CBSE कक्षा 10 विज्ञान (भौतिक विज्ञान)
अध्याय 2 – मानव नेत्र एवं रंगबिरंगा संसार
20 महत्वपूर्ण प्रश्नोत्तर
1. मानव नेत्र को प्राकृतिक कैमरा क्यों कहा जाता है?
उत्तर:
मानव नेत्र को प्राकृतिक कैमरा कहा जाता है क्योंकि इसकी कार्यप्रणाली कैमरे के समान होती है। कैमरे में लेंस प्रकाश को फोकस करके फिल्म या सेंसर पर प्रतिबिंब बनाता है, उसी प्रकार नेत्र का उत्तल लेंस प्रकाश किरणों को अपवर्तित करके रेटिना पर वास्तविक तथा उल्टा प्रतिबिंब बनाता है। रेटिना कैमरे की फिल्म की तरह कार्य करती है। आइरिस और पुतली कैमरे के डायफ्राम की तरह प्रकाश की मात्रा नियंत्रित करते हैं। सिलियरी मांसपेशियाँ लेंस की फोकस दूरी बदलकर विभिन्न दूरियों की वस्तुओं को स्पष्ट दिखाती हैं। इसलिए मानव नेत्र एक अत्यंत विकसित प्राकृतिक प्रकाशीय यंत्र माना जाता है।
2. समंजन (Accommodation) क्या है?
उत्तर:
समंजन मानव नेत्र की वह क्षमता है जिसके द्वारा नेत्र का लेंस अपनी फोकस दूरी बदलकर विभिन्न दूरियों पर स्थित वस्तुओं का स्पष्ट प्रतिबिंब रेटिना पर बनाता है। जब हम निकट की वस्तु देखते हैं, तो सिलियरी मांसपेशियाँ संकुचित होकर लेंस को मोटा बना देती हैं, जिससे उसकी फोकस दूरी कम हो जाती है। दूर की वस्तु देखने पर ये मांसपेशियाँ शिथिल हो जाती हैं और लेंस पतला हो जाता है। इससे फोकस दूरी बढ़ जाती है। सामान्य नेत्र का निकट बिंदु 25 सेमी तथा दूर बिंदु अनंत पर होता है। समंजन की क्षमता उम्र बढ़ने के साथ घटती जाती है।
3. निकट बिंदु और दूर बिंदु से क्या अभिप्राय है?
उत्तर:
मानव नेत्र किसी वस्तु को तभी स्पष्ट देख सकता है जब उसका प्रतिबिंब रेटिना पर बने। सामान्य नेत्र के लिए स्पष्ट दृष्टि की न्यूनतम दूरी को निकट बिंदु कहते हैं। यह लगभग 25 सेमी होती है। इस दूरी से कम पर रखी वस्तु स्पष्ट नहीं दिखाई देती। दूसरी ओर, वह अधिकतम दूरी जहाँ तक नेत्र वस्तु को स्पष्ट देख सकता है, दूर बिंदु कहलाती है। सामान्य नेत्र के लिए दूर बिंदु अनंत पर माना जाता है। इन दोनों बिंदुओं के बीच की दूरी को दृष्टि परास कहते हैं। नेत्र की समंजन क्षमता इन्हीं सीमाओं के भीतर कार्य करती है।
4. निकट दृष्टिदोष (Myopia) क्या है? इसका सुधार कैसे किया जाता है?
उत्तर:
निकट दृष्टिदोष वह दृष्टि दोष है जिसमें व्यक्ति निकट की वस्तुओं को स्पष्ट देख सकता है, लेकिन दूर की वस्तुएँ धुंधली दिखाई देती हैं। इस दोष में दूर की वस्तु का प्रतिबिंब रेटिना के सामने बनता है। इसका कारण नेत्रगोलक का अधिक लंबा होना या नेत्र लेंस की अपवर्तन शक्ति का अधिक होना है। इस दोष को दूर करने के लिए अवतल (Concave) लेंस का उपयोग किया जाता है। अवतल लेंस प्रकाश किरणों को थोड़ा अपसारित कर देता है, जिससे प्रतिबिंब रेटिना पर बनने लगता है। यह दोष आजकल छात्रों में मोबाइल और स्क्रीन के अधिक उपयोग के कारण भी सामान्य रूप से देखा जाता है।
5. दूर दृष्टिदोष (Hypermetropia) क्या है?
उत्तर:
दूर दृष्टिदोष वह दोष है जिसमें व्यक्ति दूर की वस्तुओं को स्पष्ट देख सकता है, लेकिन निकट की वस्तुएँ धुंधली दिखाई देती हैं। इस स्थिति में निकट वस्तु का प्रतिबिंब रेटिना के पीछे बनता है। इसका कारण नेत्रगोलक का छोटा होना या नेत्र लेंस की अपवर्तन शक्ति का कम होना होता है। इस दोष के सुधार के लिए उत्तल (Convex) लेंस का प्रयोग किया जाता है। उत्तल लेंस प्रकाश किरणों को पहले ही अभिसरित कर देता है, जिससे प्रतिबिंब रेटिना पर बनने लगता है। वृद्धावस्था में यह दोष अधिक दिखाई देता है और पढ़ने में कठिनाई उत्पन्न करता है।
6. जरा-दूरदृष्टिता (Presbyopia) क्या है?
उत्तर:
जरा-दूरदृष्टिता आयु बढ़ने के साथ उत्पन्न होने वाला दृष्टि दोष है। सामान्यतः 40–45 वर्ष की आयु के बाद नेत्र लेंस की लोच कम हो जाती है तथा सिलियरी मांसपेशियाँ कमजोर पड़ जाती हैं। परिणामस्वरूप नेत्र की समंजन क्षमता घट जाती है और व्यक्ति निकट की वस्तुओं को स्पष्ट नहीं देख पाता। ऐसे लोगों को पढ़ते समय पुस्तक दूर रखनी पड़ती है। इस दोष के सुधार के लिए द्विफोकसी (Bifocal) अथवा प्रोग्रेसिव लेंसों का उपयोग किया जाता है। ये लेंस निकट और दूर दोनों प्रकार की दृष्टि को सुधारने में सहायता करते हैं।
7. प्रिज्म द्वारा प्रकाश का अपवर्तन क्या है?
उत्तर:
जब प्रकाश किरणें किसी काँच के प्रिज्म से होकर गुजरती हैं, तो वे दो बार अपवर्तित होती हैं—एक बार प्रवेश करते समय और दूसरी बार बाहर निकलते समय। प्रिज्म की सतहें एक-दूसरे के समानांतर नहीं होतीं, इसलिए प्रकाश का मार्ग मुड़ जाता है। इस घटना को प्रिज्म द्वारा प्रकाश का अपवर्तन कहते हैं। अपवर्तन के कारण प्रकाश अपनी मूल दिशा से विचलित हो जाता है। प्रिज्म में विभिन्न रंगों का विचलन अलग-अलग होता है, जिससे श्वेत प्रकाश के रंग अलग-अलग दिखाई देने लगते हैं। यही सिद्धांत वर्ण विक्षेपण और इंद्रधनुष जैसी घटनाओं को समझने में सहायक है।
8. वर्ण विक्षेपण (Dispersion) क्या है?
उत्तर:
श्वेत प्रकाश के अपने सात रंगों—बैंगनी, जामुनी, नीला, हरा, पीला, नारंगी और लाल (VIBGYOR)—में विभाजित होने की घटना को वर्ण विक्षेपण कहते हैं। जब श्वेत प्रकाश प्रिज्म से गुजरता है, तो विभिन्न रंगों का अपवर्तन अलग-अलग मात्रा में होता है। बैंगनी रंग का विचलन सबसे अधिक तथा लाल रंग का सबसे कम होता है। परिणामस्वरूप सभी रंग अलग-अलग दिखाई देते हैं और एक रंगीन स्पेक्ट्रम बनता है। वर्ण विक्षेपण के कारण ही इंद्रधनुष दिखाई देता है। यह घटना सिद्ध करती है कि श्वेत प्रकाश वास्तव में अनेक रंगों का मिश्रण है।
9. इंद्रधनुष कैसे बनता है?
उत्तर:
इंद्रधनुष प्रकृति में होने वाला एक सुंदर प्रकाशीय प्रभाव है। वर्षा के बाद वातावरण में उपस्थित जल की छोटी-छोटी बूंदें प्रिज्म की तरह कार्य करती हैं। सूर्य का श्वेत प्रकाश इन बूंदों में प्रवेश करके अपवर्तित होता है, फिर बूंद के अंदर परावर्तित होकर पुनः बाहर निकलते समय अपवर्तित होता है। इस प्रक्रिया में प्रकाश का वर्ण विक्षेपण होता है और सात रंग अलग-अलग दिखाई देते हैं। परिणामस्वरूप आकाश में अर्धवृत्ताकार रंगीन पट्टी बनती है जिसे इंद्रधनुष कहते हैं। इसमें लाल रंग बाहर तथा बैंगनी रंग अंदर दिखाई देता है।
10. वायुमंडलीय अपवर्तन क्या है?
उत्तर:
पृथ्वी के वायुमंडल में विभिन्न परतों का घनत्व अलग-अलग होता है। जब प्रकाश इन परतों से गुजरता है, तो वह लगातार अपवर्तित होता रहता है। इस घटना को वायुमंडलीय अपवर्तन कहते हैं। इसी कारण तारों का टिमटिमाना, सूर्य का वास्तविक स्थिति से पहले दिखाई देना तथा सूर्यास्त के बाद भी कुछ समय तक दिखाई देना जैसी घटनाएँ होती हैं। वायुमंडलीय अपवर्तन का प्रभाव अंतरिक्षीय पिंडों पर अधिक स्पष्ट दिखाई देता है क्योंकि उनका प्रकाश लंबी दूरी तय करके पृथ्वी तक पहुँचता है।
11. तारे टिमटिमाते क्यों दिखाई देते हैं?
उत्तर:
तारे पृथ्वी से बहुत दूर स्थित होते हैं और प्रकाश के बिंदु स्रोत की तरह दिखाई देते हैं। जब उनका प्रकाश पृथ्वी के वायुमंडल से होकर गुजरता है, तो विभिन्न घनत्व वाली वायु परतों के कारण बार-बार अपवर्तित होता है। इससे तारे की स्थिति और चमक लगातार बदलती रहती है। हमारी आँखों तक पहुँचने वाले प्रकाश की मात्रा भी बदलती रहती है। परिणामस्वरूप तारे कभी अधिक चमकीले और कभी कम चमकीले दिखाई देते हैं। इसी प्रभाव को तारों का टिमटिमाना कहते हैं। ग्रह अपेक्षाकृत पास होने के कारण सामान्यतः टिमटिमाते नहीं हैं।
12. ग्रह टिमटिमाते क्यों नहीं हैं?
उत्तर:
ग्रह पृथ्वी के अपेक्षाकृत निकट होते हैं और उनका दृश्य आकार अधिक होता है। वे बिंदु स्रोत के बजाय विस्तृत स्रोत की तरह दिखाई देते हैं। वायुमंडलीय अपवर्तन से उनके विभिन्न भागों से आने वाले प्रकाश में होने वाले परिवर्तन एक-दूसरे को संतुलित कर देते हैं। इसलिए उनकी कुल चमक लगभग स्थिर रहती है। परिणामस्वरूप ग्रहों की चमक में तारे जैसी तेजी से परिवर्तन नहीं होता और वे टिमटिमाते हुए नहीं दिखाई देते। यही कारण है कि रात के आकाश में ग्रहों की पहचान स्थिर प्रकाश वाले पिंडों के रूप में की जा सकती है।
13. सूर्य उदय से पहले और सूर्यास्त के बाद भी क्यों दिखाई देता है?
उत्तर:
यह घटना वायुमंडलीय अपवर्तन के कारण होती है। जब सूर्य क्षितिज के नीचे होता है, तब भी उससे आने वाली प्रकाश किरणें पृथ्वी के वायुमंडल की विभिन्न परतों से गुजरते समय अपवर्तित होकर हमारी आँखों तक पहुँच जाती हैं। इससे सूर्य अपनी वास्तविक स्थिति से थोड़ा ऊपर दिखाई देता है। परिणामस्वरूप सूर्य उदय से लगभग दो मिनट पहले दिखाई देने लगता है और सूर्यास्त के लगभग दो मिनट बाद तक दिखाई देता रहता है। इस प्रभाव को अग्रिम सूर्योदय तथा विलंबित सूर्यास्त कहा जाता है। यह वायुमंडलीय अपवर्तन का महत्वपूर्ण उदाहरण है।
14. प्रकाश का प्रकीर्णन क्या है?
उत्तर:
जब प्रकाश किसी माध्यम में उपस्थित सूक्ष्म कणों से टकराकर विभिन्न दिशाओं में फैल जाता है, तो इस घटना को प्रकाश का प्रकीर्णन कहते हैं। वायुमंडल में धूल, धुआँ तथा गैस के अणु प्रकाश का प्रकीर्णन करते हैं। छोटी तरंगदैर्ध्य वाला नीला प्रकाश अधिक प्रकीर्णित होता है जबकि लाल प्रकाश कम प्रकीर्णित होता है। प्रकीर्णन के कारण आकाश नीला दिखाई देता है और सूर्योदय तथा सूर्यास्त के समय सूर्य लाल दिखाई देता है। यह घटना प्रकृति में अनेक सुंदर दृश्य उत्पन्न करती है और वायुमंडलीय प्रकाशिकी का महत्वपूर्ण भाग है।
15. आकाश नीला क्यों दिखाई देता है?
उत्तर:
सूर्य का प्रकाश सात रंगों का मिश्रण होता है। जब यह प्रकाश पृथ्वी के वायुमंडल में प्रवेश करता है, तो वायु के अणु छोटी तरंगदैर्ध्य वाले नीले प्रकाश का अधिक प्रकीर्णन करते हैं। लाल प्रकाश का प्रकीर्णन कम होता है। चूँकि नीला प्रकाश चारों ओर अधिक फैल जाता है, इसलिए वह हर दिशा से हमारी आँखों तक पहुँचता है। परिणामस्वरूप हमें पूरा आकाश नीला दिखाई देता है। यदि वायुमंडल न होता, तो आकाश काला दिखाई देता। यह घटना प्रकाश के प्रकीर्णन का उत्कृष्ट उदाहरण है।
16. सूर्यास्त के समय सूर्य लाल क्यों दिखाई देता है?
उत्तर:
सूर्यास्त के समय सूर्य का प्रकाश वायुमंडल में अधिक लंबी दूरी तय करता है। इस दौरान नीले और अन्य छोटी तरंगदैर्ध्य वाले रंगों का अधिकांश भाग प्रकीर्णित हो जाता है। लाल रंग की तरंगदैर्ध्य सबसे अधिक होने के कारण उसका प्रकीर्णन सबसे कम होता है। इसलिए हमारी आँखों तक मुख्यतः लाल रंग की किरणें पहुँचती हैं। परिणामस्वरूप सूर्य लाल या नारंगी दिखाई देता है। यही कारण सूर्योदय के समय भी लागू होता है। यह घटना प्रकाश के प्रकीर्णन और वायुमंडलीय प्रभावों का प्रत्यक्ष उदाहरण है।
17. टिंडल प्रभाव क्या है?
उत्तर:
जब किसी कोलॉइडी विलयन या सूक्ष्म कणों वाले माध्यम से प्रकाश गुजरता है, तो वह कणों द्वारा प्रकीर्णित होकर अपना मार्ग दृश्यमान बना देता है। इस घटना को टिंडल प्रभाव कहते हैं। उदाहरण के लिए, धूल भरे कमरे में खिड़की से आती सूर्य की किरणें स्पष्ट दिखाई देती हैं। इसी प्रकार कोहरे में वाहन की हेडलाइट का प्रकाश भी दिखाई देता है। टिंडल प्रभाव तभी स्पष्ट होता है जब कणों का आकार प्रकाश की तरंगदैर्ध्य के तुलनीय हो। यह प्रभाव प्रकाश के प्रकीर्णन को समझने में अत्यंत महत्वपूर्ण है।
18. रेटिना का क्या कार्य है?
उत्तर:
रेटिना नेत्र की सबसे भीतरी प्रकाश-संवेदनशील परत होती है। इस पर वस्तु का वास्तविक तथा उल्टा प्रतिबिंब बनता है। रेटिना में दो प्रकार की कोशिकाएँ होती हैं—रॉड्स और कोन्स। रॉड्स कम प्रकाश में देखने में सहायता करती हैं, जबकि कोन्स रंगों की पहचान करते हैं। जब प्रकाश रेटिना पर पड़ता है, तो ये कोशिकाएँ विद्युत संकेत उत्पन्न करती हैं। ये संकेत दृष्टि तंत्रिका के माध्यम से मस्तिष्क तक पहुँचते हैं, जहाँ उनका विश्लेषण करके वस्तु की पहचान की जाती है। इस प्रकार रेटिना देखने की प्रक्रिया का अत्यंत महत्वपूर्ण भाग है।
19. दृष्टि तंत्रिका (Optic Nerve) का क्या महत्व है?
उत्तर:
दृष्टि तंत्रिका रेटिना और मस्तिष्क के बीच संचार का कार्य करती है। रेटिना पर बनने वाले प्रतिबिंब से उत्पन्न विद्युत संकेत इसी तंत्रिका के माध्यम से मस्तिष्क तक पहुँचते हैं। मस्तिष्क इन संकेतों का विश्लेषण करके वस्तु का सही चित्र बनाता है। जहाँ से दृष्टि तंत्रिका नेत्र से बाहर निकलती है, वहाँ प्रकाश-संवेदनशील कोशिकाएँ नहीं होतीं। इस स्थान को अंध बिंदु (Blind Spot) कहा जाता है। यदि दृष्टि तंत्रिका क्षतिग्रस्त हो जाए, तो व्यक्ति की देखने की क्षमता प्रभावित हो सकती है। इसलिए यह नेत्र की कार्यप्रणाली का अत्यंत महत्वपूर्ण भाग है।
20. मानव नेत्र में आइरिस और पुतली का क्या कार्य है?
उत्तर:
आइरिस नेत्र का रंगीन भाग होता है जो पुतली के आकार को नियंत्रित करता है। पुतली नेत्र में प्रकाश प्रवेश करने का द्वार है। तेज प्रकाश में आइरिस पुतली को छोटा कर देता है ताकि कम प्रकाश अंदर जाए और रेटिना सुरक्षित रहे। कम प्रकाश में पुतली बड़ी हो जाती है जिससे अधिक प्रकाश नेत्र में प्रवेश कर सके। यह प्रक्रिया स्वतः होती है और देखने की क्षमता को बेहतर बनाती है। कैमरे के डायफ्राम की तरह आइरिस और पुतली प्रकाश की मात्रा को नियंत्रित करके स्पष्ट दृष्टि प्रदान करते हैं।
