CBSE कक्षा 10 सामाजिक विज्ञान (अर्थशास्त्र)
अध्याय 3 – मुद्रा और साख
20 महत्वपूर्ण प्रश्नोत्तर
मुद्रा और साख अध्याय में मुद्रा की भूमिका, बैंकिंग व्यवस्था, ऋण के स्रोत, औपचारिक एवं अनौपचारिक साख तथा स्वयं सहायता समूहों की अवधारणा को समझाया गया है।
1. वस्तु विनिमय प्रणाली क्या है? इसकी प्रमुख समस्या क्या थी?
उत्तर:
वस्तु विनिमय प्रणाली वह व्यवस्था थी जिसमें वस्तुओं और सेवाओं का आदान-प्रदान सीधे वस्तुओं के बदले किया जाता था। इस प्रणाली की सबसे बड़ी समस्या “दोहरी इच्छाओं का संयोग” (Double Coincidence of Wants) थी। इसका अर्थ है कि लेन-देन तभी संभव होता था जब दोनों पक्ष एक-दूसरे की वस्तुओं की आवश्यकता महसूस करें। उदाहरण के लिए, यदि किसान को जूते चाहिए और मोची को गेहूँ चाहिए तभी विनिमय संभव होगा। यह व्यवस्था समय लेने वाली तथा असुविधाजनक थी। इसी समस्या को दूर करने के लिए मुद्रा का विकास हुआ, जिसने लेन-देन को सरल और सुविधाजनक बना दिया।
2. मुद्रा को विनिमय का माध्यम क्यों कहा जाता है?
उत्तर:
मुद्रा को विनिमय का माध्यम इसलिए कहा जाता है क्योंकि इसके द्वारा वस्तुओं और सेवाओं का क्रय-विक्रय आसानी से किया जा सकता है। आधुनिक अर्थव्यवस्था में व्यक्ति अपनी वस्तु या सेवा बेचकर मुद्रा प्राप्त करता है और फिर उसी मुद्रा से अपनी आवश्यक वस्तुएँ खरीदता है। इससे वस्तु विनिमय प्रणाली की कठिनाइयाँ समाप्त हो जाती हैं। मुद्रा सभी के द्वारा स्वीकार की जाती है, इसलिए लेन-देन में सुविधा होती है। इसके कारण व्यापार का विस्तार होता है तथा आर्थिक गतिविधियों में वृद्धि होती है। इस प्रकार मुद्रा वस्तुओं और सेवाओं के आदान-प्रदान को सरल बनाती है।
3. आधुनिक मुद्रा के प्रमुख रूप कौन-कौन से हैं?
उत्तर:
आधुनिक मुद्रा मुख्य रूप से सिक्कों, कागजी नोटों और बैंक जमा (डिमांड डिपॉजिट) के रूप में पाई जाती है। सिक्के और नोट सरकार तथा भारतीय रिज़र्व बैंक द्वारा जारी किए जाते हैं। इनके अतिरिक्त बैंक खातों में जमा धन भी मुद्रा का कार्य करता है क्योंकि इसे चेक या ऑनलाइन माध्यमों से भुगतान के लिए प्रयोग किया जा सकता है। आधुनिक मुद्रा को समाज में सार्वभौमिक स्वीकृति प्राप्त होती है। यह वस्तुओं और सेवाओं के मूल्य निर्धारण तथा भुगतान का सुविधाजनक साधन है। इसलिए आधुनिक अर्थव्यवस्था में मुद्रा का अत्यंत महत्वपूर्ण स्थान है।
4. डिमांड डिपॉजिट क्या है?
उत्तर:
डिमांड डिपॉजिट वह धनराशि है जो लोग अपने बैंक खातों में जमा करते हैं और आवश्यकता पड़ने पर कभी भी निकाल सकते हैं। इसे चालू या बचत खाते के रूप में रखा जाता है। इस जमा राशि का उपयोग चेक, एटीएम, ऑनलाइन बैंकिंग तथा अन्य भुगतान माध्यमों से किया जा सकता है। चूँकि यह राशि माँग पर उपलब्ध होती है, इसलिए इसे डिमांड डिपॉजिट कहा जाता है। यह आधुनिक मुद्रा का एक महत्वपूर्ण रूप है क्योंकि लोग नकदी के स्थान पर बैंक खातों का उपयोग करके सुरक्षित और सुविधाजनक लेन-देन कर सकते हैं।
5. चेक क्या है? इसका उपयोग कैसे किया जाता है?
उत्तर:
चेक एक लिखित आदेश होता है जिसके माध्यम से खाताधारक अपने बैंक को किसी व्यक्ति या संस्था को निश्चित धनराशि का भुगतान करने का निर्देश देता है। चेक का उपयोग बड़े और सुरक्षित लेन-देन के लिए किया जाता है। चेक द्वारा भुगतान करने पर नकद धन ले जाने की आवश्यकता नहीं होती। प्राप्तकर्ता बैंक में चेक जमा करके धन प्राप्त कर सकता है। चेक बैंकिंग प्रणाली को सरल और सुरक्षित बनाता है। आधुनिक अर्थव्यवस्था में व्यापारिक लेन-देन तथा व्यक्तिगत भुगतानों में चेक का व्यापक उपयोग किया जाता है।
6. साख (Credit) से आप क्या समझते हैं?
उत्तर:
साख का अर्थ है किसी व्यक्ति, संस्था या व्यवसाय को भविष्य में भुगतान करने के वादे पर धन उधार देना। ऋणदाता उधारकर्ता को एक निश्चित अवधि के लिए धन उपलब्ध कराता है और बदले में ब्याज प्राप्त करता है। साख आर्थिक गतिविधियों को बढ़ावा देती है क्योंकि इससे लोग व्यवसाय, कृषि, शिक्षा या अन्य आवश्यक कार्यों के लिए धन प्राप्त कर सकते हैं। यदि ऋण का सही उपयोग किया जाए तो आय और उत्पादन में वृद्धि होती है। इस प्रकार साख आर्थिक विकास का एक महत्वपूर्ण साधन है।
7. ऋण की शर्तों से क्या अभिप्राय है?
उत्तर:
ऋण की शर्तों से तात्पर्य उन नियमों और शर्तों से है जिनके आधार पर ऋण दिया जाता है। इनमें ब्याज दर, पुनर्भुगतान अवधि, संपार्श्विक (Collateral), आवश्यक दस्तावेज तथा भुगतान की विधि शामिल होती है। विभिन्न ऋणदाताओं की शर्तें अलग-अलग हो सकती हैं। यदि ब्याज दर अधिक हो तो उधारकर्ता पर वित्तीय बोझ बढ़ जाता है। इसलिए ऋण लेने से पहले उसकी सभी शर्तों को समझना आवश्यक है। उचित शर्तों वाला ऋण व्यक्ति या व्यवसाय की आर्थिक प्रगति में सहायक होता है।
8. संपार्श्विक (Collateral) क्या है?
उत्तर:
संपार्श्विक वह संपत्ति होती है जिसे उधारकर्ता ऋण प्राप्त करने के लिए सुरक्षा के रूप में ऋणदाता के पास गिरवी रखता है। इसमें भूमि, भवन, वाहन, पशुधन या बैंक जमा जैसी संपत्तियाँ शामिल हो सकती हैं। यदि उधारकर्ता ऋण चुकाने में असफल रहता है तो ऋणदाता उस संपत्ति को बेचकर अपना धन वसूल सकता है। संपार्श्विक ऋणदाता के जोखिम को कम करता है और ऋण प्राप्त करने की संभावना बढ़ाता है। इसलिए औपचारिक क्षेत्र के अधिकांश ऋणों में संपार्श्विक की आवश्यकता होती है।
9. बैंक लोगों की बचत को कैसे उपयोग में लाते हैं?
उत्तर:
बैंक लोगों से जमा राशि स्वीकार करते हैं और उसका एक छोटा भाग नकद के रूप में सुरक्षित रखते हैं। शेष धनराशि को वे ऋण के रूप में उन लोगों को देते हैं जिन्हें धन की आवश्यकता होती है। इस प्रकार बैंक बचतकर्ताओं और उधारकर्ताओं के बीच मध्यस्थ का कार्य करते हैं। जमा पर बैंक कम ब्याज देते हैं जबकि ऋण पर अधिक ब्याज लेते हैं। दोनों के बीच का अंतर बैंक की आय का प्रमुख स्रोत होता है। इस प्रक्रिया से आर्थिक गतिविधियों और निवेश को बढ़ावा मिलता है।
10. औपचारिक साख के स्रोत कौन-कौन से हैं?
उत्तर:
औपचारिक साख के प्रमुख स्रोत बैंक और सहकारी समितियाँ हैं। ये संस्थाएँ सरकार तथा भारतीय रिज़र्व बैंक के नियमों के अंतर्गत कार्य करती हैं। इनके द्वारा दी जाने वाली ऋण सेवाएँ अपेक्षाकृत सुरक्षित और कम ब्याज वाली होती हैं। औपचारिक क्षेत्र में ऋण की शर्तें स्पष्ट होती हैं और उधारकर्ताओं के अधिकारों की रक्षा की जाती है। यही कारण है कि आर्थिक विकास के लिए औपचारिक साख को अधिक महत्वपूर्ण माना जाता है। यह लोगों को उचित दरों पर ऋण उपलब्ध कराकर उनकी आर्थिक स्थिति सुधारने में सहायता करती है।
11. अनौपचारिक साख के स्रोत कौन-कौन से हैं?
उत्तर:
अनौपचारिक साख के स्रोतों में साहूकार, व्यापारी, बड़े किसान, नियोक्ता, मित्र तथा रिश्तेदार शामिल होते हैं। ये संस्थाएँ या व्यक्ति सरकारी नियंत्रण के अंतर्गत नहीं आते। इसलिए वे अपनी इच्छा के अनुसार ब्याज दर तय कर सकते हैं। कई बार उधारकर्ताओं को अत्यधिक ब्याज देना पड़ता है जिससे वे ऋण के जाल में फँस जाते हैं। फिर भी ग्रामीण क्षेत्रों में औपचारिक बैंकिंग सुविधाओं की कमी के कारण लोग अनौपचारिक स्रोतों पर निर्भर रहते हैं। यह व्यवस्था उधारकर्ताओं के लिए कई जोखिम उत्पन्न करती है।
12. औपचारिक और अनौपचारिक साख में अंतर बताइए।
उत्तर:
औपचारिक साख बैंकों और सहकारी समितियों द्वारा प्रदान की जाती है, जबकि अनौपचारिक साख साहूकारों, व्यापारियों और अन्य निजी व्यक्तियों द्वारा दी जाती है। औपचारिक साख पर ब्याज दर अपेक्षाकृत कम होती है तथा यह सरकारी नियमों के अंतर्गत संचालित होती है। दूसरी ओर, अनौपचारिक साख पर ब्याज दर अधिक हो सकती है और उस पर सरकारी नियंत्रण नहीं होता। औपचारिक क्षेत्र उधारकर्ताओं को सुरक्षा और पारदर्शिता प्रदान करता है, जबकि अनौपचारिक क्षेत्र में शोषण की संभावना अधिक रहती है। इसलिए आर्थिक दृष्टि से औपचारिक साख को अधिक लाभदायक माना जाता है।
13. उच्च जोखिम की स्थिति में ऋण समस्या कैसे बन सकता है?
उत्तर:
यदि कोई किसान या व्यवसायी ऋण लेकर उत्पादन करता है और प्राकृतिक आपदा, फसल खराब होने या व्यापार में नुकसान के कारण अपेक्षित आय प्राप्त नहीं होती, तो ऋण चुकाना कठिन हो जाता है। ऐसी स्थिति में उधारकर्ता को ब्याज सहित ऋण वापस करना पड़ता है, जिससे उस पर आर्थिक बोझ बढ़ जाता है। कई बार उसे अपनी संपत्ति बेचनी पड़ती है या नया ऋण लेना पड़ता है। यह स्थिति ऋण-जाल (Debt Trap) कहलाती है। इसलिए उच्च जोखिम वाली परिस्थितियों में ऋण लाभ के बजाय समस्या बन सकता है।
14. ऋण-जाल (Debt Trap) क्या है?
उत्तर:
ऋण-जाल वह स्थिति है जिसमें उधारकर्ता पुराना ऋण चुकाने के लिए नया ऋण लेने को मजबूर हो जाता है। यह समस्या तब उत्पन्न होती है जब उसकी आय ऋण और ब्याज चुकाने के लिए पर्याप्त नहीं होती। परिणामस्वरूप उसका कर्ज लगातार बढ़ता जाता है। किसान, मजदूर और छोटे व्यवसायी अक्सर इस स्थिति का सामना करते हैं। ऋण-जाल व्यक्ति की आर्थिक स्थिति को कमजोर कर देता है तथा गरीबी को बढ़ावा देता है। इसलिए सस्ती और सुलभ साख व्यवस्था की आवश्यकता होती है।
15. भारतीय रिज़र्व बैंक की भूमिका क्या है?
उत्तर:
भारतीय रिज़र्व बैंक (RBI) देश की केंद्रीय बैंकिंग संस्था है। यह मुद्रा जारी करने, बैंकों की निगरानी करने तथा ऋण संबंधी नीतियाँ बनाने का कार्य करता है। RBI यह सुनिश्चित करता है कि बैंक पर्याप्त नकदी रखें और विभिन्न वर्गों को ऋण उपलब्ध कराएँ। यह बैंकिंग व्यवस्था में स्थिरता बनाए रखता है तथा जनता के हितों की रक्षा करता है। इसके नियंत्रण के कारण औपचारिक बैंकिंग प्रणाली अधिक विश्वसनीय और सुरक्षित बनती है। इसलिए भारतीय अर्थव्यवस्था में RBI की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण है।
16. सस्ती और सुलभ साख क्यों आवश्यक है?
उत्तर:
सस्ती और सुलभ साख लोगों को कृषि, व्यापार, शिक्षा और अन्य उत्पादक कार्यों के लिए आवश्यक धन उपलब्ध कराती है। कम ब्याज दर पर ऋण मिलने से उधारकर्ताओं पर वित्तीय बोझ कम होता है और वे अपनी आय बढ़ाने में सक्षम होते हैं। इससे रोजगार, उत्पादन और आर्थिक विकास को प्रोत्साहन मिलता है। यदि साख महँगी हो तो गरीब और कमजोर वर्ग ऋण-जाल में फँस सकते हैं। इसलिए समावेशी आर्थिक विकास के लिए सस्ती और सुलभ साख अत्यंत आवश्यक है।
17. स्वयं सहायता समूह (SHG) क्या है?
उत्तर:
स्वयं सहायता समूह (Self Help Group) समान आर्थिक स्थिति वाले लोगों का एक छोटा समूह होता है, जो नियमित रूप से बचत करता है और आवश्यकता पड़ने पर अपने सदस्यों को ऋण प्रदान करता है। यह व्यवस्था विशेष रूप से ग्रामीण महिलाओं के लिए लाभकारी सिद्ध हुई है। समूह के सदस्य सामूहिक रूप से निर्णय लेते हैं और ऋण का उपयोग आय बढ़ाने वाले कार्यों में करते हैं। SHG के माध्यम से गरीब लोगों को बिना अधिक संपार्श्विक के ऋण प्राप्त हो जाता है। इससे उनकी आर्थिक स्थिति मजबूत होती है और आत्मनिर्भरता बढ़ती है।
18. स्वयं सहायता समूहों के दो लाभ लिखिए।
उत्तर:
स्वयं सहायता समूहों का पहला लाभ यह है कि इनके माध्यम से गरीब लोगों को आसानी से ऋण प्राप्त हो जाता है। दूसरा लाभ यह है कि ये लोगों में बचत की आदत विकसित करते हैं। समूह के सदस्य नियमित रूप से छोटी-छोटी बचत जमा करते हैं, जिससे एक सामूहिक कोष तैयार होता है। आवश्यकता पड़ने पर इसी कोष से ऋण दिया जाता है। SHG महिलाओं को आर्थिक रूप से सशक्त बनाते हैं तथा उन्हें स्वरोजगार के अवसर उपलब्ध कराते हैं। इससे ग्रामीण क्षेत्रों में आर्थिक विकास और सामाजिक जागरूकता दोनों को बढ़ावा मिलता है।
19. बैंक आर्थिक विकास में कैसे योगदान देते हैं?
उत्तर:
बैंक लोगों की बचत को एकत्रित करके उसे उत्पादक गतिविधियों के लिए ऋण के रूप में उपलब्ध कराते हैं। इससे उद्योग, व्यापार और कृषि क्षेत्रों में निवेश बढ़ता है। बैंक भुगतान प्रणाली को सरल बनाते हैं तथा सुरक्षित वित्तीय सेवाएँ प्रदान करते हैं। वे उद्यमियों और किसानों को पूँजी उपलब्ध कराकर रोजगार सृजन में सहायता करते हैं। बैंकिंग प्रणाली आर्थिक संसाधनों का उचित वितरण सुनिश्चित करती है, जिससे उत्पादन और आय में वृद्धि होती है। इस प्रकार बैंक किसी भी देश के आर्थिक विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।
20. मुद्रा और साख आर्थिक गतिविधियों के लिए क्यों महत्वपूर्ण हैं?
उत्तर:
मुद्रा और साख आधुनिक अर्थव्यवस्था की आधारशिला हैं। मुद्रा वस्तुओं और सेवाओं के आदान-प्रदान को सरल बनाती है तथा मूल्य मापन का माध्यम प्रदान करती है। दूसरी ओर, साख लोगों और व्यवसायों को आवश्यक पूँजी उपलब्ध कराती है जिससे उत्पादन, निवेश और रोजगार में वृद्धि होती है। बैंकिंग व्यवस्था के माध्यम से बचत को निवेश में परिवर्तित किया जाता है। यदि मुद्रा और साख की व्यवस्था सुचारु रूप से कार्य करे तो आर्थिक विकास को गति मिलती है तथा लोगों के जीवन स्तर में सुधार होता है। इसलिए दोनों का अर्थव्यवस्था में अत्यंत महत्वपूर्ण स्थान है।
