CBSE कक्षा 10 सामाजिक विज्ञान (इतिहास)

अध्याय 2 – भारत में राष्ट्रवाद

20 महत्वपूर्ण प्रश्न एवं उत्तर

भारत में राष्ट्रवाद अध्याय भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन, महात्मा गांधी की भूमिका, असहयोग आंदोलन, सविनय अवज्ञा आंदोलन तथा राष्ट्रीय एकता के विकास पर आधारित है।


1. भारत में राष्ट्रवाद के विकास में प्रथम विश्व युद्ध की क्या भूमिका रही?

उत्तर:
प्रथम विश्व युद्ध (1914-1918) ने भारत की आर्थिक और सामाजिक स्थिति को गंभीर रूप से प्रभावित किया। युद्ध के दौरान ब्रिटिश सरकार ने करों में वृद्धि की, युद्ध ऋण लिए और सैनिकों की जबरन भर्ती की। आवश्यक वस्तुओं की कीमतें तेजी से बढ़ीं, जिससे आम जनता को कठिनाइयों का सामना करना पड़ा। 1918-19 में फसल खराब होने और इन्फ्लुएंजा महामारी ने स्थिति को और गंभीर बना दिया। लोगों को उम्मीद थी कि युद्ध के बाद उनकी समस्याएँ कम होंगी, लेकिन ऐसा नहीं हुआ। इन परिस्थितियों से ब्रिटिश शासन के प्रति असंतोष बढ़ा और लोगों में स्वतंत्रता की भावना विकसित हुई। यही असंतोष आगे चलकर राष्ट्रवादी आंदोलनों का आधार बना।


2. सत्याग्रह से गांधीजी का क्या आशय था?

उत्तर:
सत्याग्रह महात्मा गांधी द्वारा विकसित एक अहिंसात्मक संघर्ष पद्धति थी। इसका अर्थ है सत्य और अहिंसा के आधार पर अन्याय का विरोध करना। गांधीजी का विश्वास था कि यदि संघर्ष सत्य और नैतिकता पर आधारित हो तो विरोधी को बिना हिंसा के भी पराजित किया जा सकता है। उन्होंने दक्षिण अफ्रीका में इस पद्धति का सफल प्रयोग किया और बाद में भारत में चंपारण, खेड़ा तथा अहमदाबाद आंदोलनों में इसका उपयोग किया। सत्याग्रह लोगों को आत्मबल, अनुशासन और नैतिक शक्ति प्रदान करता था। इसने भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन को एक नई दिशा दी तथा लाखों लोगों को राष्ट्रीय संघर्ष से जोड़ा।


3. रॉलेट एक्ट क्या था और भारतीयों ने इसका विरोध क्यों किया?

उत्तर:
1919 में ब्रिटिश सरकार ने रॉलेट एक्ट पारित किया। इस कानून के अनुसार सरकार किसी भी व्यक्ति को बिना मुकदमे के गिरफ्तार कर सकती थी तथा उसे लंबे समय तक जेल में रख सकती थी। इससे नागरिक स्वतंत्रताओं का हनन होता था। भारतीयों ने इसे अत्यंत दमनकारी और अन्यायपूर्ण कानून माना। महात्मा गांधी ने इसके विरोध में देशव्यापी सत्याग्रह आंदोलन शुरू किया। लोगों ने हड़तालें कीं और शांतिपूर्ण प्रदर्शन किए। ब्रिटिश सरकार ने कठोर दमन का सहारा लिया, जिससे जनता का असंतोष और बढ़ गया। रॉलेट एक्ट के विरोध ने भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन को नई ऊर्जा प्रदान की।


4. जलियांवाला बाग हत्याकांड का भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन पर क्या प्रभाव पड़ा?

उत्तर:
13 अप्रैल 1919 को अमृतसर के जलियांवाला बाग में हजारों लोग शांतिपूर्ण सभा के लिए एकत्र हुए थे। जनरल डायर ने बिना चेतावनी दिए भीड़ पर गोलियां चलवा दीं, जिससे सैकड़ों लोग मारे गए और अनेक घायल हुए। इस घटना ने पूरे देश को झकझोर दिया। भारतीयों का ब्रिटिश शासन पर से विश्वास समाप्त हो गया। महात्मा गांधी सहित अनेक नेताओं ने इस घटना की कड़ी निंदा की। जलियांवाला बाग हत्याकांड ने राष्ट्रवादी भावना को मजबूत किया और लोगों को स्वतंत्रता आंदोलन में सक्रिय रूप से भाग लेने के लिए प्रेरित किया। यह भारतीय स्वतंत्रता संघर्ष का एक महत्वपूर्ण मोड़ साबित हुआ।


5. खिलाफत आंदोलन क्या था?

उत्तर:
खिलाफत आंदोलन 1919 में भारतीय मुसलमानों द्वारा शुरू किया गया एक आंदोलन था। इसका उद्देश्य तुर्की के खलीफा की सत्ता और सम्मान की रक्षा करना था। प्रथम विश्व युद्ध के बाद तुर्की के साथ किए गए व्यवहार से भारतीय मुसलमान असंतुष्ट थे। अली बंधुओं ने इस आंदोलन का नेतृत्व किया। महात्मा गांधी ने हिंदू-मुस्लिम एकता को मजबूत करने के लिए खिलाफत आंदोलन का समर्थन किया और इसे असहयोग आंदोलन से जोड़ दिया। इससे विभिन्न धर्मों के लोगों में सहयोग बढ़ा और राष्ट्रीय आंदोलन को व्यापक जनसमर्थन प्राप्त हुआ। इस आंदोलन ने भारतीय राष्ट्रवाद को नई शक्ति प्रदान की।


6. असहयोग आंदोलन क्यों शुरू किया गया?

उत्तर:
महात्मा गांधी ने 1920 में असहयोग आंदोलन शुरू किया। इसका मुख्य कारण रॉलेट एक्ट, जलियांवाला बाग हत्याकांड और खिलाफत मुद्दे पर ब्रिटिश सरकार की नीतियों के प्रति असंतोष था। गांधीजी का मानना था कि यदि भारतीय ब्रिटिश संस्थाओं का सहयोग बंद कर दें तो शासन कमजोर हो जाएगा। लोगों से सरकारी विद्यालयों, अदालतों और विदेशी वस्तुओं का बहिष्कार करने का आह्वान किया गया। आंदोलन को व्यापक जनसमर्थन मिला और लाखों लोग इसमें शामिल हुए। इससे भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन पहली बार जन-आंदोलन के रूप में उभरा और स्वतंत्रता की मांग को नई गति मिली।


7. चौरी-चौरा घटना क्या थी?

उत्तर:
फरवरी 1922 में उत्तर प्रदेश के चौरी-चौरा नामक स्थान पर प्रदर्शनकारी किसानों और पुलिस के बीच संघर्ष हुआ। पुलिस द्वारा गोली चलाने से क्रोधित भीड़ ने पुलिस थाने में आग लगा दी, जिसमें कई पुलिसकर्मी मारे गए। यह घटना हिंसक थी और गांधीजी के अहिंसा सिद्धांत के विरुद्ध थी। गांधीजी का मानना था कि जनता अभी अहिंसक संघर्ष के लिए पूरी तरह तैयार नहीं है। इसलिए उन्होंने असहयोग आंदोलन को वापस लेने का निर्णय लिया। इस फैसले से कई नेता निराश हुए, लेकिन गांधीजी ने नैतिक सिद्धांतों को सर्वोपरि माना।


8. नमक सत्याग्रह का महत्व बताइए।

उत्तर:
1930 में महात्मा गांधी ने नमक कानून का विरोध करने के लिए दांडी यात्रा आरंभ की। उन्होंने साबरमती आश्रम से दांडी तक लगभग 240 मील की यात्रा की और समुद्र के पानी से नमक बनाकर कानून तोड़ा। नमक एक ऐसी वस्तु थी जिसका उपयोग हर व्यक्ति करता था, इसलिए यह मुद्दा आम जनता से जुड़ गया। नमक सत्याग्रह ने सविनय अवज्ञा आंदोलन की शुरुआत की और लाखों लोगों को स्वतंत्रता संघर्ष में भाग लेने के लिए प्रेरित किया। इस आंदोलन ने ब्रिटिश शासन की अन्यायपूर्ण नीतियों को उजागर किया और भारतीय राष्ट्रवाद को व्यापक जनसमर्थन दिलाया।


9. सविनय अवज्ञा आंदोलन क्या था?

उत्तर:
सविनय अवज्ञा आंदोलन 1930 में महात्मा गांधी द्वारा शुरू किया गया एक महत्वपूर्ण राष्ट्रीय आंदोलन था। इसका उद्देश्य ब्रिटिश कानूनों का शांतिपूर्ण ढंग से उल्लंघन करना था। नमक कानून तोड़ना इसका प्रमुख प्रतीक बना। लोगों ने करों का भुगतान करने से इनकार किया, विदेशी वस्तुओं का बहिष्कार किया और सरकारी संस्थाओं के खिलाफ शांतिपूर्ण विरोध किया। इस आंदोलन में किसानों, महिलाओं, छात्रों और व्यापारियों ने सक्रिय भाग लिया। यद्यपि ब्रिटिश सरकार ने दमनकारी नीतियाँ अपनाईं, फिर भी आंदोलन ने राष्ट्रीय चेतना को मजबूत किया और स्वतंत्रता संघर्ष को नई दिशा प्रदान की।


10. गांधी-इरविन समझौता क्या था?

उत्तर:
मार्च 1931 में महात्मा गांधी और वायसराय लॉर्ड इरविन के बीच गांधी-इरविन समझौता हुआ। इस समझौते के तहत सरकार ने राजनीतिक कैदियों को रिहा करने और शांतिपूर्ण गतिविधियों की अनुमति देने का आश्वासन दिया। बदले में गांधीजी ने सविनय अवज्ञा आंदोलन को अस्थायी रूप से स्थगित करने और द्वितीय गोलमेज सम्मेलन में भाग लेने पर सहमति दी। यह समझौता राष्ट्रीय आंदोलन की एक महत्वपूर्ण उपलब्धि माना जाता है क्योंकि इससे ब्रिटिश सरकार को भारतीय नेताओं से बातचीत करने के लिए बाध्य होना पड़ा। हालांकि सम्मेलन से अपेक्षित परिणाम नहीं मिले, फिर भी यह भारतीय राष्ट्रवाद की बढ़ती शक्ति का प्रमाण था।


11. भारतीय उद्योगपतियों ने राष्ट्रवादी आंदोलन का समर्थन क्यों किया?

उत्तर:
भारतीय उद्योगपति ब्रिटिश आर्थिक नीतियों से असंतुष्ट थे। विदेशी वस्तुओं के आयात से भारतीय उद्योगों को नुकसान होता था। वे चाहते थे कि सरकार भारतीय उद्योगों को संरक्षण दे और आयात पर नियंत्रण लगाए। इसलिए उन्होंने राष्ट्रवादी आंदोलन का समर्थन किया। उद्योगपतियों ने कांग्रेस को आर्थिक सहायता भी प्रदान की। उनका मानना था कि स्वतंत्र भारत में व्यापार और उद्योग के विकास के अधिक अवसर मिलेंगे। हालांकि उनकी अपेक्षाएँ हमेशा पूरी नहीं हुईं, फिर भी उन्होंने राष्ट्रवादी आंदोलन को मजबूत बनाने में महत्वपूर्ण योगदान दिया।


12. किसानों ने राष्ट्रवादी आंदोलन में किस प्रकार भाग लिया?

उत्तर:
किसानों ने राष्ट्रवादी आंदोलन में सक्रिय भूमिका निभाई। वे ऊँचे लगान, बेगार और जमींदारों के शोषण से परेशान थे। विभिन्न क्षेत्रों में किसानों ने करों में कमी और आर्थिक राहत की मांग की। अवध, खेड़ा और अन्य क्षेत्रों के किसान आंदोलनों ने राष्ट्रीय आंदोलन को व्यापक आधार प्रदान किया। किसानों ने विदेशी वस्तुओं का बहिष्कार किया और राष्ट्रीय आंदोलनों में भाग लिया। हालांकि उनकी मांगें कभी-कभी कांग्रेस के उद्देश्यों से भिन्न थीं, फिर भी वे ब्रिटिश शासन के विरुद्ध संघर्ष में महत्वपूर्ण सहयोगी बने। किसानों की भागीदारी से राष्ट्रवादी आंदोलन जन-आंदोलन का स्वरूप ग्रहण कर सका।


13. महिलाओं की भूमिका पर संक्षिप्त टिप्पणी लिखिए।

उत्तर:
भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन में महिलाओं ने महत्वपूर्ण योगदान दिया। असहयोग और सविनय अवज्ञा आंदोलनों के दौरान बड़ी संख्या में महिलाओं ने जुलूसों, धरनों और विदेशी वस्तुओं के बहिष्कार में भाग लिया। उन्होंने शराब की दुकानों के सामने धरने दिए और राष्ट्रीय कार्यक्रमों का प्रचार किया। सरोजिनी नायडू जैसी महिला नेताओं ने आंदोलन को नई दिशा प्रदान की। महिलाओं की भागीदारी ने यह सिद्ध किया कि स्वतंत्रता संघर्ष केवल पुरुषों तक सीमित नहीं था, बल्कि पूरे समाज का आंदोलन बन चुका था। इससे महिलाओं में राजनीतिक जागरूकता और आत्मविश्वास का विकास हुआ।


14. दलितों के प्रति गांधीजी का दृष्टिकोण क्या था?

उत्तर:
महात्मा गांधी समाज में व्याप्त अस्पृश्यता को समाप्त करना चाहते थे। उन्होंने दलितों को ‘हरिजन’ कहा और उनके सामाजिक उत्थान के लिए कार्य किया। गांधीजी का मानना था कि स्वतंत्रता तभी सार्थक होगी जब समाज में समानता स्थापित होगी। उन्होंने मंदिर प्रवेश, शिक्षा और सामाजिक अधिकारों के लिए अभियान चलाए। हालांकि डॉ. भीमराव रामजी आंबेडकर और गांधीजी के विचारों में कुछ मतभेद थे, फिर भी दोनों दलितों के कल्याण के पक्षधर थे। गांधीजी के प्रयासों ने सामाजिक सुधार और राष्ट्रीय एकता को बढ़ावा दिया।


15. राष्ट्रवाद के विकास में ‘भारत माता’ की छवि का क्या महत्व था?

उत्तर:
भारत माता की छवि भारतीय राष्ट्रवाद का एक महत्वपूर्ण प्रतीक बन गई। इसे एक ऐसी मातृभूमि के रूप में प्रस्तुत किया गया जो अपने बच्चों से प्रेम करती है और उनकी रक्षा करती है। इस प्रतीक ने लोगों में देशभक्ति और एकता की भावना उत्पन्न की। विभिन्न चित्रकारों और राष्ट्रवादी नेताओं ने भारत माता की छवि का उपयोग राष्ट्रीय चेतना फैलाने के लिए किया। लोग देश को केवल भौगोलिक क्षेत्र नहीं, बल्कि एक पवित्र मातृभूमि के रूप में देखने लगे। इससे स्वतंत्रता आंदोलन को भावनात्मक और सांस्कृतिक आधार मिला।


16. राष्ट्रवाद के विकास में राष्ट्रीय प्रतीकों की भूमिका बताइए।

उत्तर:
राष्ट्रीय प्रतीकों ने भारतीयों में एकता और सामूहिक पहचान की भावना विकसित की। राष्ट्रीय ध्वज, वंदे मातरम्, भारत माता की छवि और लोककथाओं ने लोगों को एक साझा उद्देश्य से जोड़ा। इन प्रतीकों ने विभिन्न भाषाओं, धर्मों और क्षेत्रों के लोगों के बीच राष्ट्रीय चेतना का प्रसार किया। सार्वजनिक सभाओं और आंदोलनों में इनका व्यापक उपयोग किया जाता था। प्रतीकों के माध्यम से लोगों को यह अनुभव हुआ कि वे एक ही राष्ट्र का हिस्सा हैं। इस प्रकार राष्ट्रीय प्रतीकों ने स्वतंत्रता आंदोलन को मजबूत बनाने और राष्ट्रवाद के प्रसार में महत्वपूर्ण योगदान दिया।


17. असहयोग आंदोलन और सविनय अवज्ञा आंदोलन में एक प्रमुख अंतर बताइए।

उत्तर:
असहयोग आंदोलन (1920) का मुख्य उद्देश्य ब्रिटिश संस्थाओं और वस्तुओं का बहिष्कार करना था। इसमें लोगों से सरकारी स्कूलों, अदालतों और नौकरियों का त्याग करने का आह्वान किया गया। दूसरी ओर, सविनय अवज्ञा आंदोलन (1930) में लोगों ने ब्रिटिश कानूनों का खुलकर उल्लंघन किया। नमक कानून तोड़ना इसका प्रमुख उदाहरण था। असहयोग आंदोलन में सहयोग समाप्त करने पर बल दिया गया, जबकि सविनय अवज्ञा आंदोलन में अन्यायपूर्ण कानूनों की अवज्ञा की गई। दोनों आंदोलनों ने राष्ट्रीय चेतना को मजबूत किया और स्वतंत्रता संघर्ष को नई दिशा दी।


18. ‘सामूहिक अपनत्व की भावना’ से क्या आशय है?

उत्तर:
सामूहिक अपनत्व की भावना का अर्थ है लोगों में यह विश्वास विकसित होना कि वे एक ही राष्ट्र और समुदाय के सदस्य हैं। भारत में यह भावना राष्ट्रीय प्रतीकों, लोकगीतों, इतिहास, संस्कृति और स्वतंत्रता संघर्ष के माध्यम से विकसित हुई। लोगों ने अपने साझा अनुभवों और संघर्षों को पहचानना शुरू किया। भारत माता की छवि, राष्ट्रीय ध्वज और वंदे मातरम् जैसे प्रतीकों ने इस भावना को मजबूत किया। इससे विभिन्न सामाजिक और धार्मिक समूहों के लोग राष्ट्रीय आंदोलन में एक साथ आए। यही भावना भारतीय राष्ट्रवाद की आधारशिला बनी।


19. राष्ट्रवाद और औपनिवेशिक विरोधी आंदोलन में क्या संबंध था?

उत्तर:
भारत में राष्ट्रवाद का विकास औपनिवेशिक विरोधी संघर्ष के साथ जुड़ा हुआ था। ब्रिटिश शासन की आर्थिक, सामाजिक और राजनीतिक नीतियों से भारतीय जनता प्रभावित हो रही थी। इन समस्याओं ने लोगों को एकजुट होकर विदेशी शासन का विरोध करने के लिए प्रेरित किया। स्वतंत्रता की मांग ने विभिन्न वर्गों और समुदायों को एक साझा उद्देश्य प्रदान किया। महात्मा गांधी और कांग्रेस ने इस संघर्ष को व्यापक जन-आंदोलन का रूप दिया। इसलिए राष्ट्रवाद केवल देशभक्ति की भावना नहीं था, बल्कि विदेशी शासन से मुक्ति प्राप्त करने का एक संगठित प्रयास भी था।


20. महात्मा गांधी को भारतीय राष्ट्रवाद का प्रमुख नेता क्यों माना जाता है?

उत्तर:
महात्मा गांधी ने भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन को जन-आंदोलन का रूप दिया। उन्होंने सत्याग्रह और अहिंसा जैसे सिद्धांतों के माध्यम से लाखों लोगों को स्वतंत्रता संघर्ष से जोड़ा। चंपारण, खेड़ा, असहयोग आंदोलन, नमक सत्याग्रह और सविनय अवज्ञा आंदोलन में उनके नेतृत्व ने जनता को प्रेरित किया। गांधीजी ने किसानों, मजदूरों, महिलाओं और व्यापारियों सहित समाज के विभिन्न वर्गों को राष्ट्रीय आंदोलन में भाग लेने का अवसर दिया। उनकी नीतियों ने राष्ट्रवाद को व्यापक और लोकतांत्रिक स्वरूप प्रदान किया। इसी कारण उन्हें भारतीय राष्ट्रवाद का सबसे प्रभावशाली नेता माना जाता है।