को विशेष कागज या पॉलीथीन बैग से ढक दिया जाता है, जिसे बैगिंग कहते हैं। बैगिंग अवांछित परागकणों के प्रवेश को रोकती है। ये दोनों तकनीकें कृत्रिम संकरण में महत्वपूर्ण हैं क्योंकि इनके माध्यम से केवल वांछित परागकणों द्वारा निषेचन कराया जा सकता है। इससे नई और श्रेष्ठ पौध किस्मों का विकास संभव होता है।
20. परागकणों का संरक्षण (Pollen Storage) क्यों महत्वपूर्ण है?
उत्तर:
परागकणों का संरक्षण पादप प्रजनन और जैव प्रौद्योगिकी में अत्यंत महत्वपूर्ण है। परागकणों को द्रव नाइट्रोजन (-196°C) में क्रायोसंरक्षण तकनीक द्वारा लंबे समय तक सुरक्षित रखा जा सकता है। इससे दुर्लभ, उच्च गुणवत्ता वाले या वांछित पौधों के आनुवंशिक संसाधनों का संरक्षण संभव होता है। आवश्यकता पड़ने पर इन परागकणों का उपयोग कृत्रिम संकरण और नई किस्मों के विकास में किया जा सकता है। यह तकनीक कृषि अनुसंधान और पौध सुधार कार्यक्रमों में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है।
