CBSE कक्षा 10 – राजनीति विज्ञान (Democratic Politics-II)

अध्याय 2 – संघवाद (Federalism)

20 महत्वपूर्ण प्रश्न एवं उत्तर

संघवाद वह शासन व्यवस्था है जिसमें केंद्र और राज्य सरकारों के बीच शक्तियों का संवैधानिक विभाजन होता है। भारत में संघीय व्यवस्था, शक्तियों के बंटवारे, भाषा नीति और स्थानीय स्वशासन के माध्यम से लागू की जाती है।


1. संघवाद क्या है? इसकी मुख्य विशेषताएँ बताइए।

उत्तर:
संघवाद ऐसी शासन व्यवस्था है जिसमें सत्ता का विभाजन केंद्र सरकार और राज्य सरकारों के बीच किया जाता है। दोनों स्तर की सरकारें संविधान द्वारा निर्धारित अधिकारों का प्रयोग करती हैं। संघवाद की प्रमुख विशेषताएँ हैं— दो या अधिक स्तर की सरकारें, संविधान द्वारा शक्तियों का स्पष्ट विभाजन, स्वतंत्र न्यायपालिका, संविधान की सर्वोच्चता तथा प्रत्येक स्तर के लिए राजस्व के अलग स्रोत। संघवाद का उद्देश्य राष्ट्रीय एकता बनाए रखना और क्षेत्रीय विविधताओं को सम्मान देना है। भारत एक संघीय देश है जहाँ केंद्र और राज्य दोनों अपने-अपने अधिकार क्षेत्रों में कार्य करते हैं।


2. ‘कमिंग टुगेदर’ और ‘होल्डिंग टुगेदर’ संघों में अंतर स्पष्ट कीजिए।

उत्तर:
‘कमिंग टुगेदर’ संघ में स्वतंत्र राज्य अपनी इच्छा से मिलकर एक संघीय राष्ट्र का निर्माण करते हैं। इसमें सभी राज्यों को समान अधिकार प्राप्त होते हैं। अमेरिका, स्विट्जरलैंड और ऑस्ट्रेलिया इसके उदाहरण हैं। दूसरी ओर, ‘होल्डिंग टुगेदर’ संघ में एक बड़े देश को प्रशासनिक सुविधा के लिए राज्यों में विभाजित किया जाता है। इसमें केंद्र सरकार अपेक्षाकृत अधिक शक्तिशाली होती है। भारत, बेल्जियम और स्पेन इसके उदाहरण हैं। भारत में सभी राज्यों को समान शक्तियाँ नहीं मिली हैं, इसलिए इसे ‘होल्डिंग टुगेदर’ संघ कहा जाता है।


3. भारत को संघीय देश क्यों कहा जाता है?

उत्तर:
भारत को संघीय देश कहा जाता है क्योंकि यहाँ शासन की शक्तियाँ केंद्र और राज्यों के बीच विभाजित हैं। संविधान दोनों स्तरों की सरकारों के अधिकार और कर्तव्यों को स्पष्ट करता है। केंद्र और राज्य दोनों अपने-अपने क्षेत्रों में कानून बना सकते हैं। स्वतंत्र न्यायपालिका संविधान की रक्षा करती है तथा केंद्र और राज्यों के बीच विवादों का समाधान करती है। संविधान में संशोधन के लिए कई मामलों में राज्यों की सहमति आवश्यक होती है। ये सभी विशेषताएँ भारत को संघीय राष्ट्र बनाती हैं।


4. संघीय शासन व्यवस्था के क्या लाभ हैं?

उत्तर:
संघीय व्यवस्था विविधताओं वाले देशों के लिए अत्यंत उपयोगी होती है। इससे विभिन्न क्षेत्रों की भाषाई, सांस्कृतिक और सामाजिक पहचान सुरक्षित रहती है। स्थानीय समस्याओं का समाधान अधिक प्रभावी ढंग से किया जा सकता है क्योंकि राज्य सरकारें जनता के निकट होती हैं। इससे सत्ता का केंद्रीकरण कम होता है और लोकतंत्र मजबूत बनता है। विभिन्न स्तरों की सरकारों के बीच सहयोग से विकास कार्यों में तेजी आती है। संघवाद राष्ट्रीय एकता और क्षेत्रीय स्वायत्तता के बीच संतुलन स्थापित करता है।


5. भारत में शक्तियों का संवैधानिक विभाजन कैसे किया गया है?

उत्तर:
भारतीय संविधान में शक्तियों का विभाजन तीन सूचियों के माध्यम से किया गया है— संघ सूची, राज्य सूची और समवर्ती सूची। संघ सूची के विषयों पर केवल केंद्र सरकार कानून बना सकती है। राज्य सूची के विषयों पर राज्य सरकारों को अधिकार प्राप्त है। समवर्ती सूची के विषयों पर केंद्र और राज्य दोनों कानून बना सकते हैं। यदि किसी विषय पर दोनों के कानूनों में टकराव हो, तो केंद्र का कानून प्रभावी माना जाता है। यह व्यवस्था संघवाद को मजबूत बनाती है।


6. संघ सूची क्या है? उदाहरण सहित समझाइए।

उत्तर:
संघ सूची में राष्ट्रीय महत्व के विषय शामिल होते हैं जिन पर केवल संसद कानून बना सकती है। इन विषयों का संबंध पूरे देश से होता है, इसलिए इन्हें केंद्र सरकार के अधीन रखा गया है। रक्षा, विदेश नीति, मुद्रा, बैंकिंग, डाक एवं संचार आदि संघ सूची के प्रमुख विषय हैं। इन विषयों पर एक समान नीति की आवश्यकता होती है ताकि पूरे देश में एकरूपता बनी रहे। संघ सूची भारत की राष्ट्रीय एकता और सुरक्षा को मजबूत करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है।


7. राज्य सूची क्या है? इसके महत्व को स्पष्ट कीजिए।

उत्तर:
राज्य सूची में ऐसे विषय शामिल हैं जिनका संबंध स्थानीय और क्षेत्रीय प्रशासन से होता है। इन विषयों पर राज्य विधानमंडल कानून बनाता है। पुलिस, कृषि, सार्वजनिक स्वास्थ्य, स्थानीय सरकार और कानून-व्यवस्था इसके प्रमुख उदाहरण हैं। राज्यों को इन विषयों पर निर्णय लेने का अधिकार मिलने से स्थानीय आवश्यकताओं के अनुसार नीतियाँ बनाई जा सकती हैं। इससे प्रशासन अधिक प्रभावी बनता है और जनता की समस्याओं का समाधान शीघ्र होता है। राज्य सूची संघवाद की भावना को मजबूत करती है।


8. समवर्ती सूची क्या है?

उत्तर:
समवर्ती सूची में ऐसे विषय रखे गए हैं जिन पर केंद्र और राज्य दोनों कानून बना सकते हैं। शिक्षा, वन, विवाह, श्रम कल्याण और जनसंख्या नियंत्रण इसके प्रमुख उदाहरण हैं। इन विषयों पर दोनों स्तरों की सरकारों की भागीदारी आवश्यक होती है। यदि किसी विषय पर राज्य और केंद्र के कानूनों में विरोध हो जाए, तो केंद्र का कानून मान्य होता है। समवर्ती सूची राष्ट्रीय हित और क्षेत्रीय आवश्यकताओं के बीच संतुलन स्थापित करने का कार्य करती है।


9. भाषाई राज्यों के गठन का क्या महत्व था?

उत्तर:
स्वतंत्रता के बाद भारत में राज्यों का पुनर्गठन मुख्यतः भाषाई आधार पर किया गया। इसका उद्देश्य लोगों की भाषाई और सांस्कृतिक पहचान को सम्मान देना था। इससे क्षेत्रीय असंतोष कम हुआ और राष्ट्रीय एकता मजबूत हुई। लोगों को अपनी भाषा में प्रशासन और शिक्षा की सुविधाएँ मिलने लगीं। भाषाई राज्यों के गठन ने यह सिद्ध किया कि विविधता को स्वीकार करना देश की एकता के लिए लाभदायक है। यह भारतीय संघवाद की सफलता का महत्वपूर्ण उदाहरण है।


10. भारत की भाषा नीति की प्रमुख विशेषताएँ बताइए।

उत्तर:
भारत की भाषा नीति सभी भाषाओं का सम्मान करने पर आधारित है। संविधान में हिंदी को राजभाषा और अंग्रेजी को सहायक भाषा का दर्जा दिया गया है। साथ ही, संविधान की आठवीं अनुसूची में अनेक भारतीय भाषाओं को मान्यता प्राप्त है। किसी भी राज्य पर हिंदी थोपने का प्रयास नहीं किया गया। राज्यों को अपनी आधिकारिक भाषा चुनने की स्वतंत्रता दी गई है। इस नीति ने भाषाई विवादों को कम किया और राष्ट्रीय एकता को मजबूत बनाया।


11. विकेंद्रीकरण से क्या आशय है?

उत्तर:
विकेंद्रीकरण का अर्थ है शासन की शक्तियों और जिम्मेदारियों को निचले स्तर की संस्थाओं को सौंपना। इसका उद्देश्य जनता की भागीदारी बढ़ाना और स्थानीय समस्याओं का समाधान स्थानीय स्तर पर करना है। भारत में पंचायतों और नगरपालिकाओं को अधिकार देकर विकेंद्रीकरण को बढ़ावा दिया गया है। इससे निर्णय लेने की प्रक्रिया अधिक लोकतांत्रिक बनी है। स्थानीय लोगों को विकास कार्यों में भाग लेने का अवसर मिलता है और प्रशासन अधिक उत्तरदायी बनता है।


12. पंचायती राज व्यवस्था क्या है?

उत्तर:
पंचायती राज ग्रामीण क्षेत्रों की स्थानीय स्वशासन व्यवस्था है। इसे संवैधानिक दर्जा 73वें संविधान संशोधन द्वारा दिया गया। इसकी तीन स्तरीय संरचना है— ग्राम पंचायत, पंचायत समिति और जिला परिषद। ग्राम सभा इसकी आधारभूत इकाई होती है। पंचायती राज संस्थाएँ ग्रामीण विकास, शिक्षा, स्वास्थ्य, जल आपूर्ति और सड़क निर्माण जैसे कार्य करती हैं। इससे ग्रामीण जनता को शासन में प्रत्यक्ष भागीदारी का अवसर मिलता है और लोकतंत्र की जड़ें मजबूत होती हैं।


13. ग्राम सभा की भूमिका क्या है?

उत्तर:
ग्राम सभा किसी गाँव के सभी वयस्क मतदाताओं का समूह होती है। यह स्थानीय लोकतंत्र की सबसे महत्वपूर्ण संस्था है। ग्राम सभा पंचायत के कार्यों की समीक्षा करती है तथा विकास योजनाओं को मंजूरी देती है। पंचायत के बजट और खर्चों पर भी निगरानी रखती है। ग्राम सभा के माध्यम से ग्रामीण नागरिक सीधे शासन प्रक्रिया में भाग लेते हैं। इससे पारदर्शिता, जवाबदेही और जनभागीदारी को बढ़ावा मिलता है। ग्राम सभा ग्रामीण लोकतंत्र की आधारशिला मानी जाती है।


14. नगरपालिकाओं का महत्व बताइए।

उत्तर:
नगरपालिकाएँ शहरी क्षेत्रों की स्थानीय स्वशासन संस्थाएँ हैं। वे शहरों में सफाई, पेयजल, सड़क, प्रकाश व्यवस्था, स्वास्थ्य सेवाएँ और सार्वजनिक सुविधाएँ उपलब्ध कराती हैं। बड़े शहरों में नगर निगम तथा छोटे नगरों में नगरपालिकाएँ कार्य करती हैं। इनके प्रतिनिधि जनता द्वारा चुने जाते हैं। स्थानीय समस्याओं का समाधान स्थानीय स्तर पर होने से प्रशासन अधिक प्रभावी बनता है। नगरपालिकाएँ शहरी विकास और लोकतंत्र को मजबूत करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं।


15. 73वें संविधान संशोधन का महत्व बताइए।

उत्तर:
73वाँ संविधान संशोधन 1992 में पारित किया गया था। इसके द्वारा पंचायती राज संस्थाओं को संवैधानिक दर्जा प्रदान किया गया। नियमित चुनाव, आरक्षण, वित्तीय अधिकार और ग्राम सभा जैसी व्यवस्थाएँ सुनिश्चित की गईं। महिलाओं तथा अनुसूचित जाति-जनजाति के लिए सीटों का आरक्षण भी किया गया। इस संशोधन ने ग्रामीण क्षेत्रों में लोकतंत्र को मजबूत बनाया तथा स्थानीय स्तर पर जनभागीदारी को बढ़ावा दिया। यह भारतीय संघवाद और विकेंद्रीकरण की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम था।


16. 74वें संविधान संशोधन का महत्व बताइए।

उत्तर:
74वें संविधान संशोधन द्वारा शहरी स्थानीय निकायों को संवैधानिक मान्यता दी गई। इसके अंतर्गत नगरपालिकाओं और नगर निगमों की संरचना, चुनाव और अधिकारों को स्पष्ट किया गया। महिलाओं तथा कमजोर वर्गों के लिए आरक्षण की व्यवस्था की गई। इस संशोधन का उद्देश्य शहरी प्रशासन को अधिक लोकतांत्रिक और प्रभावी बनाना था। इससे नागरिकों की भागीदारी बढ़ी तथा शहरी विकास योजनाओं के कार्यान्वयन में सुधार हुआ। यह शहरी क्षेत्रों में विकेंद्रीकरण का महत्वपूर्ण उदाहरण है।


17. स्वतंत्र न्यायपालिका संघवाद के लिए क्यों आवश्यक है?

उत्तर:
संघीय व्यवस्था में केंद्र और राज्यों के बीच शक्तियों का विभाजन होता है। कभी-कभी अधिकारों को लेकर विवाद उत्पन्न हो सकते हैं। ऐसे मामलों में स्वतंत्र न्यायपालिका निष्पक्ष निर्णय देती है। भारत में सर्वोच्च न्यायालय संविधान का संरक्षक है और केंद्र-राज्य विवादों का समाधान करता है। न्यायपालिका यह सुनिश्चित करती है कि कोई भी सरकार संविधान की सीमाओं का उल्लंघन न करे। इसलिए संघवाद की सफलता और संविधान की रक्षा के लिए स्वतंत्र न्यायपालिका अत्यंत आवश्यक है।


18. भारत में संघवाद की सफलता के दो प्रमुख कारण बताइए।

उत्तर:
भारत में संघवाद की सफलता के प्रमुख कारणों में भाषाई राज्यों का गठन और लोकतांत्रिक राजनीति का विकास शामिल हैं। भाषाई राज्यों के गठन से क्षेत्रीय पहचान को सम्मान मिला और अलगाव की भावनाएँ कम हुईं। लोकतांत्रिक व्यवस्था ने विभिन्न राज्यों को अपनी आवश्यकताओं के अनुसार कार्य करने का अवसर दिया। इसके अतिरिक्त, स्वतंत्र न्यायपालिका और संविधान द्वारा शक्तियों का स्पष्ट विभाजन भी संघवाद को मजबूत बनाता है। इन कारणों से भारत में संघीय व्यवस्था सफलतापूर्वक कार्य कर रही है।


19. भारत में स्थानीय स्वशासन लोकतंत्र को कैसे मजबूत करता है?

उत्तर:
स्थानीय स्वशासन नागरिकों को शासन प्रक्रिया में प्रत्यक्ष भागीदारी का अवसर देता है। पंचायतों और नगरपालिकाओं के माध्यम से लोग अपने क्षेत्र की समस्याओं और विकास योजनाओं पर निर्णय लेते हैं। इससे प्रशासन अधिक पारदर्शी और उत्तरदायी बनता है। स्थानीय स्तर पर महिलाओं और कमजोर वर्गों की भागीदारी भी बढ़ती है। परिणामस्वरूप लोकतंत्र केवल चुनावों तक सीमित न रहकर जनसहभागिता का माध्यम बन जाता है। स्थानीय स्वशासन लोकतंत्र की जड़ों को मजबूत करता है।


20. संघवाद राष्ट्रीय एकता और विविधता में संतुलन कैसे स्थापित करता है?

उत्तर:
संघवाद राष्ट्रीय एकता और क्षेत्रीय विविधताओं के बीच संतुलन स्थापित करने की व्यवस्था है। केंद्र सरकार राष्ट्रीय महत्व के विषयों पर कार्य करती है, जबकि राज्य सरकारें स्थानीय आवश्यकताओं के अनुसार निर्णय लेती हैं। इससे विभिन्न भाषाओं, संस्कृतियों और परंपराओं को सम्मान मिलता है। लोगों को अपनी पहचान बनाए रखते हुए राष्ट्र की मुख्यधारा से जुड़े रहने का अवसर मिलता है। इस प्रकार संघवाद विविधता में एकता की भावना को मजबूत करता है और लोकतांत्रिक शासन को सफल बनाता है।